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उत्परिवर्तन क्या है एक उदाहरण दीजिए म्यूटेशन किसे कहते हैं , mutation in hindi definition

mutation in hindi definition उत्परिवर्तन क्या है एक उदाहरण दीजिए म्यूटेशन किसे कहते हैं ?

पादप प्रजनन में उत्परिवर्तन व बहुगुणिता की भूमिका (Role of Mutations and Polyploidy in Plant breeding)
सजीव इकाइयों के केन्द्रक में आनुवांशिक पदार्थों का वितरण एवं इनका प्रतिकृतिकरण (Replication) इतना सटीक एवं दोषरहित होता है कि आगामी पीढ़ियों में इनकी आनुवांशिक सूचनाएँ बिना किसी परिवर्तन के संचरित होती हैं । परन्तु यदा-कदा विरल रूप से (Rarely) आनुवांशिक पदार्थ के वितरण एवं प्रतिकृतिकरण (Distribution and replication) दोनों ही अव्यवस्थित हो जाने के कारण, आनुवांशिक लक्षणों के संचरण में अनियमितता (Irregularity) उत्पन्न हो जाती है, परिणामस्वरूप किसी जीवधारी के लक्षणों में त्वरित एवं अचानक वंशागत परिवर्तन (Sudden, heritable changes ) दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसे परिवर्तनों को उत्परिवर्तन (Mutation) कहा जाता है। अर्थात् “सजीवों के आनुवांशिक पदार्थ में अचानक एवं त्वरित परिवर्तन जो लक्षणों की अभिव्यक्ति को आगामी पीढ़ियों में स्थायी रूप से प्रभावित करता है, उत्परिवर्तन (Mutation) कहलाता है (Sudden and abrupt changes in genetic material)।”
सजीवों के किसी लक्षण विशेष में अचानक व अनियमित बदलाव एवं असामान्यता, जो स्थायी रूप से, आनुवंशिक वंशागति करता है, उसे उत्परिवर्तन कहते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप विभिन्न सजीवों के जीन प्ररूपों (Genotypes) में वंशानुगत विविधताएँ (Heritable variations or changes) उत्पन्न होती हैं। उत्परिवर्तन (Mutation)
संक्षिप्त इतिहास (Brief History)—
सजीव जगत में उत्परिवर्तन का उदाहरण सर्वप्रथम राइट (Wright 1791) द्वारा चिन्हित किया गया था, जब उन्होंने अपनी भेड़ों के झुण्ड में एक छोटी टांग वाले मेमने (Lamb) को देखा। बाद में इस प्रकार की भेड़ों से, एक विशेष नस्ल की भेड़ एन्कोन ब्रीड (Ancon breed) को विकसित किया गया।
यदि वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखा जावे तो उत्परिवर्तनों में वे सभी वंशानुगत परिवर्तन आते हैं जिनके कारण किसी सजीव का लक्षण प्रारूप (Phenotype) बदल जाता है। इसी अवधारणा को लेकर ह्यूगो डी व्रीज (Hugo de Vries 1901) ने सबसे पहले उत्परिवर्तन (Mutation) शब्द का प्रयोग उन लक्षण प्ररूपी परिवर्तनों (Phenotypic Changes ) के लिये किया था, जो कि वंशानुगत थे । वे सजीव जो इन लक्षणों को परिलक्षित करते हैं , उनको उत्परिवर्तनी (Mutant) कहा जाता है।
किसी सजीव की दोनों प्रकार की कोशिकाओं-कायिक (Somatic) एवं जनन कोशिकाओं (Germ cells) में उत्परिवर्तन दृष्टिगोचर हो सकते हैं। परन्तु कायिक कोशिकाओं में पाये जाने वाले उत्परिवर्तन केवल एक ही पीढ़ी तक सीमित पाये जाते हैं, वहीं दूसरी ओर जनन कोशिकाओं में विकसित उत्परिवर्तन आगामी पीढ़ी में वंशागत करते हैं एवं आगामी पीढ़ियों में ये स्थायी रूप से परिलक्षित होते हैं। डी व्रीज के अनुसार उत्परिवर्तन को प्रजाति उद्भवन (Speciation) का महत्त्वपूर्ण आधार माना गया । यह निष्कर्ष उनके द्वारा प्रस्तुत उत्परिवर्तन सिद्धान्त (Mutation theory) में प्रतिपादित किया गया था ।
बाद में मोर्गन (Morgan 1910) ने x – किरणों के प्रभाव से फलमक्खी (Drosophila) के नेत्र के रंगों में उत्परिवर्तन पर विस्तृत अध्ययन किया। इसके बाद विभिन्न जीव विज्ञानियों द्वारा उत्परिवर्तन का अध्ययन अनेक पौधों, जन्तुओं एवं सूक्ष्मजीवों जैसे-मुर्गी, मक्का, जीवाणुभोजी एवं न्यूरोस्पोरा कवक में किया गया। मुलर के प्रयोग के पश्चात् स्टेडलर (Stadler) ने 1929 में जौ, आरबेक एवं राबसन (Auerback & Robson 1946) ने मस्टर्ड गैस (Mustard gas), काल्चीसीन (Colchicine), एजीरीडोन्स (Aziridines), नाइट्रोसोअमीन (Nitrosamine) इत्यादि अनेक उत्परिवर्तनों (Mutaginic agents) की खोज की थी। भारत में भी उत्परिवर्तन के क्षेत्र में प्रथम प्रजनन (Mutation-breading) प्रयोग सफलतापूर्वक सन् 1929 से प्रारंभ हुए।
किसी भी जीव की दोनों प्रकार की कोशिकाओं अर्थात् कायिक ( Somatic), एवं जनन कोशिकाओं (Germinal cells) में उत्परिवर्तन हो सकते हैं। कायिका कोशिकाओं में उत्पन्न उत्परिवर्तन सजीव में केवल उसी एक पीढ़ी तक सीमित रहते हैं, जबकि दूसरी ओर जनन कोशिकाओं में उत्पन्न उत्परिवर्तन आगामी अनेक पीढ़ियों तक संचरित होते रहते हैं। ये उत्परिवर्तन सजीवों में आने वाली अनेक पीढ़ियों तक स्थायी रूप से विद्यमान रहते हैं । डी व्रीज ने स्वयं के द्वारा प्रतिपादित उत्परिवर्तन सिद्धांत (Mutation theory) में यह निष्कर्ष भी प्रस्तुत किया कि उत्परिवर्तन की प्रक्रिया भी किसी प्रजाति के उद्गम का एक प्रमुख आधार है। उदाहरणतया मनुष्य के साधारण हीमोग्लोबिन प्रोटीन (HBA) में लगभग 140 अमीनों अम्ल इसकी & व B श्रृंखला पर अवस्थित होते हैं । B श्रृंखला में निम्न प्रकार का अनुक्रम (Sequence) पाया जाता है-


यहां उत्परिवर्तन हीमोग्लोबिन प्रोटीन (Hbs) के उत्परिवर्तन विकल्पी द्वारा उत्पन्न होता है, तथा यह मनुष्य की लाल रक्त कोशिका (कणिका) में असमजात (Heterozygous) स्थिति में सिकल सेल ऐनीमिया नामक रोग उत्पन्न कर सकता है ।
यह उत्परिवर्तन समजात अवस्था में मृत्यु का कारण भी हो सकता है । यह स्थिति Hbs में ग्लूटेमिक अम्ल के स्थान पर ‘वेलीन’ (Valine) के आ जाने पर पैदा होती है। ग्लूटेमिक अम्ल का कोड GAA से GUA (Hbs) तथा AAA (Hbc) में परिवर्तित होते ही यह ग्लूटेमिक अम्ल के स्थान पर क्रमश: वेलीन (Valine) तथा लाइसीन (Lysine) उत्पन्न करता है ।

उत्परिवर्तनों के लक्षण (Characteristics of Mutations)
उत्परिवर्तन की प्रक्रिया सजीवों में चाहे किसी प्रकार से उत्पन्न क्यों न हो, लेकिन उत्परिवर्तनों में निम्न
विशिष्टतायें पाई जाती हैं :
(1) उत्परिवर्तन को निर्देशित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह एक संयोगवश सम्पन्न होने वाली
परिघटना है, जो किसी जीव विशेष में वंशागत परिवर्तन उत्पन्न करता है।
(2) उत्परिवर्तन एक सजीव में अथवा अनेक सजीवों में हो सकता है।
(3) प्रकृति में जीवों के जीन में स्वत: उत्परिवर्तन (Spontaneous mutation) पाये जाते हैं, जिनकी दर जीन के अनुसार अलग अलग होती है।
(4)
(5) उत्परिवर्तन के पश्चात् इनके सामान्य विकल्पी प्रभावी (Dominant) व उत्परिवर्ती विकल्पी (Mutant alleles) अप्रभावी पाये जाते हैं। हालांकि अपवादस्वरूप उत्परिवर्ती विकल्पी प्रभावी भी सिद्ध हो सकते हैं। जैसे-मनुष्य में इपीलाइया ।
लगभग सभी उत्परिवर्तन हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। लाभदायक उत्परिवर्तनों की दर केवल 0.1 प्रतिशत ही होती है
( 6 ) भौतिक एवं रासायनिक कारक जो कि जीन के उत्परिवर्तन को उत्प्रेरित (Induce) करते हैं, उत्परिवर्तज (Mutagens) कहलाते हैं । इनमें विकिरण तथा क्षारक जैसे एक्स व गामा किरणें (विकिरण), नाइट्रस अम्ल (रासायनिक उत्परिवर्तज) इत्यादि सम्मिलित हैं।
(7) सजीव की कायिक व जनन कोशिका दोनों में उत्परिवर्तन होते हैं ।
(8) किसी भी जीव में वातावरणीय कारक प्रेरित उत्परिवर्तन दर को प्रभावित करते हैं। बीजों को गामा अथवा एक्स किरणों से उपचारित किये जाने पर, उत्परिवर्तन की दर में वृद्धि पाई जाती है।
(9) (10) सामान्य विकल्पी से उत्परिवर्ती विकल्पो में जब उत्परिवर्तन की प्रक्रिया होती है तो इसे अग्र या अग्रिम उत्परिवर्तन (Forward mutation) एवं जब उत्परिवर्ती विकल्पी से सामान्य विकल्पी में उत्परिवर्तन होता है तो इसे प्रतिलोम उत्परिवर्तन (Reverse mutation) कहते हैं । प्रथम प्रकार अर्थात् अग्रिम उत्परिवर्तन की दर प्रतिलोम उत्परिवर्तन से अधिक पाई जाती है।
अधिकांश उत्परिवर्ती जीन बहु प्रभावी ( Pleotropic) पाये जाते हैं ।
उत्परिवर्तन की आणविक विधि (Molecular mechanism of mutation) –
जीवों के जीन की रासायनिक संरचना की जानकारी प्राप्त होने के साथ ही, हमें उत्परिवर्तन प्रक्रिया की . के आण्विक विधि भी ज्ञात हुई है। आज हम यह जानते हैं कि किसी भी जीन को कोड करने के लिए डी.एन.ए. विशिष्ठ क्षार अनुक्रम, आनुवंशिक कोड के रूप में पढ़े व कोडित किये जा सकते हैं। उत्परिवर्तन इस सूचना को प्रेषित करने की प्रक्रिया में कई बार निम्न प्रक्रियाओं द्वारा बाधा उत्पन्न करते हैं।
(1) प्रतिस्थापन ( Substituion)
(2) प्रेमशिफ्ट उत्परिवर्तन (Frame Shift mutatior)
: (1 ) प्रतिस्थापन ( Substitution ) — इस प्रक्रिया के अंतर्गत एक क्षार का बदलाव दूसरे क्षार से हो जाता है। प्यूरीन के स्थान पर प्यूरीन व पिरिमिडीन के स्थान पर पिरीमीडीन के प्रतिस्थापन को संक्रमण (Transition) कहते हैं । जबकि प्यूरीन के स्थान पर पिरमिडीन या इसका विलोम होने की प्रक्रिया अनुप्रस्थन (Transversion) कहलाती है ।

( 2 ) फ्रेम शिफ्ट उत्परिवर्तन (Frame shift mutation ) –

यह प्रक्रिया कुछ क्षारकों के जुड़ने अथवा हट जाने से सही सूचना प्रेषित नहीं हो पाने के कारण घटित होती है।

पौधों में उत्परिवर्तनों को ज्ञात करने की विधियाँ (Methods to detect mutations in plant ) — विभिन्न पौधों में उत्परिवर्तन प्रक्रिया की जानकारी निम्न दो विधियों द्वारा की जाती है :
(1) ऐसी प्रजाति जिसमें अनेक समयुग्मजी (Homozygous) प्रभावी एवं अप्रभावी लक्षणों के प्रभेद उपस्थित हों तो ऐसी प्रजाति के प्रभावी लक्षणों युक्त प्रभेद (Strain) को उत्परिवर्तज (Mutagen) से उपचारित करके उत्परिवर्तित करते हैं। इसके बाद अप्रभावी लक्षणों वाले प्रभेद से इसका संक्रमण करवा कर अप्रभावी पौधों को छांट कर व इनकी गिनती करके, निम्न प्रकार से उत्परिवर्तन की आवृत्ति ज्ञात की जा सकती है :
जीन में उत्परिवर्तन आवृत्ति 5% =अप्रभावी लक्षण वाले पौधों की संख्या (Recessive Phenotype)/कुल संतति पौधों की संख्या x 100
यदि प्रभावी जीन में उत्परिवर्तन होगा तो एक अप्रभावी के साथ दूसरा भी अप्रभावी विकल्पी प्रभावी लक्षणों वाले उपचारित जनक से प्राप्त होगा अन्यथा प्रभावी लक्षणों वाले जनक से केवल प्रभावी विकल्पी ही प्राप्त होंगे। फलमक्खी में उत्परिवर्तनों की पहचान (Identification of mutation in Fruit fly or Drosophila )- फलमक्खी (Drosophila melanogaster) फलमक्खी में विभिन्न प्रकार के उत्परिवर्तनों को पहचानने के लिए निम्न प्रकार की विशिष्ट विधियां सहायक होती है-

( 1 ) मुलर – 5 (Muller – 5 Method) — यह विधि Muller द्वारा विकसित की गई थी। मुलर-5 मादा ड्रोसोफिला में 2 विशिष्ठ चिन्हक जीन (Marker gene) होते हैं – (1) प्रभावी बार आंख (Dominant bar eye कृषित भूमि क्षेत्र बढ़ाया गया, किन्तु यह साधन खाद्यान्न की बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त था। यह अतिआवश्यक था कि प्रति हैक्टेयर उत्पादन क्षमता बढ़े। अतः इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए अन्य साधन जुटाना अतिआवश्यक था ।
( 2 ) एक ही कृषित भूमि क्षेत्र में, एक वर्ष में एक से अधिक फसलें प्राप्त करना (Taking more than one crops in the existing farm land per year)—अधिक उत्पादन के लिए एक वर्ष में, एक ही कृषित भूमि से एक से अधिक फसलें प्राप्त करना हरित क्रान्ति के लिए उत्तम साधन था । इसके लिए प्रतिवर्ष दो मानसूनों की आवश्यकता थी। एक प्राकृतिक एवं दूसरा कृत्रिम । कृत्रिम मानसून की आवश्यकता को पूरा करने के लिए सिंचाई के विभिन्न साधन विकसित किये गये। इस कार्य के लिए नदियों पर बाँध बनाये गये, जिससे प्राकृतिक मानसून पानी का बहुत बड़ा भाग संचय किया जा सके, जो कि बिना उपयोग में आये समुद्रों में बह जाया करता था। इसी के साथ समय पर समुचित नियंत्रित जलापूर्ति के लिए नयी सिंचाई व्यवस्थाएँ एवं तकनीकें विकसित की गयीं ।
(3) आनुवंशिक रूप से उन्नत बीजों (High yielding) का उपयोग (Use of genetically improved seed)—हरित क्रान्ति के लिए अन्य कृषिगत विधाओं को उन्नत करने के साथ-साथ आनुवंशिक रूप से उन्नत बीजों (चमत्कारी बीजों ) का उपयोग एक बहुत ही आवश्यक वैज्ञानिक कदम था। इस क्षेत्र में एक,पादप रोग विज्ञानी एवं पादप प्रजनक नॉरमैन ई. बोरलॉग (Norman E. Borlaug) का योगदान उल्लेखनीय है। इस वैज्ञानिक ने अन्तर्राष्ट्रीय मक्का तथा गेहूँ सुधार केन्द्र, सोनोरा, मैक्सिको में चमत्कारी बीजयुक्त किस्में विकसित कीं जिनमें बहुत अच्छी उपज देने के साथ-साथ फसलों के अन्य अच्छे गुणों का सम्मिश्रण किया गया था। उनमें से मुख्य गुण इस प्रकार हैं-
(1) इन बीज जनित पादपों में विभिन्न रोगों के प्रति प्रतिरोधकता होती है ।
(2) इन बीजों पर उर्वरकों का शीघ्र प्रभाव होता है तथा उर्वरक की प्रति इकाई मात्रा अधिक उपज देती है।
(3) पौधे बौने होते हैं तथा पके अन्न भारी होने पर भी बालियाँ नहीं गिरती हैं ।
(4) बीज शुष्कता सहन करने में सक्षम होते हैं अतः विस्तृत क्षेत्र में बोये जा सकतें हैं। (5) बीज अल्प अवधि में पक जाते हैं, जिससे एक आंधक फसलें प्राप्त की जा सकती हैं।
(6) स्थानीय परम्परागत बीजों की तुलना में चार गुणा उपज देने की क्षमता होती है।
ये अधिक उपज देने वाली किस्में हरित क्रान्ति का आधा अथवा है। सन 1973 में भारत में नॉरमैन द्वारा विकसित की गयीं किस्मों से सोनोरा – 64, सोनोलिका, कल्याण सोना आदि भारत में ICARI में विकसित की गयीं। भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में इन किस्मों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
इसी प्रकार चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि को भी अधिक उपज देने वाली किस्में (High yielding varieties) तैयार की गयी। चावल की अधिक उपज देने वाली किस्म IR-8 को अन्तर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान, फिलीपीन्स में तथा अन्य प्रभेदों पद्मा व जया को भारत में विकसित किया गया है, जिनका वर्तमान समय में हरित क्रान्ति के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान है। गेहूँ की अधिक उपज देने वाली किस्म K-68, हरित क्रान्ति के अग्रणी रहे डॉ. एम.पी. सिंह द्वारा विकसित की गयी है।

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