immunoglobulin molecule in hindi structure प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु की आधारभूत संरचना क्या है

पढ़िए immunoglobulin molecule in hindi structure प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु की आधारभूत संरचना क्या है ?

प्रतिरक्षियाँ (Antibodies)

परिचय (Introductions )

प्रतिरक्षी (Antibodies)—– ये प्रोटीन अणु होते हैं जो प्रतिजन के प्रतिक्रिया स्वरूप किसी प्राणी की देह में विशिष्ट लसीका कोशिकाओं (speciallized lymphoid cells) द्वारा उत्पन्न किये जाते हैं। ये प्रतिरक्षी एक विशेष संरचनात्मक गुट ग्लोबुलिन (globulins) से संबंधित होते हैं। ये पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाओं से बने होते हैं। इनका कार्य प्रतिरक्षी अनुक्रिया से सम्बन्धित है अत: इन्हें प्रतिरक्षीग्लोबुलिन्स (immunoglobulins) भी कहते हैं इन्हें 1 द्वारा अंकित किया जाता है।

सामान्यतः प्रतिरक्षी सीरम प्रोटीन का 1-2% भाग होती है किन्तु कुछ असामान्य अवस्था में ये इससे अधिक हो सकते है । इम्यूनोग्लोबुलिन नामक इन ग्लाइको प्रोटीन में अमीनो अम्ल की एक ऐसी श्रृंखलाबद्ध पंक्ति उपस्थित होती है जिनके द्वारा ये विशिष्ट प्रतिजन के सम्पर्क में आ सकते हैं। प्रत्येक प्रतिरक्षी केवल एक विशेष प्रकार के प्रतिजन से ही बन्धन बना सकती है, अन्य से नहीं अर्थात् प्रत्येक प्रतिजन हेतु विशिष्ट प्रतिरक्षी होनी चाहिये जो इससे बन्धन बना सके। यह विशिष्टता इम्युनोग्लोबुलिन के विशिष्ट भागों में उपस्थित अमीनों अम्लों की श्रृंखला के कारण ही होती है । इन बिन्दुओं पर ही प्रतिजन इनसे सम्पर्क बनाते हैं। लिम्फोसाइट की बाह्य कला पर प्रतिरक्षी के ये बिन्दु अनावरित (exposed) या खुली अवस्था में पाये जाते हैं। जब कोई उपयुक्त प्रतिजन अपने ग्राही बिन्दुओं के साथ इम्यूनोग्लोबुलिन के निकट आता है तो यह इसके साथ जुड़ जाता है। इस प्रकार प्रतिरक्षी वे प्राथमिक बन्धनकारी प्रोटीन होते हैं जो प्रवेश करने वाले सूक्ष्मजीव या कोशिका को नष्ट नहीं करते बल्कि इस बाह्य कोशिका को सभी ओर से घेर लेते हैं। प्रतिरक्षी विमोचन (trigge) कर अनुक्रिया देती है। जिससे इस सूक्ष्मजीव को मार दिया जाता है।

प्रतिरक्षी पदार्थों के बारे में वास्तविक रासायनिक अध्ययन टीसेलयिस एवं काबाट (Tiselius and Kabat) ने 1940 में किया । इन्होंने बताया कि इलेक्ट्रोफोरेसिस में अत्यधिक धीमी गति से बहने वाले सीरम प्रोटीन्स के अंश में अधिकतर सीरम प्रतिरक्षी पायी जाती है। पोर्टर (Porter) ने 1950 में प्रोटीन का लयन करने वाले एन्जाइम पेपेन (papain) का उपयोग प्रतिरक्षी के अणु को विखण्डित (cleave) करने हेतु किया । इस प्रकार इसकी संरचना एवं कार्य के बार में जानकारी प्राप्त हो सकी। एडेलमेन एवं साथियों (Edelman et at ) ने 1969 में प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अ अमीनों अम्ल श्रृंखला की खोज की।

प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु की आधारभूत संरचना  (Basic structure of the immunogolbulin molecule)

प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन ग्लाइकोप्रोटीन होते हैं। अणु की आधारभूत रचना अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर Y के समान होती है। एक चार श्रृंखला वाले एकलक (monomer) युक्त होती है। इन चार . पॉलिपेप्टाइड श्रृंखलाओं में से दो समान प्रकार की भारी श्रृंखलाएँ (heavy chains) व दो समान प्रकार ही हल्की श्रृंखलाएँ (light chains) होती है जिन्हें HT L श्रृंखलाएँ कहते हैं। इसकी Hश्रृंखला 440 अमीनों अम्ल तथा Lश्रृंखला में 220 अमीनों अम्लों की इकाईयों से बनी होती हैं। प्रत्येक पॉलिपेप्टाइड श्रृंखला में एक अमीनो शिरा व दूसरा कार्बोक्सी (carboxy) शिरा होता हैं। अमीनों अम्ल अन्त इस अणु का चर या परिवर्ती (variable) या V क्षेत्र (region) तथा कार्बोक्सी अन्त स्थिर (constant) या C क्षेत्र (C region) होता है। इस प्रकार हल्की श्रृंखलाएँ चर V तथा स्थिर C क्षेत्र तथा भारी श्रृंखलाएँ चर (VH) व स्थिर क्षेत्र (C) युक्त होती हैं। CH क्षेत्र पुन तीन उपक्षेत्रों CH1  CH2  व CH3  में विभक्त किया जाता है। ये क्षेत्र अमीनो अम्ल अन्त से कार्बोक्सी शिरे की ओर भारी श्रृंखला में विद्यमान होते हैं।

प्रतिरक्षी अणु का वह भाग जो प्रतिजन से बन्धन बनाता है यह H व Lश्रृंखलाओं के Vक्षेत्र में कुछ अमीनों अम्लों के द्वारा निर्मित होता है। हिन्ज क्षेत्र (hinge region) प्रथम व द्वितीय क्षेत्रों के बीच दो भारी शृंखलाओं द्वारा बनाया गया क्षेत्र है। यह प्रत्यास्थ भाग होता है जिस पर एन्जाइम्स अथवा रासायनिक पदार्थों का अधिक प्रभाव होता है। यह अत्यधिक प्रोटीन युक्त भाग है अत: पेपेन (papain) का इस हिंज क्षेत्र पर अधिक प्रभाव होता है एवं प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अणु खण्डों (fragments) में विखण्डित हो जाता है। प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अणु का पेपेन से पाचक होता है व यह दो प्रतिजन बन्धकारी (two fab fragments) एवं एक f. क्रिस्टल बनाने योग्य खण्ड (cystallizable fragment) में बँट जाता है। f खण्ड प्रतिजन से बन्धन बनाने की क्षमता नहीं रखता। पेप्सिन एंजाइम भिन्न बिन्दु पर क्रिया करता है। यह f खण्ड को शेष अणु से विखण्डित करता है इस प्रकार हिंज क्षेत्र अणु के शेष भाग से जुड़ा रहता है यह एक बड़े खण्ड जिसे F(ab), कहते हैं से पृथक् होता है। यह पैतृक प्रतिरक्षी पदार्थ की भाँति अभी भी द्विसंयोजक (devalent ) होता है। यह प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अणु दूसरे अणु के साथ अनेक डाइसल्फाइड बन्ध बनाते हुए जुड़ा रहता है। ये बन्ध H- Hश्रृंखलाओं, H-Lश्रृंखलाओं व L-L को जोड़ते हैं। अन्तरशृंखला जुड़ाव भी पाये जाते हैं। डाइसल्फाइड बन्धन दोनोंशृंखलाओं को संयोजित बनाये रखने से पूर्णत: सफल नहीं होते हैं क्योंकि इन बन्धनों को हटा देने के बाद भी प्रतिरक्षी अणु पूर्व समान जुड़ा रहता है। नान कोवेलेन्ट बल जैसे विद्युत स्थैतिक, हाइड्रोजन बन्ध व वान्डरवाल बल डाइसल्फाइड बन्धों की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं जो इन अणुओं को परस्पर जोड़े रखते हैं। दो उप प्रकार के इम्यूनोग्लोबुलिन अणुओं में श्रृंखलाओं के मध्य डाइसल्फाइड बन्ध नहीं पाये जाते हैं फिर भी ये चार श्रृंखलाओं वाली आधार भूत सरंचना बनाये रखती है। प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अणुओं का अवसादन गणनांक ( sedimentation coefficient) जो स्वेदबर्ग इकाई द्वारा निरुपित किया जाता है के द्वारा मापा जाता है। प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन अणु का अणुभार जितना अधिक होता है उतनी ही s की दर बढ़ती जाती है

समप्ररूप (Isotypes )-

भारी श्रृंखलाओं के स्थिर क्षेत्रों की संरचना के आधार पर प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन्स को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया गया है।

  1. प्रतिरक्षीग्लोबुलिन M (IgM)
  2. प्रतिरक्षीग्लोबुलिन A (IgA)
  3. प्रतिरक्षीग्लोबुलिन E (IgE) 4. प्रतिरक्षीग्लोबुलिन G (IgG)
  4. प्रतिरक्षीग्लोबुलिन D (IgD)

ये सभी समरूप (isotypes) कहलाते हैं। प्रत्येक प्रकार के प्रतिरक्षीग्लोबुलिन के स्थिर क्षेत्र में अन्य की अपेक्षा अमीनो अम्ल श्रृंखला में भिन्नता पायी जाती है। इस प्रकार इनके CH क्षेत्र में प्रतिजनित विभिन्नताएँ (antigenic differences) निहित रहती हैं। एक विशेष प्रकार के प्रतिरक्षीग्लोबूलिन CH क्षेत्र के ग्रीक शब्दावली के अक्षर से निरूपित करते हैं जैसे IgG में y, IgM-IgA a, IgE- £ तथा lgD में 6 प्रकार के भारी स्थिर क्षेत्र C पाये जाते हैं। IgG JgA. व IgM को इनके उपवर्गों में इनके CH क्षेत्रों में सूक्ष्म अन्तर पाये जाने के कारण पुनः वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार इन्हें IgG1, IgG2, IgG3 व IgG4 उपवर्गों में विभक्त करते हैं। प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु क्योंकि प्रोटीन संरचना होती है, इसके विभिन्न समप्ररूपों में प्रतिजनिक विभिन्नताएँ पायी जाती हैं इसलिये किसी भी प्रकार के समप्ररूप के लिये एन्टीसीरम तैयार करने की पूरी-पूरी संभावनाएँ रहती हैं। माना कि इस प्रकार IgG के लिये एन्टीसीरम तैयार किया गया तो यह IgG के साथ प्रतिक्रिया करने में सक्षम होगा किन्तु IgM, IgA, IgE व lgD के प्रति प्रतिक्रिया नहीं करेगा।

जिस प्रकार प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु की भारी श्रृंखलाओं के स्थिर भाग के कारण समप्ररूप पाये जाते हैं इसी प्रकार हल्की श्रृंखला के स्थिर भाग में भी अन्तर पाये गये हैं। इस आधार पर भी समप्ररुप रूप पाये जाते हैं इन्हें k व रूप कहते हैं। इस अणु में दोनों प्रकार की (k या 7) श्रृंखलाएँ कभी नहीं पायी जाती एक अणु एक ही प्रकार की श्रृंखला रखता है । इस प्रकार IgG – दो रूप IgGk या IgGy व IgM-IgMk या IgMy में प्राप्त होते हैं।

साधारणतः प्रतिरक्षी तंत्र किसी भी प्रतिजन के लिये प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन तैयार करने की क्षमता रखता है जो प्राणी विशेष के जीवन काल के दौरान प्राप्त किये जाते हैं। यह क्रिया प्रतिरक्षीग्लोबुलिन के चर क्षेत्र में अमीनो अम्लों कीश्रृंखला में आवश्यक परिवर्तन करके की जात है। भारी व हल्की श्रृंखला के अन्त में स्थित 110 अमीनो अम्लों की शृंखला चर क्षेत्र (variable region) या विषमजीनी क्षेत्र (heterogenous region) बनाती है। चर क्षेत्र की कुछ श्रृंखलाएँ अत्यधिक विविधता दर्शा है इन्हें अधिचर क्षेत्र (hypervarible region) या संपूरकी झात कारक क्षेत्र (complementarity determining region) (CDR) कहते हैं। ये अधिचर क्षेत्र L व H श्रृंखलाओं पर तीन खण्डों में उपस्थित रहते हैं। ये अधिचर क्षेत्र ही प्रतिजन बन्धनकारी स्थल (antigen binding site) के निर्माण में भूमिका रखते हैं। CDR क्षेत्र भी पुन: CDR1  CDR2, व CDR में उपविभाजित किये जाते हैं।

जिस प्रकार विभिन्न आइसोटाइम्स के C क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार के प्रतिजेनिक निर्धारक (determinats) पाये जाते हैं। इसी आधार पर इडिओटाइप्स ( idiotypes) बनाये गये हैं। इसका

आधार चर क्षेत्र में पाये वाले प्रतिजनिक निर्धारक होते हैं जो अलग-अलग आइसोटाइप्स में भिन्न प्रकार के होते हैं।

प्रतिरक्षीग्लोबुलिन अणु प्राकृतिक अवस्था में त्रिविम संरचना (three dimensional) बनाते हुए वलित स्वरूप में पाये जाते हैं। चर सिरे पर अधि चर बन्धनकारी श्रृंखला लूप बनाते हुए पायी जाती यह प्रतिजन की पहचान बनाने का कार्य करती है। चर क्षेत्रों का महत्वपूर्ण जैविक योगदान होता है। प्रत्येक प्रतिरक्षी अणु दोहरी भूमिका में होता है यह प्रतिजन से बन्धन बनाते हेतु दो क्षेत्र रखता है। अमीनों सिरा जो चर क्षेत्र युक्त होता है यह प्रतिजन को पहचानता है व उससे बन्धन बनाता है। इस प्रकार भारी व हल्की श्रृंखलाएँ प्रतिजन को पहचान लेती हैं।

प्रतिरक्षीग्लोबुलिन का WHO वर्गीकरण (WHO classification of immunoglobulin)

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) द्वारा प्रतिरक्षीग्लोबुलिन का प्रमुखतः तीन वर्गों IgG lgA व IgM में विभक्त किया है। इसके अतिरिक्त मानव रक्त प्लाज्माIgDa ,IgE प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन भी पाये जाते हैं। यह वर्गीकरण प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन के अपकेन्द्रण लक्षण (centrifugation character) प्रतिरक्षा वैद्युत कण संचलन (immunoelectro phoretic) व्यवहार को आधार बनाकर किया गया है। विभिन्न प्रकार के प्रतिरक्षीग्लोबुलिन विशिष्ट भिन्न परिस्थितियों में असामान्य मात्रा में उत्पन्न होते हैं। अधिकतर प्रतिरक्षी ग्लोबुलिन का अणुभार लगभग 1,50,000 होता है। सभी प्रकार के lg दो छोटी इकाईयों से बने होते हैं जो डाइसल्फाइड बन्धों द्वारा जुड़ी रहती हैं। यह बन्ध मरकेप्टोइथेनॉल (mercaptoethnol) अभिकारकों द्वारा अपचयित होकर दो उप इकाईयाँ बनाता है।

  1. L श्रृंखला (light chain) M. W = 23, 500
  2. H श्रृंखला (heavy chain) M. W = 50,000 से 70,000

विभिन्न प्रकार के Ig प्रतिरक्षीग्लोबुलिन निम्नलिखित प्रकार से हैं-

प्रतिरक्षीग्लोबुलिन (Immunoglobulin) G (IgG)

IgG मनुष्य में कुल सीरम प्रतिरक्षीग्लोबुलिन्स का 75% भाग बनाते हैं। द्वितीयक प्रतिरक्षी अनुक्रिया के बाद संश्लेषित किये जाने वाले प्रतिरक्षीग्लोबुलिन में ये प्रमुख हैं। ये संक्रमण के विरुद्ध प्रमुख भूमिका निभाते हैं। ये माता से भ्रूण में अपरा (placenta ) को पार करने की क्षमता के कारण प्रवेश करते हैं एवं शिशु को प्रथम छः माह तक सुरक्षा प्रदान करते हैं। माता द्वारा स्त्रावित कोलोस्ट्रम (colostrum) या नवदुग्ध में IgG के उपस्थित होने के कारण यह क्रिया होती हैं। स्तन से दुग्ध करने पर यह शिशु में पहुँच जाती हैं। IgG आन्तरागों में शीघ्रता के साथ विसरित होती है। यह शरीर के सभी भागों में पाया जाता है किन्तु रक्त, लसिका और आन्त्र में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। अतः जीवाणुओं अथवा इनके द्वारा स्त्रावित आविष एवं अन्य रक्त जनित संक्रमणकारी कारकों के प्रति प्राणी को सुरक्षा प्रदान करती है। यह भक्षकाणु क्रिया (phagocytosis) में वृद्धि करती है। इसकी चार उपइकाईयाँ होती है। IgG अणु परिपूरक तंत्र के वैकल्पिक पक्ष को संवेदित करता है तथा भक्षानुनाशन क्रिया हेतु आपसोनिन की तरह कार्य करता है। यह जीवाणु, विषाणु, कवक विषैले पदार्थों के विरुद्ध प्रभावशाली होता है।