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Methods of breaking dormancy in hindi , प्रसुप्ति नष्ट करने की विधियाँ कौन कौनसी है नाम बताइए
पढ़िए Methods of breaking dormancy in hindi , प्रसुप्ति नष्ट करने की विधियाँ कौन कौनसी है नाम बताइए ?
प्रकाशप्रेरित अंकुरण की क्रियाविधि (Mechanism of light induced germination)
इस प्रक्रिया के लिए फायटोक्रोम (phytochrome) नामक वर्णक (pigment) को उत्तरदायी माना जाता है। इसकी उपस्थिति बीजों में भी पायी गयी है तथा तापमान, PH, आर्द्रता, बीज की उम्र व किस्म इत्यादि के अनुसार बदल सकती है। प्रकाश की मात्रा व गुण का भी इस पर प्रभाव पड़ता है। इसके दो रूप PR एवं PER पाये जाते हैं। लाल प्रकाश में PR रूप PFR में बदल जाता है जो सामान्यतया अंकुरण को प्रेरित करता है, जबकि PER रूप दूरस्थ लाल प्रकाश (far red light) में PR में परिवर्तित हो जाता है तथा अंकुरण को प्रेरित नहीं करता। किसी एक समय में PR एवं PER के अनुपात अथवा PFR की मात्रा अंकुरण को नियंत्रित करती है। लेट्यूस में इसकी मात्रा 30-40% तक तथा नाइजैला में 3% तक वांछित है, अतः लेट्यूस को अंकुरण के लिए नाइजैला की अपेक्षा अधिक प्रकाश की आवश्यकता होती है।
- निम्न तापमान की आवश्यकता के कारण (Due to low temperature requirement)
अनेक पादपों में बीजांकुरण के लिए कुछ काल तक निम्न तापमान की आवश्यकता होती है। उदाहरण- एसर (Acer), सेब (Pyrus malus) इत्यादि । निम्न तापमान की आवश्यकता भिन्न-भिन्न हो सकती है। पादप के बीजों का निम्न ताप (0- 5°C) द्वारा उपचार बसन्तीकरण (vernalization) कहलाता है तथा प्रसुप्तावस्था तोड़ने में बहुत प्रभावी होता है। इससे अनेक पादपों में प्रसुप्ति काल समाप्त हो जाता है। बीजों को भिगोकर निम्न ताप पर रखने को पूर्वशीतलन (rechilling) भी कहते हैं।
अनेक पादपों के बीज एक समान ताप पर रख देने मात्र से अंकुरित नहीं होते. उन्हें लगभग 5-15°C तक तापमान में बदलाव की आवश्यकता है, तब वे अंकुरित होते हैं। अरंडी में यह अन्तर लगभग 10°C से अधिक हो तो अंकुरण लगभग 90 प्रतिशत होता है।
- प्रकाश एवं तापमान का सम्मिलित प्रभाव (Combined effect of light and temperature)
गेंदा उच्च तापमान पर अंकुरित नहीं होता। इन्हें अंकुरण के लिए प्रकाश की भी आवश्यकता होती है, परन्तु ये उच्च ताप के प्रभाव को समाप्त नहीं कर सकते। निम्न ताप पर प्रकाश में बीज अंकुरित हो जाते हैं जबकि उसी ताप पर अंधेरे अंकुरित नहीं होते। इन्हें अंकुरण के लिए निम्न ताप एवं प्रकाश दोनों की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार लेपिडियम (Lepidium) की एक प्रजाति में भी बुवाई के दो दिन बाद लाल प्रकाश द्वारा उद्भासन (illumination) तथा 15-25°C तापमान दोनों की उपस्थिति में ही लगभग 40% अंकुरण होता है।
- द्वितीयक प्रसुप्ति (Secondary dormancy)
अनेक पादपों के बीजों में अनुकूल परिस्थितियों में प्रथमतः तो अंकुरण प्रारंभ हो जाता है परन्तु किसी कारणवश वे अपनी अंकुरण क्षमता खो देते हैं। इस प्रकार अंकुरण प्रक्रिया का थम जाना द्वितीयक प्रसुप्ति (secondary dormancy) कहलाती है। कुछ पादपों में यह स्वतः ही बीजों में कुछ कार्यिकी परिवर्तनों के कारण होता है जैसे-टैक्सस (Taxus ) । कभी-कभी प्रथमतः अंकुरण की प्रक्रिया प्रारंभ होने पर अंकुरण के लिए आवश्यक एक अथवा अधिक परिस्थितियां अनुकूल प्रतीत नहीं होती अथवा अनुपस्थित होती हैं। उदाहरणतया – नाइजैला (Nigella) लगातार प्रकाश में रखने पर अंकुरण नहीं होता। इन्हें लम्बे समय तक अंधकार में रखने पर उनमें अंकुरण हो जाता है, परन्तु दीर्घकाल तक प्रकाश में रखने के बाद अंधकार में रखने पर अंकुरण नहीं होता ।
द्वितीयक प्रसुप्ति पर्यावरण में बीजों व पादपों के स्थापन ( establishment) में सहायक होती है। प्रथमतः अंकुरण शुरू होने के पश्चात् यदि प्रतिकूल परिस्थितियाँ हो तो बीज वापस प्रसुप्तावस्था (dormancy) में प्रवेश कर जाता है। इससे भ्रूण अथवा भ्रूणपोष को कोई क्षति नहीं होती अथवा न्यूनतम क्षति होती है। बाद में अनूकूल परिस्थितियों में यही वापस अंकुरित हो जाते हैं। अनेक शीतकालीन एकवर्षी पादप बीजों के प्रकीर्णन के बाद अनुकूल ताप न मिलने पर प्रसुप्त हो जाते हैं गर्मी के मौसम के बाद शीतकाल के प्रारम्भ में अंकुरित होते हैं परन्तु यदि ऐसा न हो सके तो अगले वर्ष यही प्रक्रिया दुबारा होती है तथा पादपक (plantlets) बन जाते हैं।
प्रसुप्ति का हार्मोन नियंत्रण (Hormonal control of dormancy)
बीजों में प्रसुप्ति विभिन्न कारणों से हो सकती है। इसमें पादप हार्मोन का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसमें एबसिसिक अम्ल (ABA) सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसा माना जाता है कि ABA का अन्य हार्मोन यथा IAA तथा GA के साथ संतुलन प्रसुप्ति को नियंत्रित करते हैं। बीजों में सामान्यतः प्रसुप्त बीजों में उच्च ABA सान्द्रता के साथ IAA एवं GA की सांद्रता कम हो जाती है। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि ABA, JAA एवं GA की सांद्रता मान (absolute value) की अपेक्षा उनका आपसी अनुपात बीज प्रसुप्ति व बीजांकुरण को नियंत्रित करते हैं।
प्रसुप्ति नष्ट करने की विधियाँ (Methods of breaking dormancy)
प्रसुप्ति (dormancy) जिन कारणों से होती है उन कारणों को हटा कर प्रसुप्तावस्था को दूर किया जा सकता है- 1. बीजचोल को क्षतिग्रस्त करके (By sacrification of seed coat)
अनेक बीजों में उनकी संरचना इस प्रकार होती है कि बीजावरण अथवा बीज चोल (seed coat) बहुत मोटा अथवा स्थूलित कोशिकाओं से बना होता है अथवा क्यूटिन व मोम इत्यादि की परतों के कारण बीज में जल व वायु का प्रवेश नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में बीज चोल को आंशिक रूप से इस प्रकार क्षतिग्रस्त किया जाता है कि ये भीतर प्रवेश कर सकते हैं व अंकुरण हो पाता है। भौतिक तरीकों (physical or mechanical methods) से क्षति ग्रस्त करना यांत्रिक क्षतिकरण (mechanical scarification) कहलाता है। जैसे बीजों को रेत के साथ रगड़ना, चाकू अथवा चिमटी से बीज चोल को छीलना व रगड़ना, कभी-कभी बीजों को तनुं अम्ल अथवा कार्बनिक विलायकों यथा एसिटोन व एल्कोहल से उपचारित करके बीज चोल को नरम (soften) किया जाता है। यह प्रक्रिया रासायनिक क्षतिकरण (chemical scarification) कहलाती है। कभी-कभी बीजों को पानी में उबाला जाता है।
प्राकृतिक परिस्थितियों में मृदा में उपस्थित कार्बनिक अम्ल, सूक्ष्म जीव यथा जीवाणु कवक इत्यादि बीज चोल पर क्रिया कर उसे विघटित (decompose) कर देते हैं। अनेक पादपों में बीज धीरे-धीरे जलापघटनी विकरों (hydrolytic enzymes) का स्रावण करते हैं जो बीज चोल पर अभिक्रिया कर उन्हें नरम बना देते हैं।
- समाघात / टक्कर ( Impaction )
कुछ बीजों में अंकुरण नाभिक (hilum) में छिद्र प्लग द्वारा अवरुद्ध होने के कारण नहीं हो पाता है। ऐसे पादपों जैसे ट्राइगोनेला (Trigonella arabica), क्रोटोलेरिया (Crotolaria aegyptica) इत्यादि के बीजों को बहुत प्रबलता से हिलाया जाता है ताकि प्लग हट जाये। यह प्रक्रिया समघात (impaction) कहलाती है ।
- प्रशीतन उपचार के द्वारा (By chilling treatment)
अनेक पादपों के बीजों को निम्नंताप पर उपचारित करने से बीजों में सुषुप्तावस्था खत्म हो जाती है तथा हो जाते हैं। प्राकृतिक परिस्थितियों में निम्न ताप उपचार शीत ऋतु के द्वारा हो जाता है तथा शीत ऋतु के बाद बसन्त में बीजों का अंकुरण हो जाता है। कुछ पादपों में पूरे बीज को उपचारित करना पड़ता है व कुछ में भ्रूण को निम्न ताप उपचार की आवश्यकता होती है। सैकेरम (Succharum), सेब (Malus sp), चीड़ (Pimus). थूजा (Thuja). पॉली गोनम (Polygonum) इत्यादि पादपों के बीजों को 0-5° C तापमान पर कुछ सप्ताह रखने के बाद सामान्य तापमान पर लाने पर वे अंकुरित हो जाते हैं। द्रुतशीतन के प्रसुप्ति में विशिष्ट रोल के बारे में अधिक जानकारी नहीं हैं।
- एकान्तरित उच्च व निम्न ताप उपचार (Alternating temperature treatment)
कुछ पादपों में बीजों को विभिन्न समयांतराल (time period) के लिए बारी-बारी से उच्च व निम्न ताप पर उपचारित किया जाता है। उच्च एवं निम्न तापमान के मध्य 10-20° C से अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए। यह अपरिपक्व भ्रूण युक्त बीजों में लाभदायक है। इससे बीज प्रसुप्तावस्था से निकल कर अंकुरित हो जाते हैं। उदाहरण रूमैक्स क्रिस्पस (Rumex crispus) के बीज ।
- स्तरण (Stratification)
यह पुष्पन के लिए वर्नलाइजेशन (vernalization) के समान ही होता है। इसमें बीजों को नम हवादार, स्थान में 0- 10°C के बीच रखा जाता है। कभी बीजों को नम करके फिर उपचारित किया जाता है। इस उपचार को अनुपक्वन भी कहते हैं। यह उपचार कई दिनों तक किया जाता है। इस उपचार के दौरान अपरिपक्व अथवा अर्धविकसित भ्रूण में कुछ परिवर्तन होते हैं, जैसे अमिनों अम्ल, कार्बनिक अम्ल, विकर तथा फास्फोरस युक्त पदार्थों की बीज के विभिन्न भागों में सांद्रता में परिवर्तन होता है। कुछ वृद्धि हार्मोन की सांद्रता में परिवर्तन होता है तथा कुछ सायनोजनी यौगिकों का अपघटन होता है। इस परिवर्तनों से अंकुरण में सहायता मिलती है।
- प्रकाश उद्भासन के द्वारा (Illumination of seeds).
कुछ पादपों में अंधकार में बीज को रखने पर उनमें अंकुरण नहीं होता परन्तु यदि उन्हें प्रकाश में रखा जाये तो वे अंकुरित हो जाते हैं। ऐसे बीज धनात्मक फोटोब्लास्टिक होते हैं। लोबेलिया इनफ्लैटा (Lobelia inflata) में प्रयोगों द्वारा मुन्शर (Muenscher. 1936) ने पाया कि 3-20 दिन तक प्रकाशोद्भासन द्वारा प्रसुप्तावस्था को खत्म किया जा सकता है। धनात्मक फोटोब्लास्टिक बीजों को लाल प्रकाश (650 nm) द्वारा उपचारित करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं परन्तु सुदूर लाल प्रकाश अंकुरण को संदमित करता है। संभवतः इन बीजों के अंकुरण में फायटोक्रोम ( phytochrome) का योगदान भी होता है ।
PR = 650 nm/735 nm PFR
लाल प्रकाश में PR टाइप PFR में बदल जाता है। यह अंकुरण को प्रेरित करता है। सुदूर प्रकाश में PER टाइप PR में बदल जाता है जिससे अंकुरण का संदमन होता है।
कुछ पादप बीजों में प्रदीप्तिकालिता भी देखी गई है। एराग्रोस्टिस फेरूजिनिया (Eragorostis ferruginea ) के बीजों को अंकुरण हेतु छोटे दिन व लंबी रातों की आवश्यकता होती है। रात में यदि जरा सा भी लाल प्रकाश अथवा सुदूर प्रकाश डाल दिया जाये तो अंकुरण नहीं होता। ये सभी परिस्थितियाँ सभी पर लागू नहीं होती । विभिन्न प्रकार के पादप भिन्न-भिन्न प्रकार से अपनी प्रतिक्रिया दर्शाते हैं।
- दबाव डालना (Application of pressure)
कुछ बीजों जैसे मैडिकेगो सेटाइवा (Medicago sativa) में 18° C तापमान पर 5-15 मिनट तक 2000 ATM का द्रवजनित दाब (hydraulic pressure) लगाने पर संभवतः इसके बीज चोल की जल के लिए पारगम्यता बढ़ जाती है तथा अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है।
- वृद्धि नियंत्रक का उपयोग (Use of Growth regulators)
अनेक पादपों में विशेषकर धनात्मक फोटोब्लास्टिक बीजों में काइनेटिन एवं जिबरेलिन द्वारा उपचार करने पर बीजांकुरण बढ़ जाता है। इसके बारे में विस्तार से अंकुरण में दिया जा रहा है। बीज प्रसुप्ति के माध्यम से बीज का उचित मौसम व पर्यावरण में अंकुरण सुनिश्चित हो जाता है तथा वे प्रतिकूल परिस्थितियों का मुकाबला कर सकते हैं।
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