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कोठारी शिक्षा आयोग क्या है

कोठारी शिक्षा आयोग क्या है , आयोग के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या है kothari education commission in hindi

kothari education commission in hindi कोठारी शिक्षा आयोग क्या है , कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य क्या है ?

अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव
अंग्रेजों ने स्कूलों एवं काॅलेजों में अंग्रेजी भाषा के पढ़ा, जागे पर जोर दिया ताकि उन्हें प्रशासनिक कार्यालयों के लिए लिपिक एवं बाबू मिल सकें। इसने लोगों के एक नए वग्र को जन्म देने में मदद की जिन्होंने बाद में उनकी भारत में प्रशासन के विभिन्न पहलुओं के शासन एवं नियंत्रण में सहायता की। जिसके परिणामस्वरूप, भारत में आने वाले ईसाई मिशनरीज ने स्कूल खोलने शुरू कर दिए जहां अंग्रेजी पढ़ाई जाती थी। आपको भारत में आज भी ऐसे स्कूल मिल जाएंगे जो उन दिनों में खोले गए थे। ऐसा ही एक स्कूल प्रेजेन्टेशन काॅन्वेंट है जो दिल्ली में स्थित है, और अभी भी चल रहा है तथा अच्छी शिक्षा दे रहा है। कई भारतीय इन स्कूलों में अपने बच्चों को भेजते थे, जैसाकि वे समझते थे कि यह उन्हें सरकारी कार्यालयों में नौकरी दिलाने में मदद करेगा।
अंग्रेजो ने अपने हितों की अभिवृद्धि के लिए अंग्रेजी शिक्षा को प्रोत्साहित किया लेकिन यह एक अलग तरीके से भारतीयों के लिए उपयोगी साबित हुई। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोग अलग-अलग भाषाएं बोलते थे और ऐसी कोई भाषा नहीं थी जिसे सभी लोग समझ सकें। भारतीयों द्वारा अंग्रेजी के प्रयोग ने पूरे देश में एक भाषा प्रदान की और यह सभी को जोड़ने का माध्यम बन गई। अंग्रेजी पुस्तकों एवं समाचार पत्रों ने पूरे विश्व से नवीन विचारों को यहां प्रस्तुत किया। स्वतंत्रता, लोकतंत्र, समानता,एवं बंधुत्व जैसे नवीन पश्चिमी विचारों ने अंग्रेजी जागने वाले भारतीयों के मन पर प्रभाव छोड़ना शुरू कर दिया जिसने राष्ट्रीय जागरण को उत्थान दिया। शिक्षित भारतीय अब ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बारे में सोचने लगे।
1- सीमित रूप से ही सही लेकिन सरकार ने आधुनिक शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु इस संबंध में लोकोपरोकारी भारतीयों के प्रयास ज्यादा सराहनीय थे। सरकार द्वारा आधुनिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने में उठाये गये कदम निम्न कारणों से प्रभावित थे
ऽप्रबुद्ध भारतीयों द्वारा आधुनिक शिक्षा के संबंध में किये गये प्रदर्शन, ईसाई मिशनरियां एवं मानवतावादी नौकरशाह।
ऽप्रशासन के निम्न स्तरीय पदों हेतु भारतीयों की आपूर्ति को सुनिश्चित करने की योजना तथा इंग्लैण्ड के व्यापारिक हितों को पूरा करने की आवश्यकता। इसीलिये सरकार ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाये जागे पर ज्यादा जोर दिया।
ऽसरकार की यह उम्मीद की शिक्षित भारतीय इंग्लैण्ड में निर्मित वस्तुओं की मांग को बढ़ाने में सहायक होंगे।
ऽसरकार की यह अभिलाषा की पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार से भारतीय अंग्रेजी रंग में रंग जायेंगे तथा इससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को स्थायित्व मिलेगा। साथ ही यह शिक्षा, ब्रिटिश विजेताओं तथा उनके प्रशासन का महिमामंडन करेगी। इस प्रकार अंग्रेजों की योजना थी कि वे आधुनिक एवं पाश्चात्य शिक्षा का प्रयोग कर अपनी सत्ता को भारत में सुदृढ़ एवं स्थायी बना देंगे।
2- भारतीय शिक्षा की परम्परागत पद्धति से धीरे-धीरे प्रशासनिक कर्मचारियों की मांग में गिरावट आ रही थी। विशेष रूप से 1844 के पश्चात्, जब यह स्पष्ट हो गया कि सरकारी सेवाओं के लिये आवेदन करने वाले भारतीयों को अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है।
3- जनसाधारण की शिक्षा की उपेक्षा करने से देश में निरक्षरता में तेजी से वृद्धि हुई। जैसाकि आकड़ों से स्पष्ट है कि 1911 में निरक्षरता का प्रतिशत 84 था जो 1921 में बढ़कर 92 हो गया। निरक्षरता में वृद्धि से मुट्ठीभर शिक्षित भारतीयों एवं जनसाधारण के बीच भाषायी एवं सांस्कृतिक खाई चिंताजनक रूप से चैड़ी हो गयी।
4- शिक्षा व्यवस्था को मंहगा कर दिये जागे से यह आम भारतीय की पहुंच से दूर हो गयी तथा उच्च एवं धनी वग्र तथा शहरों में निवास करने वाले लोगों का इस पर एकाधिकार (monopoly) हो गया।
5- अंग्रेजों ने स्त्री शिक्षा की पूर्णरूपेण उपेक्षा की। क्योंकि (i) सरकार समाज के रूढ़िवादी तबके को नाराज नहीं करना चाहती थी तथा (ii) तत्कालीन उपनिवेशी शासन के लिये यह किसी प्रकार से फायदेमंद नहीं थी।
6- वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा की भी उपेक्षा की गयी। 1857 के अंत तक देश में केवल तीन चिकित्सा महाविद्यालय (कलकत्ता, बंबई एवं मद्रास) थे। अभियांत्रिक महाविद्यालय भी केवल एक था (रुड़की में) जिसकी स्थापना यूरोपीय एवं यूरेशियाई लोगों को इंजीनियरिंग की शिक्षा देने के लिये की गयी थी न कि भारतीयों को।
स्वतंत्रता पश्चात् भारत में शिक्षा
जैसाकि आप जागते हैं कि हमने ब्रिटिश साम्राज्य से सन् 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की और शिक्षा के नियोजन की जिम्मेदारी मुक्त भारत के भारत सरकार के कंधों पर आ गई। वैयक्तिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, यह आवश्यक हो गया कि शिक्षा के समन्वित कार्यक्रम के लिएएक उचित प्रावधान किया जाए जो विकास के विभिन्न स्तरों, विभिन्न भाषा-भाषियों, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों को शामिल कर सके। ऐसे कार्यक्रम विभिन्नता में एकता को मजबूत करने वाले पाठ्यक्रम पर आधारित होने चाहिए और देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आसानी से ले जाए जा सकें।
यदि शिक्षा के प्रसार के लिए उचित एवं पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो इससे आर्थिक असमानता, प्रादेशिक असंतुलन एवं सामाजिक अन्याय और गहरे हो सकते हैं जो समाज में तनाव के निर्माण के रूप में परिलक्षित होते। इसलिए देश में राधाकृष्णन आयोग (1948-49) का गठन किया गया। आगे 1964-66 के बीच शिक्षा आयोग (सुप्रसिद्ध तौर पर कोठारी आयोग के नाम से जागा गया) का गठन हुआ और 1966 में उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि शिक्षा ही शांतिपूर्ण सामाजिक परिवर्तन का एकमात्र तरीका है। 1976 के संवैधानिक संशोधन ने शिक्षा को समवर्ती सूची में डाल दिया जिससे शिक्षा केंद्र एवं राज्यों दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी बन गई।
राधाकृष्णन आयोगः नवंबर 1948 में राधाकृष्णन आयोग का गठन देश में विश्वविद्यालय शिक्षा के संबंध में रिपोर्ट देने हेतु किया गया था। स्वतंत्र भारत में विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में इस आयोग की रिपोर्ट का अत्यंत महत्व है। इस आयोग ने निम्न सिफारिशें की थीं
1- विश्वविद्यालय पूर्व (pre university) 12 वर्ष का अध्ययन होना चाहिये।
2- उच्च शिक्षा के मुख्य तीन उद्देश्य होने चाहिये
(i) सामान्य शिक्षा
(ii) सरकारी शिक्षा,एवं
(iii) व्यवसायिक शिक्षा
3- प्रशासनिक सेवाओं के लिये विश्वविद्यालय की स्नातक उपाधि आवश्यक नहीं होनी चाहिये।
4-शांति निकेतन एवं जामिया मिलिया की तर्ज पर ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना की जागी चाहिये।
5- महाविद्यालयों में छात्रों की संख्या बहुत अधिक नहीं होनी चाहिये। एक महाविद्यालय में 1 हजार से ज्यादा छात्रों को प्रवेश न दिया जाये।
6- विश्वविद्यालयों के द्वारा आयोजित की जागे वाली परीक्षा के स्तर में सुधार लाया जाये तथा विश्वविद्यालय शिक्षा को ‘समवर्ती सूची’ में सम्मिलित किया जाये।
7- देश में विश्वविद्यालय शिक्षा की देख-रेख के लिये एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Commission) का गठन किया जाये।
8- उच्च शिक्षा में अंग्रेजी माध्यम को जल्दबाजी में न हटाया जाये।
9- विश्वविद्यालयों में कम से कम 180 दिनों का अध्ययन अनिवार्य किया जाये। यह 11-11 सप्ताहों के तीन सत्र में विभाजित हो।
10- जहां राज्यों की भाषा एवं मातृ (स्थानीय) भाषा का माध्यम समान न हो वहां संघीय भाषा (Federal Language) अर्थात् राज्यों की भाषा में शिक्षा देने को प्राथमिकता दी जाये। जहां राज्यों की भाषा एवं स्थानीय भाषा समान हो वहां छात्रों को परंपराग्त या आधुनिक भारतीय भाषाओं का चयन करना चाहिये।
इन्हीं सिफारिशों के आधार पर 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का गठन किया गया तथा 1956 में संसद द्वारा कानून बनाकर इसे स्वायत्तशासी निकाय का दर्जा दे दिया गया। इस आयोग का कार्य विश्वविद्यालय शिक्षा की देखरेख करना, विश्वविद्यालयों में शिक्षा एवं शोध संबंधी सुविधाओं के स्तर की जांच करना तथा उनमें समन्वय स्थापित करना है। सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लिये पर्याप्त धन की व्यवस्था करती है। तदुपरांत आयोग देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों को धन आवंटित करने का सुझाव देता है तथा विश्वविद्यालय शिक्षा से संबंधित विभिन्न विकास योजनाओं को क्रियान्वित करता है।
कोठारी शिक्षा आयोगः जुलाई 1964 में डाॅ. डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय आयोग का गठन किया गया। इसका कार्य शिक्षा के सभी पक्षों तथा चरणों के विषय में साधारण सिद्धांत, नीतियों एवं राष्ट्रीय नमूने की रूपरेखा तैयार कर उनसे सरकार को अवगत कराना था। आयोग को अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड एवं यूनेस्को के शिक्षा-शास्त्रियों एवं वैज्ञानिकों की सेवायें भी उपलब्ध करायीं गयीं थी। आयोग ने वर्तमान शिक्षा पद्धति की कठोरता की आलोचना की तथा शिक्षा नीति को इस प्रकार लचीला बनाये जागे की आवश्यकता पर बल दिया जो बदलती हुयी परिस्थितियों के अनुकूल हो। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गयी। जिसमें निम्नलिखित तथ्यों पर बल दिया गया
ऽ14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा।
ऽशिक्षा के लिये तीन भाषाई फार्मूला मातृभाषा, हिन्दी एवं अंग्रेजी तथा क्षेत्रीय भाषाओं का विकास।
ऽराष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करना।
ऽअध्यापकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था तथा उनके लिये मानक तय करना।
ऽकृषि तथा औद्योगिक शिक्षा का विकास।
ऽविज्ञान तथा अनुसंधान शिक्षा का समानीकरण (मुनंसपेंजपवद)।
ऽसस्ती पुस्तकें उपलब्ध कराना तथा पाठ्य-पुस्तकों को उत्तम बनाना।