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संयुक्त पूंजी कंपनी से आप क्या समझते हैं | संयुक्त पूंजी कम्पनी के गुण व अवगुण का उल्लेख कीजिए Joint-stock company in hindi
Joint-stock company in hindi meaning definition संयुक्त पूंजी कंपनी से आप क्या समझते हैं | संयुक्त पूंजी कम्पनी के गुण व अवगुण का उल्लेख कीजिए ?
संयुक्त पूँजी कंपनी
भारत में 1857 के आसपास शेयर धारकों के सीमित दायित्व के साथ संयुक्त पूँजी कंपनी अस्तित्व में आई। इस तरह का सबसे उल्लेखनीय उद्यम 1845 में चाय बागान और उत्पादन के क्षेत्र में गठित असम कंपनी थी। वर्ष 1951 तक, संयुक्त पूँजी कंपनियों की संख्या 1945 में करीब 15,000 से बढ़ कर 28,000 हो गई थी जिसमें से लगभग 12000 सार्वजनिक सीमित दायित्व कम्पनियाँ (पब्लिक लिमिटेड कंपनी) थीं। अतएव इस तरह की कंपनियों की संख्या में छः वर्षों में लगभग शत प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। सिर्फ 1945 में एक हजार से अधिक कंपनियों की स्थापना हुई थी। भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय, 1948 में अंगीकृत नई औद्योगिक नीति संकल्प के अनुसरण में कंपनियाँ जिसमें सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से अधिक थी, भी अस्तित्व में आई। इन कंपनियों की प्रदत्त पूँजी लगभग 26.3 करोड़ रु. के बराबर थी।
भारतीय उद्योगों का संगठन
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय उद्योगों में दो प्रकार के संगठनात्मक ढाँचे मौजूद थे। एक जाति और परिवार व्यवस्था पर आधारित है और दूसरा प्रबन्ध एजेन्सी प्रणाली था। इस भाग में हम ने इन दो ढाँचों की चर्चा की है। संयुक्त स्टॉक कंपनी के बारे में भी संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की गई है।
जाति और संयुक्त परिवार पर आधारित संगठनात्मक ढाँचा
भारतीय व्यापार और उद्योग का संगठन परम्परागत रूप से जाति और संयुक्त परिवार के नियमों पर आधारित रहा है। अधिकांश मामलों में व्यापार और औद्योगिक इकाइयाँ परिवार आधारित साझेदारी थी। जाति के नियमों से व्यवसाय का चयन निर्धारित होता था जबकि परिवार के नियमों से व्यवसाय के संगठन की रूपरेखा का निर्धारण होता था। जाति के सदस्य एक-दूसरे के साथ-सीमित प्रतिस्पर्धा में संलग्न होते थे किंतु ऋण की आवश्यकता और आपदा में साथी सदस्यों के लिए गारंटीकर्ता भी होते थे। इसके बदले में, जाति के नेता उसी जाति में सदस्यों के कार्य निष्पादन के स्तर के पर्यवक्षण, और विपणन की पद्धति से संबंधित नियम, रीति सम्मत प्रभार और फीस, तथा व्यवसाय के अन्य नियमों को निर्धारित करने के अधिकार, का दावा करते हैं। परम्परानुसार सभी जातियों को वाणिज्य और उद्योग अपनाने की अनुमति नहीं थी। हिन्दु समाज के चर्तुवर्ण जाति विभाजन में तीसरी जाति वैश्य वाणिज्यिक और औद्योगिक वर्ग था।
व्यापार और वाणिज्य से जुड़े गैर हिन्दु समुदायों के बीच यद्यपि जाति नियमों का पालन नहीं किया जाता था, व्यावसायिक नियम उनके संयुक्त परिवार प्रणाली के संगठनात्मक ढाँचे द्वारा शासित होते थे। व्यक्तिगत उद्यम अथवा परिवार से बाहर के सदस्यों के साथ साझेदारी गिनी-चुनी ही होती थी।
प्रबन्ध एजेन्सी पद्धति
भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व एक विशिष्ट व्यावसायिक समूह, प्रबन्ध एजेंसी फर्म विद्यमान थी। ये फर्मे उस कम्पनी के कृत्यों के निर्वहन जिसके लिए प्रबन्धन की जाने वाली कंपनी गठित की जाती है, के लिए प्रबन्धकों अथवा एजेटों के रूप में कार्य करती हैं। ऐसी प्रबन्धन एजेंसियाँ मुख्य रूप से प्राइवेट लिमिटेड कंपनियाँ थीं। तथापि, द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् बड़ी संख्या में प्रबन्ध एजेन्सी फर्म सीमित दायित्व कंपनियों में परिवर्तित हो गई थी।
प्रबन्ध एजेन्सी फर्मों का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कृत्य औद्योगिक उद्यमों का मार्ग प्रशस्त करना और इसे बढ़ावा देना था। वे बहुधा तकनीकी विशेषज्ञता भी उपलब्ध कराते थे। इंडियन फिस्कल कमीशन (1949-50) ने पाया कि भारत में सूती वस्त्र, लौह तथा इस्पात, जूट और सीमेण्ट जैसे उद्योग मुख्य रूप से प्रबन्ध एजेंसी फर्मों के ‘‘उत्साह और अनुकूल देखभाल‘‘ के माध्यम से अस्तित्व में आए। तथापि, प्रबन्ध एजेन्सी फर्मों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृत्य वित्त की व्यवस्था करना था। वे न सिर्फ प्रारंभ में अचल पूँजी निवेश की व्यवस्था करती थीं, वे अपितु उत्तरवर्ती पुनर्गठन, विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए भी पूँजी की व्यवस्था करती थीं।
किंतु प्रबन्ध एजेंसी पद्धति में ही इसके दुरूपयोग की संभावनाएँ भी अन्तर्निहित थीं जिसने अंततः इस पद्धति को बदनाम कर दिया। कई मामलों में प्रबन्ध एजेन्सी फर्मों के हित कंपनी जिसके लिए वे कार्य कर रहे होते थे के स्वामियों के हितों के अनुरूप नहीं होते थे। हितों के टकराव का सबसे आम कारण यह होता था कि प्रबन्ध एजेंसी फर्म का लक्ष्य लाभप्रद रूप से बेचे जा सकने योग्य स्तर से कहीं अधिक स्तर पर निर्गत का उत्पादन और बिक्री करना था क्योंकि बहुधा इसका पारिश्रमिक व्यवसाय के सकल निर्गत पर आधारित होता था। परिणामस्वरूप, अनेक कंपनियों द्वारा इष्टतम स्तर की अपेक्षा कहीं बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, कई उद्योगों में बढ़ते हुए लाभ ने अनेक प्रबन्ध एजेंटों को शेयर धारकों के हितों की चिन्ता किए बिना अत्यधिक मूल्यों पर अपने प्रबन्ध एजेंसी अधिकार बेचने का अवसर प्रदान किया। प्रबन्ध एजेंसी अधिकारों के इस व्यापार ने प्रबन्ध एजेंटों के अधिकारों तथा विशेषाधिकारों को कम करने के मुद्दे को सबसे आगे लाकर खड़ा कर दिया। अक्तूबर 1950 में, भारत सरकार ने इस मुद्दे और कंपनी अधिनियम के सुधार के अन्य पहलुओं पर विचार करने के लिए ‘‘कम्पनी लॉ कमेटी‘‘ का गठन किया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय औद्योगिक नीति
अंग्रेजों द्वारा औद्योगिक और आधारभूत संरचना विकास की सुनियोजित ढंग से उपेक्षा किए जाने के कारण भारत को विरासत में अत्यन्त ही दुर्बल औद्योगिक आधार प्राप्त हुआ था जिसके सुधार के लिए भारत सरकार ने दिसम्बर 1947 में औद्योगिक सम्मेलन आयोजित किया, ताकि स्वतंत्र भारत के लोगों की बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उद्योगों की विद्यमान क्षमता का पूरी तरह से उपयोग किया जाए और इसके लिए उद्योग को तैयार करने के उपायों पर विचार किया जा सके। केन्द्रीय और प्रान्तीय सरकारों, उद्योगपतियों और श्रमिकों के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया। प्रबन्धन और कर्मचारियों के बीच बेहतर संबंध सुनिश्चित करने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता किया गया जिसमें प्रबन्धन और कर्मचारियों के बीच तीन-वर्षीय औद्योगिक शांति का प्रावधान था। सरकार ने 1948-49 में उद्योग को कतिपय कर रियायत प्रदान किया और ‘‘फाइनेन्स कारपोरेशन ऑफ इंडिया‘‘ की स्थापना के लिए एक विधेयक पारित किया। पहला औद्योगिक नीति संकल्प भी 1948 में पारित किया गया जिसने उद्योगों को चार श्रेणियों में बाँट दिया।
बोध प्रश्न 3
1) स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में विभिन्न प्रकार के कौन-कौन से संगठनात्मक ढाँचे थे? (एक वाक्य में उत्तर दें।)
2) सही उत्तर पर ( ) निशान लगाइए:
क) वर्ष 1945-51 के दौरान संयुक्त पूँजी कंपनी की संख्या में वृद्धि थी,
प) लगभग शत प्रतिशत
पप) लगभग पचास प्रतिशत
पपप) एक सौ पचास प्रतिशत
ख) ‘‘कंपनी लॉ कमेटी‘‘ का गठन किया गया था।
प) अक्टूबर 1948 में
पप) अक्टूबर 1950
पपप) दिसम्बर 1950
3) प्रबन्ध एजेन्सी पद्धति की परिभाषा दीजिए। उनके मुख्य कृत्य क्या थे?
बोध प्रश्न 3 उत्तर
1) जो जाति और संयुक्त परिवार प्रणाली; प्रबन्ध एजेन्सी पद्धति; संयुक्त पूँजी कंपनी पर आधारित हैं।
2) (क) प) (ख) पप)
सारांश
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषता इसका दुर्बल औद्योगिक आधार और अर्धविकसित आधारभूत संरचना थी। स्वामित्व की संरचना अत्यधिक केन्द्रीकृत थी और विनिर्माण उद्योग शायद ही निर्यातोन्मुखी था। इतना ही नहीं, उद्योगों के सम्मुख तकनीकी और प्रबन्धकीय कौशल की कमी की समस्या भी थी।
वर्ष 1951 में प्रथम पंचवर्षीय योजना आरम्भ होने से पूर्व भारत में औद्योगिक विकास मुख्य रूप से उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र तक ही सीमित था। महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती वस्तुओं का उत्पादन करने वाले सिर्फ सीमेण्ट और लौह तथा इस्पात उद्योग ही थे।
भारतीय व्यापार और उद्योग का संगठन परम्परागत रूप से जाति और संयुक्त परिवार के नियमों पर आधारित था। अधिकांश मामलों में व्यापार और औद्योगिक इकाइयाँ परिवार आधारित साझेदारी थीं। तथापि, प्रबन्धन एजेन्सी एक विशिष्ट संगठनात्मक ढाँचा था जो किसी कंपनी के उन कृत्यों के निर्वहन, जिसके लिए प्रबन्धन की जाने वाली वह कंपनी गठित की जाती थी, के लिए प्रबन्धक अथवा एजेण्ट के रूप में कार्य करता था।
शब्दावली
मूल्यानुसार/यथामूल्य शुल्क ः शुल्क अथवा कर मूल्य पर लगाया जाता है।
प्रबन्ध एजेन्सी फर्म: ः प्रबन्ध एजेन्सी फर्म किसी कंपनी के लिए उसके कृत्यों के निर्वहन हेतु प्रबन्धक के रूप में कार्य करती हैं।
त्रिपक्षीय समझौता ः औद्योगिक संबंधों को मधुर बनाने के लिए सरकार, प्रबन्धन
और कर्मचारियों के बीच त्रिपक्षीय समझौता।
कुछ उपयोगी पुस्तकें एवं संदर्भ
भट्टाचार्य, डी. (1979). ए कन्साइज हिस्ट्री ऑफ द इंडियन इकनॉमीय प्रेण्टिस हॉल ऑफ इंडिया, नई दिल्ली।
बागची ए., (1972). प्राइवेट इन्वेस्टमेंट इन इंडिया, 1900-1939, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस।
बाला, एम., (2003). सीमेण्ट इण्डस्ट्री इन इंडियाः पॉलिसी, स्ट्रकचर एण्ड पर्फोमेन्स, शिप्रा पब्लिकेशन्स, दिल्ली।
मिश्रा, एस.के., और वी.के. पुरी, (2000). इंडियन इकनॉमी, हिमालय पब्लिशिंग हाउस, मुम्बई
वी.बी.सिंह (संपा.) (1975). इकनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया, एलाइड पब्लिशर्स
उद्देश्य
यह इकाई स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में औद्योगिक संरचना तथा औद्योगिक संगठन के स्वरूप पर विहंगम दृष्टि डालती है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:
ऽ उद्योग की सामान्य संरचना को जान सकेंगे;
ऽ स्वतंत्रता प्राप्ति के समय कुछ प्रमुख उद्योगों के कार्यनिष्पादन के संबंध में चर्चा कर सकेंगे; और
ऽ उद्योग के संगठन को समझ सकेंगे।
प्रस्तावना
अंग्रेजों के आगमन से पहले, भारत आज के अनेक पश्चिमी यूरोपीय देशों की तुलना में औद्योगिक दृष्टि से कहीं अधिक विकसित था। किंतु ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत इसके अधिकांश औद्योगिक आधार को सुनियोजित ढंग से नष्ट कर दिया गया, और भारतीय उद्योगों को ब्रिटेन में स्थित विनिर्माण उद्योगों के लाभ के लिए प्राथमिक उत्पादों का आपूर्तिकर्ता मात्र बना दिया गया। इन सबकी पराकाष्ठा स्वतंत्रता प्राप्ति के समय दुर्बल औद्योगिक आधार, अविकसित आधारभूत संरचना और जड़ अर्थव्यवस्था के रूप में हुई। स्वामित्व का ढाँचा अत्यधिक केन्द्रीकृत था और विनिर्माण उद्योग शायद ही निर्यातोन्मुखी था। इतना ही नहीं, उद्योग को तकनीकी और प्रबन्धकीय कौशल की कमी का भी सामना करना पड़ा।
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