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प्राथमिक जाइलम और द्वितीयक जाइलम में अंतर (difference between primary xylem and secondary xylem)
(difference between primary xylem and secondary xylem in hindi) प्राथमिक जाइलम और द्वितीयक जाइलम में अंतर क्या है , किसे कहते है ? परिभाषा क्या है लिखिए |
रम्भ क्षेत्र में द्वितीयक वृद्धि (secondary growth in stelar region) : अनावृतबीजी पौधों और बहुवर्षी द्विबीजपत्री पौधों के तनों की प्राथमिक संरचना में संवहन बंडल एक वलय में पाए जाते है। इस प्रकार की रम्भीय संरचना का युस्टिलिक अवस्था कहते है। मज्जा बीच में पायी जाती है। यह संवहन बंडल संयुक्त , समपाशर्विक और खुले हुए होते है।
संवहन कैम्बियम निर्माण (formation of vascular cambium)
जब तने में द्वितीयक वृद्धि प्रारंभ होती है तो उस समय दो संवहन बंडलों के मध्य उपस्थित अन्त:पूलीय एधा के तल पर उपस्थित मृदुतकी कोशिकाएँ विभाज्योतकी हो जाती है और एधा अथवा केम्बियम का निर्माण करती है। इस एधा को अन्तरपूलीय एधा कहते है। चूँकि यह द्वितीयक उत्पत्ति की होती है अत: इसको द्वितीयक एधा (secondary cambium) भी कहते है।
संवहन बंडलों के बीच में अंतरपूलीय एधा पट्टिकाओं के अंत:पूलीय एधा से संयुक्त होने से अब सम्पूर्ण कैम्बियम एक वलय के रूप में निरुपित होता है। इस कैम्बियम वलय को संवहन कैम्बियम कहते है।
संवहन कैम्बियम की सक्रियता के कारण बाहर की तरफ द्वितीयक फ्लोएम और भीतर की तरफ द्वितीयक जाइलम का निर्माण होता है। संवहन कैम्बियम की कोशिकाएँ सजीव , आयताकार , मृदुतकी , रिक्तिका युक्त और सघन जीवद्रव्य वाली होती है जो एक परत में व्यवस्थित होती है।
इनके सक्रीय विभाजन के परिणामस्वरूप तने में द्वितीयक संवहन ऊतकों का निर्माण होता है। संवहन कैम्बियम में मुख्यतः दो प्रकार की कोशिकाएँ मौजूद होती है। यह है –
(1) तर्कुरुपी प्रारंभिक : यही कोशिकाएँ लम्बाई में अधिक और चौड़ाई में कम होती है और तने की अक्ष के समान्तर लम्बवत रूप से व्यवस्थित होती है। इनकी सक्रियता के परिणामस्वरूप बाहर की तरफ फ्लोयम और भीतर की तरफ जाइलम निर्मित होता है।
(2) रश्मि प्रारम्भिक : संवहन कैम्बियम की यह विभाज्योतकी कोशिकाएं अपेक्षाकृत छोटी और समव्यापी होती है और यह तने में अरीय रूप से अथवा आड़ी अक्ष के समकोण पर व्यवस्थित होती है और इनके विभाजन में सामान्य मृदुतकी कोशिकाएँ बनती है।
संवहन कैम्बियम की सक्रियता (activity of vascular cambium)
कैम्बियम की प्रत्येक तर्कुरुपी प्रारंभिक कोशिका में परिनतिक विभाजन बनने वाली कोशिकाओं में से एक सन्तति कोशिका विभाज्योतकी बनी रहती है जबकि दूसरी सन्तति कोशिका जाइलम या फ्लोयम मातृ कोशिका बनाती है। मातृ कोशिकाएं क्रमशः द्वितीयक जाइलम या द्वितीयक फ्लोयम तत्वों में विभेदित हो जाती है। बाह्यत्वचा की तरफ बनने वाली कोशिका द्वितीयक फ्लोएम और केंद्र की तरफ बनने वाली सन्तति कोशिका द्वितीयक जाइलम बनाती है।
सामान्यतया तर्कुरूपी प्रारंभिक बाहर की ओर कम जबकि अन्दर की तरफ अधिक सक्रियता दर्शाती है जिसके फलस्वरूप परिपक्व तने में जाइलम की मात्रा सदैव फ्लोएम से अधिक पायी जाती है।
कैम्बियम की रश्मि प्रारंभिक कोशिकाएं अन्दर और बाहर दोनों तरफ मृदुतकी कोशिकाएँ बनाती है जो द्वितीयक मज्जा किरणों में विभेदित होती है। इन मज्जा किरणों का विस्तार द्वितीयक जाइलम और द्वितीयक फ्लोयम में होता है। सामान्यतया कैम्बियम की सभी कोशिकाएं समान सक्रियता दर्शाती है जिसमें द्वितीयक वृद्धि से फलस्वरूप द्वितीयक संवहन ऊतक का एक संहत सिलिंडर बनता है।
कैम्बियम कोशिकाओं में परिनत विभाजनों के अतिरिक्त कुछ अपनतिक और तिर्यक विभाजन भी होते है। इन विभाजनों के फलस्वरूप कैम्बियम की परिधि में वृद्धि होती है।
जैसे जैसे अन्दर की तरफ जाइलम की कोशिकाएं अधिकाधिक मात्रा में बनती है तो इसके साथ ही कैम्बियम और इसके बाहर निर्मित फ्लोयम की कोशिकाओं पर भी दबाव बढ़ता जाता है। इसकी वजह से यह दोनों ऊतक क्षेत्र बाहर की तरफ खिसकते जाते है। परिणामस्वरूप तने के व्यास में वृद्धि होती है। इस बढ़ते हुए दबाव के कारण प्राथमिक फ्लोयम की कोशिकाएं बाहर की तरफ विघटित होकर तंतुओं में रूपांतरित हो जाती है और प्राथमिक जाइलम केन्द्रीय भाग में मज्जा की ओर खिसकता जाता है। कुछ समय तक तो यह दिखाई देता है लेकिन बाद में मज्जा के स्थान पर आ जाता है तथा मज्जा नष्ट हो जाती है।
कैम्बियम वलय की सक्रियता के कारण द्वितीयक ऊतकों का निर्माण होता है। कैम्बियम की सक्रियता उष्णकटिबंधीय वृक्षों में पूरे साल बनी रहती है लेकिन ठन्डे या शीतोष्ण प्रदेशों में कैम्बियम की सक्रियता प्रतिकूल परिस्थितियों में बहुत कम अथवा लगभग नगण्य हो जाती है परन्तु अनुकूल परिस्थितियों के आते ही यह सक्रीयता यथावत पूर्व स्थिति में आ जाती है। यही नहीं पौधे की युवावस्था में कैम्बियम अधिक सक्रीय होता है लेकिन प्रोढ़ अवस्था में कैम्बियम की सक्रियता धीरे धीरे कम होने लगती है।
द्वितीयक जाइलम की संरचना (structure of secondary system)
प्राथमिक जाइलम के समान द्वितीयक जाइलम भी चार प्रकार के तत्वों वहिनिकाओं , वाहिकाओं , जाइलम तंतु और जाइलम मृदुतक से बना होता है। प्राथमिक जाइलम के वाहिकीय तत्व द्वितीयक जाइलम की अपेक्षा लम्बे होते है। द्वितीयक जाइलम या काष्ठ दो ऊतक तन्त्रों में विभाजित किया जा सकता है –
- अक्षीय अथवा अनुदैधर्य तंत्र (axial or longitudinal system)
- अरीय / अनुप्रस्थ तन्त्र (radial or transverse system)
- अक्षीय अथवा अनुदैधर्य तंत्र (axial or longitudinal system): इनमें जाइलम की सभी प्रकार की कोशिकाएं या तत्व जैसे वाहिका , वहिनिका , जाइलम तंतु और मृदुतक पाए जाते है। ये तत्व अक्ष में अनुदैधर्य क्रम में विन्यासित रहते है अर्थात तने के केन्द्रीय अक्ष के समानान्तर होते है। इस तंत्र का अध्ययन तने के अनुप्रस्थ काट अथवा अरीय लम्बवत काट में किया जाता है।
- अरीय / अनुप्रस्थ तन्त्र (radial or transverse system): इसमें मुख्यतः जाइलम मृदुतक पाया जाता है। इन कोशिकाओं की लम्बवत – अक्ष तने के केन्द्रीय अक्ष के समकोण पर होती है। प्राथमिक जाइलम में अरीय तंत्र अनुपस्थित होता है लेकिन द्वितीयक जाइलम में यह मज्जा रश्मियों का निर्माण करता है। इन रश्मियों की ऊँचाई अरीय और मोटाई स्पर्श रेखीय लम्बवत काट में देखी जा सकती है।
तने की अनुप्रस्थ काट में अक्षीय काष्ठ की कोशिकाएँ अनुप्रस्थ काट प्रदर्शित करती है जबकि अरीय अथवा अनुप्रस्थ तंत्र में यह लम्बाईवत कटती है। स्पर्शरेखीय काटों में सभी अक्षीय कोशिकाएं लम्बाईवत और अरीय काष्ठ की कोशिकाएँ लम्बवत कटती है जो ऊंचाई और चौड़ाई प्रदर्शित करती है।
वाहिकीय तत्व (tracheary elements)
द्वितीयक जाइलम में वाहिकीय तत्व प्राथमिक जाइलम के समान ही होते है। द्वितीयक जाइलम की वाहिकाओं और वाहिनिकाओं में सोपानवत और गर्तीय स्थलून पाया जाता है जबकि प्राथमिक जाइलम की वाहिकाओं और वाहिनिकाओं में सर्पिल और वलयाकार स्थूलन भी पाया जाता है। इसके अतिरिक्त द्वितीयक जाइलम की वाहिकाएँ और वाहिनिकाएँ प्राथमिक जाइलम की वाहिकाओं और वाहिनिकाओं से छोटी और अधिक चौड़ी होती है।
प्राथमिक जाइलम और द्वितीयक जाइलम में अंतर (difference between primary xylem and secondary xylem)
| प्राथमिक जाइलम (primary xylem) | द्वितीयक जाइलम (secondary xylem) |
| 1. यह अग्रस्थ विभाज्योतक की प्राकएधा द्वारा निर्मित होता है। | यह द्वितीयक अथवा संवहन कैम्बियम के द्वारा निर्मित होता है। संवहन कैम्बियम एक वलय के रूप में पाशर्विय विभाज्योतक से विकसित होता है। |
| 2. इसमें मेटाजाइलम परिधि की तरफ और प्रोटोजाइलम मज्जा की तरफ विन्यासित होता है। | प्रोटोजाइलम और मेटाजाइलम का विभेदन सुस्पष्ट नहीं होता और इनका अंतर धीरे धीरे गौण होता जाता है। |
| 3. प्रोटोजाइलम की स्थिति के आधार पर विभिन्न संवहन बंडल अन्त: आदिदारुक अथवा बाह्य आदिदारुक अथवा मध्यादिदारुक हो सकते है। | इस प्रकार का कोई विभेदन नहीं पाया जाता। |
| 4. प्राथमिक जाइलम में वाहिकाएँ और वाहिनिकाएं लम्बी और पतली होती है। | द्वितीयक जाइलम में वाहिकाएं और वाहिनिकाएं छोटी और अधिक व्यास वाली होती है। |
| 5. प्राथमिक जाइलम में मज्जा रश्मियाँ भी अग्रस्थ विभाज्योतक द्वारा निर्मित प्राकएधा से बनती है। | द्वितीयक जाइलम में मज्जा रश्मियाँ कैम्बियम की रश्मि आद्यक कोशिकाओं से बनती है। |
| 6. प्राथमिक जाइलम अक्षीय या अरीय तंत्र के रूप में विभेदित नहीं होता है। | द्वितीयक जाइलम में अरीय और अक्षीय दोनों प्रकार के तंत्र का सुस्पष्ट विभेदन पाया जाता है। |
| 7. प्राथमिक जाइलम में वार्षिक वलय टाइलोसस , दारुकाष्ठ और रस काष्ठ जैसी विशेष संरचनाएँ नहीं पायी जाती। इसके अतिरिक्त जाइलम रेशे या तो अनुपस्थित होते है अथवा बहुत कम मात्रा में होते है। | वार्षिक वलय टाइलोसस , दारुकाष्ठ और रस काष्ठ पायी जाती है। इसके साथ ही जाइलम रेशे सुस्पष्ट और बहुतायत में पाए जाते है। |
| 8. प्राथमिक जाइलम में मज्जा रश्मियाँ समांगी या समकोशीय होती है। | द्वितीयक जाइलम में मज्जा रश्मियाँ विषमांगी होती है। |
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