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सूक्ष्मजैविक किण्वक एवं इनके उपयोग क्या है , Microbial enzymes and their uses in hindi application
जानिये सूक्ष्मजैविक किण्वक एवं इनके उपयोग क्या है , Microbial enzymes and their uses in hindi application ?
एन्जाइम्स (Enzymes) : अन्य प्राणियों की भाँति सूक्ष्मजीवों द्वारा भी अनेकों प्रकार के एन्जाइम उत्पन्न किये जाते हैं जो उत्पाद के रूप में प्राप्त होते हैं या सूक्ष्मजीवों में उपापचयी क्रियाओं के सम्पन्न किये जाने हेतु प्रयुक्त किये जाते हैं। अब तक लगभग 200 प्रकार के किण्वकों की खोज की जा चुकी है, इनमें से लगभग 150 प्रकार के एन्जाइमों का उपयोग कपड़ा, कागज, चमड़ा बेकरी. डेयरी, मण्ड, अपमार्जक, भोज्य पदार्थों जैसे उद्योगों में काम में लिये जाते हैं। लगभग 200 प्रकार के किण्वक आनुवंशिक अभियांत्रिकी हेतु उपयोग में लाये जाते हैं। 10 प्रकार के किण्वकों का उपयोग स्वास्थ्य व सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री के निर्माण में किया जाता है। एन्जाइम संश्लेषण, शुद्धिकरण व निश्चलीभवन की नवीन तकनीकें खोजी गयी हैं। विश्व के अनेक राष्ट्रों के द्वारा किण्वकों का औद्योगिक उत्पादन करके प्रतिवर्ष विदेशी मुद्रा कमायी जा रही है, इस क्षेत्र में और अनुसंधान कार्य जारी है।
सारणी – महत्वपूर्ण सूक्ष्मजैविक किण्वक एवं इनके उपयोग
| क्र.सं. | एन्जाइम | स्त्रोत | क्रिया | उपयोग |
| 1 | a एमाइलेज
| बैसिलस | मण्ड को ग्लूकोज में
| मण्ड जल अपघटन बदलना भोजन उद्योग
|
| 2. | प्रोटीएज | एशरेकिया | प्रोटीन अपघटन | लान्ड्री उद्योग |
| 3. | पेनिसिलिन एसाइलेज
| बेन्जॉइल विदलन
| एल्यूकेमिआ / केन्सर उपचार
| |
| 4. | L- एसपेरेजिनेस
| एसपरजिलस | I – एस्पार्जिन की प्राप्ति
| |
| 5. | एमाइलो- ग्लूकोसिडे
| एसपरजिलस | डेक्ट्रिन जल अपघटन | ग्लूकोज उत्पादन |
| 6. | B – गेलेक्टोसिडेज | एसपरजिलस
| लेक्टोज जल अपघटन
| दुग्ध व व्हे में लेक्टोज
|
| 7. | एमीनो एसिलेज | एसपरजिलस | एसिलेटेड L अमीनो अम्लों का जल अपघटन | जल अपघटन रेसेमिक मिश्रण का विश्लेषण
|
| 8. | ग्लूकोज ऑक्सीडेज
| स्ट्रेप्टोमाइसेज | ग्लूकोज का ऑक्सीकरण | रक्त में ग्लूकोज की जाँच |
| 9. | ग्लूकोज आइसोमरेज
| स्ट्रेप्टोमाइसेज
| ग्लूकोज का फ्रक्टोज में परिवर्तन | उच्च फ्रक्टोज सिरप उत्पादन
|
| 10 | ल्यूसीफरेज | समुद्री जीवाणु
| जैव संदीप्ती न्यूक्लिक अम्ल में
| ATP की प्राप्ति
|
| 11 | न्यूक्लिएजेज रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिऐज
| अनेक जीवाणु व सायनोबैक्टीरिया
| फॉस्फो डाएक्टर बन्धों का जल अपघटन
| आनुवंशिक अभियांत्रिकी
|
एन्जाइम उत्पादन की क्रिया हेतु सूक्ष्मजीवों का पृथक्करण कर इनकी पहचान की जाती है। इसके उपरान्त कम लागत में इनका संवर्धन संवर्धन माध्यम में किया जाता है। इसके लिये उत्परिवर्तित विभेदों का उपयोग किया जाने लगा है जो अधिक मात्रा में एन्जाइम उत्पादन करते हैं जिस माध्यम में सूक्ष्मजीव का संवर्धन किया जाता है वह निजर्मित होना चाहिये । एन्जाइम निर्माण के उपरानत इसका शुद्धिकरण किया जाता है। इसमें अनेक प्रकार के परिरक्षक मिलाये जाते हैं। किण्वक का अवक्षेपण कराकर इसे सूखे चूर्ण (powder) के रूप में प्राप्त किया जाता है। इसे पेक कर विभिन्न उद्योगों में उपयोग हेतु काम में लाया जाता है। एन्जाइमों के कुछ महत्वपूर्ण उपयोग के क्षेत्र निम्नलिखित हैं।
- रोग निदान एवं उपचार
- विश्लेषणी क्रियाओं में।
- डेयरी उद्योग ।
- डिटरजेन्ट उद्योग
- मदिरा उद्योग
- औषध उद्योग
- चर्म उद्योग
- कागज उद्योग
- कपड़ा उद्योग
- बेकरी उद्योग आदि ।
नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) : जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्रिया सूक्ष्मजीवों के द्वारा की जाती है। ये सूक्ष्मजीव लेग्यूमिनेसी कुल के पादपों की जड़ों की गांठों में पाये जाते हैं। इन जीवाणुओं में नाइट्रोजिनेज जटिल ( nitrogenase complex) नामक एन्जाइम्स पाये जाते हैं। नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रिया निफ जीन्स (Nif genes) के निर्देशन में सम्पन्न होती है। क्लेबसिएला निमोनिएई (K. pneumoniae) से Nif जीन को अलग करने में सफलता मिल गयी है। इनकी मदद से राइजोबियम (Rhizobium) जीवाणु में उपस्थित निफ जीन का अध्ययन किया जा चुका है। इन जीवाणुओं की देह में उपस्थित nif जीन्स को द्विबीजपत्री पादपों में स्थानान्तरित करने हेतु अनुसंधान किये जा रहे हैं। कुछ पादपों की कोशिकाओं में nif जीन्स रोपित किया गया है, इसके परिणामस्वरूप इन पादपों में वायुमण्डल में उपस्थित स्वतन्त्र नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने का लक्षण आ जाता है अर्थात् इन्हें बाहर से नाइट्रोजन युक्त खाद देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस क्रिया को निम्न पदों के अनुरूप सम्पन्न कराया जाता है-
(i) निफ जीन का पृथक किया जाना (Isolation of Nif genes) : इस क्रिया हेतु निफ जीन रखने वाले जीवाणुओं जैसे राइजोबियम पर लाइसोजाइम एन्जाइम द्वारा क्रिया करायी जाती है। एन्जाइम द्वारा जीवाणु की देह को खोले जाने के उपरान्त इसके DNA को विशिष्ट रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज (restriction endonuclease) द्वारा उपचारित (treat) कराते हैं। इस प्रकार चिपचिपे सिरों (sticky ends) युक्त DNA के अंश प्राप्त होते हैं। इन अंशों या खण्डों में निफ (nif) जीन उपस्थित होता है।
(ii) वाहक में निफ जीन का संयोजित किया जाना (Integration of Nif gene in vector) : वाहक व औजार (tool) हैं जो निफ जीन को पादप जीनोम में स्थानान्तरित करता है इस क्रिया हेतु मृदा में रहने वाले एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमिफेसिएन्स (Agrobacterium tumefaciens) नामक जीवाणु का उपयोग करते हैं। इस जीवाणु में प्लाज्मिड T, पाया जाता है। यह जीवाणु द्विबीजपत्री पादपों में शिखर गाँठे (crown gall) या अबुर्द्ध (tumors) उत्पन्न करता है। जब यह जीवाणु पादप की कोशिकाओं में प्रवेश कर जाता है तो इसका प्लाज्मिड T, पादप कोशिका के जीनोम में रूपान्तरित कर दिया जाता है यह क्रिया T प्लाज्मिड के द्वारा T-DNA अर्थात् हस्तान्तरित DNA (transferred DNA) को स्थानान्तरित करके करायी जाती है।
अतः वाहक के प्लाज्मिड को पृथक कर इसे रेस्ट्रिक्शन एण्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम द्वारा खोलते हैं व T-DNA के खण्ड के विशिष्ट स्थल पर पृथक किया हुआ निफ जीन लाइगेज (ligase) एन्जाइम की सहायता से T-DNA में जोड़ दिया जाता है, इस प्रकार निफ जीन युक्त पुनर्योजित (recombinant) DNA प्राप्त होता है।
(iii) निफ जीन की क्लोनिंग (Cloning of Nif gene) : निफ जीन की एक जैसी प्रतियाँ हजारों लाखों की संख्या में प्राप्त किये जाने हेतु क्लोनिंग क्रिया करायी जाती है। पद दो के अन्तर्गत प्राप्त पुनयोजित प्लाज्मिड को एग्रोबैक्टीरियम जीवाणु में प्रवेशित करा दिया जाता है, इस जीवाणु के द्वारा प्रजनन की क्रिया के दौरान निफ जीन की प्रतिकृति (replica) बनती है।
(iv) निफ जीन का पादप जीन में निवेशन (Insertion of Nif gene in plant genome): पुनयोजित DNA जो प्लाज्मिड के रूप में होता है, धारक जीवाणु को मादप कोशिका में प्रवेशित कराया जाता है। NifT-DNA के पादप के जीनोम में शामिल हो जाने के बाद यह पादप जीन के साथ-साथ पुनरावृत्ति करता है। इस प्रकार पादप कोशिकओं में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का गुण या दक्षता विकसित हो जाती है।
(v) पादप कोशिकाओं का पूर्ण पादप के रूप में संवर्धन (Culture of plant cells into whole plant) : ऊत्तक संवर्धन की क्रिया के द्वारा इन पादप कोशिकाओं को संवर्धित किया जाता है। इन्हें पूर्ण पादप के रूप में इस विधि से प्राप्त किया जाता है।
जैव-ईंधन (Bio-fuels) : जैव ईंधन से जैव ऊर्जा (bio-energy) प्राप्त की जाती है। सूक्ष्मजीवों से हाइड्रोजन, इथेनॉल, मिथेनॉल व जैव-गैस प्राप्त की जाती है।
जाइमोमोनास मोबिलिस (Zymomonas mobilis) में पादप शर्कराओं का किण्वन कर एल्कोहॉल बनाने क्षमता यीस्ट की अपेक्षा दो गुनी पायी जाती है। थर्मोएनेरोबैक्टर इथेनॉलिकस (Themoanaerobacter ethanpolicus) का उपयोग कार्बोहाइड्रेट्स से इथेनॉल प्राप्ति हेतु किया जाता है। मीथेन उत्पादक जीवाणु जैव-गैस का उत्पादन करते हैं। यह क्रिया अपशिष्ट पदार्थों पर क्लोस्ट्रिडिया ( Clostriadia), बैक्टिरॉइड्स (Bacteriods), सेलेनोमोनेस (Selenomonas ) एवं ब्यूटाइरोविब्रिओ (Butyrovibrio) जीवाणुओं द्वारा करायी जाती है। जैव- भार पर सूक्ष्मजीवों की क्रिया द्वारा एल्कोहल व जैव-गैस प्राप्ति भी संभव है।
हाइड्रोजन एक स्वच्छ ईंधन है कुछ शैवाल जैसे स्केनेडस्मस (Scenedesmus) व क्लोरेला (Chlorella) प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के दौरान इस गैस का उत्पादन करते हैं। कुछ सायनोबैक्टीरिया आणविक हाइड्रोजन का निर्माण करते हैं। यह क्रिया हाइड्रोजिनेस एन्जाइम द्वारा सम्पन्न होती है व ऑक्सीजन की कम उपलब्धता के समय की जाती है। थर्मोएनेरोबिकम ब्रोकी (Themnnonerobicum brockii) नामक जीवाणु में इस क्रिया हेतु हाड्रोजिनेस व फेरोडोक्सिन पाये जाते हैं। क्लोस्ट्रीडियम सेलोबायोपोरम (Clostridium cellbioporum) में यह क्रिया सेल्यूलोस पर क्रिया कर हाइड्रोजन उत्पादन के रूप में की जाती है। क्लो. ब्यूटाइरिकम (Cl. butyricum) द्वारा हाइड्रोजन उत्पादन की क्रिया वायवीय परिस्थिति में की जाती है। सिट्रोबैक्टर फ्रैन्डाई (Citrobacter frundi) द्वारा हाइड्रोजन उत्पादन की क्रिया अपशिष्ट पदार्थों पर करके की जाती है, इस संदर्भ में औद्योगिक स्तर पर ईंधन उत्पादन हेतु और अनुसंधान कार्यों की आवश्यकता है।
किसी भी राष्ट्र की सम्पन्नता उसके ऊर्जा स्त्रोत से पायी जाती है। ऊर्जा को आवश्यक उद्योग धन्धों, सामान्य रहन-सहन हेतु सभी को पड़ती है। आज परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत पेट्रोलियम उत्पाद, गैस कोयला लगभग समाप्ति को ओर है अतः आवश्यकता इस बात की है कि नये ऊर्जा स्त्रोत खोजे जाये। जैव तकनीक इस क्षेत्र में भी पीछे नहीं है। कार्बन युक्त यौगिकों से मीथेन तथा हाइड्रोजन प्राप्त करने के प्रयास किये जा रहे हैं। इस क्रिया हेतु एन्जाइम हाइड्रोजिनेस कुछ जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। इसी प्रकार जैव संहति (biomass) से किण्वन की क्रिया द्वारा एल्कोहल उत्पन्न किया जाता है। इस क्रिया में भी जीवाणु भाग लेते हैं। बायोगैस (bio-gas) हमारे देश में भी गोबर तथा अन्य अपशिष्ट पदार्थों से प्राप्त की जा रही है। यह भी कुछ विशिष्ट जाति के जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न की जाती है। इसके उत्पादन की प्रक्रिया में सुधार लाने के प्रयास किये जा रहे हैं। इसी प्रकार अपशिष्ट जल ( waste-water) से भी जैव ऊर्जा प्राप्त किये जाने हेतु यूट्रोफिक झीलों में प्रयास किये जा रहे हैं।
कसावा, मक्का, ज्वार, आलू, गन्ना, अन्नानास एवं चुकन्दर आदि से एल्कोहल प्राप्त किया जाने लगा है। एल्कोहल को पेट्रोल के साथ 20% तक मिला गाड़ियों में ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जात है। ब्राजील सरकार ने 1975 में एल्होकल उत्पादन बढ़ाने का फैसला क्यों किया कि बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ गये थे व चीनी की कीमत बाजार में घट रही थी। अमेरिका में गैसोहोल (gasohal) 6-9 भाग पेट्रोल एवं 1 भाग एल्कोहल ईंधन के रूप में प्रयुक्त करने की सलाह दी जा रही है।
जैव ईंधन इसलिये भी उपयोगी है क्योंकि इनके उपयोग से प्रदूषण नहीं फैलता । अपशिष्ट पदार्थों से इन्हें प्राप्त करने पर इनका उचित निस्तारण हो जाता है। बायो मास में CO2 का पुनः चक्रण रहता है अतः वायुमण्डल में CO, की मात्रा में और अधिक वृद्धि नहीं होता।
जैव तकनीकीविज्ञ सीधे पादपों से डीजल समान ईंधन प्राप्त करने में प्रयासरत है। इन्हें बायोगैस से एल्कोहल प्राप्त करने में सफलता मिल चुकी है। भूमिगत चट्टानों से अधिकाधिक तेल निकालने में जीवाणुओं की सहायता ली जा रही है। तेल का भक्षण करने जीवाणुओं की नयी जातियाँ करने के प्रयास किये जा रहे हैं जो तेल शोधक कारखानों व समुद्र की सतह पर फैले तेल को जल सतह से हटाने में सहायक होंगे।
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