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laminar air flow in biotechnology in hindi , लैमीनर वायु प्रवाह जैव प्रौद्योगिकी में क्या होता है
जाने laminar air flow in biotechnology in hindi , लैमीनर वायु प्रवाह जैव प्रौद्योगिकी में क्या होता है ?
लैमीनर वायु प्रवाह (Laminar Air Flow)
यह 8×112 फीट का कक्ष होता है जिसमें कर्त्तोत्तकों (explants) को निर्जर्मीकृत स्थितियों में पोष माध्यमों (culture media ) पर स्थानान्तरित करवाया जाता है। इस क्रिया को सम्पन्न करने हेतु इस कक्ष में एक बेंच उपस्थित होती है जिस पर कर्त्तोत्तक स्थानान्तरण करने के काम आने वाली सभी सामग्री यथा चाकू, ब्लेड, रोगाणुनाशक पदार्थ, चिमटी, फिल्टर पेपर, कैंची, बुन्सनबर्नर, फ्लास्क, पिपेट आदि उपस्थित रहते हैं। लैमिनर फ्लो में UV प्रकाश के स्त्रोत के रूप में पाया जाता है जिससे निर्जर्मित (sterile) पदार्थ के संक्रमण (infection) के अवसर कम हो जाते हैं। लैमिनर फ्लो दो प्रकार के होते हैं – क्षैतिज (horizontal) तथा ऊर्ध्वाधर (verticle) लैमिनर फ्लो हुड में सामान्यतः 108 किमी. प्रति घंटे की रफ्तार से निर्जर्मित हवा का प्रवाह रहता है अतः कैबिनेट में निर्जर्मित स्थिति बनी रहती है। यह हवा पहले एक पूर्व फिल्टर से गुजरती है जिससे इसमें पाये जाने वाले सभी बड़े कण छन ( filter) जाते हैं उसके पश्चात् यह HEPA (High Efficency Particulate Air = उच्च दक्षता वायु कण) फिल्टर (Fibre glass filter) से गुजरती है जिससे वायु में उपस्थित 0.3 से बड़े कण फिल्टर हो जाते हैं।
लैमिनर फ्लो से काम करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-
- लैमिनर कक्ष में प्रवेश करते समय जूते, चप्पल कक्ष के बाहर ही उतार देने चाहिए ।
- कार्य आरम्भ करने से पूर्व हाथ, लैमिनर फ्लो की बैंच तथा सभी काम में आने वाली सामग्री को 70% अल्कोहल से पोंछ लेना चाहिए ।
- कार्य आरम्भ करने से 30 मिनट पहले आकर UV प्रकाश खोल देना चाहिए।
- कार्य आरम्भ करने से पूर्व हवा के प्रवाह को इस प्रकार रखना चाहिए कि संदूषित हवा बाहर निकल जाये तथा संक्रमण की कोई आंशका नहीं रहे ।
- पदार्थों के स्थानान्तरण करते समय प्लेटिंग, स्ट्रीकिंग, निवेशन (inoculation) आदि सभी कार्य बुन्सन बर्नर के नजदीक ही करने चाहिए ।
- अगर बेन्च पर कुछ बिखर जाता है तो उसे रोगाणुनाशक से पोंछ देना चाहिए।
- अपकेन्द्रण यंत्र (Centrifuge)
सेन्ट्रीफ्यूज एक धातु का बना उपकरण होता है जिसमें एक स्टेंड होता है। ऊपर का हिस्सा चौड़ा होता है जिसमें धातु के कप, टेस्ट ट्यूब रखने के लिए स्थान बने होते हैं। इसके आधार पर मोटर होती है जिसके द्वारा यह तेजी से घूम सकता है तथा इस घूर्णन गति से टेस्ट ट्यूब में रखे हुए पदार्थ या कण अलग हो जाते हैं। सेन्ट्रीफ्यूज सामान्यतः तीन प्रकार का होता है-
(i) कम गति सेन्ट्रीफ्यूज – गति सीमा = 500rpm
(ii) उच्च गति सेन्ट्रीफ्यूज – गति सीमा = 20,000 rpm
(iii) अल्ट्रा सेन्ट्रीफ्यूज-गति सीमा = 60,000rpm
यह एक ऐसा उपकरण होता है जो बहुत उच्च गति पर घूम कर कणों अथवा पदार्थों को अपकेन्द्री बल (centrifugal force) के द्वारा उनके सघनता व द्रव्यमान बल (density mass) के आधार पर अलग कर देता है।
अपकेन्द्री बल को परिक्रमण/मिनट (revolution per minute = rpm ) अथवा कोणिक गति (angular speed) में ज्ञात किया जाता है।
अपकेन्द्री बल = कोणिक वेग X त्रिज्या
(Centrifugal force) = (angular velocity) X (radius)
कोणिक वेग, घूर्णन (rotation) प्रति मिनट द्वारा दर्शाया जाता है।
कोणिक वेग = 2 x rpm / 60 त्रिज्या / सेकेन्ड
अपकेन्द्री बल सामान्यतः आपेक्षिक या सापेक्ष अपकेन्द्री क्षेत्र (Relative centrifugal field) (RFC) ‘g’ इकाई में दर्शाया जाता है।
सावधानियाँ- ध्यान रखना चाहिए कि सेन्ट्रीफ्यूज में पदार्थ रखने से पूर्व कप में उसकी मात्रा उचित हो
- वर्णमिती (Colorimetry)
इस उपकरण द्वारा बायोकेमिकल यौगिकों (compounds ) की सान्द्रता अथवा जीवाणु समष्टि (bacterial population) की सघनता का, टर्बिडिटी के आधार पर आकलन किया जाता है। इसमें अगर पदार्थ की प्रकाशीय सघनता (optical density) अथवा टर्बिडिटी अधिक होगी तो उसमें उपस्थित कण अधिक होंगे जो प्रकाश का अवशोषण (absorb) कर लेंगे तथा उसके प्रकीर्णन (scattering) को रोकेंगे। उदाहरण स्वरूप ब्रॉथ में जब जीवाणु वृद्धि करते हैं तब उनकी कोशिकाओं की संख्या बढ़ने के साथ ही साथ जो ब्रॉथ जो साफ (clear ) था धुंधला (turbid ) होने लगता है। यह जीवाणु सघनता की पहचान होती है जिसका आंकलन हम स्पेक्ट्रोफोटोमीटर की सहायता से कर सकते हैं
कलरीमीटर/स्पेक्ट्रोफोटोमीटर में मुख्यतः तीन भाग होते हैं-
(1) प्रकाश स्त्रोत
(2) वांछित तरंगदैर्घ्य की प्रकाश तरंग प्रदान करने के लिए उपयुक्त चयनकर्ता इकाई । कलरीमीटर में यह इकाई विभिन्न रंग के फिल्टर के रूप में होते हैं जबकि स्पेक्ट्रोफोटोमीटर में यह मोनोक्रोमेटिक होता है जिससे प्रकाश की वांछित तरंगदैर्घ्य प्राप्त की जा सकती है। कलरीमीटरी की तरंगदैर्ध्य की रेंज अधिक होती है तथा स्पेक्ट्रोफोटोमीटर में निश्चित तरंगदैर्घ्य कम रेंज की होती है।
(3) सेम्पल द्रव में से गुजरने वाले प्रकाश को मापने के लिए उपकरण में द्रव को उपयुक्त स्थान पर रखने के लिए कांच से बने क्यूवेट (cuvette) होते हैं।
सिद्धान्त (Principle) जब प्रकाश स्त्रोत से मोनोक्रोमेटर या फिल्टर के माध्यम से प्रकाश (IO तीव्रता) पारदर्शी पात्र में रखे विलयन में से गुजरता है तब कुछ प्रकाश विलयन द्वारा अवशोषित हो जाता है या इसमें उपस्थित कणों द्वारा विसरित हो जाता है अतः विलयन से बाहर आने वाले प्रकाश की तीव्रता (IS) कम हो जाती है।
प्रयोगों में यौगिकों अथवा मिश्रणों (compounds mixture) का मात्रात्मक (quantitative)आंकलन करना होता है। जब प्रकाश की किरण किसी माध्यम में प्रवाहित करते हैं तो उसका कुछ भाग अवशोषित हो जाता है। यह अवशोषण की मात्रा, विलयन की सान्द्रता, माध्यम की मोटाई, विकिरण की तरंगदैर्ध्य (wavelength) पर निर्भर करती है। विकिरण की तीव्रता को मापकर गुणात्मक रूप से तथा मात्रात्मक (Qualitative and Quantitative) रूप से विलयन में उपस्थित सूक्ष्मजीवों एवं कणों की सान्द्रता द्वारा ज्ञात कर सकते हैं।
- थर्मामीटर (Thermometer)
संवर्धन कक्ष का तापक्रम नियमित तौर पर जांचने हेतु थर्मामीटर का प्रयोग किया जाता है।
- प्रकाशमापी (Luxmeter)
संवर्धन कक्ष में प्रकाश की तीव्रता को सदैव नियंत्रित अवस्था में रखा जाता है इस कार्य के लिए प्रकाशमापी की आवश्यकता होती है जो प्रकाश को 100 से 2500 लक्स तक नियंत्रित रखता है ।
- आर्द्रतामापी (Hygrometer)
संवर्धन कक्ष की सापेक्षित आर्द्रता को 60 प्रतिशत तक नियंत्रित करने के लिए हेयर हायग्रोमीटर का उपयोग किया जाता है।
- जल आसवन संयंत्र (Water Distillation Equipment)
ऊतक संवर्धन हेतु आसवित ( distilled) जल का होना अति आवश्यक है। जल में सामान्यतः खनिज, कार्बनिक पदार्थ आदि मिले रहते हैं अतः इनको आसवन या विआयनीकरण विधि से अलग करके जल को शुद्ध रूप में प्राप्त किया जाता है।
- तुला (Balance)
पोष पदार्थ बनाने हेतु विभिन्न रसायनों को एक विशिष्ट अनुपात में ही मिलाया जाता है। इस कार्य हेतु इलैक्ट्रोनिक तुला का उपयोग करना उचित रहता है ताकि कम से कम मात्रा भी प्रमाणिक रूप से तौली जा सके।
- pH मीटर (pH Meter)
सभी कर्तोंतकों की पोष पदार्थ पर पर एक ही pH पर वृद्धि संभव ही होती है अतः अतः विशिष्ट PH जो कर्तोंतकों की वृद्धि के लिए उपयोगी हो उसे ऊतक संवर्धन के दौरान pH मापन किया जाता। है।
- गैस (Gas)
पोष पदार्थों को गरम करने हेतु प्रयोगशाला में गैस कनेक्शन लेना आवश्यक होता है।
- स्वचालित विलोडक (Automatic stirrer)
यदि लाल शैवालों से प्राप्त अगार अगार को ठोस (solid) पोष पदार्थ बनाने के लिए इस्तेमाल करना हो तब अगार–अगार के चूर्ण को आसवित जल में मिला कर अच्छी तरह मिश्रित करने के लिए हिलाया जाता है। इस कार्य को भली-भांति करने के लएि स्वचालित विलोडक का उपयोग किया जाता है ताकि मिश्रण सही बन जाये ।
- संवर्धन स्थानान्तरण पिपेट (Media dispenser Pipette)
संवर्धन स्थानान्तरण अगर कम मात्रा में करना हो तब 10 ml आयतन की पॉलीप्रोपाइलीन की बनी पिपेट इस्तेमाल करते हैं किन्तु बड़े पैमाने पर संवर्धन स्थानान्तरण हेतु स्वचालित पिपेटर प्रयोग किये जाते है जो 100 परखनलियों में केवल 10 मिनट में ही पोष पदार्थ स्थानान्तरित कर सकते हैं।
- हलित्र (Shaker)
कुछ ऊतक संवर्धन तकनीक में ठोस की अपेक्षा द्रव पोष माध्यम का उपयोग किया जाता है। कर्तोतक द्रव माध्यम में पूर्णतया डूबकर एक स्थान पर स्थित ना हो जाए तथा उसे वातन (aeration) प्राप्त होता रहे अतः इन कार्यों की पूर्ति हेतु हलित्र का उपयोग किया जाता है।
- फ्रिज ( Fridge )
रसायनों के संग्रहण हेतु प्रयोगशाला में रेफ्रीजरेटर का होना आवश्यक है।
- सूक्ष्मदर्शी (Microscope)
कुछ कर्तोतक जैसे भ्रूण, परागकण आदि को अलग करने में सूक्ष्मदर्शी सहायक होता है।
- अलमारी (Almirah )
प्रयोगशाला में प्रयुक्त होने वाले पात्रों व रसायनों को सुरक्षित रूप से भंडारित करने हेतु अलमारी आवश्यक होती है।
- कांच के उपकरण (Equipment of glass)
टेस्टट्यूब, पेट्रिडिश, फ्लास्क, कांच की छड़, (glass rod), पिपेट, मापन सिलेण्डर (measuring cylinder) आदि ।
- अन्य उपकरण (Other equipment)
फिल्टर पेपर, रूई, टेस्ट ट्यूब पर लगाने के धातु के कैप, लेबिल, कचरा पात्र, जल व प्रकाश सुविधा, तौलिये, आग बुझाने के संयंत्र, प्रकाश की सतत् सुविधा हेतु जनरेटर आदि की समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है।
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