हिंदी माध्यम नोट्स
संसद और राज्य विधानमंडल के सम्बन्ध के बारे में जानकारी दीजिये parliament and state legislature in hindi
parliament and state legislature in hindi संसद और राज्य विधानमंडल के सम्बन्ध के बारे में जानकारी दीजिये ?
संसद तथा राज्य विधानमंडल
भारतीय संविधान द्वारा देश में संघीय शासन प्रणाली स्थापित की गई है क्योंकि संघ तथा राज्यों के बीच विधायी, कार्यपालिका एवं वित्तीय शक्तियों का वितरण किया गया है। परंतु भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को संघीय अथवा फेडरल कहना बड़ी संदेहास्पद बात है । संविधान के पाठ में फेडरेशन शब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है। वास्तव में, भारत को फेडरेशन का नाम देने का प्रस्ताव संविधान सभा में विशिष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ’’, (यूनियन आफ स्टेट्स) कहा गया है। संविधान में ऐसे बहुत से तत्व हैं और इसके अनेक ऐसे उपबंध हैं जो बहुत स्पष्ट रूप में इसके फेडरल संविधान होने के विरुद्ध हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत भारत में नागरिकता एक है; ध्वज एक है; संविधान एक है। न्यायपालिका भी एकीकृत है और संघतथा राज्यों में विभाजित नहीं है। परंतु संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि इस बारे में मतभेद हो सकता है कि क्या भारतीय राजनीतिक व्यवस्था संघीय स्वरूप की है, एकात्मक है या अर्द्धसंघीय है या कि यह एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है जो भावना से तो एकात्मक है परंतु जिसका ढांचा संघीय स्वरूप का है।
भारतीय संघ में इस समय 25 राज्य हैं और सात संघ-राज्य क्षेत्र हैं, जैसाकि संविधान की पहली अनुसूची में उल्लिखित है । संघ का राज्य क्षेत्र राज्यों और संघ-राज्य क्षेत्रों में बंटा हुआ है। किसी राज्य द्वारा बनाया गया विधान उस राज्य के राज्य क्षेत्र में ही लागू हो सकता है। संघ की संसद भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भी भाग के लिए विधान बना सकती है। संसद को राज्यक्षेत्रातीत विधान बनाने की शक्ति भी प्राप्त है, अर्थात इसके द्वारा बनाया गया कोई विधान केवल भारतीय राज्य क्षेत्र के लोगों और संपत्ति पर ही लागू नहीं होगा बल्कि विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों पर भी लागू होगा। राज्यों को ऐसा विधान बनाने की शक्ति प्राप्त नहीं है।
संविधान में संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्ति का वितरण तीन प्रकार से करने का उपबंध किया गया है। सूची 1 अथवा संघ सूची में 97 विषय हैं जिनके बारे में केवल संसद ही विधान बना सकता है। सूची 2 या राज्य सूची में 66 विषय हैं जिनके बारे में केवल राज्य विधानमंडल ही विधान बना सकते हैं । सूची 3 या समवर्ती सूची में 47 मदें हैं जिनके बारे में संसद और राज्य विधानमंडल, दोनों ही विधान बना सकते हैं । यद्यपि संविधान द्वारा आवंटित अपने अपने क्षेत्रों में, संसद और राज्य विधानमंडलों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है, तथापि शक्तियों के वितरण की योजना में विधायी क्षेत्र में संसद के सामान्य प्रभुत्व पर बल दिया गया है।
संघ सूची में, जो तीन सूचियों में सबसे लंबी है, रक्षा, वैदेशिक कार्य, रेलवे, संचार, बैंकिंग, मुद्रा आदि जैसे महत्वपूर्ण विषय हैं। अवशिष्ट शक्तियां, अर्थात ऐसे विषय के संबंध में विधान की शक्ति जो तीनों में से किसी भी सूची में वर्णित न हो, संसद को प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त, समवर्ती सूची में, एक ही विषय के संबंध में संघ के और राज्य के विधान में टकराव होने की स्थिति में, संघ का विधान मान्य होता है, दूसरे शब्दों में, इस संबंध में संघ के विधान का स्थान पहला है। समवर्ती क्षेत्र के किसी विषय में राज्य की विधि के पक्ष में इस नियम का अपवाद है कि संसद के पहले के किसी विधान के साथ टकराव होने के मामले में राज्य का विधान मान्य रहता है, यदि उसे विचारार्थ रक्षित रखा गया हो और राष्ट्रपति की अनुमति उस पर प्राप्त हो चुकी हो। परंतु इस उपबंध में संसद के लिए ऐसी कोई रोक नहीं है कि वह राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए विधान में बाद में संशोधन नहीं कर सकतीं उसे बदल नहीं सकतीया निरस्त नहीं कर सकती । प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाना अपेक्षित है जिससे संसद द्वारा बनाए गए विधान का अनुपालन सुनिश्चित हो।
राज्यों के लिए पूर्णतया रक्षित क्षेत्रों में भी, संसद को कुछ परिस्थितियों में विधान बनाने की शक्ति प्राप्त है। इस प्रकार, जब कभी राज्य सभा एक संकल्प पास करके, जिसे विशेष बहुमत प्राप्त हो, यह घोषणा करती है कि ऐसा करना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन है तो संसद राज्य सूची में उल्लिखित किसी विषय पर विधान बना सकती है । इसके अतिरिक्त, जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो तो संसद की विधान बनाने की शक्ति का विस्तार हो जाता है जिससे वह राज्य सूची के किसी विषय पर विधान बना सकती है। यद्यपि संसद द्वारा राष्ट्रीय हित में या आपात स्थिति के दौरान प्रयोग की गई किसी शक्ति से किसी राज्य के विधानमंडल की सामान्य विधायी शक्ति प्रतिबंधित नहीं होती, तथापि टकराव की स्थिति में संसद द्वारा बनाया गया विधान प्रवर्तन में रहता है और जब तक वह प्रवर्तन में रहता है तब तक राज्य विधान, जहां तक संसद के विधान से उसके टकराव का संबंध है, अप्रवर्तनीय रहता है।
किसी देश के साथ की गई संधि, समझौते याअभिसमय को या किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, एसोसिएशन या अन्य निकाय में किसी विषय पर, यदि वह विषय राज्य सूची में हो तो भी, किए गए फैसले को कार्यान्वित करने के लिए विधान बनाने की शक्ति भी संसद को प्राप्त है।
संसद से निवेदन किए जाने पर भी वह राज्य सूची के किसी विषय पर विधान बना सकती है। यदि दो या दो से अधिक राज्य विधानमंडल ऐसा वांछनीय समझते हैं कि उनके अधिकार क्षेत्र वाले किसी विषय का विनियमन संसद के विधान द्वारा होना चाहिए और इस आशय का संकल्प पास करते हैं तो, संसद आवश्यक विधान बना सकती है। परंतु इस प्रकार बनाया गया विधान उन्हीं राज्यों में प्रभावित रहता है जिन्होंने इस हेतु निवेदन किया हो और अन्य उन राज्यों में भी जो इस बारे में संकल्प पास करके बाद में उसे अपना लें । संघ सूची की कुछ प्रविष्टियों से भी संसद को शक्ति प्रदान हो जाती है कि वह, विधि द्वारा अपेक्षित घोषणा करके, कुछ क्षेत्र और विषय राज्य के क्षेत्र से अपने अधिकार में ले ले।
संविधान में उपबंध है कि यदि राष्ट्रपति का, किसी राज्य के राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा उस राज्य की सरकार के सभी या कोई कृत्य अपने हाथ में ले सकता है और यह घोषणा कर सकता है कि राज्य के विधानमंडल की शक्तियों का प्रयोग संसद द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन किया जाएगा।
नये राज्यों की स्थापना एवं गठन के मामलों से भी संसद के प्रभुत्व का संकेत मिलता है। संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह-
(क) किसी राज्य में से उसका राज्य क्षेत्र अलग करके अथवा दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकती है;
(ख) किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा या घटा सकती है;
(ग) किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है; और
(घ) किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकती है।
ये परिवर्तन संविधान में संशोधनों की तरह न होकर ऐसे संशोधन हैं जो राष्ट्रपति की सिफारिश पर संसद द्वारा साधारण बहुमत से विधेयक पास करके किए जा सकते हैं। ऐसे विधेयकों पर संबंधित राज्यों के विधानमंडलों के, इस प्रयोजनार्थ निर्धारित अवधि में विचार जानने के लिए उनके पास भेजना अपेक्षित है। परंतु विधेयक इस प्रकार विधानमंडलों के पास भेजने से संसद की जैसा वह उचित समझे वैसा परिवर्तन करने की शक्ति कम नहीं होती। इसके अतिरिक्त, संसद को किसी राज्य में विधान परिषद का साधारण प्रक्रिया द्वारा उत्पादन या सृजन करने की शक्ति प्राप्त है जिसके लिए संविधान में संशोधन करना अपेक्षित नहीं है। यदि किसी राज्य की विधान सभा विशेष बहुमत से इस आशय का संकल्प पास कर देती हैं तो संसद के अधिनियम द्वारा ही ऐसा हो सकता है।
अंतिम परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि संसद राज्यपाल के द्वारा राज्यों पर कुछ नियंत्रण रखती है। जैसाकि हम जानते हैं, राष्ट्रपति संसद का एक अंग है और साथ ही वह संघ की कार्यपालिका का प्रमुख भी है। राज्यों के राज्यपाल उस के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और वे राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद धारण करते हैं। इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति ऐसी किसी आकस्मिकता में जिसके लिए संविधान में उपबंध न किया गया हो, राज्य के राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसे उपबंध कर सकता है जो वह ठीक समझे।
परंतु इन सब तथ्यों से यह अभिप्राय नहीं है कि भारत में राज्य संघ के मात्र प्रशासनिक एजेंट हों । संविधान में निर्धारित सीमाओं में रहकर संघ और राज्य एक-दूसरे में स्वतंत्र हैं। अपने क्षेत्र में कोई एक-दूसरे के अधीन नहीं है। अंबेडकर के शब्दों में, “संविधान द्वारा नियत किए गए अपने क्षेत्र में राज्य उतने ही संपन्न हैं जितना कि केंद्र संविधान द्वारा सौंपे गए अपने क्षेत्र में हैं‘‘। एक का प्राधिकार दूसरे के प्राधिकार से समन्वयकारी है। वास्तव में, भारत में संघ और राज्यों का संबंध निम्नलिखित दो विरोधी विचारों में समझौते का प्रतीक है:
(1) शक्तियों का सामान्य विभाजन जिसके अनुसार राज्य अपने क्षेत्रों में स्वायत्त है;
(2) विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता और मजबूत संघ की आवश्यकता।
इस प्रकार, व्यवहार में भारत में, जैसे कि ग्रैनविल्ल आस्टिन द्वारा कहा गया है, “एक सहकारी संघ विद्यमान है जिसमें संसद का प्रभुत्व तो है परंतु इस कारण राज्य कमजोर नहीं है‘‘।
निष्कर्ष
निष्कर्ष यह है कि हमारी व्यवस्था में, सभी वयस्क लोग, अर्थात जिन्होंने 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो, मतदाता हैं; वे अपने राज्यों में लोक सभा के और विधान सभाओं के सदस्य चुनते हैं । राज्यों की विधान सभाएं फिर राज्य सभा के सदस्य चुनती हैं। राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल द्वारा किया जाता है जिसमें राज्य सभा, लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं। वह नाममात्र अथवा संवैधानिक कार्यपालिका है, वास्तविक अथवा राजनीतिक कार्यपालिका मंत्रिपरिषद होती है। मंत्रिगण संसद सदस्य अवश्य होने चाहिए और वे सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं । उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
आदर्श रूप से हमारी राजनीतिक व्यवस्था में संसद और अन्य निकायों के बीच संघर्ष का प्रश्न कदापि उत्पन्न नहीं होना चाहिए क्योंकि यहां संबंध ऐसा है जैसे पूर्ण का उसके अंगों से होता है। जहां तक कार्यपालिका और विधानमंडल के संबंधों का प्रश्न है, उनकी स्थिति विरोधात्मक नहीं है। ये दोनों जनता की सेवा में भागीदार हैं।
भारत की संसद, राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक रूप से संगठित सभी लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करती है, उसका दश की राजनीतिक व्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें जनता की “प्रभुसत्ता‘‘ का समावेश एवं सार है; यह राष्ट्र की आवाज और उसका दर्पण है। संविधान की उद्देशिका में यह पूरी तरह स्पष्ट किया गया है कि संपूर्ण शक्ति का अंतिम स्रोत भारत के लोग हैं जिनमें प्रभुसत्ता निहित है।
संविधान जो इस देश की मूल विधि है उसे “हम, भारत के लोग अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं‘‘, ऐसा संविधान की उद्देशिका में कहा गया है। अतः संसद को सर्वाेपरि यह देखना होता है कि लोगों की जिन इच्छाओं एवं आकांक्षाओं का प्रतिपादन इसके सदनों में किया जाता है उनकी यथासंभव उत्तम रीति से पूर्ति हो । लोगों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के रूप में संसद सदस्य लोगों की विभिन्न मामलों पर शिकायतों और विचारों को संसद के सदनों में व्यक्त करते हैं, सरकार के कार्यकरण की छानबीन करते हैं और विधान बनाते हैं। संसद “राष्ट्र की जांच पड़ताल करने वाली एवं प्रहरी महान संस्था” के रूप में कार्य करती है।
इसके विधायी अधिकार क्षेत्र की सीमा से, संविधान निर्माण की इसकी शक्तियों से, आपात की स्थितियों में इसकी भूमिका स और न्यायपालिका, कार्यपालिका, राज्य विधानमंडलों और संविधान के अधीन अन्य प्राधिकरणों के साथ इसके संबंधों से पता चलता है कि संसद की शक्ति एवं अधिकार क्षेत्र कितना अधिक और विस्तृत है। परंतु यहां यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि भारतीय संसद को उस प्रकार प्रभुसत्ता संपन्न निकाय नहीं कहा जा सकता जिस प्रकार कि ब्रिटिश संसद को जाना जाता है । इसकी शक्ति बहुत अधिक है परंतु असीम नहीं है। हमारी संसद का प्राधिकार और अधिकार क्षेत्र अन्य निकायों की शक्तियों द्वारा, संघ और राज्यों में विधायी शक्तियों के विभाजन द्वारा, वादयोग्य मूल अधिकारियों द्वारा, न्यायिक पुनर्विलोकन के लिए सामान्य उपबंध द्वारा और स्वतंत्र न्यायपालिका होने के कारण सीमित है । इसके प्राधिकार की इन सीमाओं के बावजूद, संविधान के अधीन जो शक्तियां इसे प्राप्त हैं वे इतनी पर्याप्त हैं कि जो भूमिका इसके लिए निहित है उसे वह भली-भांति निभा सकती है।
परिशिष्ट-2.1
विभिन्न राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों के लिए राज्य सभा में नियत किए गए स्थान
राज्य
स्थान संख्या स्थान संख्या
1. आंध्र प्रदेश 18 14. मणिपुर 1
2. अरुणाचल प्रदेश 1 15. मेघालय 1
3. असम 7 16. मिजोरम 1
4. बिहार 22 17. नागालैंड 1
5. गोवा 1 18. उड़ीसा 10
6. गुजरात 11 19. पंजाब 7
7. हरियाणा 5 20. राजस्थान 10
8. हिमाचल प्रदेश 3 21. सिक्किम 1
9. जम्मू तथा कश्मीर 4 22. तमिलनाडु 18
10. कर्नाटक 12 23. त्रिपुरा 1
11. केरल 9 24. उत्तर प्रदेश 34
12. मध्य प्रदेश 16 25. पश्चिम बंगाल 16
13. महाराष्ट्र 19
संघ-राज्य क्षेत्र
26. दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र)’ 3 मनोनीत 12
27. पांडिचेरी
’पूर्ववर्ती दिल्ली संघ-राज्य क्षेत्र ने, जिसमें एक महानगर परिषद तथा कार्यकारी पार्षद थे, अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का रूप ले लिया है, जिसमें एक विधानमंडल तथा एक मंत्रिपरिषद है। (अनुच्छेद 239 क क तथा अनुच्छेद 239 क ख, 1991 में उनहत्तरवें संशोधन द्वारा निविष्ट किये गये।)
परिशिष्ट-2.2
लोक सभा की वर्तमान सदस्य संख्या तथा राज्यों एवं संघ-राज्य क्षेत्रों
के लिए उसमें नियत किए गए स्थान
राज्य
स्थान संख्या स्थान संख्या
1. आंध्र प्रदेश 42 14. मणिपुर 2
2. अरुणाचल प्रदेश 2 15. मेघालय 2
3. असम 14 16. मिजोरम 1
4. बिहार 54 17. नागालैंड 1
5. गोवा 2 18. उड़ीसा 21
6. गुजरात 26 19. पंजाब 13
7. हरियाणा 10 20. राजस्थान 25
8. हिमाचल प्रदेश 4 21. सिक्किम 1
9. जम्मू तथा कश्मीर 6 22. तमिलनाडु 39
10. कर्नाटक 28 23. त्रिपुरा 2
11. केरल 20 24. उत्तर प्रदेश 85
12. मध्य प्रदेश 40 25. पश्चिम बंगाल 42
13. महाराष्ट्र 48
संघ राज्य क्षेत्र
1. अंडमान निकोबार द्वीप समूह 1
2. चण्डीगढ़ 1
3. दादर तथा नागर हवेली 1
4. दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) 7
5. दमन तथा दीव 1
6. लक्षद्वीप 1
7. पांडिचेरी 1
मनोनीत आंग्ल-भारतीय 2
Recent Posts
Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic
Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…
Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)
Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…
Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise
Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…
Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th
Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…
विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features
continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…
भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC
भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…