kostroma breed in hindi |  कोस्त्रोमा नस्ल का विकास कैसे किया गया कोस ट्रोमा गाय की नस्ल की जानकारी

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कोस्त्रोमा नस्ल का विकास कैसे किया गया कोस ट्रोमा गाय की नस्ल की जानकारी kostroma breed in hindi.
ढोरों की चिंता और पशुरोग विरोधी उपाय
चिंता गायों की अच्छी तरह चिंता करना आवश्यक है। सबसे पहली बात यह कि उन्हें हमेशा साफ रखना चाहिए। उनकी त्वचा और बालों में मैल इकट्ठा होता है अतः उन्हें नियमित रूप से ब्रूश से साफ करना चाहिए और मैले स्थान धोने चाहिए। सप्ताह में एक बार गायों को साबुन लगाकर धोना चाहिए। जाड़ों में जब गायें बाड़ों में रहती हैं और शायद ही बाहर जाती हैं उस समय उनके खुर बहुत अधिक बढ़ते हैं। इन खुरों को काटकर ठीक करना चाहिए।
ढोरों के बाड़े में एक निश्चित दिन-क्रम के अनुसार काम करना चाहिए। हर रोज निश्चित समय पर गायों को चारा देना, खुली हवा में घुमाना और दुहना चाहिए। जानवर इस दिन-क्रम के आदी हो जाते हैं और उनमें संबंधित नियमित प्रतिवर्ती क्रियाएं विकसित होती हैं।
दूध दुहनेवाली एक ही औरत को हमेशा संबंधित गाय का दूध दुहना चाहिए। दुहनेवाली को गाय के साथ शांति और कोमलता से पेश आना चाहिए। यदि गाय के साथ हड़-धत और चीख-चिल्लाहट का बरताव किया जाये तो उसके दूध की मात्रा घट जायेगी।
गरमियों में गायें चरागाहों में ताजी घास चरती हैं। देर तक खुली हवा में रहने से जानवरों का स्वास्थ्य सुधरता है।
सोवियत संघ के बहुत-से फार्मों में गायों को सारे समय बाड़ों में रखा जाता। है। गरमियों में भी चारा डेयरी-घर में पहुंचाया जाता है। पर इस स्थिति में भी – गायों को हर रोज बाड़े के बाहर खुली हवा में ले जाया जाता है।
अच्छी देखभाल, खिलाई और चिंता के फलस्वरूप दूध की मात्रा में काफी बढ़ोतरी होगी।
रोगविरोधी उपाय अन्य प्राणियों की तरह ढोर भी बीमार पड़ सकते हैं। बीमार गायें बहुत ही कम दूध देती हैं और उनके दूध के जरिये लोगों में तपेदिक जैसी गंभीर बीमारियों का संक्रमण हो सकता है। अतः ढोरों की स्वास्थ्य-रक्षा के और बीमारी की। रोक-थाम के उपाय किये जाने चाहिए।
ढोरों का स्वास्थ्य उचित देखभाल, खिलाई और चिंता पर निर्भर है। साल में दो बार (वसंत और शरद में) डेयरी-धरों में कीटमार दवाओं का छिड़काव किया जाता है। तरल कीटमार दवाओं से दीवारें, फर्श और सारी साधन-सामग्री धोयी जाती है और इमारत को चूने से रंगा जाता है।
इसलिए कि बाड़े में रोगोत्पादक कीटाणुओं का प्रवेश न हो, डेयरी-घर के दरवाजे पर कीटमार दवाओं में भिगोया हुआ पायंदाज बिछाया जाता है। डेयरी-घर – में आनेवाले लोग यहां अपने पांव पोंछ लेते हैं।
ढोरों के गल्लों की नियमित जांच की जाती है और कोई जानवर बीमार दिखाई दे तो उसे गल्ले से अलग किया जाता है। गाय की आंखों की श्लेष्मिक झिल्लियों में एक विशेष द्रव्य (टयूबरक्युलाइन) की कुछ बूंदों की सूई लगाकर देखा जा सकता है कि उसमें कहीं तपेदिक का अस्तित्व तो नहीं है। यदि संबंधित जानवर इस रोग से ग्रस्त हो तो कुछेक घंटों बाद उसकी पलकें सूजकर लाल हो जाती हैं और आंखों से मवाद निकलने लगता है। स्वस्थ गायों में यह प्रतिक्रिया नहीं होती।
यदि गल्ले में संक्रामक रोगों का अस्तित्व पाया जाये तो फौरन उसके फैलाव को रोकनेवाले कदम उठाये जाते हैं। बीमार जानवरों को स्वस्थ जानवरों से दूर कर दिया जाता है। क्वारेंटाइन का प्रबंध करके नये जानवरों को गल्ले में नहीं आने दिया जाता और संबंधित फार्म के बाहरवाले ढोरों को उसके क्षेत्र से होकर नहीं गुजरने दिया जाता।
बीमार गायों का इलाज विशेषज्ञों – पशु-चिकित्सकों और सहायक पशु-चिकित्सकों द्वारा किया जाता है।
प्रश्न – १. ढोरों की उचित देखभाल का महत्त्व बतलाओ। २. गायों की उचित देखभाल में कौनसी बातें शामिल हैं ? ३. बाड़े की देखभाल किसे कहते हैं ? ४. यदि गल्ले में संक्रामक रोग का अस्तित्व पाया जाये तो कौनसे कदम उठाये जाते हैं ?
व्यावहारिक अभ्यास – तुम्हारे इलाके के सबसे नजदीकवाले डेयरी-घर में जाकर देखो कि वहां किस प्रकार के दिन-क्रम का पालन किया जाता है। इस दिन-क्रम को अपनी कापी में लिख लो।

 कोस्त्रोमा नस्ल का विकास कैसे किया गया
कारावायेवो का गल्ला सोवियत पशु-संवर्द्धन विशेषज्ञों द्वारा ढोरों की नयी नस्लें विकसित करने में जो तरीके अपनाये जाते हैं उनका एक उदाहरण कोस्त्रोमा नस्ल प्रस्तुत करती है। यह नस्ल कारावायेवो स्थित राजकीय पशु-संवर्द्धन फार्म में और कोस्त्रोमा प्रदेश के कोलखोजों में विकसित की गयी। क्रांतिपूर्व काल के एक कृषि-मजदूर, ज्येष्ठ प्राणि-प्रविधिज्ञ स० इ० श्तैमन के मार्गदर्शन में कारावायेवो में सर्वोत्तम गल्ला प्राप्त किया गया।
कारावायेवो गल्ले के सुधार का काम शुरू होने से पहले उसमें विभिन्न मिश्रित नस्लें शामिल थीं। स० इ० श्तैमन ने ऐसी गायों की पैदाइश का काम हाथ में लिया जो दसों महीनों में अच्छा , मक्खनदार दूध बड़ी मात्रा में और बराबर दे सकें। वे ऐसी नस्ल पैदा कराना चाहते थे जो स्वस्थ और सुदृढ़ हो और जिससे स्वस्थ बछड़े पैदा हों। यह काम धीरे धीरे किया गया और हर साल अच्छे से अच्छे जानवर मिलते गये।
६ वर्षों में (१९३२ से १९४० तक) कारावायेवो गल्ले में दूध की औसत मात्रा तिगुनी से अधिक हो गयी और जानवरों का जिंदा वजन आधे से अधिक बढ़ गया। दूध में मक्खन की मात्रा घटी नहीं और गायों का स्वास्थ्य भी सुधर गया।
खिलाई पुरानी नस्ल के सुधार और नयी नस्ल के विकास की बुनियादी शर्त है उचित और भरपूर खिलाई। कारावायेवो राजकीय फार्म में खिलाई पर पूरा ध्यान दिया गया। ढोरों को अत्यंत पुष्टिकर और विभिन्न खुराकों के राशन बड़ी मात्रा में दिये गये और आज भी दिये जा रहे हैं। राशन निश्चित करते समय हर गाय की पसंद पर ध्यान दिया गया और उसे जो खुराक सबसे ज्यादा पसंद आयी उसकी मात्रा बढ़ायी गयी। गाभिन गायों को भी ज्यादा राशन दिये गये। बछड़ों और जवान गायों को उनके बढ़ते हुए शरीर के अनुसार उचित चारा-दाना दिया गया। इस प्रकार जानवरों को उनकी सारी जिन्दगी-भर, यहां तक कि उनकी पैदाइश के पहले से भी (उनकी माताओं के शरीरों के द्वारा) अच्छी तरह खिलाया गया।
अच्छी खिलाई के फलस्वरूप दूध की मात्रा बढ़ी और गायें अधिक सशक्त हुईं।
देखभाल और चिंता कारावायेवो के गल्ले को सूखे, साफ-सुथरे, रोशन और हवादार डेयरी-घर में रखा गया। निश्चित दिन-क्रम का ठीक ठीक पालन किया गया।
यह ध्यान में लेते हुए कि शरीर की उचित गतिविधि के लिए तंत्रिका तंत्र की स्थिति बहुत महत्त्वपूर्ण है, जानवरों के साथ कोमलतापूर्ण बरताव किया गया न कि हड़-धत और चीख-चिल्लाहट का। शांत वातावरण में जानवर अपना खाना अच्छी तरह हजम करते हैं और उनसे अधिक मात्रा में दूध मिलता है। कारावायेवो गल्ले के अपेक्षित विकास में अच्छी देखभाल से बड़ी सहायता मिली।
दोहन
कोस्त्रोमा नस्ल के विकास में कुशलतापूर्ण दोहन ने बड़ा हाथ बंटाया। वहां की गायों को दुहने से पहले उनके थन गरम . पानी से धोये जाते थे और तौलिये से पोंछे जाते थे। दुहने से पहले और दुहाई के दौरान भी थनों की मालिश की जाती थी। जब थनों में दूध बाकी नहीं रहता , दुहाई तभी बंद की जाती थी। इस प्रकार की दुहाई से स्तन-ग्रंथियों की क्रिया सुधरती है और थन बड़े होते जाते हैं।
स्तन-ग्रंथियों की अच्छी क्रिया तभी संभव है जब उन्हें दूध तैयार होने के लिए आवश्यक पोषक द्रव्यों से भरपूर रक्त अधिकाधिक मात्रा में मिलता रहता है। अधिक मात्रा में दूध देनेवाली गायें खूब खाती हैं, अच्छी तरह भोजन पचाती हैं और उनकी पचनेंद्रियां सुविकसित होती हैं। जैसे जैसे स्तन-ग्रंथियों और पचनेंद्रियों की क्रिया में वृद्धि होती है वैसे वैसे अन्य इंद्रियों (फुफ्फुस , हृदय आदि) की गतिविधि में भी सुधार होता है। इससे उनके विकास में उद्दीपन मिलता है। इस प्रकार दोहन के समय थनों की क्रिया के फलस्वरूप गाय के समूचे शरीर में परिवर्तन होते हैं।
गाय के शरीर पर कुशल दुहाई का सुप्रभाव तभी पड़ सकता है जब उसे उचित और भरपूर खिलाई और देखभाल का साथ दिया जाये।
बछडांे की देखभाल कारावायेवो में स्वस्थ और सशक्त बछड़ों के परिवर्द्धन पर बछड़ों को पूरा ध्यान दिया जाता है।
बछड़े को पहले पंद्रह दिन तक सिर्फ उसकी मां का दूध पिलाया जाता है। बाद में उन्हें सर्वोत्तम गायों का दूध पर्याप्त मात्रा में दिया जाता है। इसके अलावा आठवें महीने तक उन्हें स्किम दूध (मलाई हटाया गया दूध) भी पिलाया जाता है। बछड़ों को रबड़ की चूचियों वाले टीन या कांच के बरतनों में से दूध पिलाया जाता है। इससे बछड़ों को मां के स्तन-पान का सा मजा आता है। दूध धीरे धीरे उनके पेट में चला जाता है और गंदा नहीं होता। परिणामतः बछड़े बड़ी शीघ्रता से बड़े होते हैं।
बछड़ों के शरीर को मजबूत बनाने और रोग के प्रादुर्भाव को रोकने की दृष्टि से उन्हें जाड़ों तक के दौरान सूखी घास में लपेटकर, बिना गरम किये गये बाड़ों में रखा जाता है (आकृति १७६)।
बिना गरम किये गये बाड़े में तापमान अधिक सम , नमी कम और हवा ताजी रहती है। गरम और नम जगहों में सहूलियत से बढ़नेवाले रोगाणु सर्दी में मर जाते हैं और इस प्रकार बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। कम तापमान के कारण बछड़ों का शरीर मजबूत हो जाता है और अंदरूनी इंद्रियों की गतिविधियां बढ़ती हैं।
उक्त प्रकार की देखभाल और रख-रखाव के फलस्वरूप बछड़े स्वस्थ और सशक्त बनते हैं। विगत २० वर्षों में कारावायेवो में जाड़ों के दौरान कोई महामारी नहीं हुई।
बछड़ों की स्वास्थ्य-रक्षा की दृष्टि से दूसरे कदम भी उठाये गये। बाड़ों को हमेशा साफ रखा गया । बछड़ों को हर दिन मुलायम ब्रूश से साफ किया गया । गरम मौसम के समय उन्हें गरमी की छावनियों में रखा गया (आकृति १७७)।
चुनाव उचित खिलाई , अच्छी देखभाल , कुशल दुहाई और बछड़ों के उचित पालन-पोषण के फलस्वरूप नस्ल में जो ऊंचे गुण प्राप्त किये गये वे संबंधित जानवरों की बाद की पीढ़ियों में आनुवंशिक रूप से बने रहे। फिर भी किसी गल्ले की गायें एक दूसरी से भिन्न होती हैं- कुछ ज्यादा अच्छी तो कुछ उनसे कम। कारावायेवो में हर गाय की गौर से जांच-पड़ताल की गयी। दूध की दैनिक तथा वार्षिक मात्रा नोट की गयी , दूध में मक्खन का अनुपात निश्चित किया गया और संतान के गुणों (स्वास्थ्य , वजन और दूध की मात्रा) को ध्यान में लिया गया।
पशु-संवर्द्धन केंद्रों में विशेष वंशावलि पुस्तकें रखी गयी हैं। इनमें संबंधित जानवर के गुण और उसके वंश (माता-पिता , दादा-दादी) के संबंध में सूचना लिखी जाती है। नयी अच्छी नस्लें पैदा कराने के लिए जानवरों का चुनाव करते समय इस सूचना से महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। पैदा हुए बछड़ों का भी चुनाव किया जाता है और नस्ल-संवर्द्धन . के लिए उनमें से सर्वोत्तम बछड़े चुन लिये जाते हैं।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि ढोरों की कोस्त्रोमा नस्ल उचित तथा भरपूर खिलाई , अच्छी देखभाल तथा चिंता , कुशल दुहाई तथा बछड़ों के पालन-पोषण और नस्ल-संवर्द्धन के लिए सर्वोत्तम जानवरों के चुनाव के जरिये प्राप्त की गयी। अन्य नयी नस्लों की पैदाइश. और पुरानी नस्लों के सुधार में भी यही तरीके अपनाये जाते हैं।
प्रश्न – १. कोस्त्रोमा नस्ल के विकास में कौनसी समस्याएं प्रस्तुत थीं? २. कारावायेवो स्थित राजकीय फार्म में ढोरों की खिलाई किस प्रकार की जाती है ? ३. कारावायेवो में गायों की दुहाई कैसे होती है ? ४. भरपूर खिलाई और कुशल दुहाई के मेल का क्या महत्त्व है ? ५. श्सर्दी मेंश् बछड़ों के पालन-पोषण का अर्थ क्या है ? ६. संवर्द्धन के लिए जानवरों का चुनाव कैसे किया जाता है ? ७. कोस्त्रोमा नस्ल के संवर्द्धन में कौनसे तरीके अपनाये गये थे?