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बीजों के अंकुरण की प्रक्रिया क्या है , Process of Germination in hindi process of seed to plant
जानिये बीजों के अंकुरण की प्रक्रिया क्या है , Process of Germination in hindi process of seed to plant ?
अंकुरण की प्रक्रिया (Process of Germination)
- आकारिकी परिवर्तन (Morphological changes )
अंकुरण की प्रक्रिया बीजों द्वारा जल के अंतर्ग्रहण ( uptake) से प्रारंभ होती है। कुछ समय बाद भ्रूण में वृद्धि होती है, बीज चोल फट जाता है। इसमें से मूलांकुर बाहर निकलता है तथा बाद में प्रांकुर भी बाहर निकलता है। इस बीच में कुछ अंतराल होता है जो विभिन्न बीजों में भिन्न-भिन्न होता है। बीजों को भिगोने के कुछ समय तक अंकुरण बहुत कम होता है। बाद में बहुत तेजी से बढ़ता है कुछ समय बाद यह अंकुरण प्रतिशत कम होने लगती है। अंकुरण के समय लगभग सभी बीजों में एक समान आकारिकी परिवर्तन होते हैं। जल योजन के फलस्वरूप पूरा भ्रूण अक्ष फूल जाता है तथा भ्रूण की सक्रिय वृद्धि प्रारंभ होती है। पहले मूलांकुर में वृद्धि होती है तथा वह 24 48 घंटों के भीतर बीज चोल को तोड़कर बाहर निकल जाता है। यहां तक की अवस्था अंकुरण की प्रथम अवस्था कहलाती है। मूलांकुर विकसित जड़ बनाने लगता है एवं प्रांकुर की वृद्धि प्रारंभ होती है। एकबीजपत्रियों में प्रांकुर चोल (coleoptile) की वृद्धि होती है फिर इसमें अंतपर्व इत्यादि की वृद्धि होने के बाद पहली सामान्य पत्ती बाहर निकलती है। द्विबीजपत्री पादपों में बीजपत्रोपरिक में वृद्धि होती है तथा प्रथम पर्ण आद्यक में वृद्धि होती है।
- अंकुरण की प्रक्रिया में कार्यिकी परिवर्तन (Physiological changes during Germination)
अंकुरण की प्रक्रिया पहले जल के अतः शोषण (imbibition) तथा फिर अवशोषण (absorption) के साथ प्रारंभ होती है। अंतःशोषण बीजों में उपस्थित कोलाइडी पदार्थों यथा कार्बोहाइड्रेट व प्रोटीन के कारण होता है। समान्यतः द्विबीजपत्री बीज मे बीज चोल दो परतों से बना होता है। बाहरी मोटी परत गैसों के लिए पारगम्य होती हैं। भीतरी परत में एक परत जीवित कोशिकाओं की अवश्य होती है। जल के अवशोषण के साथ इन परतों की पारगम्यता विशेषकर गैसों के लिए बढ़ती जाती है
बीज में जलावशोषण के साथ कार्यिकी स्तर पर निम्न मुख्य परिवर्तन होते हैं:-
1.कोशिकाओं के आकार में परिवर्तन
2.बीज में संचित भोजन का जल अपघटन एवं स्थानांतरण
- बीज में पोषक ऊतकों यथा बीजपत्र अथवा भ्रूणपोष में उपस्थित पदार्थों का नवीन कोशिकाओं विशेषकर मूलांकुर एवं प्रांकुर के शीर्ष पर उपस्थित कोशिकाओं के लिए उपयोगी पदार्थों में परिवर्तन
जल अवशोषण के फलस्वरूप कोशिकाओं का आकार बहुत बढ़ जाता है तथा विभिन्न कोशिकांगों में भी जल अंतः ग्रहण होता है एवं उनका आकार व आकृति सामान्य हो जाते हैं। इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी के द्वारा मटर के बीजों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इसमें माइट्रोकॉन्ड्रिया आकार में बढ़ जाते हैं. उनमें क्रिस्टी विकसित हो जाते हैं व श्वसन दर बढ़ जाती है। जबकि सूखे बीजों में माइटोकॉन्ड्रिया गोल पिण्ड के समान व क्रिस्टी ( cristae) से रहित होते हैं।
अंकुरण के आरंभन के साथ ही सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन श्वसन दर का तीव्र गति से बढ़ना होता है। कुछ समय तक लगातार बढ़ने के बाद श्वसन दर स्थिर हो जाती है। यह संभवतः बीज चोल के फटने से ठीक पहले होती है। फिर दोबारा श्वसन दर तेजी से बढ़ती है। संभवतः बीज चोल के फटने के बाद अधिक O2 की उपलब्धता से यह तेजी आती है। मटर में प्रारंभ में मुख्यतः अनॉक्सी श्वसन होता है।
अनेक बीजों में कुछ एन्जाइम जैसे साइटोक्रोम ऑक्सीडेज, ऐस्कॉर्बिक अम्ल आक्सीडेज, B एमाइलेज, इलैक्ट्रान स्थानांतरण श्रृंखला इत्यादि पाये जाते हैं, परन्तु शुष्क बीजों में निष्क्रिय होते हैं। जलावशोषण के साथ ही अनेक ऐसे विकर सक्रिय हो जाते हैं।
अनेक बीजों में न्यूक्लिक अम्ल उपापचय का भी अध्ययन किया गया है। कुछ बीजों (जैसे अरंडी) में जल अवशोषण के तुरन्त बाद 30 मिनट के भीतर पोलीराइबोसोम (polyribosomes ) का संगठन व प्रोटीन संश्लेषण प्रारम्भ हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि ऐसे बीजों में mRNA पहले से ही उपस्थित होता है तथा जलशोषण के बाद इनसे प्रोटीन संश्लेषण प्रारंभ हो जाता है। अनेक बीजों में अंकुरण प्रारंभ होने के बाद DNA से mRNA तथा इनसे नये विकर व प्रोटीन का संश्लेषण होता है।
बीजों में संचित भोजन यथा प्रोटीन, वसा, मंड तथा अमिनो अम्ल व विभिन्न विकरों की सक्रियता अंकुरण से संबंधित है। 7 दिन के भीतर ही संचयी ऊतकों जैसे बीज पत्र व भ्रूण पोष में से प्रोटीन व मंड इत्यादि की मात्रा लगभग आधी रह जाती है। चने में प्रोटीन के जलअपघटन के कारण बीजपत्र में अमिनो अम्ल की तथा मंड के अपघटन के फलस्वरूप विलेय शर्करा की मात्रा काफी बढ़ जाती है।
बीजांकुरण के समय संग्रहीत पदार्थों का चालन (Mobilization of stored products during seed germination)
बीजों के जलावशोषण के साथ ही बीजों में उपस्थित अनेक विकर सक्रिय हो जाते हैं। अंकुरण के दौरान बीज के विभिन्न भागों यथा भ्रूणपोष, बीजपत्र, परिभ्रूणपोष इत्यादि में उपस्थित संग्रहीत पदार्थों (मुख्यतया प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा तथा कुछ पादपों में सेलुलोस एवं हेमीसेलुलोस ) का अपघटन होता है तथा उनके जल अपघटन उत्पाद विभिन्न स्थानों पर जहाँ पर इनकी आवश्यकता होती है पहुँचा दिये जाते हैं। यहां पर इनका उपयोग विभिन्न पदार्थों व अवयवों के संश्लेषण में तथा ऊर्जा के लिए किया जाता है। नवोद्भिद् पादपों के मिट्टी से बाहर निकलने व हरी पत्तियां बनने के बाद संग्रहीत पदार्थों पर निर्भरता लगभग समाप्त हो जाती है।
विभिन्न संग्रही पदार्थों के अपघटन व चालन के बारें में यहां संक्षेप में दिया जा रहा है।
- संग्रही कार्बोहाइड्रेट का चालन (Mobilization of stored carbohydrates)
सामान्यतः बीजों में कार्बोहाइड्रेट भ्रूणपोष एवं बीजपत्रों में होता है तथा मंडकणों में एमाइलेस एवं एमाइलोपैक्टिन के रूप में होता है। अधिकांशतः मंड का जल अपघटन a- एमाइलेस तथा B-एमाइलेस नामक विकरों द्वारा होता है। – एमाइलेस शुष्क बीजों में पहले से उपस्थित होता है तथा a-एमाइलेस का बीजांकुरण के समय संश्लेषण होता है। ये दोनों प्रक्रियाएँ भ्रूण में उपस्थित GA द्वारा नियंत्रित होती है ।
मंड – a-एमाइलेस – एमाइलेस → जल में विलेय ऑलिगोसैकराइड b-एमाइलेस → माल्टोस a – ग्लूकोसाइडेस ग्लूकोस
एमाइलेस विकर की अभिक्रिया से एमाइलोस, माल्टोस एवं ग्लूकोस बनते हैं। मंड के अपघटन से पहले बीजों में उपस्थित शर्करा का उपयोग होता है उसके बाद मंड के अपघटन उत्पादों का उपयोग होता है।
- संग्रही प्रोटीन का चालन (Mobilization of stored proteins)
अधिकांशतः प्रोटीन लेग्यूमी बीजों के बीजपत्र में होती है। अनाज वर्ग के पौधों में मुख्यतया एल्यूरॉन परत (aleurone layer) में तथा मंड युक्त भ्रूणपोष में पायी जाती है। इसके अतिरिक्त स्कुटैलम तथा भ्रूण अक्ष में भी कुछ मात्रा में प्रोटीन पायी जाती है।
बीजांकुरण के दौरान संग्रही प्रोटीन का जलापघटन प्रोटीनलयी विकरों प्रोटिएज (protease) एवं पेप्टिडेज द्वारा होता है तथा अमिनो अम्ल (amino acids) पैप्टाडाइड (peptides) एवं एमाइड (amids) बनते हैं। ये भ्रूणपोष व स्कुटैलम के माध् यम से होते हुए विकास कर रहे भ्रूण तक स्थानांतरित हो जाते हैं जहाँ वांछित नयी प्रोटीन का संश्लेषण होता है । लेग्यूमी व अन्य द्विबीजपत्रियों में अनेक प्रकार के प्रोटीनलयी विकर होते हैं उनमें से कुछ पहले से बीज में उपस्थित होते हैं तथा कुछ विकरों का संश्लेषण बीजों के अंकुरण के समय होता है। ये विकर मुख्यतः दो समूहों में रखे जा सकते हैं-
(i) प्रोटीनेज़ (Proteinases)
(ii) पेप्टिडेज़ (Peptidases)
प्रोटीनेज मुख्यरूप से वृहत प्रोटीन अणुओं पर क्रिया कर उन्हें पेप्टाइड (peptideds) व पोलीपेप्टाइड (poly peptides) में अपघटित कर देते हैं। पैप्टिडेज इन पोलीपेप्टाइड पर अभिक्रिया कर उन्हें छोटे पैप्टाइड, एमाइड एवं अमिनो अम्ल में बदल देते हैं।
प्रोटीन प्रोटीनेज पैप्टिडेज → पेप्टाइड अमिनो अम्ल
संग्रहण ऊतकों से आवश्यक स्थानों पर (अर्थात् नवोद्भिद में) नाइट्रोजिनी पदार्थों का स्थानान्तरण एमिनो अम्ल के बजाय मुख्य रूप से एमाइड जैसे – एस्पार्जिन, ग्लूटेमिन (aspargine, glutamine) के रूप में होता है। अतः लेग्यूमिनोसी बीज पत्रों में एस्पार्जिन सिन्थेटेस तथा ग्लूटेमिन सिन्थेटेस (Aspargine synthetase and Glutamine synthetase) की सक्रियता बहुत बढ़ जाती है। परन्तु अलग-अलग पादपों में विभिन्न अमिनो अम्ल के रूप में भी स्थानांतरण हो सकता है। मटर में यह चालन (mobilization) व स्थानान्तरण होमोसिरीन (homoserine) के रूप में होता है। अंरडी (Ricinus) में प्रोटीन भ्रूणपोष में पायी जाती हैं तथा उनके अपघटन के बाद अमिनो अम्ल एमाइड ग्लूटेमिन (glutamine) के रूप में स्थानांतरित होती हैं तथा कुछ भाग शर्करा (सूक्रोस) के रूप में स्थानांतरित व उपयोगी होती है।
- संग्रही लिपिड का चालन (Mobilization of storage lipids)
लिपिड भ्रूणपोष (उदाहरण – अंडी Ricinus ) तथा बीज पत्रों (उदाहरण- सरसों, मूंगफली) में मुख्य रूप से ट्राइग्लिसराइड के रूप में पाए जाते हैं । इन का जलापघटन लाइपेस विकर द्वारा ग्लिसरोल एवं वसा अम्लों में होता है।
लिपिड ( वसीय अम्ल के ग्लिसराइड) लाइपेस → ग्लिसरोल + वसा अम्ल
कुछ पादपों में वसा अम्ल कार्बोहाइड्रेट में बदल जाते हैं तथा यह परिवर्तन विशेष कोशिकांगों ग्लाइऑक्सीसोम (glyoxysomes ) में होता है। (उदाहरण- मूंगफली एवं अंरडी) ।
पादपों में भ्रूणपोष अथवा बीजपत्र से वसा अथवा लिपिड का स्थानांतरण नहीं हो पाता अतः उनका अधिक गतिमान अणु अर्थात् सूक्रोज (sucrose) में परिवर्तित होने के बाद ही उनका स्थानांतरण होता है। वसा अम्लों से ग्लूकोज में परिवर्तन की प्रक्रिया ओलियोसोम, माइटोकोन्ड्रिया, ग्लाइऑक्सीसोम एवं जीवद्रव्य चारों के समन्वयन से सम्पन्न होती है। सम्भवतः अंकुरण की पहली अवस्था से यह प्रक्रिया प्रेरित होती है तथा ट्राइग्लिसरोल के जल अपघटन से प्रारंभ होती है जिससे वसा अम्ल (fatty acids) बनते हैं।
लिपिड का शर्करा में परिवर्तन बीजांकुरण से प्रेरित (triggered ) होता है तथा ट्राइएसाइल ग्लिसरोल (वसा) के जल अपचयन (hydrolysis) से प्रारंभ होता है। इससे प्राप्त वसा अम्लों का B ऑक्सीकरण होने से एसिटाइल CoA बनता है। पादपों में यह प्रक्रिया ग्लाइऑक्सीसोम (glyoxysomes ) में तथा जंतुओं में यह प्रक्रिया माइटोकोन्ड्रिया में होती है। जंतुओं में एसिटाइल CoA संभवतः TCA चक्र में प्रवेश करता है तथा इसका पूर्ण आक्सीकरण हो जाता है। पादपों में एसिटाइल CoA ग्लाइऑक्सलेट चक्र (glyoxalate cycle) में प्रवेश करता है।
ग्लाइऑक्सलेट चक्र (Glyoxalate cycle)
ग्लाइऑक्सीसोम में B आक्सीकरण से प्राप्त एसिटाइल CoA ग्लाइआक्सलेट चक्र में प्रवेश करता है। प्रारंभ में यह ऑक्सेलोएसिटेट (oxalooacetate/OAA) से क्रिया करता है तथा सिट्रेट सिन्धेज़ (citrate synthase) की उपस्थिति में सिट्रेट (citrate) बनाता है। सिट्रेट एकोनिटेस (Aconitase) की उपस्थिति में आइसोसिट्रेट में परिवर्तित हो जाता है। कुछ वैज्ञानिकों के मतानुसार ग्लाइऑक्सीसोम में एकोनिटेज एन्जाइम नहीं होता अथवा इसकी सक्रियता बहुत कम होती है इसलिए सिट्रेट कोशिका द्रव में स्थानांतरित होने के पश्चात आइसोसिट्रेट में परिवर्तित होता है एवं ग्लाइऑक्सीसोम में स्थानांतरित होता है। आइसोसिट्रेट आइसोसिट्रेट लायेस (isocitrate lyase) की उपस्थिति में सक्सीनेट (succinate) एवं ग्लाइऑक्सलेट (glyoxalate) में बदल जाता है। ग्लाइऑक्सलेट एसिटाइल CoA के साथ मैलेट सिन्थेस एन्जाइम (Malate synthase) की उपस्थिति में मैलेट (Malate) बनाता है तथा CoA समूह मुक्त हो जाता है। मैलेट का मैलेट डिहाइड्रोजिनेस (malate dehydrogenase) की उपस्थिति में विहाइड्रोजनीकरण (dehydrogenation) होता है तथा फिर से ऑक्सेलोएसिटेट बन जाता है जो एसिटाइल CoA के साथ क्रिया करता है।
सक्सीनेट का शर्करा में परिवर्तन (Conversion of succinate to sugar)
ग्लाइऑक्सलेट चक्र में आइसोसिट्रेट के अपघटन से बना सक्सीनेट माइटोकोन्ड्रिया में प्रवेश करता है तथा TCA चक्र के माध्यम से मेलेट में परिवर्तित हो जाता है। मैलेट माइट्रोकॉन्ड्रिया से कोशिका द्रव (cytosol) में आ जाता है तथा ऑक्सीकृत हो कर ऑक्सेलोएसिटेट बनाता है। यह ATP के रूप में उर्जा का उपयोग करते हुए PEP कार्बोक्सिीकाइनेज (PEP Carboxykinase) की उपस्थिति में फास्फोइनोल पायरूवेट (phosphoenol pyruvate) बनाता है। अन्त में ग्लाइकोलिसिस की उलट प्रक्रिया के माध्यम से फ्रक्टोस -6- फास्फेट बनता है तथा इससे सूक्रोस बनता है। सूक्रोज वह पहला वसा उपापचयी उत्पाद है जिसे अब पादप के विभिन्न भागों में सरलता पूर्वक स्थानांतरित किया जा सकता है।
कुछ पादपों जैसे अरंडी, सूरजमुखी इत्यादि में पूरे लिपिड का सूक्रोस परिवर्तन नहीं होता। इनमें लिपिड के अपघटन एवं ऑक्सीकरण से उत्पन्न घटकों का बीजपत्र में क्लोरोप्लास्ट एवं अन्य संरचनाओं के संश्लेषण में उपयोग हो जाता है।
ग्लाइऑक्सीसोम में इसके उपापचयन से सक्सीनेट बनता है जो माइटोकोन्ड्रिया में प्रवेश करता है व ऑक्सेलोएसिटेट में परिवर्तित हो जाता है। यह जीवद्रव्य में स्थानांतरित हो जाता है तथा ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाता है जो सूक्रोज में परिवर्तित हो जाता है तथा वांछित ऊतक तक कोशिकाओं से सामान्य विसरण अथवा पोषवाह द्वारा पहुँच जाता है।
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