यकृत क्या है ? Liver in hindi , शरीर में लिवर कहा होता है ? यकृत में कौन सा विटामिन संचित रहता है

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Liver in hindi यकृत में कौन सा विटामिन संचित रहता है ? यकृत क्या है ? , शरीर में लिवर कहा होता है ? और इसके रोग , संरचना , चित्र सहित व्याख्या |

यकृत (Liver) : यह शरीर का सबसे बड़ा अंग और ग्रंथि है जो कि लाल भूरे रंग की होती है। यकृत उदरीय गुहा के ऊपरी दाई ओर एवं डायफ्राम के बिल्कुल नीचे स्थित होता है , यह दो पिण्डो दायाँ और बायाँ पिण्ड में विभाजित होता है। ये फेल्सीफॉर्म लिगामेंट्स द्वारा पृथक होते है। यकृत का दायां पिंड नीचे की तरफ वास्तविक दायें पिंड , क्वाड्रेट और कोडेट पिण्ड में विभेदित होता है।

एक नाशपति आकार की थैलेनुमा पित्ताशय यकृत की पश्च सतह से संयोजी उत्तक द्वारा जुडी रहती है। दाई एवं बायीं हिपेटिक नलिका जुड़कर एक सामान्य हिपेटिक नलिका बनाती है। यह बाद में सिस्टिक नलिका से जुड़ जाती है जो पित्ताशय से उत्पन्न होती है।

बाद में सिस्टिक नलिका और सामान्य हिपैटिक नलिका जुड़कर पित्त नलिका बनाती है। जो कि नीचे से गुजरती है और पश्च भाग में मुख्य अग्नाशय नलिका से जुड़कर hepatopancreatic ampulla (ampulla of vater) बनाती है। यह ओपनिंग oddi के कपाट द्वारा रक्षित होती है। बॉयडेन की कपाट पित्त नलिका की ओपनिंग को अग्नाशय नलिका के साथ जुड़ने से पहले घेरे रखता है। यकृत पित्त का स्त्रावण करता है (यकृत पित्त pH 8.6 , पित्ताशय पित्त pH 7.6 ) पित्त पित्तवर्णकों और पित्त लवणों (सोडियम कार्बोनेट , सोडियम ग्लाइकोलेट , सोडियम टोरोकोलेट) , जल म्यूसिन और कोलेस्ट्रोल युक्त होता है। पित्त लवण वसा के पाचन और अवशोषण में सहायता करता है। पित्त में कोई एंजाइम नहीं होता।

जब ग्रहणी में भोजन उपस्थित होता है। पित्त ग्रहणी में बहने लगता है यदि ग्रहणी में भोजन उपस्थित नहीं होता तो पित्त सिस्टिक नलिका द्वारा पित्ताशय में चला जाता है। जहाँ यह संग्रहित होता है। चूहे और घोड़े में पित्ताशय नहीं होता।

पित्त – पित्त क्षारीय (pH – 7.7) होता है , इसकी स्त्रावित मात्रा 600 ml से एक लीटर है। इसमें जल -92% , पित्त वर्णक -0.3% , वसीय अम्ल = 0.3 से 1.2% , कोलेस्ट्रोल = 0.3 से 0.9% , लेसीथिन – 0.3% होता है।

पीलिया : पीलिया यकृत की एक सामान्य बिमारी है। इसमें त्वचा पीली हो जाती है। यह बिलिरुबिन के बाह्य कोशिकीय द्रव्य में इकट्टा होने के परिणाम स्वरूप होता है और यह लाल रूधिर कणिकाओं के अधिक नष्ट होने एवं यकृत कोशिका के क्षतिग्रस्त होने या नलिका में अवरोध आने से जो कि पित्त ले जाती है आदि के कारण भी हो सकता है।

यकृत के कार्य

  • यकृत ग्लाइकोजन , वसा , विटामिन A , D , E , K , B12 , आयरन , कॉपर और पोटेशियम का संग्रह करता है।
  • यह लिम्फ निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र है।
  • यह भ्रूण में हिमोपोइटिक होता है।
  • यह इसके उत्सर्जी पदार्थो पित्त वर्णकों का उत्सर्जन करता है।
  • हिपेरिन (प्रतिस्कन्दक) , फाइब्रिनोजन , रक्त स्कंदन के लिए महत्वपूर्ण प्रोटीन और प्रोथ्रोम्ब्रिन – रक्त स्कंदन के लिए आवश्यक आदि पदार्थो का निर्माण यकृत में ही होता है।
  • एल्कोहल उपापचय , वसा , कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन आदि का उपापचय यकृत में होता है।
  • डीएमीनीकरण और डी-टोक्सिफिकेशन भी यकृत में ही होती है।
  • प्लाज्मा प्रोटीन भी यकृत में बनती है है , उदाहरण – एल्बुमिन , ग्लोब्युलिन
  • यकृत में ग्लाइकोजेनेसिस , ग्लाइकोजिनोलाइसिस , ग्लाइकोनिओजेनेसिस की क्रिया भी यकृत में होती है।

यकृत (Liver in hindi) :

संरचना : यह शरीर की सबसे बड़ी और भारी ग्रंथि है। इसकी ऊपरी एवं अग्र सतह चिकनी और मुड़ी हुई होती है , जो डायफ्राम में धँसी हुई होती है। जबकि इसकी पिछली सतह अनियमित होती है। यह मेंढक में तीन लोब में दाई , बायीं और मध्य लोब जबकि खरगोश में पाँच लोब पाए जाते है। लेफ्ट लेटरल , लेफ्ट सेन्ट्रल , स्पाइजीलियन , राइट सेन्ट्रल और कॉर्डेट। मनुष्य में चार लोब होती है। राईट , लेफ्ट , क्वाड्रेट्स और कॉर्डेट लोब।

यह मुख्य रूप से दो लोब (दायाँ और बायाँ) में विभाजित होता है , जो कैल्सीफॉर्म लिगामेंट द्वारा विभाजित होती है। नाशपाती के आकार के यकृत में पीछे की ओर पित्ताशय (गोल ब्लैडर) संयोजी उत्तक की सहायता से जुड़ा होता है। दाई और बायीं हिपेटिक डक्ट मिल कर कॉमन हिपेटिक डक्ट बनाती है , जो पीछे सिस्टिक डक्ट जो पित्ताशय से निकलती है से मिल जाती है। सिस्टिक डक्ट और कॉमन हिपेटिक डक्ट आपस में मिल कर बाइल डक्ट बनाती है। बाइल डक्ट पीछे की ओर पैन्क्रियाटिक डक्ट से मिलकर हिपैटोपैन्क्रियाटिक एम्पुला (एम्पुला ऑफ़ वेटर) बनाती है। यह एम्पुला ड्यूओडिनम में खुलता है। एम्पुला की ओपनिंग ओडाई के स्फिंकटर द्वारा नियंत्रित होती है। बाइल डक्ट के पैन्क्रियाटिक डक्ट में मिलने से पूर्व के स्फिंक्टर बॉयडन पाया जाता है जो बाइल डक्ट को घेरता है।

यकृत की आधारभूत संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई हिपेटिक लोब्यूल होती है।

प्रत्येक लोब्यूल्स बहुभुजीय , ग्लाइकोजन की घनी प्लेट्स हिपैटोसाइट्स से निर्मित होती है , जो सेन्ट्रल वेन के चारों ओर स्थित होती है। इन प्लेट्स (हिपैटोसाइट्स ) के मध्य गोल रक्त साइनोसोइड्स पाए जाते है। लोब्युल्स के चारों ओर शाखित पोर्टल वेन , हिपेटिक आर्टरी , बाइल डक्ट और लिम्फैटिक डक्ट पायी जाती है। हिपैटोसाइट्स के मध्य ट्यूबलर रिक्त स्थानों का एक जाल बाइल कैनालीकुली को दर्शाता है। लोब्यूल्स के बाहर की ओर बाइल कैनालीकुली क्यूबॉयडल एपिथिलियम से निर्मित छोटे हैरिंग्स कैनाल में खुलते है। ये कैनाल कोल्यूमनर एपिथिलियम से बनी बाइल डक्ट में मिल जाता है। साइनोसोइड्स भक्षक कुफ्फर कोशिका युक्त एंडोथीलियम से आस्तरित होती है। कुफ्फर कोशिकाएँ बैक्टीरिया और बाह्य पदार्थो को नष्ट करने का कार्य करती है।

पित्ताशय (gallbladder) : पित्ताशय नाशपाती के आकार का नीला थैले जैसा अंग है , जो यकृत से एक लिगामेन्ट द्वारा जुड़ा रहता है। इसका निचला हिस्सा फंड्स कहलाता है जबकि संकरा भाग गर्दन कहलाता है। जो सिस्टिक डक्ट से जुड़ा होता है।

यकृत के कार्य

यकृत वर्टिब्रेट्स के शरीर की सबसे बड़ी और आवश्यक ग्रंथि है जो बहुत सारे कार्यो का संचालन करती है।
  • यह बाइल जूस का स्त्रावण करता है , जो जल , बाइल साल्ट (सोडियम ग्लाइकोकोलेट और सोडियम टोरोकोलेट) , बाइल पिगमेंट (बिलिरुबिन और बिलीवर्डिन) , कोलेस्ट्रोल , म्युसिन , लेसिथिन , वसा आदि से मिलकर बना होता है। यह वसा को तोड़ने और इम्ल्सीकरण का कार्य करता है।
  • यकृत में मृत आरबीसी के हीमोग्लोबिन को बिलिरुबिन और बिलीवर्डिन नामक बाइल पिग्मेंट में बदला जाता है। पित्त वर्णक आंत में स्टर्कोबिलिन में बदल जाती है जो मल को रंगने का कार्य करता है।
  • यकृत में इंसुलिन की उपस्थिति में आवश्यकता से अधिक मात्रा में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट (ग्लूकोज) को ग्लाइकोजन (ग्लाइकोजेनेसिस) में बदल दिया जाता है तथा वही संग्रहित होता है।
  • ग्लाइकोजन एक संरक्षित भोज्य पदार्थ है , जो ग्लाइकोजेनोलिसिस की क्रिया द्वारा ग्लूकोज में बदल दिया जाता है तथा रक्त में छोड़ दिया जाता है अत: इस प्रकार विविध भोज्य परिस्थितियों में भी रक्त शर्करा का स्तर नियंत्रित रहता है।
  • असामान्य स्थिति में यकृत जटिल रासायनिक क्रियाविधि द्वारा वसा और प्रोटीन को ग्लूकोज में परिवर्तित कर देता है। अकार्बनिक स्रोत से इस नयी शर्करा का बनना ग्लूकोनिजोजेसिस कहलाता है।
  • यदि ग्लाइकोजेनेसिस तथा उपापचय के बाद भी रक्त शर्करा का स्तर सामान्य से अधिक होता है तब यकृत आवश्यकता से अधिक ग्लूकोज , वसा में परिवर्तित करके जमा कर लिया जाता है। इस क्रिया को लाइपोजेनेसिस कहते है।
  • प्रोटीन पाचन के बाद आंत में बने अमीनो अम्ल अवशोषित हो कर रक्त संचार द्वारा यकृत में आ जाते है। इनमे से कुछ प्रोटीन सिंथेसिस में उपयोग कर लिए जाते है , शेष का ट्रांसएमिनेशन (दूसरी तरह के एमिनो अम्ल में परिवर्तन) और डिएमीनेशन हो जाता है।
  • भ्रूण में यकृत आरबीसी का निर्माण करता है। वयस्क में यह आयरन , कॉपर और विटामिन B12 (एन्टी एनीमिक फैक्टर) को संचित रखता है और आरबीसी और हीमोग्लोबिन निर्माण में सहायता करता है।
  • रक्त के संग्रह केंद्र के रूप में यकृत कार्य करता है और रक्त की मात्रा को नियंत्रित करता है।
  • फाइब्रिनोजन , प्रोथोम्बिन और अन्य थक्का बनाने वाले कारक यकृत में बनते है। हिपैरिन एक इन्ट्रावैस्कुलर एंटीकोगुलेट है , जो यकृत में संचित रहता है।
  • प्लाज्मा प्रोटीन एल्ब्युमिन और ग्लोब्युलिन का निर्माण भोजन में उपस्थित प्रोटीन से यकृत में होता है।
  • यकृत में कैरोटिनॉइड पिग्मेंट से विटामिन A का निर्माण होता है , इसके अलावा वसा में घुलनशील विटामिन A , D , E , K का और विटामिन B12  का संग्रह भी यकृत में होता है।
  • यकृत भोजन के साथ आये अथवा शरीर द्वारा स्त्रावित विषाक्तों का विनाश करता है।
  • यकृत मुख्य ऊष्मा उत्पादन करने वाला अंग है।
  • यकृत के साइन्युसोइड्स में उपस्थित कुफ्फर कोशिकाएं फैगोसाइटोसिस द्वारा बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक सूक्ष्म जीवो को नष्ट करते है।
  • लसीका के निर्माण का प्रमुख केंद्र यकृत है।

बाइल / कोली :

  1. मात्रा : 800 से 1000 मिली लीटर प्रतिदिन (औसतन 700 मिली प्रतिदिन)
  2. स्रोत : हिपेटिक कोशिकाओं द्वारा स्त्रावित।
  3. संग्रह स्थान : पित्ताशय
  4. रंग : हरा / नीला
  5. रासायनिक प्रकृति : क्षारीय
  6. pH : 7.6 से 8.6

बाइल के कार्य :

  1. वसा का पायसीकरण (इमल्सीफिकेशन)
  2. वसा में घुलनशील विटामिन्स का अवशोषण
  3. माध्यम को क्षारीय बना कर एंजाइम को क्रिया करने के लिए सुविधा प्रदान करता है।
  4. भारी धातुओं जैसे – Cu , Hg , Zn आदि को शरीर से निष्कासित करने में।
  5. बाइल पिगमेंट की अधिक मात्रा को त्यागने में।
  6. स्टर्कोबिलिन तथा यूरोबिलिन (यूरोबिलिन मूत्र में पाया जाता है ) का निर्माण बिलीरुबिन और बिलीवर्डिन से होता है। ये मल के रंग से सम्बंधित होते है।

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