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विधायिका किसे कहते हैं | विधायिका की क्या परिभाषा है Legislature in hindi definition कार्य , विशेषता प्रक्रिया
Legislature in hindi definition विधायिका किसे कहते हैं | विधायिका की क्या परिभाषा है कार्य , विशेषता प्रक्रिया बताइए ?
प्रस्तावना
‘विधायिका‘ अंग्रेजी शब्द ‘लैजिस्लेचर‘ (Legislature) का अनुवाद है जो लैटिन शब्द लैक्स (स्मग) से निकला है, जिसका अर्थ है-मुख्यतः सामान्य अनुप्रयोगार्थ वैधानिक नियम का एक विशिष्ट प्रकार। इस नियम को विधान नाम दिया गया है, और वह संस्था जो जनता की ओर से इसे अधिनियमित करती है,
विधायिका कहलाती है। अनिवार्यतः, विधायी प्राधार के दो प्रतिरूप होते हैं: संसदीय तथा अध्यक्षीय। संसदीय प्रतिरूप में कार्यकारिणी उसके अपने सदस्यों में से ही विधायिका द्वारा चुनी जाती है। इसी कारण, कार्यकारिणी विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। अध्यक्षीय प्रणाली सत्ता-पृथक्करण के सिद्धांत पर आधारित होती है और किसी भी व्यक्ति को एक ही समय कार्यकारिणी तथा विधायिका दोनों में कार्य करने की अनुमति नहीं देती है।
भारतीय संसद, जो हमारे संविधान की रचना है, जनता का सर्वोच्च प्रतिनिधिक प्राधिकरण है। यही उच्चतम विधायी अंग है। यही जनमत की अभिव्यक्ति हेतु राष्ट्रीय मंच है।
भारतीय विधायिका: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय संसद रातोंरात नहीं प्रकट नहीं हुईय यह ब्रिटिश शासन के दौरान, विशेषकर 1858 से धीरे-धीरे तब उद्भूत हुई जब ब्रिटिश ‘क्राउन‘ ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से भारत पर प्रभुसत्ता ग्रहण कर ली। भारत सरकार अधिनियम, 1858 द्वारा ‘क्राउन‘ की शक्तियों का प्रयोग एक कौन्सिल ऑव । इण्डिया की मदद से भारत हेतु राज्य-सचिव द्वारा किया जाना था। यह राज्य–सचिव, जो ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के प्रति उत्तरदायी था, उच्च सरकारी पदाधिकारियों वाली एक एक्जीक्यूटिव कौन्सिल की मदद से, गवर्नर-जनरल के मार्फत भारत पर शासन करता था। किसी प्रकार का कोई शक्ति-पृथक्करण नहीं थाय सभी शक्तियाँ – विधायी, कार्यकारी, सैन्य तथा असैनिक — कौन्सिल में इस गवर्नर-जनरल में निहित थीं।
इण्डियन कौन्सिल एक्ट, 1861 ने थोड़ा-बहुत लोकप्रियता का पुट देना आरम्भ दिया क्योंकि इसने एक्जीक्यूटिव कौन्सिल में कुछ अतिरिक्त गैर-राजकर्मचारियों को शामिल किया था और उनको विधायी व्यवसाय के लेन-देन में भाग देने की अनुमति दे दी थी। लेजिस्लेटिव कौन्सिल न तो मंत्रणात्मक थी और न ही प्रतिनिधिक। इसके सदस्य, नामांकित होते थे और उनकी भूमिका गवर्नर-जेनरल द्वारा रखे गए विधायी प्रस्तावों पर मात्र विचार करने तक सीमित थी।
इण्डियन कौन्सिल एक्ट, 1892 ने दो महत्त्वपूर्ण सुधार किए। प्रथम, इण्डियन लैजिस्लेटिव कौन्सिल के गैर-पदेन सदस्य अब से बंगाल चैम्बर ऑव कॉमर्स तथा प्रोविन्सिअल लैजिस्लेटिव कौन्सिलों द्वारा नामांकित किए जाने थे, जबकि प्रोविन्सिअल कौन्सिलों के गैर-पदेन सदस्य विश्वविद्यालयों, जिला बोर्डो, नगरपालिकाओं जैसे कुछ स्थानीय निकायों द्वारा नामांकित किए जाने थे। दूसरे, ये कौंसिलें बजट पर चर्चा करने तथा एक्जीक्यूटिव से शंका-समाधान कराने में सक्षम बना दी गई।
मॉरले-मिण्टो सुधारों पर आधारित इण्डियन कौन्सिल एक्ट, 1909 ने पहली बार प्रतिनिधिक के साथ-साथ लोकप्रिय अभिलक्षणों को भी प्रवेश दिया। केन्द्र में, लैजिस्लेटिव कौन्सिल में निर्वाचन शुरू किया गया यद्यपि पदाधिकारियों ने बहुमत अभी तक कायम रखा था। परन्तु प्रान्तों में, प्रोविन्सिअल लैजिस्लेटिव कौन्सिल का आकार निर्वाचित गैर-पदेन सदस्यों को शामिल कर बढ़ा दिया गया ताकि ये पदाधिकारीगण आइंदा बहुमत न बनाएँ। इस अधिनियम ने लैजिस्लेटिव कौन्सिलों के मंत्रणात्मक प्रकार्यों को बढ़ावा दिया और उन्हें बजट तथा जनहित के किसी भी अन्य ऐसे मामले पर दृढ़-प्रतिज्ञता प्रस्तुत करने का अवसर दिया जो कुछ विशिष्ट विषयों, जैसे कि सशस्त्र बल, विदेश मामले तथा भारत राज्य आदि, को छोड़कर हो। भारत सरकार अधिनियम, 1915 ने सभी पूर्व अधिनियमों को समेकित किया ताकि कार्यकारिणी, विधायिका तथा वैधानिक प्रकार्य किसी एक ही अधिनियम से व्युत्पन्न किए जा सकें।
भारत सरकार अधिनियम, 1919 से उद्गमित विधायी सुधारों का अगला चरण प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार के रूप में कुछ और विधायी सुधार लेकर आया। केंद्र में विधायिका को द्विसदनी बना दिया गया और निर्वाचित बहुमत को दोनों सदनों में प्रविष्ट कराया गया। तथापि, उत्तरदायी सरकार का कोई भी घटक केन्द्र में प्रविष्ट नहीं किया गया। कौन्सिल में गवर्नर-जेनरल पहले की ही भाँति राज्य-सचिव के माध्यम से ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के प्रति उत्तरदायी बना रहा।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 भारतीय राष्ट्रीय नेताओं और ब्रिटेन के बीच अनेक सन्धिवार्ताओं के बाद अस्तित्व में आया। इसने ब्रिटिश भारतीय प्रांतों तथा देशज राज्यों वाले एक संघ की अपेक्षा की थी। इसने छह राज्यों में द्विसदनी विधायिकाओं को प्रारंभ किया। इसमें तीन सूचियों केन्द्रीय सूची, प्रान्तीय सूची और समवर्ती सूची, के माध्यम से केन्द्र व प्रान्तीय विद्यार्थी शक्ति को सीमांकित किया। बहरहाल, सैण्ट्रल एक्जीक्यूटिव को विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया गया। गवर्नर-जेनरल के साथ-साथ ‘क्राउन‘ भी सैण्ट्रल लैजिस्लेचर द्वारा पारित विधेयकों को अस्वीकार (वीटो) कर सकता था। गवर्नर-जेनरल के पास अध्यादेश-प्रारूपण अधिकारों के अलावा विधि-निर्माण अथवा स्थायी अधिनियमों के स्वतंत्र अधिकार भी थे। इस प्रकार की सीमाएँ प्रोविन्सिअल लैजिस्लेचरों के मामले में भी विद्यमान थीं।
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य तथा भारत व ब्रिटेन में हालातों ने ब्रिटिश सरकार को स्वतंत्रता हेतु भारतीय दावे के एक असम-मुखरित स्वीकरण की ओर प्रवृत्त किया। भारतीय स्वाधीनता अधिनियम, 1947 दो स्वतंत्र उपनिवेश – भारत और पाकिस्तान, बना कर पास किया गया। प्रत्येक स्वतंत्र उपनिवेश को पूरी विधि-निर्माण स्वायत्तता रखनी थी। 1946 में बनी कॅन्स्टीट्यूएण्ट असेम्बली द्वारा जो कुछ भी प्रतिबंध हो, स्वतंत्र उपनिवेश की विधायिका के अधिकार बिना किसी प्रतिबन्ध के व्यवहार्य थे। इस कन्स्टीटयूएण्ट असेम्बली ने भारतीय संविधान अंगीकार कर लिया जिस पर 26 नवम्बर 1950 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हुए।
बोध प्रश्न 1
नोट: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिए गए रिक्त स्थान का प्रयोग करें।
ख) अपने उत्तरों की जाँच इकाई के अन्त में दिए गए आदर्श उत्तरों से करें ।
1) भारत सरकार अधिनियम, 1919 के द्वारा शुरू किए गए महत्त्वपूर्ण वैधानिक सुधार हैं
2) केन्द्र तथा संघट्ट इकाई के बीच शक्ति-विभाजन पहली बार द्वारा शुरू किया गया।
बोध प्रश्न 1.उत्तर
1) केन्द्र में द्विसदन विधायिका दृ पहली बार, निर्वाचित बहुमत विधायिका में स्थापित किया गया।
2) भारत सरकार अधिनियम, 1935 जिसने भारत में संघवाद की पुरस्थापना की।
संघीय विधायिका
अनुच्छेद 79 के प्रावधान के तहत्, भारत की संसद के मुख्य घटक हैं – राष्ट्रपति और दो सदननिम्न सदन अथवा लोक सभा (जनता का सदन) तथा उच्च सदन अथवा राज्य सभा (राज्यों की परिषद्)। जबकि लोकसभा भंग किए जाने की विषयवस्तु है, राज्य सभा एक स्थायी विधि-निर्माण संस्था है जिसको भंग नहीं किया जा सकता है। राष्ट्रपति पद भी कभी रिक्त नहीं रहता है।
राष्ट्रपति
जबकि अमेरिका का राष्ट्रपति विधायिका (काँग्रेस) का अंग नहीं होता, भारत का राष्ट्रपति भारतीय संसद का एक अभिन्न अंग होता है। तथापि वह दोनों सदनों में से किसी में भी न तो बैठ सकता है और न मंत्रणाओं में भाग ही ले सकता है।
भारत का राष्ट्रपति संसद की तुलना में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। राष्ट्रपति सदन को एक सत्र से दूसरे सत्र तक उपस्थित होने के लिए आदेश जारी करता है और सत्रावसान करता है। दोनों सदनों द्वारा पास किया गया कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के बिना कानून नहीं बन सकता है। इसके अलावा कुछ विधेयक तभी लाए जा सकते हैं जब राष्ट्रपति की अनुशंसा प्राप्त हो जाए। जब दोनों ही सदनों की सत्रावसान स्थिति हो तो राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार भी है। ये अध्यादेश यद्यपि स्वभावतः अस्थायी होते हैं, संसद द्वारा पास किए गए किसी कानुन जैसा ही प्रभाव और शक्ति रखते हैं । इकाई 12 में हम भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों का विस्तार से निरीक्षण करेंगे।
सारांश
भारतीय संसद, देश में सर्वोच्च विधायी अंग, की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। ईस्ट इण्डिया के दिनों में, जबकि विधायिका किसी रूप में अस्तित्व में आ गई, तभी कम्पनी के शासन के स्थान पर ‘क्राउन‘ का शासन हो गया और यूनियन लैजिस्लेटिव की शक्तियों के साथ-साथ इसका लोकतांत्रिक आधार भी धीरे-धीरे बढ़ने लगा।
संसद में होते हैं — राष्ट्रपति, लोक सभा तथा राज्य सभा । संसद हेतु चुने जाने के लिए संविधान व संसद द्वारा निर्धारित कुछ अहंताएं पूरी करनी होती हैं । संसद-सदस्यों को बेहतर प्रकार्यात्मक हेतु कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं। सदन की सभाओं का संचालन करने और सदन की प्रतिष्ठा और मान की रक्षार्थ प्रत्येक सदन का अपना एक पीठासीन अधिकारी होता है।
संसद का प्राथमिक कार्य है कानून बनाना। इसके अतिरिक्त, यह अपनी नीतियों के लिए मंत्रिपरिषद् को उत्तरदायी ठहराती है और जहाँ कहीं भी आवश्यक हों, नीतियों की आलोचना करती है। इसके पास संविधान संशोधित करने और राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने की शक्तियों हैं। प्रभावी प्रकार्यात्मकता भी हेतु इसके सदस्यों के बीच से अनेक समितियाँ नियुक्त की जाती हैं। सरकार पर नियंत्रण रखने के लिए प्रश्न-काल, स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, आदि संसद को उपलब्ध हैं। बजट पारित करना, संसद का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार्य, उसे सरकार की गतिविधियों की सूक्ष्म जाँच करने का अवसर प्रदान करता है।
सम्पूर्ण विश्व में विधायिका की स्थिति में एक अधोमुखी प्रवृत्ति व्याप्त है। प्रतिनियुक्त विधान, सरकार के अन्य अंगों पर कार्यकारिणी का आधिपत्य, सशक्त दल प्रणाली का उदय, आदि इस प्रवृत्ति हेतु कुछ कारण हैं। इन प्रवृत्तियों के बावजूद, संसद अब भी शासन की अधिकारिणी है और सरकार के अन्य अंगों की तुलना में अपनी स्थिति बरकरार रखने में सक्षम है।
कुछ उपयोगी पुस्तकें
ग्रैनविले, ऑस्टिन, इण्डियाश्ज कॅन्स्टीट्यूशन – कॉर्नरस्टोन ऑव ए नेशन, आक्सफॉर्ड यूनीवर्सिटी प्रैस, 1964 ।
बसु, दुर्गा दास, कमेण्ट्री ऑन दि कॅन्स्टीट्यूशन ऑव इण्डिया, प्रेण्टिस हॉल, नई दिल्ली, 1983 ।
मुखर्जी, हिरेन, पोर्टेट ऑव पार्लियामेण्ट: रिफ्लेक्शन्स एण्ड रीकलेक्शन्स, विकास, नई दिल्ली, 19781
विधायिक प्रक्रिया
विधि-निर्माण ही विधायिका का प्राथमिक प्रकार्य है। चूंकि आधुनिक समाज स्वभावतः बहुत जटिल है, विधि-निर्माण भी एक जटिल प्रक्रिया हो गई है। भारतीय संविधान विधि-निर्माण प्रक्रिया के निम्नलिखित चरण सुझाता है:
विधि-निर्माण का प्रथम चरण है – एक विधेयक की पुरस्थापना जिसमें प्रस्तावित कानून अभिव्यक्त होता है और यह “प्रयोजनों तथा हेतुओं की अभ्युक्ति‘‘ के साथ होता है। विधेयक की पुरस्थापना को विधेयक का प्रथम पाठन भी कहा जाता है। विधेयक दो प्रकार के होते हैं: साधारण विधेयक तथा धन-विधेयक। धन अथवा वित्त विधेयक के अलावा कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और राष्ट्रपति की सहमति हेतु प्रस्तुत किए जाने से पूर्व इसे दोनों सदनों में पारित किए जाने की आवश्यकता होती है। कोई विधेयक एक मंत्री अथवा किसी गैरसरकारी सदस्य द्वारा पेश किया जा सकता है। सदन में प्रस्तुत किया जाने वाला प्रत्येक विधेयक राजपत्र में प्रकाशित करवाना पड़ता है। सामान्यतः एक विधेयक को प्रस्तुत किए जाते समय कोई बहस नहीं होती। विधेयक प्रस्तुत करने वाला सदस्य विधेयक के उद्देश्य व प्रयोजनों को इंगित करता हुआ एक संक्षिप्त विवरण दे सकता है। यदि विधेयक का इस चरण में विरोध होता है, विधेयक का विरोध करने वाले सदस्यों में से एक को अपने तर्क देने के लिए अनुमति दी जा सकती है। इसके बाद प्रश्न मत व्यक्त करने हेतु रखा जाता है। यदि सदन विधेयक की पुरस्थापना के पक्ष में है, तब यह अगले चरण में जाता है।
दूसरे चरण में, चार वैकल्पिक प्रक्रियाएँ होती हैं। अपनी पुरस्थापना के बाद, एक विधेयक (क) विचारार्थ लिया जा सकता है, (ख) सदन की एक प्रवर समिति के पास भेजा जा सकता है, (ग) दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति के पास भेजा जा सकता है, (घ) जनमत माँगने हेतु घुमाया जा सकता है। जबकि पहले तीन विकल्प नियमित विधि-निर्माण के मामले में सामान्यतः अपनाए जाते हैं, अंतिम विकल्प की सहायता केवल तब ली जाती है जब प्रस्तावित विधान जनविवाद और उत्तेजना-प्रवण हो। जिस दिन इन प्रस्तावों में से कोई कार्यान्वित किया जाता है, विधेयक के सिद्धांत और उसके सामान्य प्रावधानों पर चर्चा की जा सकती है। यदि विधेयक विचारार्थ लिया जाता है, विधेयक में संशोधन ओर विधेयक के प्रावधानों की एक-एक धारा दृढ़ता से कही जाती है। यदि विधेयक सदन की प्रवर समिति को भेजा जाता है, वह विधयेक पर विचार करता है और अपनी रिपोर्ट सदन को विचारार्थ पेश करता है। तब विधेयक की धाराएँ विचार किए जाने के लिए सार्वजनिक हो जाती हैं और संशोधन स्वीकार्य होते हैं। यही सर्वाधिक समय-व्ययी चरण है। एक बार धारा-दर-धारा विचार कार्य पूरा हो जाने और प्रत्येक धारा पर मत व्यक्त हो जाने के बाद विधेयक का दूसरा पाठन समाप्त हो जाता है।
तीसरे चरण में, प्रभारी सदस्य “पारित किए जाने वाले विधेयक‘‘ का प्रस्ताव रखता है। तीसरे पाठन पर विधेयक की प्रगति तीव्र होती है क्योंकि सामान्यतः केवल मौखिक अथवा नितांत औपचारिक संशोधन ही प्रस्तावित होते हैं और बहुत ही संक्षिप्त चर्चा होती है। एक बार संशोधनों का निपटारा होने के बाद, विधेयक अंततः सदन में पारित हो जाता है। तदोपरांत, यह दूसरे सदन को उसके विचारार्थ प्रेषित कर दिया जाता है।
जब विधेयक दूसरे सदन के विचारार्थ आता है, उसको उन्हीं सभी चरणों से गुजरना पड़ता है जो आरंभिक सदन में थे। सदन के सामने तीन विकल्प होते हैं: (क) वह आरंभिक सदन द्वारा भेजे गए विधेयक को अंतिम रूप से वैसे ही पारित कर सकता हैय (ख) यह विधेयक को पूर्ण निरस्त कर सकता है अथवा आरंभिक सदन को वापस भेज सकता हैय (ग) वह विधेयक पर कोई कार्रवाई नहीं भी कर सकता है और यदि विधेयक प्राप्ति-तिथि के बाद छः माह से अधिक पड़ा रहे, यह निरस्त माना जाता है।
आरंभिक सदन अब संशोधनों के आलोक में लौटाए गए विधेयक पर विचार करता है। यदि वह संशोधनों को मान लेता है, इस आशय का एक संदेश दूसरे सदन को भेजता है। यदि वह इन संशोधनों को स्वीकार नहीं करता है, तब विधेयक दूसरे सदन को इस आशय के एक संदेश के साथ लौटा दिया जाता है। ऐसी स्थिति में जब दोनों सदनों में कोई सहमति नहीं बनती, राष्ट्रपति दोनों सदनों की एक संयुक्त बैठक बुलाता है। उपस्थित एवं मतदान करते सदस्यों के एक साधारण बहुमत द्वारा यह विवादित प्रावधान अंतिम रूप से अंगीकार अथवा निरस्त कर दिया जाता है।
वह विधेयक जो अंतिम रूप से दोनों सदनों द्वारा पारित है, लोक सभा अध्यक्ष के हस्ताक्षर के साथ राष्ट्रपति को उसकी सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यह सामान्यतः अंतिम चरण होता है। अगर राष्ट्रपति अपनी सहमति दे देता है, विधेयक अधिनियम बन जाता है और विधान-पुस्तिका में लिख दिया जाता है। यदि राष्ट्रपति अपनी सहमति नहीं देता है, विधेयक समाप्त हो जाता है। राष्ट्रपति इस पर फिर से विचार किए जाने के एक संदेश के साथ विधेयक सदनों में पुनर्विचार हेतु वापस भी कर सकता है। यदि फिर भी सदन विधेयक को संशोधन अथवा बिना संशोधन पारित कर देते हैं और विधेयक राष्ट्रपति को उसकी स्वीकृति हेतु दूसरी बार प्रस्तुत कर दिया जाता है, राष्ट्रपति को अपनी सहमति रोकने का कोई अधिकार नहीं है।
इस प्रकार, विधि-निर्माण एक लंबी, दुर्वह और समय-व्ययी प्रक्रिया हैय एक थोड़े-से समय में कोई विधेयक पारित करना कठिन हो जाता है। विधेयक का समुचित प्रारूपण समय बचाता है और कुशलतापूर्वक विपक्ष का समर्थन माँगने के काम को आसान बनाता है।
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