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Categories: Biology

Prokaryotic Chromosome in hindi , प्रोकैरियोटिक कोशिका क्या है में गुणसूत्रों की संख्या कितनी होती है

जाने Prokaryotic Chromosome in hindi , प्रोकैरियोटिक कोशिका क्या है में गुणसूत्रों की संख्या कितनी होती है ?

क्रोमेटिन संरचना व क्रोमेटिन संगठन (Chromatin Structure and Chromatin Organization)

वर्तमान समय में यह पूर्णरूपेण ज्ञात है कि पादप वाइरसों (RNA वाइरस) को छोड़कर सभी सजीवों में DNA ही आनुवंशिक पदार्थ है। प्रोकैरियोट्स में DNA केवल एक गुणसूत्र द्वारा ही व्यक्त होता है तथा सीधे ही कोशिकाद्रव्य में पाया जाता है। जबकि यूकैरियोट्स में DNA एक से अधिक गुणसूत्रों के रूप में निरूपित होता है तथा केन्द्रक द्रव्य में पाया जाता है, जो कि केन्द्रक झिल्ली द्वारा आबद्ध रहता है। गुणसूत्र सूत्रवत अथवा छड़नुमा संरचनाएँ हैं जिनमें स्वजनन की क्षमता होती है तथा ये पीढ़ी दर पीढ़ी संरचनात्मक एवं क्रियात्मक गुणों को बनाये रखते हैं तथा आनुवंशिक पदार्थ को पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित करने का कार्य करते हैं। इनमें क्षारीय अभिरंजकों से अभिरंजित होने का गुण होता है।

संक्षिप्त इतिहास (Brief history) :

ई. स्ट्रेसबर्गर (E. Strasburger, 1875) ने सर्वप्रथम कोशिका विभाजन के दौरान केन्द्रकं द्रव्य में स्पष्ट होने वाली ‘सूत्राकार संरचनाओं’ ‘गुणसूत्रों’ को देखा। डब्ल्यू. वाल्डेयर (W. Waldeyer, 1888) ने इन संरचनाओं को क्रोमोसोम्स (Chroma = Colour, Soma = body) नाम दिया, क्योंकि ये संरचनाएँ क्षारीय रंजकों से रंग जाती है । डब्ल्यू. एस. सटन ( W. S. Sutton, 1902) ने इनको आनुवंशिक पदार्थ को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाने वाले वाहकों के रूप में माना। हॉफमिस्टर (Hofmeister, 1948) ने इन्हें ट्रेडेस्केन्शिया (Trades cantia) की परागकण मातृ कोशिकाओं में देखा।

प्रोकैरियोटिक गुणसूत्र (Prokaryotic Chromosome) :

प्रोकैरियोटिक कोशिका द्रव्य के केन्द्र में एक रंगहीन केन्द्रकीय क्षेत्र होता है जिसे न्यूक्लिओइड (Nucleoid) अथवा जीनोफोर ( Genephore ) कहते हैं ! इस क्षेत्र में वलयाकार (Circular), कुण्डलित (Coiled), द्विरज्जुकी (Double stranded) DNA अणु पाया जाता है जिसे प्रोकैरियोटिक गुणसूत्र कहते हैं। DNA वलय अत्यधिक वलित होता है तथा प्लाज्मा झिल्ली से एक बिन्दु मीजोसोम से संलग्न रहता है। न्यूक्लिओइड क्षेत्र के चारों ओर केन्द्रक झिल्ली का अभाव होता है तथा इस क्षेत्र में कोशिका द्रव्य क्षार स्नेही (Basophilic ) होता है ।

प्रोकैरियोट्स में जीवाणु ई. कोलाई व सालमोनेला टाइफमुरियम की कोशिकाओं के गुणसूत्रों का विस्तृत अध्ययन किया गया है । जीवाणु ई. कोलाई की कोशिका में भी गुणसूत्र वलयाकार, वलित, द्विरज्जुकी DNA अणु का बना होता है जिसकी लम्बाई लगभग 1100 pm – 1400 um होती है। यह 3.235 X 106 न्यूक्लिओटाइड जोड़ों से मिलकर बना होता है। इसका आणविक भार 25.109 B – होता है। इस DNA में 4 क्षारकों (एडिनीन, ग्वानीन, साइटोसीन व थायमीन) क्षारक अन्य गुणसूत्र में DNA के साथ हिस्टोन प्रोटीन्स नहीं पाये जाते हैं किन्तु DNA अणु के साथ कुछ अन्य प्रोटान्स व RNA अणु मिलकर गुणसूत्र बनाते हैं जिसमें लगभग 30% RNA व 10% प्रोटीन्स (भार के आधार पर) पाये जाते हैं। चूँकि इनमें अनुलेखन की क्रिया पूर्ण होने के पश्चात् ही mRNA, DNA से जुड़ा दिखाई देता है। अत: RNA आनुवंशिक पदार्थ का हिस्सा नहीं होता है। इसी प्रकार जिन प्रोटीन्स की उपस्थिति देख 6-मिथाइल अमीनोप्यूरीन्स व 5-मिथाइल साइटोसीन भी पाये जाते हैं। यद्यपि प्रोकैरियोटिक गयी है, वे एन्जाइम्स होते हैं तथा प्रोकैरियोटिक गुणसूत्र के संरचनात्मक घटक नहीं होते हैं।

प्लाज्मिड्स (Plasmids ) — जीवाणु कोशिका में केन्द्रकीय DNA के अतिरिक्त कोशिकाद्रव्य में कई द्विरज्जुकी DNA वलय पाये जाते हैं जिन्हें प्लाज्मिड्स कहते हैं । जब ये अतिरिक्त DNA वलय केन्द्रीय DNA वलय में समायोजित हो जाते हैं तो एपीसोम्स (Episomes) कहलाते हैं। प्लाज्मि स्वायत्त तत्त्व होते हैं जिनमें स्वयं प्रतिकृत (replicate) होकर अनेक प्रतिलिपियाँ बनाने की क्षमता होत प्लाज्मिड है। संरचना में प्लाज्मिड्स भी वलथाकार, द्विरज्जुकी DNA अणु द्वारा निर्मित वलय हैं जिनमें 50 से जीन्स पाये हैं जो कि जीवाणु कोशिकाओं की कुछ क्रियाओं व लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।

DNA की लम्बाई लगभग 25 pm होती है तथा आणविक भार 5 x 107 डाल्टन होता है। जैसा कि जीवाणु ज्ञात है कि प्लाज्मिड्स एक स्वतंत्र आनुवंशिक तन्त्र होते हैं, अतः ऐसा माना जाता है कि कोशिकाद्रव्य में प्लाज्मिड्स किसी वाइरस के जीनोम हैं जो कि जीवाणु कोशिका में अतिरिक्त जीन्स के रूप में कार्य करते हैं । ये जीवाणु कोशिका में स्वतन्त्र रूप से प्रतिकृत होते हैं तथा कोशिका विभाजन व पिलाई (Pilli) द्वारा एक कोशिका से दूसरी कोशिका में स्थानान्तरित हो जाते हैं। जबकि एपीसोम्प में स्वयं प्रतिकृतिकरण (Self replication) का गुण नहीं पाया जाता है। इन्हें पहले जीवाणु DNA साथ समाकलित होना पड़ता है। फिर ही ये प्रतिकृत हो पाते हैं। जीवाणु कोशिकाओं में संयुग्मन (Conjugation) की क्रिया समय एपीसोम्स लिंग कारक (F”) की तरह कार्य करते हैं तथा संयुग्मक को नियंत्रित करते हैं। ये संयुग्मन नलिका द्वारा एक कोशिका से दूसरी कोशिका में प्रवेश कर जाते हैं ( चित्र 3.1 ) ।

यूकैरियोटिक गुणसूत्र (Eukaryotic Chromosomes) :

सभी यूकैरियोटिक जीवों की जाति विशेष में गुणसूत्रों की संख्या, आकार व परिमाप निश्चित होता है।

(1) संख्या (Number)

सामान्यतः जीवों की कायिक या वर्धी कोशिकाओं (Somatic cells) में गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित (Diploid = 2n) तथा जनन कोशिकाओं ( Sex units or gametes) में अगुणित (haploid = n) होती है। विभिन्न जातियों में गुणसूत्रों की संख्या भिन्न-भिन्न होती है । पिन वर्म (Pin worm) कोशिका में अगुणित संख्या 1, ऐस्केरिस मेगेलोसिफेला (Ascaris megalocephala) में 2 तथा कुछ प्रोटोजोआ में 300 से 400 तक गुणसूत्र पाये जाते हैं। आवृतबीजी पादपों (angiospermic plants) में अगुणित संख्या 3 से 16 तथा कवकों में 3 से 8 तक हो सकती है। इसी प्रकार टेरिडोफाइट्स

की आधारीय गुणित संख्या जिसमें जीन का एक पूर्ण समुच्चय होता है, जीनोम (genome) कहलाती (Peridophytes ) में गुणसूत्रों की द्विगुणित संख्या 1200 से अधिक होती है। किसी भी जीव में गुणसूत्रों

(2) केरियोटाइप एवम् इडियोग्राम (Karyotype & Idiogram)

किसी भी जाति के गुणसूत्र समुच्चय को जिन आकारिकीय लक्षणों के आधार पर पहचाना जाता है, वह उसका केरियोटाइप कहलाता है। इसके अन्तर्गत निम्न लक्षण समावेशित होते हैं- (a) गुणूसत्रों की संख्या (Number of chromosomes) ।

(b) गुणसूत्रों की लम्बाई तथा व्यास ।

(c) संकीर्णन – प्राथमिक, द्वितीयक तथा सेटेलाइट ।

(d) क्रोमेटिन की कुल लम्बाई ।

(e) भुजाओं का अनुपात-लम्बी भुजाओं की कुल लम्बाई /छोटी भुजाओं की कुल लम्बाई । (f) क्रोमेटिन की लम्बाई में प्रत्येक गुणसूत्र के योगदान की प्रतिशतता ।

इडियोग्राम – किसी भी जाति के केरियोटाइप का आरेखीय निरूपण ( diagrammatic representation) इडियोग्राम कहलाता है।

केरियोटाइप तैयार करने की विधि

मानव एवं अन्य लैंगिक जनन करने वाले प्राणियों में गुणसूत्र जोड़ों में पाये जाते हैं। प्रत्येक जोड़े अथवा युग्म में एक गुणसूत्र मातृक (maternal) व दूसरा पैतृक (paternal) होता है जो कि संरचना में एक समान दिखाई देते हैं, समजात (Homologous) गुणसूत्र कहलाते हैं । अतः केरियोटाइप बनाते समय समजात गुणसूत्रों को एक साथ रखा जाता है, जैसा कि चित्र 3.2 में मानव केरियोटाइप में प्रदर्शित है।

चित्र 3.2 : मानव केरियोटाइप का इडियोग्राम

केरियोटाइप तैयार करने हेतु ऐसी कोशिका जो कि ऊतक संवर्धन (Tissue culture) में परिवर्धित हो रही होती है उसे कृत्रिम रूप से समसूत्री विभाजन ( mitosis) के लिए उत्प्रेरित ( induce) करते हैं। कोशिका विभाजन को कोल्चीसीन (colchicine) रसायन द्वारा मध्यावस्था में रोक लिया जाता है, क्योंकि इस अवस्था में ही गुणसूत्र संरचना अधिक संकुचन के कारण सबसे स्पष्ट होती है ।

चित्र 3.4: क्रोमोनीमल धागों की कुण्डलियाँ

(i) पैरानिमिक कुण्डलन (Paranemic coiling) — इसमें क्रोमोनिमा के हो सकते हैं ।

सूत्र सरलता से अलग

(ii) प्लेक्टोनिमिक कुण्डलन (Plectonemic coiling ) – इसमें क्रोमोनिमा के सूत्र आपस में अत्यधिक गुँथे रहते हैं तथा उन्हें सरलता से अलग नहीं किया जा सकता है।

(c) क्रोमोमीयर्स (Chromomeres)

अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) की पूर्वावस्था (Prophase) में गुणसूत्रों पर सूक्ष्म दाने के समान उभार दिखायी देते हैं जिनका आकार व स्थिति निश्चित होती है, इन्हें क्रोमोमीयर्स (chromomeres) कहते हैं। सर्वप्रथम इन संरचनाओं का वर्णन बालबियानी (Balbiani, 1876) ने किया। क्रोमोमीयर्स क्रोमोनिमा पर पायी जाने वाली मणिकाकार (beaded संरचनाएँ होती हैं जिनके बीच-बीच में पाया जाने वाला स्थान अन्तर- क्रोमोमीयर (Interchromomere) कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि क्रोमोमीयर्स में अधिक मात्रा में न्यूक्लिक अम्ल व प्रोटीन के संश्लेषण व उन्हें इकट्ठा करने की क्षमता होती है। इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा देखने पर क्रोमोमीयर्स क्रोमोनिमा के स्थानीकृत (localized) वलन (coiling) से उत्पन्न होने वाली संरचनायें दिखायी देती हैं। क्रोमोनिमा पर इनकी संख्या सहस्रों में हो सकती है।

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