इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना किसने की indian society of oriental art founder in hindi

By   March 20, 2021

indian society of oriental art founder in hindi इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट की स्थापना किसने की कब हुई ?

प्रश्न: ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरियन्टल आर्ट‘ पर एक लेख लिखिए।
उत्तर: भारतीय कला एवं कलाकारों को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से ‘गगेन्द्रनाथ ठाकुर‘ ने ‘ई.वी. हैवल‘ एवं सर जॉन बुडराॅफ के सहयोग से सन् 1907 में कलकत्ता में ‘इण्डियन सोसायटी ऑफ ओरियन्टल आर्ट‘ (Indian Society of Oriental Art) की स्थापना की, जिसके प्रथम संचालक ‘लार्ड किचनर‘ थे। सोसायटी के लगभग 35 सदस्यों में से ज्यादातर अंग्रेज ही थे। सन् 1908 ई. में संस्था ने एक चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया, जिसमें ‘अवनीन्द्रनाथ‘ ‘गगेन्द्रनाथ‘, ‘नन्दलाल बोस‘, ‘शैलेन्द्र नाथ डे‘, ‘के. वैकटप्पा‘ आदि के कार्यों की प्रशंसा विदेशी तथा भारतीय विद्वानों ने की। सन् 1919 ई. में ‘ओ.सी. गांगोली‘ के संपादन में कला-पत्रिका ‘रूपम‘ (Rupam) का प्रकाशन किया।
प्रश्न: पुनर्जागरण काल के या बंगाल स्कूल के चित्रों की विशेषताएँ का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: भारतीय पुनर्जागरण काल या बंगाल स्कूल के चित्रों की विशेषताएं निम्नलिखित हैं –
ऽ बंगाल स्कूल के कलाकारों की कृतियों में विदेशी कला प्रभाव के रूप में जापानी ‘वॉश पद्धति‘ के अतिरिक्त पाश्चात्य शैली का यथार्थ रेखांकन और चीनी आलेखन का निश्चित रूप में सम्मिश्रण मिलता है।
ऽ चित्रकारों ने भारत की प्राचीन ‘गौरवमयी-गाथाओं‘, ‘धार्मिक कथाओं‘, ‘ऐतिहासिक प्रसंगों‘, ‘साहित्यिक संसर्गो‘ तथा ‘जनजीवन की झाँकियों‘ से अपने विषयों का चयन किया।
ऽ रेखांकन के महत्त्व को पुनः प्रतिष्ठित किया गया। इससे पूर्व इस प्रकार की प्रथा भारत में प्रचलित नहीं थी।
ऽ कुछ कलाकारों, जिनमें प्रमुख रूप से आचार्य नन्दलाल बोस, क्षितीन्द्रनाथ मजूमदार ने ‘टेम्परा पद्धति‘ को अपनाया। इस पद्धति में धूसर-आभा वाले कम चटकीले रंग सीधे सपाट रूप से भरे जाते थे।
ऽ कला के क्षेत्र में यूरोपीय शैली ‘वादों‘ तथा ‘चित्रांकन रंग पद्धतियों‘ का भारत में जो अन्धानुकरण किया जा रहा था, पुनर्जागरण काल की कला में उसका परित्याग किया गया और चित्रकला के क्षेत्र में भारतीय परम्परा, संस्कृति, धर्म एवं इतिहास आदि का प्रवेश हुआ।
अपनी उक्त प्रमुख विशेषताओं के कारण इस कला आंदोलन ने (बंगाल कलम या स्कूल, पुनर्जागरण चित्रकला या टैगोर शैली) पूरे विश्व में ख्याति अर्जित की और भारतीय कला को विदेशी जकड़ से मुक्त कराने में सफलता भी प्राप्त की।
प्रश्न: ई.वी. हैवल का आधुनिक भारतीय चित्रकला में योगदान बताइए।उत्तर: ई.वी. हैवल एक ऐसे अंग्रेज कला समीक्षक थे, जिन्होंने न केवल भारतीय कला समीक्षा की दिशा बदली, अपितु आधुनिक भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण को एक परिपक्व स्थान दिलाया। ई.वी. हैवल ने अभिव्यक्ति की आवश्यकता को अनुभव करते हुये सन् 1920 ई. में अपनी प्रारंभिक रचनाओं का संक्षिप्त संकलन ‘हैंडबुक ऑफ इण्डियन आर्ट‘ (भ्ंदक ठववा व िप्दकपंद ।तज) नाम से प्रकाशित किया। इसके चार वर्ष बाद ‘भारतीय कला में हिमालय‘ (भ्पउंसंलं पद प्दकपंद ।तज) प्रकाशित हुआ। ई.वी. हैवल ने भारतीय लघु चित्रों, प्राचीन मूर्तिशिल्पों तथा अन्य कलाकृतियों की समालोचना करते हुये अपनी मौलिक कल्पना एवं विवेचना शक्ति को काम में लिया और उसे ‘नये शब्दों‘, ‘नई भाषा‘ से समृद्ध किया। कला समीक्षा को भी नये आयाम दिये, जिससे दर्शकों एवं पाठकों के सामने उसका महत्व दर्शा सके। यह उन्हीं के पुण्य प्रयत्नों का परिणाम था कि पुराने मूल्यों को फिर से स्थापित करने के लिए कला के क्षेत्र में एक नए आंदोलन का बीजारोपण हुआ और देशी तकनीक को पुनरूज्जीवित करने के प्रयत्न किए गए। हैवेल की एक और उपलब्धि थी कि वे भारतीय कला और स्थापत्य की समृद्ध विरासत को विश्व की नजरों में लाए। यह कार्य उनकी तीन कृतियों, ‘इंडियन कल्चर एंड पेंटिंग‘, ‘इंडियन आर्कीटेक्चर‘, और ‘आईडियल्स ऑफ इंडियन आर्ट‘ ने किया। यह कार्य अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की सहायता से किया गया।

प्रश्न: मंजूषा शैली
उत्तर: मूलतः भागलपुर (अंग) क्षेत्र में सुपरिचित इस चित्रशैली में मंदिर जैसी दिखने वाली एक मंजूषा जो सनई की लकड़ियों से बनाई गई होती हैं, पर बिहुला-विषहरी की गाथाओं से संबंधित चित्र कूचियों द्वारा बनाए जाते हैं। मूलतः मालियों द्वारा विकसित एवं प्रतियांकित इस चित्रकला शैली की एक प्रमुख कलाकार चक्रर्धी देवी का निधन 2009 में हो गया।
प्रश्न: साफी कला
उत्तर: साफी कला जिसे लोग रंगोली, अल्पनाया अश्विन के नाम से जानते हैं, पिछले 40 वर्षों से बिहार, विशेषकर पटना व मिथिला क्षेत्र में अधिक प्रचलित हैं। यह मूलतः (उदगम-स्थल की दृष्टि से) ब्रजक्षेत्र की कला है।
प्रश्न: थंग्का पेंटिंग
उत्तर: इस चित्रशैली के चित्र पटना संग्रहालय के एक भाग में सुरक्षित है। हालांकि ये मूलतः बिहार की चित्रशैली के चित्र नहीं, बल्कि तिब्बती चित्रशैली के चित्र हैं, जबकि कुछ लोग इन्हें बिहार का मानते हैं। जातक कथाओं, बुद्ध के धर्मोपदेशों, भारतीय आचार्यों तथा तिब्बती संतों के जीवन को अपना मुख्य कार्य विषय बनाने वाली यह चित्रशैली पर एवं मैडल धार्मिक चित्रशैली से जुड़ी है। इन चित्रों में जिन पांच विषयों का वर्णन किया गया है वे हैं दिव्याला, अभिधर्मापदेश, धर्मपाल, अंतप्रकृति तथा मंडल। इन चित्रों में रंग संयोजन को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है।
प्रश्न: जादोपिया शैली
उत्तर: यह संथाल जनजाति की सर्वाधिक मशहूर लोक चित्रकला शैली रही है जो अब लगभग लुप्त हो चुकी है। यह शैली संथालों की सामाजिक-धार्मिक रीतिरिवाजों और मान्यताओं को उकेरती है। इस शैली के चित्रकार को संथाली भाषा में जादो-कहा जाता है। इस शैली में सामान्यतः छोटे कपड़ों और कागज के टुकड़ों को मोड़कर बनाए जाने वाले पटों पर चित्र अंकित किए जाते हैं।
प्रश्न: वर्ली चित्रकला
उत्तर: यह महाराष्ट्र की लोकप्रिय चित्रकला है। रेखाओं और त्रिकोणों का प्रयोग कर इस चित्रकला में जीवन चक्र को दिखाया गया है। इन चित्रों को बनाने के लिए सफेद रंग का प्रयोग होता है। यह रंग चावल के चूरे से बनाते हैं। इन चित्रों को आदिवासी अपने घर की बाहरी दीवारों पर चित्रित करते हैं।
प्रश्न: कलमकारी
उत्तर: आंध्रप्रदेश का श्रीकलाहास्ती जिला कलमकारी के लिए प्रसिद्ध है। कलम से की जाने वाली कारीगरी को कलमकारी कहते है। इस लोककला में बांस से बनी नुकीली कलम और सब्जियों द्वारा तैयार किए गये रंगों का प्रयोग किया जाता है। रंगों का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप में किया जाता है। कलमकारी चित्र कहानी कहते हैं और इन को बनाने वाले कलाकारों में अधिकतर महिलाएं हैं।
प्रश्न: राजा रवि वर्मा का भारतीय चित्रकला में योगदान पर प्रकाश डालते हुए समालोचनात्मक विवेचना कीजिए।
उत्तर: 19वीं शताब्दी के अंत में एक प्रसिद्ध भारतीय कलाकार रविवर्मा ने पश्चात्य तरीकों, तकनीक, सिद्धांतों और गुणों के माध्यम से भारतीय कला को फिर से स्थापित करने की कोशिश की। इन्हें दरबारी चित्रकार ‘आलमगिरी नायडू‘ से कला प्रशिक्षण एवं प्रोत्साहन मिला। रविवर्मा ने प्रसिद्ध यूरोपीय छवि चित्रकार थियोडोर जैनसन के तैलचित्रों की तकनीक सीखी। रविवर्मा ने मुख्यतया भारतीय जीवन और दृश्यों तथा प्राचीन पौराणिक कथाओं को विषयवस्तु बना कर चित्र तैयार किए। लेकिन यह तैलचित्र पाश्चात्य शैली में थे। रविवर्मा के बाद अन्य कलाकारों को उनकी नई तकनीकों और शैलियों के उदाहरणों से कोई प्रेरणा नहीं मिली।
सन् 1873 ई. में चेन्नई शिल्पशाला के अधिष्ठाता ‘चैसमट‘ त्रावणकोर आये व राजा रवि वर्मा की चित्रकला को देखकर प्रभावित हुए। रविवर्मा ने त्रावणकोर महाराजा का संरक्षण प्राप्त कर अथक परिश्रम द्वारा एक चित्र निर्मित किया। चित्र में ‘नायर महिला बालों को चमेली के हार से गूंथती हुई चित्रित है।‘ इस चित्र से राजा रवि वर्मा की धूम मच गई। 25 वर्ष की उम्र में इस चित्र पर तत्कालीन गवर्नर का ‘स्वर्ण पदक‘ प्राप्त हुआ। उनकी इस कृति ने ‘वियेना की‘ ‘अन्तर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी‘ में ‘योग्यता प्रमाण पत्र‘ भी प्राप्त किया। इसके पश्चात् तो सन् 1880 ई. में पुणे प्रदर्शनी का ‘गायकवाड़ स्वर्ण पदक‘ व सन् 1904 ई. में ब्रिटिश सरकार का ‘केसर-ए-हिन्द‘ मैडल उल्लेखनीय है। इसके उपरान्त ही वे रवि वर्मा कहलाये।
‘सर माधवराव‘ की सहायता से उन्होंने सन् 1894 में मुम्बई के उपनगर ‘घाटकोपर‘ में अपनी लिथोग्राफिक प्रेस खोलकर चित्रों की प्रतिकृतियाँ छपवाई, इससे इनके चित्र घर-घर में फैल गये और चित्रों का मूल्य सस्ता हो गया, जिसे लोग खरीदने में सक्षम हो गये। इस तरह रवि देश के ‘पहले लिथोग्राफर‘ बने व विस्तृत पैमाने पर मुद्रण के युग का सूत्रपात हुआ।
उनके द्वारा चित्रित ‘सरबत बजाती हुई एक तमिल युवती‘ पर उन्हें ‘स्वर्ण पदक‘ प्राप्त हुआ। उनका जगविख्यात चित्र ‘शकुन्तला का दुष्यन्त के नाम पत्र लेखन‘ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। यह चित्र ‘ड्यूक ऑफ बकिंघम‘ ने खरीदकर राजा रवि वर्मा का उत्साहवर्द्धन किया।
सन् 1901 ई. में रवि वर्मा उदयपुर दरबार के निमंत्रण पर उनके यहाँ गये तथा कुछ अन्य चित्रों के साथ उन्होंने वहाँ महाराणा प्रताप का भी एक सुन्दर ‘व्यक्ति चित्र‘ बनाया।
उनके प्रमुख चित्रों में ‘ऊषा‘, ‘अनिरूद्ध‘, ‘दुष्यन्त‘, ‘शकुन्तला‘ के छवि चित्रों का चित्रण, ‘राम द्वारा समुद्र का मानभंग‘, ‘सत्यवादी हरीशचन्द्र‘, ‘श्री कृष्ण और बलराम‘, ‘दूत के रूप में श्रीकृष्ण‘, ‘रावण और जटायु‘, ‘मत्स्यगन्धा‘, ‘सीताहरण‘, ‘भीष्मप्रतिज्ञा‘, ‘दरिद्रता‘, ‘द्रोपदी‘, ‘सरस्वती‘, ‘श्रृंगार‘, ‘मेनका‘, ‘महेन्द्र‘, ‘हंस और महिला‘, ‘गंगा-शांतनु‘, ‘सागर‘, ‘जलाशय‘, ‘कुलीन महिलाएँ‘, ‘भिखारी‘, ‘बाला‘, ‘प्रस्थान‘, ‘गरीबी‘, ‘पक्षी-दूत‘, ‘चांदनी रात में पनघट से लौटते हुए‘, ‘उदयपुर का किला‘, ‘साधु और मेनका‘, ‘सेवानिवृत्त सिपाही‘, ‘वामन अवतार‘, ‘महिला और दर्पण‘, ‘भिक्षुणी‘ तथा भारतीय ऐतिहासिक पौराणिक घटनाओं पर अनेक सुन्दर चित्र शामिल हैं। साथ ही तत्कालीन राजा-महाराजाओं के अनेक शबीह (व्यक्ति चित्र) उन्होंने बनाये।
कला समीक्षकों की आलोचना के बाद भी यह कहना युक्तिसंगत होगा कि राजा रवि वर्मा ने अपनी उत्कृष्ट कलाकृतियों के माध्यम से भारतीय पौराणिक अनुभूतियों को जीवंत बनाया। उन्होंने कला को सार्वजनिक होने की विशुद्ध भूमिका तैयार की। उन्होंने अपनी कला में मानवीय रंगशास्त्र के अनेक अध्याय जोड़े।
2 अक्टूबर, सन् 1906 ई. को कला कर्म करते हुये त्रिवेन्द्रम के निकट आर्टिट्रंगल में महान् भारतीय कलाकार राजा रवि वर्मा दिवंगत हुए। राजा वर्मा भारतीय चित्रकाल इतिहास के पितामह कहलाये।