पॉलिमरेज चेन रिएक्शन (Polymerase chain reaction & PCR in hindi) पीसीआर तकनीक क्या है

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(Polymerase chain reaction & PCR in hindi) पॉलिमरेज चेन रिएक्शन किसे कहते है ? पीसीआर तकनीक क्या है ?

कोशिका प्रभाजन (Cell Fractionation)
इस विधि द्वारा कोशिकीय झिल्लियों को यांत्रिक विधि द्वारा अलग कर लिया जाता है जिससे उप कोशिकीय अंग अपने-अपने भार (mass), सतह (surface) तथा विशिष्ट घनत्वानुसार अलग-अलग सतहों (surface) पर जलीय माध्यम में विलग (isolate) हो जाते हैं। इस विधि द्वारा सर्वप्रथम निम्न चार भाग प्राप्त होते हैं केन्द्रक, माइटोकोड्रियल, माइक्रोसोमीय (microsomic) तथा घुलनशील तत्व । माइक्रोसोमीय भाग में प्रदव्यी जालिका (ER), गाल्गी सम्मिश्र तथा राइबोसोम इत्यादि उपस्थित रहते हैं।
परासेन्ट्रीफ्यूगेशन मशीन सर्वप्रथम स्वीडन ने 1925-30 के दौरान कियोडार बेदबर्ग (Theodar Vedberg) द्वारा विकसित की गयी थी जो सर्वप्रथम प्रोटीन अणुओं को विभिन्न अवसादन अनुपातानुसार अलग करने के लिये प्रयुक्त की गयी थी। इस विधि द्वारा उपकोशिकीय कणों को आकार, परिणाम व घनत्व के अनुसार अलग किया जा सकता है। इसमें विभिन्न प्रकार के कण अपने अवसादन अनुपात (sedimentation ratio) के अनुसार विभिन्न स्तरों पर स्थिर हो जाते हैं। इस उपकरण को डिफ्रेंशियल सेन्ट्रीफ्यूगेशन कहते हैं। आज परासेन्ट्रीफ्यूगेशन (ultracentrifugation) द्वारा वायरस न्यूक्लिक अम्ल आरएनए, डीएनए व प्रोटीन्सं को अलग किया जा सकता है।
विभेदी अपकेन्द्रीकरण उपकरण द्वारा कोशिका प्रभाजन (cell fractionation) करने पर कोशिकांगों को अलग किया जाता है। इस तरह सूत्र कणिकायें, केन्द्रक, लवक इत्यादि विलगित (isolate) किये जा सकते हैं।
कोशिका अथवा कोशिकांगों की कलाओं को उनके भार (weight) के अनुसार अपेक्षाकृत अधिक शक्ति वाले घनत्व प्रवणता अपकेन्द्री उपकरण में बल द्वारा अपकेन्द्रीकरण (centrifugate) करने पर विलगित किया जा सकता है। इस तरह कलाओं (membranes) में स्थित एन्जाइम को ज्ञात किया जाता है। इसी तरह विभिन्न प्रकार के डीएनए भी इसी विधि द्वारा प्राप्त करते हैं। जीन गन बाह्य डीएनए को पादप कोशिका के अन्दर तीव्र गति से प्रविष्ट करवाने के लिए प्रयुक्त होती है। इसका आविष्कार 1987 में स्टेनफोर्ड व साथियों ने किया था। सामान्यतः एग्रोबैक्टीरियम के द्वारा जीन स्थानान्तरण किया जाता है परन्तु अनेक फसलों जैसे चावल, गेहूँ, मक्का इत्यादि में ऐसा नहीं हो पाता अतः जीन गन इनमें कारगर सिद्ध हुई है।
माइक्रोइन्जेक्शन द्वारा भी ऊतकों में सीधे ही सूक्ष्म इंजेक्शन द्वारा बाह्य डीएनए प्रविष्ट करवाया जा सकता है।
पॉलिमरेज चेन रिएक्शन (Polymerase chain reaction&PCR) :
यह एक सरल एवं आधुनिक विधि है जिसमें विशिष्ट डी एन ए अनुक्रमों का प्रवर्धन (amplifiation) पात्रे (in vitro) अवस्था में करके डी एन ए संश्लेषण किया जाता है। इस विधि में डी एन ए निर्मित करने के लिए इसके क्लोनिंग की आवश्यकता नहीं रहती। इसके द्वारा क्लोनिंग रहित डी एन ए खण्डों को बड़ी मात्रा में संवर्धित किया जा सकता है। यह तकनीक केरी मुलिस (Kary Mullis) द्वारा विकसित की गयी ।
किरण विभेदी विश्लेषण (X&ray dffierential analysis):
यह डीएनए के अणु तथा विभिन्न प्रोटीन की संरचना को ज्ञात करने के लिये प्रयुक्त होती है इसमें प्रोटीन जैसे हीमोग्लोबिन तथा मायोग्लोबिन इत्यादि की 3D संरचना ज्ञात की जा सकती है। जब पदार्थ के अणुओं के ऊपर से X-किरणें विवर्तित (dffiract) हो जाती है। यदि पदार्थ की आण्विक संरचना एक निश्चित क्रम में व्यवस्थित है तो यह भी उसी अनुपात में विवर्तित होकर व्यवस्थित हो जाती है और परिणामस्वरूप अणुओं के क्रिस्टल का 3D संरचना परावर्तित होती है।
कॉलोनी संकरण (Colony hybrydçation) रू
कॉलोनी संकरण द्वारा डीएनए की संकरित कॉलोनी की पहचान करते हैं। इस विधि द्वारा असंकरित अणु निष्कासित होकर निकल जाते हैं परन्तु संकरित अणु एनीलित (Annelealing) हो जाते हैं जिसकी पहचान ऑटोरडियोग्राफी द्वारा की जाती है। इसमें मात्र वही डी एन ए कॉलोनियाँ द्वारा की जाती है जो संकरित होती है।
डाट ब्लाट तकनीक (Dot blot technique):
ऊतकों में इच्छित डीएनए खण्डों अथवा mRNA की उपस्थिति को ज्ञात करने हेतु डॉट ब्लाट तकनीक का प्रयोग किया जाता है। सर्वप्रथम सम्पूर्ण डीएनए अथवा आरएनए को नाइट्रोसेल्युलोस पर विभिन्न बिन्दुओं के रूप में चस्पा कर दिया जाता है। तत्पश्चात इसे गर्म करके विगुणित (denaturation) करके नाइट्रोसेल्युलोस पर एक सुत्रीय डीएनए के रूप में स्थिर (fix) कर दिया जाता है। इसे एकसूत्रीय रेडियोधर्मी प्रोब (prob) के विलयन में एनीलन (annnealing) के लिये रख दिया जाता है। इस स्थिति में प्रोब मात्र उन एक सूत्रीय डीएनए से जुड़ कर संकरित होता है जो इसके पूरक क्रम में व्यवस्थित होते हैं। संकरित बिन्दुओं (डॉट) को ऑटोरेडियोग्राफी द्वारा चिन्हित किया जाता है।
EIA पद्धति (EIA technique)
एन्जाइम्स केवल कुछ ही इम्यूनोएस्से पद्धतियों में प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए इनकी यहाँ द्वितीयक भूमिका है। इनका प्रयोग रेडियो आइसोटोप की जगह मार्कर के रूप में होता है क्योंकि ये रेडियो आइसोटोप की तरह स्वास्थ्य को हानि नहीं पहुंचाते हैं और इनका परीक्षण कुछ उपलब्ध तकनीकों के द्वारा किया जाता है। वर्तमान में दो प्रकार की एंजाइम इम्यूनोएस्से (EIA) पद्धतियां उपयोग में ली जाती हैं। उदाहरणस्वरूप एंजाइम लिंक्ड इम्यूनों सॉरबेन्ट एस्सै (ELISA) में (यह शब्द एंग्वेल और पर्नेम्न द्वारा 1971 में दिया गया था) इस पद्धति का प्रयोग नमूने में एक विशिष्ट प्रोटीन एंटीजन की पहचान के लिए किया जाता है। एंटीबॉडी को एक अक्रिय पॉलीमर आधार पर बांधकर, नमूने के संपर्क में लाया जाता है। इस प्रक्रिया द्वारा अबन्धित प्रोटीन्स जो अलग एंटीबॉडी के साथ क्रिया करती है, को मिलाया जाता है। दूसरी एंटीबॉडी जो कि प्रयोग में लायी जाती है उससे जुड़ा एक एंजाइम होता है जिसमें यह गण होता है कि एक रंगहीन या नॉन फ्लोरेसेंट क्रियाधार (substrate) को एक रंगीन व फ्लोरेसेंट उत्पाद में परिवर्तित कर देता है। बंधित दूसरी एंटीबॉडी की मात्रा और इस प्रकार मूल नमूनें में उपस्थित प्रोटीन एंटीजन की मात्रा फ्लोरेसेंट उत्पाद में परिवर्तित हो जाती है। बंधित दूसरी एंटीबॉडी की मात्रा और पल नमूनें में उपस्थित प्रोटीन एंटीजन की मात्रा फ्लोरेसेंस के विकसित रंग की तीव्रता के मात्रा द्वारा जाना जा सकता है। पिछले 33 सालों में इम्यूनोपरीक्षणों की संख्या और विविधता में काफी वृद्धि हुई है। ऐसा उन पद्धतियों के विकास के कारण हुआ जिनमें अंकित एंटीजन या एंटीबॉडी को परीक्षण (test) के लिए प्रयोग किया जाता है जिनमें कि उच्च कोटि की संवेदनशीलता और विशिष्टता होती है।
ELISA में ऐसे विकर का उपयोग करते हैं जो रंगहीन आधार (substrate) से प्रतिक्रिया (react) करता है तथा परिणामस्वरूप एक रंगीन उत्पाद उत्पन्न करता है। ज्ञात सान्द्रता द्वारा एक मानव वक्र तैयार किया जाता है जिसकी सहायता से किसी भी सेम्पल की अज्ञात सान्द्रता ज्ञात की जा सकती है। एलीसा में निम्न विकर प्रयुक्त किये जा सकते हैं
1. क्षारीय फोस्फेटेज (Alkaline Phosphatase)
2. च नाइट्रोफिनाइल फोस्फेटेज (p~ nitrophenyl phosphatase)
3. हॉर्स रेडिश परऑक्सीडेज (Horse radish peroxidase)