WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now
physiology of flowering in hindi

physiology of flowering in hindi , पुष्पन की कार्यिकी क्या है , पुष्पन आह्वान (Floral evocation)

जाने physiology of flowering in hindi , पुष्पन की कार्यिकी क्या है , पुष्पन आह्वान (Floral evocation) ?

पुष्पन की कार्यिकी (Physiology of Flowering)

परिचय (Introduction)

पादपों में पुष्पन उनके जीवन चक्र की एक महत्वपूर्ण अवस्था होती है। इसके लिये पादप की कायिक अवस्था (vegetative phase) से प्रजननात्मक अवस्था (reproductive phase) में संक्रमण के बीच पादप में अनेक शरीरक्रियात्मक परिवर्तन होते है। पुष्पन के लिये कायिक वृद्धि की एक निश्चित अवधि चाहिये जो कि विभिन्न पादपों के लिये भिन्न होती है। उदाहरण के लिये वार्षिक शाक पौधों में कुछ महीनों में ही पुष्पन हो जाता है। जबकि वृक्षों में अनेक वर्षों में पुष्प है। अनेक पादपों में किसी विशेष ऋतु (season) में ही पुष्पन होता है। पुष्पन निम्न कार्यिकी क्रियाओं द्वारा होता है।

  1. स्तम्भशीर्ष एवं अवस्था परिवर्तन (The shoot apex and Phase change)

कायिक विकास के दौरान, मृदूतकीय कोशिकाएं इस प्रकार परिवर्तित हो जाती है कि नये प्रकार की संरचनाएं बनती है। पोइथिंग (Poethig, 1990) के अनुसार स्तम्भ शीर्ष में विकास की तीन अवस्थाएँ एक क्रम में पायी जाती हैं-

(i) तरूण अवस्था (Juvenile phase)

(ii) प्रौढ़ कायिक अवस्था (Adult vegetative phase)

(iii) प्रौढ़ जनन अवस्था (Adult reproductive phase)

इन अवस्थाओं के एक से दूसरे में परिवर्तन को अवस्था परिवर्तन (phase change) कहते हैं। तरूण से प्रौढ़ अवस्था में परिवर्तन के साथ-साथ कायिक लक्षणों जैसे- पत्ति की आकारिकी, पर्ण विन्यास (phyllotaxy), काँटेनुमा होना, मूलतंत्र इत्यादि में परिवर्तन भी होता है। ये परिवर्तन धीर-धीरे आते है अतः इनके बीच की अवस्थाएँ (intermediate forms) भी दिखायी देती है। उदाहरण- अकेसिया हिटरोफिल्ला ( Acacia heterophylla) में संयुक्त (pinnately compound) पत्ती (तरूण अवस्था) से एक फिल्लोड (प्रोड़ अवस्था ) बनती है ।

स्तम्भशीर्ष पर तरूण ऊतक एवं अंग इसके आधार पर बनते हैं तथा प्रौढ़ ऊतक एवं अंग ऊपरी एवं परीधि की ओर बनते है। यदि स्तम्भ शीर्ष की ओर विभिन्न भोज्य पदार्थों (विशेषकर कार्बोहाइड्रेट) का स्थानान्तरण रूक जावे अथवा कम हो जावे तो प्रौढ अवस्था आने में अधिक समय लगता है। इस प्रक्रिया में हार्मोन एवं अन्य कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। यह देखा गया है कि जिब्रेलिन के प्रभाव से जल्दी पुष्पन हो जाता है।

  1. पुष्पन आह्वान (Floral evocation )

मेकडेनियल एवं सहयोगियों (McDaniel et al. 1992) के अनुसार इसकी दो विकासशील अवस्थाएँ होती है। (चित्र-1) (i) समर्थ (Competent ) एवं (ii) निर्धारित ( Determined)।

सामान्यतया एक कोशिका अथवा कोशिकाओं के समूह को उचित विकासीय संकेत (develomental signal) दिया जावे तो वे यदि अपेक्षित तरह से व्यवहार करते है तो वे समर्थ कहलाते है।

उदाहरण के लिये, यदि एक कायिक स्तंभ ( scion) को पुष्पीय स्टॉक (stock) पर प्रत्यारोपित (graft) करने पर वह तुरंत ही पुष्पन प्रदर्शित करता है तो इसका अर्थ हुआ कि वह स्टॉक में उपस्थित पुष्पन उद्वीपन के प्रति अनुक्रिया करता है अर्थात् – यह कायिक स्तंभ ( scion ) पुष्पीय समर्थ है।

जब विभज्योतक नये विकासशील प्रोग्राम (यहाँ पुष्पन) के लिये उत्तरदायी होने लगता है, चाहे इसे सामान्य भौतिक व वातावरणीय अवस्था से विलग कर दिया जावे तो यह पुष्पीय निर्धारित (determined) कहलाता है। उदाहरण के लिये, यह पाया गया है कि तम्बाकू में 41 पर्व संधियों वाले पौधे में शीर्ष कलिका पुष्पन के लिये निर्धारित (determined) 37 पत्तियों के शुरू होने पर बनती है। (Singer and Mc Danies, 1986)।

  1. जैव रासायनिक संकेतन (Biochemical signaling)

पुष्पन के लिये स्तम्भ शीर्ष पर जैव रासायनिक संकेतन पादप के अन्य अंगो, मुख्य रूप से पत्तियों से आते है। इनमें जिब्रेलिन (gibberellins, GAS ) हार्मोन पुष्पन का संकेतन है। अन्य वृद्धि नियंत्रक भी पुष्पन में सहायक होते है अथवा पुष्पन को संदमित करते हैं। अन्य पदार्थों में पॉलीएमीन्स (polyamines ) जैसे- पुट्रेसीन ( putrescine) पुष्पन को रोकते है। स्तम्भ शीर्ष, पुष्पन के लिये संकेत जड़ों से भी प्राप्त करता है। प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हुआ है कि जड़ों में अपस्थानिक (adventitious) जड़ों के प्रारम्भन एवं वृद्धि से पुष्पन रूक जाता है अर्थात् जड़ों से एक संदमक ( inhibitor) स्तम्भ शीर्ष तक पहुँचता है।

  1. पुष्पन का जीन द्वारा नियमन (Gene regulation of flowering)

कोइन (Coen, 1991) के अनुसार पुष्पन विकास तीन वर्गों के जीन (genes) द्वारा नियमित किया जाता है।

(i) समूह I ( group 1)- पुष्पीय अंगों के पहचान जीन (floral organ identity genes) द्वारा नियंत्रण

(ii) समूह II (group II)- पुष्पीय अंगों के स्थानिक (spatial) विभेदन का नियंत्रण केडस्ट्रल जीन (cadastrl genes) द्वारा ।

  • समूह III (group III)- विभाज्योत्क पहचान जीन (meristem identity genes) द्वारा पुष्पीय अंगों के नियामक ।

पुष्पीय अंगों के पहचान जीन, होमियोटिक जीन (homeotic genes) के रूप में उत्परिवर्तनों में पहचाने गये है । मेयरोविट्ज एवं कोइन (Meyerowitz and Coen. 1999) ने पुष्पीय अंगों के पहचान जीनों के लिये एक प्रारूप प्रस्तुत किया जिये ABC प्रारूप (ABC Model) कहते हे। इसके अनुसार पुष्प के प्रत्येक चक्र (whorl) में जीन क्रियाऐं तीन प्रकार के जीनों (Types A. B एवं C) के आपसी संयोजन द्वारा नियंत्रित होती है।

तालिका-1 : पुष्पीय अंगों की पहचान का जीनों द्वारा नियंत्रण (ABC प्रारूप)

पुष्पीय अंग की पहचाननियंत्रित करने वाले जीन समूह
1.

2.

3.

4.

बाह्यदल का बनना

दल का बनना

पुंकेसर का बनना

अंडाशय का बनना

Type A

Type A + Type B

Type B + Type C

Type C