प्रीसेप्टस ऑफ जीसस पुस्तक किसके द्वारा लिखी गयी थी ? Precepts of Jesus written by in hindi

Precepts of Jesus written by in hindi प्रीसेप्टस ऑफ जीसस पुस्तक किसके द्वारा लिखी गयी थी ?

उत्तर : Precepts of Jesus (प्रीसेप्टस ऑफ जीसस) नामक पुस्तक राजा राम मोहन राय के द्वारा लिखी गयी थी |

पुस्तक के बारे में –

प्रीसेप्टस ऑफ जीसस: द गाइड टू पीस एंड हैप्पीनैस 1820 में ‘प्रीसेप्टस ऑफ जीसस‘ पुस्तक लिखी जिसमें New Testament के नैतिक एवं दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारिक कहानियों से अलग करने की कोशिश की।

प्रश्न: ‘‘नव-भारतीय मध्य वर्ग का पश्चिम के साथ सम्पर्क एक उत्प्रेरक साबित हुआ। राजा राममोहन या ईश्वरचन्द्र विद्यासागर द्वारा प्रवर्तित सामाजिक एवं पार्मिक आन्दोलनों को इसी संदर्भ में समझना आवश्यक है।‘‘ विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: भारत में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना के साथ ही पाश्चात्य देशों में हुए पुनर्जागरण आंदोलन का प्रभाव यहां के समाज एवं धर्म में व्याप्त कुरीतियों के उन्मूलन पर पड़ा। यद्यपि यूरोपीय पुनर्जागरण के मूल तत्व तक्रवाद, विज्ञानवाद एवं मानववाद जैसी बहुमूल्य निधि से भारतीय शिक्षित वर्ग काफी प्रभावित हुए, परन्तु इन भारतीय बौद्धिक वर्गाें ने पाश्चात्य एवं भारतीय संस्कृति का समन्वय स्थापित कर भारतीय पुनर्जागरण की रूपरेखा प्रस्तुत की। इनमें राजा राममोहन राय एवं ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अग्रण्य हैं।
राजा राममोहन राय पूर्व एवं पश्चिम के समन्वय के प्रतिनिधि के रूप में सामने आए। उन्होंने परंपरागत भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक रूढ़ियों में भारतीय संस्कृति के अनुरूप सुधार हेतु आवश्यक कदम उठाए। यूरोपीय पुनर्जागरण के तर्ज पर उनका भी दृष्टिकोण तक्र, विवेक एवं मानववाद पर आधारित था। उन्होंने शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी शिक्षा पर बल दिया तथा 1817 ई. में कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना में डेविड हेयर को सहयोग दिया। सामाजिक क्षेत्र में राजा राममोहन राय हिन्दू समाज की कुरीतियों( जैसे – सती प्रथा, बहु-पत्नी प्रथा, वेश्यागमन, जातिवाद आदि के जबर्दस्त विरोधी थे। विधवा पुनर्विवाह का उन्होंने समर्थन किया। धार्मिक क्षेत्र में उन्होंने मूर्ति पूजा, देववाद, तीर्थयात्रा आदि का विरोध किया तथा भारतीयों को प्राचीन व समृद्ध संस्कृति के अन्तर्गत वेदान्त दर्शन की सत्यता से अवगत कराया। इन सामाजिक कुरीतियों सहित समाज में प्रचलित अन्धविश्वास एवं रूढिवादी कपमण्डकता पर जबर्दस्त प्रहार किए। इन सामाजिक एवं धार्मिक रूढ़िवादिता के समाधान हेतु उन्होंने पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान पर आधारित मानवतावाद, तक्रवाद एवं विवेक के आधार पर करने का मार्ग दिखाया। विभिन्न पत्र-पत्रिका तथा ब्रह्म समाज के माध्यम से उन्होंने सती प्रथा जैसे घिनौने सामाजिक पक्ष पर प्रहार किया। इन विभिन्न प्रयासों के द्वारा राजा राममोहन राय ने सामाजिक व धार्मिक कुरीतियाँ सुधारकर भारतीय राष्ट्रवाद को प्रेरणा दी।
इसी प्रकार ईश्वचन्द्र विद्यासागर ने भी समाज एवं धर्म में व्याप्त कुरीतियों की समाप्ति से ही समाज, धर्म एवं राष्ट्र के कल्याण का रास्ता दिखाया। नारी शिक्षा पर विशेष जोर देकर उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का जबर्दस्त समर्थन किया तथा विधवाओं की उन्मुक्ति हेतु विधवा पुनर्विवाह कानून के सम्बन्ध में सफल प्रयास किए।
अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय पुनर्जागरण के क्रम में पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित होकर भारतीय बौद्धिक वर्ग, समाज एवं धर्म की कुत्सित परम्परा का यथेष्ठ उन्मूलन कर राष्ट्रीय चेतना का जागृत किया। इसी के परिणामस्वरूप मुस्लिम, सिख एवं इसाई धर्म में ही व्यापक सुधार आन्दोलन का सिलसिला चल पड़ा और अन्नतः इन सभी प्रयासों ने भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में अपरिमित योगदान दिया।

प्रश्न: “युवा बंगाल में धर्म और दर्शन के तले न के बराबर सुस्पष्ट या स्थायी छाप छोड़ी थी।‘‘
उत्तर: बंगाल में नव चेतना लाने की दिशा में सर्वप्रथम प्रयास श्यंग बंगाल आन्दोलनश् ने किया। 19वीं शताब्दी के तीसरे-चैथे दशक में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त बंगालियों का युवा वर्ग उभरा जिसने राष्ट्रीयता पर बल दिया और पुरातन व्यवस्था और परम्पराओं पर तीव्र प्रहार किया। इस आन्दोलन के अगुआ हेनरी विवियन डेरोजिओं थे।
यंग-बंग आंदोलन एंग्लो इण्डियन हैनरी विवियन डेरा जिओ के द्वारा 1826-1831 किया गया। इसका केन्द्र कलकता हिन्दू कॉलेज था। वह कलकत्ता हिन्दू कॉलेज का अध्यापक था और वह फ्रांस की राज्य क्रांति से प्रभावित था। यह एक बौद्धिक तथा व्यवहारमूलक आंदोलन था। डेरा जिओं ने आत्मिक उन्नति एवं समाज सुधार के लिए एकेडमिक डिबेटिंग क्लब, एंग्लो-इण्डियन हिन्दू एसोसिएशन, सोसाइटी. फॉर दॉ ऑफ जनरल नोलेज आदि स्थापित की। हिन्दू कॉलेज की भांति 1834 में एलफिन्सटन कॉलेज की स्थापना की तथा यंग-बंग आंदोलन देखते ही देखते भारत के बहुत बड़े क्षेत्र में फैल गया। इसी नाम से यंग बोम्बे, यंग मद्रास जैसे आंदोलन खड़े हो गए। इस आन्दोलनों ने युवा पीढ़ी विशेषतया, छात्रों को स्वतंत्र एवं विवेकपूर्ण ढंग से सोचने, तर्क करने, पुरातन परम्पराओं को तोड़ने, समानता, स्वतंत्रता एवं सत्य पर बल देने को उत्प्रेरित किया। इन लोगों ने रूढ़िवादी परम्पराओं और कुरीतियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई एवं नारियों को शिक्षित करने की माँग की।
यद्यपि इस आंदोलन का योगदान नकारात्मक अधिक था फिर भी इसने प्रेस की स्वतंत्रता, प्रवासी भारतीयों के साथ सौम्य व्यवहार, जमींदारी अत्याचारों से पीड़ित जनता को राहत देने, उच्च सरकारी सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति इत्यादि के प्रश्न पर जनमानस को उद्वेलित कर दिया।
चूंकि ‘यंग बंगाल‘ के सदस्य सामाजिक और धार्मिक बंधनों को तोड़ते थे, यथार्थ से इनका कम सम्बन्ध था, संगठन का अभाव था, समाज से कटे हुए थे अतः इन्हें रूढ़िवादियों का व्यापक विरोध सहना पड़ा। इन्हीं कारणों से युवा बंगाल आंदोलन ने धर्म और दर्शन के तल पर न के बराबर छाप छोड़ी क्योंकि इनका कोई धार्मिक संगठन नहीं बन पाया और न ही कोई मौलिक दार्शनिक विचार जिससे कि वह एक संगठनात्मक रूप ग्रहण कर सकता परन्तु इसने युवा वर्ग को समाज में व्याप्त कुरीतियों, स्वतंत्रता, समानता आदि पर विचार करने पर मजबूर कर दिया और एक ऐसे आधार का निर्माण किया जिससे भारतीय युवा वर्ग उद्वेलित हुआ तथा ब्रिटिश साम्राज्य का विरोधी बन गया।