सूक्ष्मजीव किसे कहते हैं , Microbes definition in hindi , आकार कितना होता है , नाम बताओ कौन कौनसे होते है

जानेंगे सूक्ष्मजीव किसे कहते हैं , Microbes definition in hindi , आकार कितना होता है , नाम बताओ कौन कौनसे होते है ?

सूक्ष्मजीव (Microbes)

परिचय (Introduction)

” सूक्ष्मजीव” (microbe) फ्रेंच भाषा से लिया गया शब्द है जिसका अर्थ “लघु अथवा सूक्ष्मदर्शिक जीव” से है। माइक्रो-ऑरगेनिज्म (micro-organism) समानार्थ शब्द है जिसका उपयोग अधिकता से किया जाता है। सामान्य व्यवहार में जर्म (germ) शब्द किसी भी सूक्ष्मजीव हेतु प्रयुक्त किया जाता है परन्तु विशेषतया यह शब्द रोगजनक जीवाणुओं हेतु ही उपयोग में लाया जाता है। मानव नैत्र 0.1 मि.मी. से छोटे आमाप की वस्तुओं को देखने में असक्षम होते हैं। अत: 1 मि.मी. या इससे कम व्यास के सूक्ष्मजीव सूक्ष्मजीवी विज्ञान (microbiology) की परिधि में आते हैं। जिनका अध्ययन सूक्ष्मदर्शी द्वारा ही संभव हैं। अधिकतर सूक्ष्मजीव 1 मि.मी. के हजारवें भाग से भी छोटे होते हैं। इनका अध्ययनं विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मदर्शी, अनेक तकनीकों व अभिरजंकों (stains) की सहायता से किया जाता है। सूक्ष्मजीवी विज्ञान जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत सूक्ष्मजीवों (विषाणुओं, जीवाणुओं, शैवाल, कवक एवं प्रोटोजोआ ) के जीवन चक्र एवं क्रिया-कलापों का अध्ययन किया जाता है। सूक्ष्मजीवीविज्ञों (microbiologists) ने सूक्ष्मजीवों को कुछ मुख्य समूहों, जीवाणु (bacteria), शैवाल ( algae), फफूंद (mould ), कवक (fungi), विषाणु (virus) और प्रोटोजोआ (protozoa) में विभाजित किया है। इन समूहों के आधार पर ही सूक्ष्मजीवी विज्ञान (Microbiology) की निम्नलिखित उपशाखाएँ बनाई गई हैं-

(i) जीवाणु विज्ञान (Bacteriology): जीव विज्ञान की वह शाखा जो जीवाणुओं (bacteria) के अध्ययन से संबंधित है।

(ii) विषाणु विज्ञान (Virology) : जीव विज्ञान की वह शाखा जो विषाणुओं (virus) के अध्ययन से संबंधित है।

(iii) कवक विज्ञान (Mycology): जीव विज्ञान की वह शाखा जो यीस्ट एवं मोल्ड (mould), कवक (fungi) से संबंधित है।

(iv) आदि जन्तु विज्ञान (Protozoology): जीव विज्ञान की वह शाखा जो एक कोशीय जन्तुओं प्रोटोजोआ से संबंधित है।

(v) शैवाल विज्ञान (Phycology ) : जीव विज्ञान की वह शाखा जो शैवाल से संबंधित है।

सूक्ष्मजीव विश्व के सभी भागों में व्यापक रूप से फैले हुए हैं और भिन्न-भिन्न प्रकार के वातावरण में तथा सभी प्रकार की वास परिस्थितियों में पाये जाते हैं। ये आर्कटिक क्षेत्र, उष्ट-कटिबंधीय क्षेत्र, घने जंगलों, बर्फीले भाग, मरूस्थली क्षेत्र गर्म व शीतल जल स्त्रोतों, तेल कूपों, वायु, जल, मृदा; मृत पदार्थों, भोज्य पदार्थों जन्तुओं एवं वनस्पतियों की देह के भीतर व बाहर अर्थात् सभी स्थानों में रहने वाले जीव हैं। वायुमंडलीय स्तरों एवं भूमि के विभिन्न स्तरों में भी पाये जाते हैं। सूक्ष्मजीव सभी परिस्थितियों में रह कर सामानय जैविक क्रियाएं करते हुए अपनी संख्या में वृद्धि करते हैं। इन जीवों में वृद्धि हेतु ताप, नमी एवं भोजन की सामान्य आवश्यकता होती है।

विभिन्न वातावरणीय दशाओं के अनुसार एक स्थान से दूसरे स्थान पर इनकी संख्या तथा प्रकार में भिन्नता पायी जाती है। कुछ निश्चित जीवाणु कुछ स्थानों पर सदैव विद्यमान रहते हैं। किसी विशेष वातावरण में एक या एक से अधिक जीवाणुओं की जातियाँ उपस्थिति हो सकती हैं। उदाहरणतः स्ट्रेप्टोकॉकस लैक्टिस सामान्यतः दूध में पाया जाता है तथा इसे अम्लीय बनाता है। यही जीवाणुभूमि में सामान्यतः पाया जाता है, अनाज के दानों व सूखी घास में एवं खाद में भी पाया जाता है तथा जन्तुओं के बाह्य आवरण पर भी उपस्थिति हो सकता है।

भूमि में ये उसके प्रारूप, कार्बनिक पदार्थों की मात्रा (pH) संगठन, वायु, आर्द्रता आदि के अनुसार वितरित रहते हैं। अधिकतर ये भूमि की ऊपरी सतहों में ही पाये जाते हैं, आक्सीजन व भोज्य पदार्थों की कमी के कारण गहराई में इनकी संख्या घटती जाती है। इनकी संख्या उपजाऊ भूमि में अधिक (उद्यान ) व अनुपजाऊ भूमि में कम होती है।

वायु · इनके वितरण में सहायक होती है। वायु में इनकी वृद्धि एवं गुणन संभव नहीं होता। जीवाणु वायु प्रवाह, धूल कणों व गैसों द्वारा वितरित होते हैं। ये सागर के ऊपर की वायु में भी पाये जाते हैं किन्तु स्थलीय वायु की अपेक्षा इनकी संख्या में कमी पायी जाती है। ऊँचे पर्वतों के ऊपर की वायु में इनका प्राय: अभाव होता है। देहात व शहरों के ऊपर की वायु में जीवाणुओं की जातियों के प्रारूप एवं संख्या में भिन्नता पायी जाती है। ये धूल कणों से अधिक आसंजित रहते हैं।

अधिकतर जल में ये बहुतायत में पाये जाते हैं। जल के विभिन्न स्त्रोतों कुए, झरने, नदी, तालाब, व झीलों में इनकी संख्या भिन्न होती हैं। वाहित मल, प्रदूषित जल में इनकी संख्या अधिक होती है। समुद्री जल में भूमि की अपेक्षा कम जीवाणु पाये जाते हैं। इसका कारण यह है कि समुद्री जल संवर्धन माध्यम के रूप में निम्न कोटि का होता है। भोज्य पदार्थों में ये अधिकतर पाये जाते हैं, संग्रहित दुग्ध में इनकी संख्या ताजा दूध की अपेक्षा अधिक होती है।

सूक्ष्मजीवों की व्यापकता का अनुमान हम इस प्रकार से कर सकते हैं कि प्रत्येक जन्तु या पौधा इन सूक्ष्मजीवों के द्वारा सभी ओर से घिरा हुआ रहता है। ये हमारे मित्र के रूप में अथवा दुश्मन के रूप में सदैव हमारे साथ रहते हैं। प्रत्येक प्राणी जो इस भूमण्डल में रहता है और श्वांस लेता है, जल व भोजन ग्रहण करता है किसी न किसी माध्यम के साथ इन सूक्ष्मजीवों को अपनी देह के भीतर आमंत्रित करता है।

अनेकों प्रकार की जीवाणु तथा रोगाणु भयानक रोगों को जन्म देते हैं जिनसे महामारी जैसे रोग उत्पन्न होते हैं एवं करोड़ों लोग मृत्यु के शिकार हो जाते हैं। वनस्पतियों में भी ये रोग फैल कर फसल को दूषित कर देते हैं, और हानि पहुँचाते हैं। इन हानिकारक सूक्ष्मजीवों का नियंत्रण करना अत्यन्त आवश्यक है।

सूक्ष्मजीव हानिकारक तथा लाभदायक दोनों ही प्रकार के हो सकते हैं। मनुष्य ने विभिन्न क्षेत्रों में लाभदयक सूक्ष्मजीवों का उपयोग कर अपने जीवन स्तर में सुधार लाने का प्रयास किया है। अनकों प्रकार के सूक्ष्मजीव वायुमण्डल में या मृदा में या हमारी देह में उपस्थित होकर प्राकृतिक रूप से उपयोगी क्रियाएँ जैसे नाइट्रोजन एवं कार्बन चक्र को नियमित बनाये रखना, मृत-कार्बनिक पदार्थों को सरल पदार्थों में परिवर्तित करना, पाचन क्रिया में सहायता करना आदि क्रियाएँ करते रहते हैं। जीवाणुओं की अधिकतर जातियाँ हानि रहित ही नहीं है बल्कि संजीवों के लिये आवश्यक भी है। जीवाणुओं के पूर्ण अभाव में जीवन सम्भव है। भूमि का ऊपजाऊपन इन्हीं पर निर्भर है। प्रदूषण नियन्त्रण हेतु भी ये आवश्यक है ।

सूक्ष्मजीवों के ज्ञान के कारण ही आज शल्यचिकित्सा तथा औषधि विज्ञान के क्षेत्र में व्यापक प्रगति हुई है। सूक्ष्मजीवों की उपापचयी क्रियाओं का उपयोग बीयर, शराब, ऐल्कोहॉल, सिरका, लेक्टिक अम्ल, एसिटिक अम्ल, सिट्रिक अम्ल, ग्लूकोनिक अम्ल आदि उद्योगों में किया जाने लगा है। अनेक रोगों के उपचार हेतु पेनिसिलीन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, वेक्सीन, विटामिन्स तथा एन्जाइम्स इनके तैयार किये जाते हैं। चाय, काफी, भोज्य पदार्थों, टेक्सटाइल, धातु, प्लास्टिक एवं रबर, लकड़ी और चमड़ा उद्योग में इनका उपयोग किया जाता है। दुग्ध से निर्मित पदार्थों की क्रियाओं तथा इनके रख-रखाव में भी लाभदायक सूक्ष्मजीवों का उपयोग नियंत्रित विधियों द्वारा किया जाता है। अनेक नाशक जीवों (pests) का नाश करने या नियंत्रण करने के लिये भी अब जैव कीटनाशी का उपयोग किया जाता है जिसके अन्तर्गत सूक्ष्मजीवों के बीजाणु माध्यम में घोलकर या बिखेर कर मिला दिये जाते हैं। ये जीवाणु पौधों या जन्तुओं की देह में प्रवेश कर जीवाणुओं को जन्म देकर, रोग उत्पन्न कर या अन्य प्रकार से नाशक जीव को नष्ट कर देते हैं। आगे होने वाले युद्ध भी अब हो सकता है “जीवाणुबम ” द्वारा लड़े जाये । अनेक प्रयोगशालाओं में अत्यन्त प्रभावी एवं हानिकारक प्रकार के जीवाणुओं व विषाणुओं का प्रजनन करा कर उग्र विभेद संवर्धित किये जा चुके हैं, जिन्हें वायुमण्डल में मुक्त करने पर अनेकों प्रकार के असाध्य रोग प्राणियों को घेर लेंगे जो इन्हें काल का ग्रास बनाकर धरती को पुनः सूनी कर देंगे। हाल ही में आतंकवादियों ने एन्थ्रेक्स पाउडर लिफाफों में भेज कर अमेरिका में आतंक एवं रोग उत्पन्न करने की कोशिश की थी। मानव का वैज्ञानिक ज्ञान दिनों दिन बढ़ता जा रहा है, आवश्यकता इसकी है कि उपलब्ध संसाधनों का उपयोग मानव जाति के हित में किया जाता रहे ।

अनुप्रयोगों (application) के आधार पर सूक्ष्मजीवी विज्ञान को अनेकों शाखाओं में विभक्त किया गया है जिनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं-

(i) चिकित्सा सूक्ष्मजैविकी (Medical microbiology)

(ii) खाद्य एवं दुग्ध सूक्ष्मजैविकी (Food and dairy microbiology)

(iii) औद्योगिक सूक्ष्मजैविकी (Industrial microbiology)

(iv) जलीय एवं अनुपयोगी जल का सूक्ष्मजीवी विज्ञान (Water and waste water microbiology)

(v) मृदा एवं कृषि सूक्ष्मजैविकी (Soil and agricultural microbiology)

इनके अतिरिक्त भी और अनेक शाखाएं अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुई हैं जिनका वर्णन हम संबंधित अध्यायों में करेंगे।