अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की यूनेस्को की सूची सांस्कृतिक विरासत का अर्थ क्या हैं ? intangible cultural heritage of india in hindi

By   July 16, 2021

intangible cultural heritage of india in hindi of unesco list अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की यूनेस्को की सूची सांस्कृतिक विरासत का अर्थ क्या हैं ?

अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों
की यूनेस्को सूची

परिचय
हाल के दशकों में सांस्कृतिक विरासत शब्द की परिभाषा में अत्यधिक परिवर्तन आया है, इसमें आंशिक रूप से यूनेस्को द्वारा विकसित दस्तावेजों का भी योगदान है। सांस्कृतिक विरासत का अर्थ केवल स्मारकों और वस्तुओं का संग्रहण नहीं है। इसमें पूर्वजों से विरासत में मिले और अपने वंशजों को उत्तराधिकार में हस्तांतरित की जाने वाली परंपराएँ या जीवन्त भाव जैसे वाचिक परंपराएँ, प्रदर्शन कलाएँ, सामाजिक प्रथाएँ, रीतियाँ, उत्सव, प्रकृति और ब्रह्माण्ड से संबंधित ज्ञान और प्रथाएँ या पारंपरिक शिल्पकलाओं को सृजित करने वाले ज्ञान और कौशल भी सम्मिलित होते हैं।
यूनेस्को ने अपनी अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूचियों की स्थापना विश्वभर की महत्वपूर्ण अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों के बेहतर संरक्षण को सुनिश्चित करने तथा उनके महत्व के संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लक्ष्य को निरूपित करने के लिए की है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य विश्वभर की मानव जाति के विभिन्न वाचिक और अमूर्त कोषों की सूचनाओं के विस्तृत संग्रह के माध्यम से अमूर्त विरासत के संरक्षण की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट करना है, जिसे यूनेस्को ने सांस्कृतिक विविधता और रचनात्मक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण अवयव तथा सांस्कृतिक विविधता के भण्डार के रूप में पहचाना है।
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का अर्थ समुदायों, समूहों से सबंधित प्रथाएँ, निरूपण, अभिव्यक्तियाँ, ज्ञान, कौशल और साथ ही उपकरण, वस्तुएँ, कलाकृतियां तथा कुछ प्रकरणों में उनकी सांस्कृतिक विरासत का भाग माने जाने वाले व्यक्ति भी शामिल होते हैं।
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत है:
ऽ पारम्परिक, समकालीन और जीवंतः अमूर्त सांस्कृतिक विरासत न केवल भूतकाल की वंशानुगत परंपराओं को बल्कि उन समकालीन ग्रामीण और शहरी प्रथाओं का प्रतिनिधित्व भी करती है, जिसमें विविध सांस्कृतिक समूह भागीदारी करते हैं।
ऽ समावेशीः हम अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की ऐसी अभिव्यक्तियों को समाहित कर सकते हैं जो दूसरे लोगों में भी प्रचलित हों। चाहे वे पड़ोस के गाँव से हों, विश्व के दूसरे छोर पर स्थित किसी शहर की हों, या प्रवासित होकर किसी भिन्न क्षेत्र में बस गए लोगों द्वारा अपनायी गयी हों, ये सभी अमर्त सांस्कृतिक विरासते हैं। वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित की गयी हैं, अपने पर्यावरणों की अनुक्रिया के रूप में उत्पन्न हुई हैं और वे हमें हमारे भूतकाल से संबंध प्रदान कर, वर्तमान से होते हुए तथा हमारे भविष्य से संबंधित कर, पहचान और निरंतरता का बोध कराने में योगदान करती हैं। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत इन प्रश्नों को नहीं उठाती कि क्या कुछ विशिष्ट प्रथाएँ किसी संस्कृति से संबंधित हैं या नहीं। यह सामाजिक पहचान और उत्तरदायित्व के भाव को प्रोत्साहित करते हुए सामाजिक सामंजस्य में योगदान करती है जिससे व्यक्तियों को किसी एक या अन्य समुदायों और व्यापक रूप से संपूर्ण समाज के भाग के रूप में अनुभव करने में सहयोग प्राप्त है।
ऽ प्रतिनिधिः अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को केवल तुलनात्मक आधार, इसकी विशिष्टता या इसके असाधारण मूल्य हेतु एक सांस्कृतिक वस्तु के रूप में मूल्य प्रदान नहीं किया जाता। यह समुदायों में अपने आधार पर पनपती है और उन व्यक्तियों पर निर्भर रहती है जिनके पारम्परिक ज्ञान, कौशल और रीतियाँ शेष समुदाय को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी या अन्य समुदायों को हस्तांतरित होते हैं।
ऽ समुदाय आधारितः अमूर्त सांस्कृतिक विरासत केवल तभी विरासत मानी जा सकती है जब इसे निर्मित करने वाले, धारित करने वाले या प्रसारित करने वाले समुदायों, समूहों या व्यक्तियों द्वारा इसे इस रूप में मान्यता प्रदान की जाती है। उनकी मान्यता के बिना, कोई अन्य यह निर्धारित नहीं कर सकता कि कोई निश्चित अभिव्यक्ति या प्रथा उनकी विरासत है।
2010 तक इस कार्यक्रम ने दो सूचियों को संकलित किया है:
ऽ मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची: इसमें सांस्कृतिक प्रथाएं और अनुभव सम्मिलित हैं जो इस विरासत की विविधता को प्रदर्शित करने में सहयोग करते हैं और इसकी महत्ता के संबंध में जागरूकता उत्पन्न करते हैं।
ऽ उन अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की सूची जिन्हें तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है: यह उन सांस्कृतिक तत्वों को सम्मिलित करती है जिन्हें संबंधित समुदाय और देश जीवित रखने पर विचार करते हैं और उन्हें तत्काल संरक्षण की आवश्यकता है।

मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची
मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में भारत की निम्नलिखित दस अमूर्त विरासतें हैं:

कोडियट्टम (संस्कृत नाट्यकला), 2008 में सम्मिलित
यह केरल में चकयारों (हिन्दुओं की एक उप-जाति) द्वारा किया जाने वाला नृत्य नाटक है जिसमें वे पुरुष की भूमिका निभाते हैं। नंगियार जाति की महिलाएँ नारी की भूमिका निभाती हैं। यह प्रदर्शन 6 से 20 दिन तक चलता है। इनका अभिनय मुख्य रूप से मन्दिरों में किया जाता है और इसकी विषय-वस्तु हिन्दू पौराणिकता पर आधारित है।
‘विदूषक‘ का चरित्र साधारण मलयालम में कथा की पृष्ठभूमि की व्याख्या करता है और दर्शकों के मन में चरित्रों की जीवंत छवि पैदा करता है। अन्य सभी चरित्र संस्कृत भाषा का प्रयोग कर अभिनय करते हैं। इसमें मिझावू नामक संगीत वाद्य यंत्र प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है।

रामलीला : 2008 में सम्मिलित
यह उत्तर प्रदेश क्षेत्र की लोकप्रिय लोक अभिनय कला है। इसमें दशहरे से पहले रामायण का गीतों, नत्यों और संवादों के रूप में अभिनित किया जाता है। इसे सामान्य रूप से पुरुष अभिनेताओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है। ले सीता का अभिनय भी करते हैं। इस नाटक को प्रतिवर्ष शारदीय नवरारात्रियों की शुभ बेला में 10 या इससे अधिक रातों तक मंचित किया जाता है।
लखनऊ के निकट बक्शी के तालाब नामक स्थान पर 1972 से एक अनोखी रामलीला का मंचन किया जा रहा है जहाँ प्रमुख चरित्रों, जैसे- राम, लक्ष्मण और हनुमान आदि का अभिनय मुस्लिम युवकों द्वारा किया जाता है। इससे यह प्रदर्शित होता है की इस क्षेत्र के लोगों के बीच सामुदायिक तनाव नहीं है। इस नाटक को आम जनता के बीच सामुदायिक सौहार्द्र को बढ़ावा देने के लिए ‘उस गाँव की रामलीला‘ नामक रेडियो नाटक का रूप भी दिया गया है।

वेदपाठ की परम्परा : 2008 में सम्मिलित
वेदों की वाचिक परंपरा में वेद मंत्रों के पाठ अनेक प्रकार से किए जाते हैं। वैदिक पाठ की ऐसी परंपराओं को बहुधा अभी तक जीवित सर्वाधिक प्राचीन अक्षत वाचिक परंपरा माना जाता है। संरक्षित वैदिक ग्रन्थों का समय काल लगभग होमर के समकालीन नियत किया गया है। यूनेस्को ने वेदपाठ की परंपरा को मानवता की वाचिक तथा अमूर्त विरासतों की उत्कृष्ट कृति घोषित किया है।

रम्मन : 2009 में सम्मिलित
यह एक धार्मिक उत्सव तथा गढ़वाल क्षेत्र की पारंपरिक रीतिगत नाट्यकला है। इसे उत्तराखण्ड के चमोली जिले में पैनखंडा घाटी के सलूर डुंगरा गाँव में हिन्दू समुदाय द्वारा मनाया जाता है। ग्रामीण गाँव के मन्दिर के बरामदे में ग्राम-देवता भूमियाल को ग्रामीणों द्वारा चढ़ावा चढ़ाया जाता हैं। यह उत्सव इस गाँव का अद्वितीय उत्सव है और इसे हिमालयी क्षेत्र में कहीं और सम्पन्न नहीं किया जाता। विशेष वर्ष के दौरान विशिष्ट व्यक्ति द्वारा भूमियाल देवता का आतिथ्य किया जाता है। उत्सव में प्रत्येक जाति और व्यावसायिक समूह की अलग-अलग भूमिका होती है तथा इसका एक महत्वपूर्ण पक्ष जागर का गान करना है, जो स्थानीय पौराणिक कथाओं का संगीतमय गायन है।

नवरोज : 2009 में सम्मिलित
यह पारसियों के नववर्ष के आरम्भ को इंगित करता है तथा इसे कश्मीरी समदाय द्वारा वसंत-उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। यह पर्यावरण के प्रति पारसी मत के सम्मान को प्रदर्शित करता है। इस उत्सव में एक चैकी स्थापित कर उस पर गाथाओं की एक प्रति रखने, दीपक या मोमबत्ती प्रज्ज्वलित करने, मिट्टी की एक उथली तश्तरी में अंकुरित गेहूँ या सेम रखने, छोटी कटोरी में एक चांदी का सिक्का, पुष्प, रंगे हुए अंडे, मिष्ठान्न और एक कटोरे में पान रखकर उसमें गोल्डफिश रखने की परम्परा है। ये सभी समृद्धि, सम्पन्नता, रंग, मधुरता और प्रसन्नता को दर्शाते हैं।

मुडियेट्टू : 2010 में सम्मिलित
मुडियेेट्टू एक पारम्परिक रीतिगत नाटक कला है जो केरल राज्य में सपन्न किया जाने वाला लोक नृत्य और नाटक है। यह देवी काली और दारिका राक्षस के बीच युद्ध की पौराणिक कथा को चित्रित करता है। इस नृत्य को भगवती कावुस नामक मन्दिरों में फरवरी और मई में फसल कटाई के मौसम के बाद किया जाता है। इसका प्रदर्शन करने वाले अलौकिकता का अनुभव कराने हेतु भारी-भरकम भंगार करते हैं तथा परम्परागत रूप से मुख पर चित्रकारी कर लंबे मुकुट इत्यादि के साथ भव्य वेशभूषा धारण करते हैं। इन प्रथाओं में प्रत्येक जाति का पारस्परिक सहयोग और सामूहिक भागीदारी उनकी साझा पहचान और संबंधों को मजबूत करती है।

कालबेलिया : 2010 में सम्मिलित
राजस्थान राज्य में कलबेलिया नाम की ही जनजाति द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले इस नृत्य का संचालन सर्प से मेल खाता हैं। कालबेलिया जनजाति को पारम्परिक रूप से बारंबार एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करने तथा सांपों को पकड़ने और सर्पविष का व्यापार करने के लिए जाना जाता है। इसके गीत पौराणिक गाथाओं पर आधारित हैं और गीतों को प्रदर्शन के दौरान गीत के शब्दों को तत्काल निर्मित भी किया जाता है।

छाऊ : 2010 में सम्मिलित
यह एक जनजातीय युद्ध कला नृत्य है जिसे प्रमुख रूप से ओडिशा, झारखण्ड तथा पश्चिम बंगाल में प्रदर्शित किया जाता है। उत्पत्ति और विकास स्थान के आधार पर इस नृत्य की तीन उप-शैलियाँ हैं- पुरुलिया छाऊ (पश्चिम बंगाल), सरायकेला छाऊ (झारखण्ड) और मयूरभंज छाऊ (ओडिशा)। यह नृत्य मुख्य रूप से वसन्त उत्सव के दौरान प्रदर्शित किया जाता है और 13 दिनों तक चलता है। संपूर्ण समुदाय इसम भाग लेता है। नृत्य का प्रदर्शन पुरुष नर्तक द्वारा रात्रि के समय किसी खुले स्थान में किया जाता है। यह नृत्य और युद्ध कलाओं दोनों का एक मिश्रण है, जिसमें छद्म युद्ध तकनीकों का प्रयोग किया जाता है। छाऊ नृत्य की विषय-वस्तु हिन्दू पौराणिक गाथाओं पर आधारित है। मयूरभंज छाऊ के अतिरिक्त अन्य सभी में प्रदर्शन के दौरान नर्तक द्वारा मुखौटा पहना जाता है।

लददाख का बौद्ध पाठ : 2012 में सम्मिलित
इसका संदर्भ ट्रांस-हिमालयी लद्दाख क्षेत्र में जम्मू और कश्मीर राज्य में पवित्र बौद्ध ग्रन्थों के पाठ से है।

संकीर्तन : 2013 में सम्मिलित
यह मणिपुर की रीतिगत गायन, ढोल वादन और नृत्य कला है। यह कला रूप मणिपुरी वैष्णवों के जीवन में धार्मिक अवसरों और विभिन्न अवस्थाओं को चिन्हित करने के लिए प्रदर्शित किया जाता है। मन्दिरों में प्रचलित इस कला में प्रदर्शनकर्ता भगवान कृष्ण के जीवन और कार्यों का गीतों और नृत्यों द्वारा वर्णन करते हैं। संकीर्तन लोगों को उत्सव के अवसरों पर निकट लाता है और लोगों तथा समुदाय के बीच संस्कार समारोहों द्वारा संबंधों को सुदृढ़ करता है। एक विशिष्ट संकीर्तन प्रदर्शन में घर के बरामदे में बने कक्ष में दो ढोलवादक और 10 गायक-नर्तक भक्तों से घिरकर प्रदर्शन करते है।

अभ्यास प्रश्न – प्रारंभिक परीक्षा
1. निम्नलिखित में से कौन-सा यूनेस्को की अमूर्त विरासतों की सूची में नहीं है?
(a) कोडियट्टम (b) रामलीला
(c) नवरोज (d) पटना कलम
2. संकीर्तन निम्नलिखित राज्य का पारम्परिक गायन है:
(a) असम (b) पश्चिम बंगाल
(c) मणिपुर (d) ओडिशा
3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
(i) संकीर्तन मणिपुर का पारम्परिक गायन है।
(ii) इसे यूनेस्को की सूची में सम्मिलित किया गया है।
(iii) यह वैष्णववाद से संबंधित है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से सही हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i), (ii) और (iii) (d) (i) और (iii)
4. निम्नलिखित को यूनेस्को की विरासत सूची में सम्मिलन वर्ष के अनुसार बढ़ते क्रम में व्यवस्थित कीजिए?
(i) कोडियट्टम (ii) कलबेलिया
(iii) संकीर्तन (iv) नवरोज
कूटः
(a) (i)-(ii)-(iii)-(iv) (b) (i)-(iv)-(ii)-(iii)
(c) (ii)-(iv)-(i)-(iii) (d) (ii)-(i)-(iii)-(iv)
5. निम्नलिखित में से कौन-सा कला रूप देवी काली और राक्षस दारिका के बीच पौराणिक युद्ध को चित्रित करता है?
(a) कोडियट्टम (b) मुडियेटू
(c) राम्मन (d) संकीर्तन

उत्तरः
1. ;d) 2. ;c) 3. ;c) 4. ;b)
5. ;b)