पढ़िए परिशिष्ट पर्वन के लेखक कौन थे , parishishtaparvan written by in hindi who is writer author ?

उत्तर : परिशिष्टपर्वन नामक ग्रंथ हेम चंद्र सूरी के द्वारा लिखित है |

महास्थान (24°57‘ उत्तर, 89°20‘ पूर्व)
महास्थान, वर्तमान समय में बांग्लादेश के बोगरा जिले में है। पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल महास्थान पहले पूर्वी भारत में था किंतु अब यह बांग्लादेश में है। यह क्षेत्र प्राचीन भारत के प्रसिद्ध नगर पुंड्रवर्धन से संबंधित है, जो प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से प्रारंभिक मध्यकाल तक प्रसिद्ध शहरी सभ्यता के विकास का साक्षी रहा है। कराटोआ नदी के तट पर स्थित इस दर्शनीय स्थल में मिट्टी के अनेक विशाल टीले हैं, जिन्हें स्थानीय स्तर पर गोविंद, भील मंदिर एवं कोडाई पाथर टीलों के नाम से जाना जाता है।
यहां से चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल का एक लेख भी प्राप्त हुआ है, जिसमें मौर्य साम्राज्य में पड़ने वाले उस भीषण अकाल का उल्लेख है, जिसका विवरण जैन लेखक हेम चंद्र सूरी के ‘परिशिष्टपर्वन‘ नामक ग्रंथ में भी प्राप्त होता है। यह अभिलेख महत्वपूर्ण है क्योंकि मेगास्थनीज ने मौर्य साम्राज्य में अकाल का उल्लेख नहीं किया। यह स्थान संभवतः गुप्त काल में पुंड्रवर्धन भुक्ति का मुख्यालय रहा होगा।
आठवीं शताब्दी के इस प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल का हिन्दुओं के लिए आज भी अत्यधिक महत्व है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल के मध्य में तथा प्रत्येक 12 वर्ष में दिसंबर माह में पूरे देश से हिन्दू श्रृद्धालू यहां आते हैं तथा कराटोआ नदी में स्नान करते हैं।
इस क्षेत्र से टेराकोटा की बनी हुई वस्तुएं तथा सोने की कई मुद्राएं प्राप्त हुई हैं। महेश्वर/महिष्मती (22.11° उत्तर, 75.35° पूर्व) महेश्वर, नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर मध्य प्रदेश के पश्चिमी निमाड़ (खरगौन) जिले में स्थित है। मंदिरों के इस प्रसिद्ध शहर को पहले ‘महिष्मति‘ के नाम से जाना जाता था। रामायण एवं महाभारत में भी इस स्थान का विवरण प्राप्त होता है। हरिवंश पुराण के अनुसार महिष्मती की स्थापना मुकुंद ने की थी। जबकि पुराणों के अनुसार, महिष्मती की स्थापना यदु वंश के एक राजकुमार द्वारा की गई थी। पुरातात्विक उत्खननों से इस बात के प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि उज्जैन के साथ ही महिष्मती भी छठी शताब्दी ईसा पूर्व से ही राजनीतिक एवं वाणिज्यिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। यद्यपि उज्जैन के पास से लौह अयस्कों की प्राप्ति से यह अनुमान लगाया जाता है कि यहां के लोग काम के लिए उज्जैन आकर बस गए थे तथा महिष्मती से तेजी से लोगों का पलायन हुआ था। इसके परिणामस्वरूप महिष्मती का महत्व घटने लगा। प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों में महिष्मती का उल्लेख अवंती की राजधानी के रूप में किया गया है। यह उज्जैन से पैठन के मुख्य मार्ग पर अवस्थित था। सांची अभिलेख में महिष्मती के लोगों द्वारा दिए गए दान का विवरण भी प्राप्त होता है।
पुरातात्विक उत्खननों से इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि नेवदाटोली के समान यह भी एक पुरापाषाणकालीन स्थल था तथा इसका महत्व प्रथम शताब्दी ईस्वी से बढ़ना प्रारंभ हुआ।
उत्तरवर्ती गुप्तों के शासनकाल में महिष्मती का महत्व एक बार पुनः स्थापित हो गया था। इस बात का प्रमाण यहां से प्राप्त एक लेख से भी मिलता है, जिसमें यहां के एक शासक सुबंधु द्वारा भूमि दान में दिए जाने का उल्लेख है। बदरीक इतिवृत्तों के अनुसार यहां नर्मदा के किनारे प्रारंभिक चाहमान या चैहान शासकों का निवास स्थल था।
रानी अहिल्याबाई ने महिष्मती को होल्करों की राजधानी बनाया था। यहीं समीप स्थित पेशवा घाट, फांसे घाट एवं अहिल्या घाट पर्यटकों के आकर्षण के प्रमुख केंद्र हैं।
यह नगर महेश्वरी साड़ियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जो अपनी विशिष्ट बुनाई के लिए जानी जाती हैं।

महोबा (25.28° उत्तर, 79.87° पूर्व)
वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित महोबा एक प्राचीन शहर है। विभिन्न समयों में इसे भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता था। ये नाम थे-केकापुर एवं पाटनपुरा। ऐसी भी मान्यता है कि इसका यह नाम श्महोत्सवश् से व्युत्पन्न हुआ है। यह महोत्सव महोबा के संस्थापक, चंदेल शासक चन्द्रवर्धन द्वारा 800 ई. में आयोजित किया गया था। जैसा कि साक्ष्य बताते हैं, लगभग 900 ई. में चंदेलों ने अपनी राजधानी खजुराहो से महोबा स्थानांतरित कर दी थी। प्रारंभिक चंदेल शासक जिसे स्थानीय रूप से रुहेला कहा जाता था, के सम्मान में यहां रुहेला सागर झील का निर्माण किया गया है। इस झील के निकट ही ग्रेनाइट से एक सूर्य मंदिर भी निर्मित किया गया। चंदेल वंश के दो प्रसिद्ध शासकों कीर्तिवर्मन एवं मंदरवर्मन ने भी यहां कीर्तिसागर एवं मदन सागर नामक दो प्रसिद्ध जलाशयों का निर्माण करवाया था। यह निर्माण 1182 ई. में हुआ था तथा इन जलाशयों का नामकरण इन शासकों के नाम पर ही किया गया। पृथ्वीराज चैहान ने जब महोबा पर आक्रमण किया तो परमार्दिदेव को दो प्रसिद्ध सेनानायकों आल्हा एवं ऊदल ने पृथ्वीराज के विरुद्ध भीषण युद्ध किया। इस युद्ध में पृथ्वीराज चैहान की विजय हुई। उसने महोबा पर अधिकार कर लिया तथा उसे तहस-नहस कर दिया। चंदेलों के पतनोपरांत, इस स्थान का महत्व समाप्त हो गया। यद्यपि बाद में मुगलों ने इसे बुंदेलखंड क्षेत्र का अपना मुख्यालय बनाया।
महोबा में धार्मिक, पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक महत्व के अनेक स्थल हैं।
महोबा का पान पूरे भारत में प्रसिद्ध है तथा विदेशों को निर्यात भी किया जाता है।

मलयदिपत्ती गुफा (10.28° उत्तर, 78.82° पूर्व)
मलयदिपत्ती गुफा तमिलनाडु के पदुकोट्टई जिले में स्थित है। पहले मलयदिपत्ती को थिरुवलत्तुरमलई भी कहा जाता था। यह शिला को काटकर बनाए गए दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है-इनमें से एक मंदिर शिव का तथा दूसरा मंदिर विष्णु का है। दोनों मंदिर आठवीं शताब्दी के उतरार्द्ध तथा नौवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में एक ही चट्टान को काट कर बनाए गए थे। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अनुसार, शिव मंदिर पल्लव काल से संबंधित है तथा यह विष्णु मंदिर से अधिक प्राचीन है। यह मंदिर कुवावन साथन द्वारा 730 ई. में बनाया गया था, जिसने यहां पीठासीन देवता वकिशवरर का नाम दिया। इस शिव मंदिर को अलारथुर्थली के नाम से जाना जाता है। विष्णु मंदिर में रंगनाथ (अनंतपदमनाभ स्वामी) की विश्राम मुद्रा में एक नक्काशीदार प्रतिमा है।
शैलकर्त मंदिर की शैली थिरूमेय्यम मंदिर तथा वहां चूने द्वारा अलंकरण का स्मरण करती है। मलयदिपत्ती में विष्णु मंदिर मामल्ल शैली का अधिक प्रतीत होता है, जिसमें अत्यन्त सुंदर स्तंभ बने हैं। स्तंभयुक्त विशाल कक्ष में पाश्र्वभित्तियों पर पैनल बने हुए हैं। दंती वर्मा पल्लव का एक आठवीं शताब्दी का अभिलेख भी है। कुछ अन्य अभिलेख भी हैं, जिनमें राजा केसरी सुन्दर चैझन (एक चोल नरेश) द्वारा 960 ई. में यहां किए गए मरम्मत कार्यों का उल्लेख है।

मांडला (लगभग 22.59° उत्तर, 80° पूर्व)
मध्य प्रदेश के मांडला जिले में पादप जीवाश्मों का एक राष्ट्रीय उद्यान है। ये पादप जीवाश्म भारत में 40 मिलियन से 150 मिलियन वर्ष पहले के हैं तथा मांडला जिले के 7 गांवों (घुगुवा, उमारिया, देओराखुर्द, बरबसपुर, चांटी-पहाड़ियां, चारगांव तथा देओरी कोहानी) में फैले हैं। इस क्षेत्र को 1983 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। यह पाया गया कि ये जीवाश्म 65 मिलियन वर्ष पूर्व मिलने वाले पौधों के हैं। उपरोक्त सात गांवों के अतिरिक्त धनगांव में भी कुछ पादप जीवाश्म मिले हैं। तीन अन्य गांव भी हैं जहां जीवाश्म पाए गए हैं, परंतु ये गांव राष्ट्रीय उद्यान की परिधि के बाहर हैं।
बीरबल साहनी प्रागवनस्पति संस्थान, लखनऊ ने मांडला के वनस्पति अवशेषों पर कुछ प्रारम्भिक अध्ययन किए हैं। घुगुवा तथा उमरिया में सूखे हुए पेड़ों को जिमनोस्पर्म, ऐजियोस्पर्म तथा ताड़ के रूप में चिन्हित किया गया है। कुछ ब्रायोफाइट जीवाश्मों को भी पहचाना गया है। पादप जीवाश्मों में कुछ मोलस्क जीवाश्म भी मिले हैं तथा ये माना जाता है कि नर्मदा नदी घाटी के निकट मांडला में जिस क्षेत्र में ये जीवाश्म पाए गए हैं वह क्षेत्र लगभग 40 मिलियन वर्षों पहले ‘पोस्ट कैम्ब्रियन टरश्यरी ऐज‘ में समुद्र से आच्छादित था। समुद्र के उतरने पर घाटी में एक दरार उत्पन्न हो गई, जिससे वर्तमान की नर्मदा व तापी नदी अरब सागर तक बहती हैं। भूमि में दरार के फलस्वरूप दो भू-भाग लोरेशिया तथा गोंडवाना सामने आए। भारत गोंडवाना का हिस्सा था। यह कटाव जुरासिक अथवा क्रिटेशियस काल में हुआ था तथा वैज्ञानिकों द्वारा जीवाश्मों का सही-सही काल निर्धारण किया जाना अभी बाकी है। कुछ पादप अफ्रीका व ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले पादपों से संबंधित हो सकती हैं। यूकेलिप्ट्स वृक्ष के जीवाश्म हैं, जो ऑस्ट्रेलिया में बहुतायत से पाए जाते हैं। कुछ फलदार वृक्षों जैसे खजूर, नीम, जामुन, केला, कटहल तथा रुद्राक्ष के जीवाश्म भी हैं। हालांकि निश्चित रूप से अभी इनके बारे में कुछ भी नहीं बताया जा सकता है।

मांडू (22°20‘ उत्तर, 75°24‘ पूर्व)
मांडू, एक विनष्ट नगर, माण्डव या मांडोगढ़ नाम से भी जाना जाता है, जो दक्षिण-पश्चिमी मध्य प्रदेश में स्थित है। मांडू की किलेबंदी मालवा क्षेत्र के परमार शासकों के समय की गई। प्रसिद्ध परमार शासक मुंज ने यहां मुंज सागर झील का निमाण कराया।
मध्यकाल में मांडू दिल्ली सल्तनत के नियंत्रणाधीन हो गया। बाद में इस पर तीन पठान वंशों के शासकों ने शासन किया। दिलावर खान गुर ने 1401 में यहां एक नए शासक वंश की स्थापना की। उसके पुत्र एवं उत्तराधिकारी होशंगशाह ने मांडू को अपनी राजधानी बनाया। 1435 में होशंगशाह की मृत्यु हो गई तथा उसको एक शानदार मकबरे में दफन कर दिया गया, जो आज भी अस्तितत्व में है। किंतु अपनी मृत्यु से पूर्व उसने यहां कई सुंदर इमारतों का निर्माण कराया, जिन्हें आज भी देखा जा सकता है। होशंगशाह की मृत्यु के उपरांत उसके पुत्र गजनी खान ने आदेश दिया कि मांडू को ‘शादियाबाद‘ (खुशी की नगरी) के नाम से पुकारा जाए।
कालांतर में मांडू पर शेरशाह ने अधिकार कर लिया तथा इसे सुजात खान के नियंत्रण में रख दिया। सुजात खान का उत्तराधिकारी उसका पुत्र बाज बहादुर हुआ। इसी बाज बहादुर एवं रानी रूपमती के प्रणय संबंधों से मांडू की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गयी। बाद में मुगल सेना ने बाज बहादुर को पराजित कर दिया।
मांडू, मुगल सम्राट जहांगीर का प्रसिद्ध सैरगाह था। यहां की स्वास्थ्यवर्धक जलवायु एवं सुंदर स्थलों का वह कायल था तथा अक्सर वह मांडू आया करता था।
मांडू में मुस्लिम शासकों की वास्तुकला के जो नमूने हैं, वे स्थापत्य की भारतीय-इस्लामी शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उनके विलासिता के प्रति अगाध प्रेम से विशेषित हैं। यहां की प्रमुख इमारतों में होशंगशाह का मकबरा, रानी रूपमती एवं बाजबहादुर के महल, हिंडोला महल, जहाज महल एवं जामी मस्जिद इत्यादि सम्मिलित हैं।

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