मानव श्वसन तंत्र (human respiratory system in hindi) , मनुष्य में श्वसन तंत्र की प्रक्रिया , चित्र , अंग

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human respiratory system in hindi , मानव श्वसन तंत्र , मनुष्य में श्वसन तंत्र की प्रक्रिया , चित्र , अंग ? ह्यूमन रेस्पिरेटरी सिस्टम क्या है ? श्वसन और श्वासोच्छ्वास में अंतर ?

प्राणियों में गैसों का आदान प्रदान :-

प्रोटोजोअन्स , स्पंज और सीलेन्ट्रेटस में गैसों का आदान प्रदान : एक कोशिकीय (अकोशिकीय) अथवा बहुत छोटे बहुकोशिकीय जीवों की कोशिका झिल्ली बाह्य वातावरण के सीधे सम्पर्क में आती है।

वायवीय बैक्टीरिया और प्रोटिस्ट जैसे अमीबा तथा पैरामिशियम में गैसों का आदान प्रदान वातावरण और जीव के शरीर के मध्य प्लाज्मा झिल्ली से विसरण द्वारा होता है।

कुछ बहुकोशिकीय प्राणी जैसे स्पंज (सायकान) और सीलेन्ट्रेट (हाइड्रा) में विसरण द्वारा कोशिका और चारों ओर के जल के मध्य गैसों का आदान प्रदान होता है।

एनेलिड्स में शरीर भित्ति श्वसन अंगो युक्त होती है और इनमे रुधिर केशिकाओं की आपूर्ति अच्छी होती है। रक्त हीमोग्लोबिन युक्त होता और प्लाज्मा में घुलित रहता है।

श्वसन : केंचुओं में विशिष्ट श्वसन अंग नहीं होते है। गैसों का आदान प्रदान साधारण रूप से त्वचा द्वारा होता है जो कि पतली और संवहनीय होती है। जब त्वचा नम होती है तब प्रभावी आदान प्रदान तय होता है। त्वचा एपीडर्मल कोशिकाओं द्वारा श्लेष्मा स्त्रावण से और पृष्ठ छिद्रों द्वारा सिलोमीक द्रव की oozing से नम रहती है।

श्वसन अंग : क्रस्टेशियन के श्वसन अंग गिल्स है और इनमे रक्त में श्वसन वर्णक हीमोसायनिन भी होता है।

इन्सेक्ट में श्वसन अंग ट्रेकिया है। ये उत्पत्ति में एक्टोडर्मल और शाखित नलिकाकार संरचना है जो कि निश्चित ओपनिंग स्टीग्मेटा या स्पाइरेकल द्वारा बाहरी वातावरण से सम्पर्क रखते है और अन्दर उत्तको तक विस्तृत रहते है। ये आंतरिक रूप से क्युटिकल की सर्पिल बैण्ड द्वारा रेखित होती है जो कि इनको पिचकने से रोकती है।

इन्सेक्ट में रक्त श्वसन में कोई भूमिका नहीं निभाता और यह श्वसन वर्णक रहित होता है क्योंकि ट्रेकिया उत्तक तक सीधे ही पहुँच जाती है।

स्तनियो के अलावा वर्टीब्रेट के फेफड़े

बहुत सी मछलियों में एक swim bladder (फेफड़े) पाया जाता है जो कि श्वसन अंग के रूप में कार्य करता है और floating सुगम बनाता है। यह सामान्यतया एकल होता है लेकिन युग्मित भी हो सकता है।

हालाँकि यह सामान्यतया पाचन प्रणाली से जुड़ा होता है। हालाँकि कुछ मछलियों में इसका सम्बन्ध इनके साथ नहीं होता है।

फुफ्फुस मछलियों फेफड़े ( swim bladder) द्वारा श्वसन करती है। जब ये शुष्क मौसम के दौरान कीचड़ में रहती है। मेंढक एवं टॉड में फेफड़े के अन्दर वलन पाए जाते है जो कि श्वसन सतह को बढ़ा देते है। रेप्टाइल्स के फेफड़ो की संरचना एम्फीबियन की तुलना में जटिल होती है।

सर्प का बायाँ फेफड़ा हांसित होता है। पक्षियों के फेफड़ो में वायुकोष होता है। गैसीय आदान प्रदान केवल फेफड़ो में होता है। वायुकोष में नहीं होता है। वायुकोष में नहीं होता है ये नि:श्वसन के दौरान वायु से भर जाते है और उच्छवसन के दौरान उपयुक्त वायु को फेफड़ो से बाहर निकाल देते है। इस प्रकार फेफड़ो में उपयोग की गयी वायु बची नहीं रहती और श्वसन सतह हमेशा स्वच्छ वायु के सम्पर्क में रहती है।

सहायक श्वसन अंग जंतु प्रकार
Yolk sac and allantois वर्टीब्रेट की भ्रूणीय अवस्था
Skin एम्फीबियन , सेलामेंडर , अफ्रीकन हेयरी मेंढक
Lining of epithelium of cloaca , rectum , gut etc. मछली
Cloacal bladder समुद्री कछुआ
Pelvic gills  अमेरिकन फेफड़ा मछली लेपिड़ोसाइरेन
Opercular gills मछली जैसे – acipenser , lepidosteus , polypterus
Pseudobranchs इलास्मोब्रेंक के स्पाइरेकल [उपास्थित मछलियों के श्वसन छिद्र]
Pharyngeal diverticula Amphipnous , channa
Branchial diverticula Clarias and anabas
Swim bladder Lung fishes

spiracles के खुलने और बंद होने के आधार पर इन्सेक्ट में ट्रेकियल तंत्र दो प्रकार का होता है –

(a) Holopneustic : इसमें सभी spiracles  खुले होते है।

(b) Hemipneutic : इसमें एक या अधिक spiracles बंद होते है।

जल संवातन की समस्याएँ –

(i) जल वायु से कम ऑक्सीजन युक्त होता है।

(ii) ऑक्सीजन जल से वायु की तुलना में धीरे विसरित होती है।

(iii) जल वायु से सघन होता है। मछली जल प्रवाह बनाये रखने के लिए पेशीय प्रयास करती है।

(iv) उच्च तापमान पर जन्तुओ को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है।

Book lungs and book gills

पुस्तक फेफड़े स्कार्पिआन और मकड़ी में पाए जाते है। इनका यह नाम इसलिए है क्योंकि इनके वलन पुस्तक के पृष्ठों के समान होते है। बुक गिल्स Limulus में श्वसन अंग है। एक जीवित जीवाश्म shallow coastal waters में रहता है।

मुख ग्रासन श्वसन : इस प्रकार का श्वसन मुखग्रसनी गुहा द्वारा होता है। उदाहरण : मेंढक।

पल्मोनरी श्वसन : बहुत सी मछलियों में फेफड़ा (swim bladder) एक अंग है जो कि फ्लोटिंग को सुगम बनाता है और यह श्वसन अंग के रूप में कार्य करता है। फुफ्फुस मछली शुष्क मौसम के दौरान फेफड़े से श्वसन करती है। कुछ सेलामेन्डरो के फेफड़े लम्बे और साधारण कोश होते है। मेंढक और टॉड में फेफड़ो के अन्दर वलन पाए जाते है जो कि श्वसन सतह को बढाते है। पक्षियों के फेफडो में वायुकोष होते है। गैसों का आदान प्रदान केवल फेफड़ो में होता है वायुकोष में नहीं।

स्तनधारियों में फेफड़े बहुपिण्डिय होते है लेकिन इनमे वायुकोष नहीं होते।

वायु संवातन की समस्याए :

  • वायु संवातित स्थलीय प्राणी अपनी श्वसन सतह को शुष्क होने से बचाते है।
  • इसमें श्वसन सतह से वाष्पीकरण द्वारा जलहानि होती है।

मानव में श्वसन

श्वसन तंत्र : मानव के श्वसन तंत्र निम्न अंग होते है –

  1. नासा गुहा: नासा गुहा श्वसन तंत्र का प्रथम भाग है। यह नासा छिद्रों द्वारा बाहर की ओर खुलती है। नासागुहा नासापट्ट द्वारा नासा कोष्ठों में विभाजित होती है। प्रत्येक नासा कोष्ठ तीन भागों में विभेदित होता है।

(i) प्रकोष्ठ : प्रथम भाग , बाह्य नासा छिद्रों से प्रारंभ होता है। इसमें बड़े धुल कणों के प्रवेश को रोकने के लिए बहुत से रोम पाए जाते है।

(ii) श्वसनीय भाग उच्च परिसंचरित होता है और इसमें वायु की दशा जैसे गर्म या नम आदि भी शामिल होती है। प्रत्येक नासा कोष्ठ की दिवार से उत्पन्न होने वाले तीन अस्थिल संकरे ऊंचे भाग होते है , जिन्हें नाक खोल (nasal conchae) कहते है।

इनका नाम ऊपरी नाक खोल , मध्य नाक खोल और निचला नाक खोल होता है।

यह श्लेष्मा झिल्ली द्वारा घिरी होती है और नासा कोष्ठ की सतह बढ़ाती है।

(iii) ग्राण भाग उपरी भाग है और गंध के लिए घ्राण एपिथीलियम द्वारा रेखांकित होता है।

  1. ग्रसनी (Pharynx): नासा गुहा से वायु ग्रसनी में प्रवेश करती है। यह भोजन और वायु दोनों के लिए उभयनिष्ठ मार्ग प्रदान करती है। ग्रसनी एक संकरी slit , glottis द्वारा wind पाइप या ट्रेकिया में खुलती है। ग्लोटिस उत्तकों के त्रिकोणीय आवरण एपिग्लोटिस द्वारा भोजन के प्रवेश को रोकती है।
  2. मानव कंठ (human larynx): वयस्कावस्था तक नर और मादा के कंठ के आकार में बहुत कम अंतर होता है। कंठ मुखग्रसनी में एक दरार जैसे छिद्र , ग्लोटीस द्वारा मुखग्रसनी में खुलता है। कंठ अनियमित आकृति की उपास्थियो द्वारा बना होता है जो कि लिगामेंट और झिल्ली द्वारा एक दुसरे से जुडी होती है।

मुख्य उपास्थियाँ निम्नलिखित है –

(i) थायरॉइड उपास्थि : सबसे बड़ी उपास्थि है। यह कंठ को सामने और पाशर्व से सहारा देती है। यह एक सबक्यूटेनिस उभार बनाती है। जिसे एडम का एप्पल कहते है। यह नर में अधिक विकसित होता है।

(ii) क्रिकोइड उपास्थि : थायरोइड उपास्थि के निचे होती है और इसका आकार मुहर गुदी हुई अंगूठी जैसा होता है।

(iii) अरेटीनोइड उपास्थि : खुरदरी पिरामिड आकार की उपास्थि है , अरेटीनॉइड कंठ की पश्च दिवार बनाती है।

(iv) कार्निक्यूलेट उपास्थि : यह लचीली तन्तु उपास्थि के दो शंक्वाकार के नोड्युल होते है जो कि अरेटीनाइड उपास्थि के ऊपरी सिरे पर स्थित होते है।

(v) क्युनिफार्म उपास्थि : ये दो छोटे लम्बे मुग्दराकार नोड्यूल होते है जो कि कार्निक्यूलेट उपास्थि के ऊपर और आगे स्थित होती है।

(vi) एपिग्लोटिस उपास्थि : एक पत्तीनुमा उपास्थि है जो कि ग्रसनी में उभरी हुई होती है।

इस प्रकार कुल 9 उपास्थियो में से 3 युग्मित (iii , iv , v) और 3 अयुग्मित (i , ii , vi) होती है।

थायरोहायड झिल्ली एक चौड़ी , चपटी झिल्ली है जो होइड अस्थि के ऊपर से और थायरोइड झिल्ली के निचे से जुडी होती है। कंठ के अन्दर एक जोड़ी असत्य वाक्रज्जू उपस्थित होते है जो कि ध्वनि उत्पादन में सहायक होते है और अन्दर की जोड़ी सत्य वाक्रज्जू होती है। जब कंठ द्वारा वायु का दबाव डाला जाता है तो यह वास्तविक वाक्रज्जू में कम्पन्न उत्पन्न करता है और ध्वनी उत्पादन होता है।

ध्वनी की पिच वाक्रज्जू में तनाव द्वारा ज्ञात की जाती है। नर मानव में एन्ड्रोजन के प्रभाव में वाक् रज्जू लम्बे और मोटे होते है। मादा और बच्चो में वाक् रज्जू छोटे होते है। मादा में वयस्क अवस्था में इनकी मोटाई अधिक नहीं होती इसलिए आवाज तीक्ष्ण या तीव्र स्वरमान युक्त होती है।

4. श्वासनली (Trachea)

श्वासनली 12 सेंटीमीटर लम्बी , दीवारों में हायलाइन उपास्थि की C आकार की अपूर्ण वलयों युक्त नलिका है। उपास्थि के ये वलय दीवारों को पिचकाने से रोकते है। यह आंतरिक रूप से कूटस्तरित कशाभिक स्तम्भाकार एपिथिलियम से बनी होती है। सिलिया श्लेष्मा को बाहर की ओर धकेलती है।

  1. ब्रोंकाई (Bronchi): ब्रोंकाई की दीवारों को उपास्थिल वलयो द्वारा सहारा प्रदान किया जाता है। प्रत्येक Bronchus विभाजित होकर छोटे से छोटी Bronchioles (सूक्ष्मश्वासनली) में पुनः विभाजित होती है। एपिथिलियम धीरे धीरे ब्रोंकाई में आभासी स्तरीय पक्ष्माभीय स्तम्भी उपकला से टर्मिनल ब्रोन्कियोल में नॉन रोमक सरल घनाकार उपकला में परिवर्तित हो जाती है। उपास्थि के अपूर्ण वलय धीरे धीरे उपास्थि की प्लेटो द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है जो अंत में दूरस्थ सूक्ष्मश्वासनली में समाप्त हो जाती है।

टर्मिनल सूक्ष्मश्वासनली आगे श्वसनीय सूक्ष्मनलिका में उपविभाजित हो जाती है।

श्वसनीय श्वसनिकायें कुपिका नलिका → कूपिकीयकोष → कुपिकाओं में खुलती है। श्वसन श्वसनीकाओं की दिवार बहुत पतली होती है और सरल शल्की उपकला से बनी होती है।

6. फेफड़े

फेफडे वक्ष गुहा के एक बड़े भाग में स्थित होते है। प्रत्येक फेफड़े के चारों ओर एक दोहरी प्ल्युरल गुहा होती है। दायाँ फेफड़ा तीन पिण्डो में और बायाँ दो में विभाजित होता है।

फेफड़े के अन्दर प्रत्येक श्वसनी अनेक श्वसनिकाओं में विभाजित होती है। जिनमे से प्रत्येक लम्बी थैली और कुपिका नलिकाओं में खुलती है। जिनकी सतह पर वायु कोश या वायुकोष्ठ होते है।

मानव फेफड़े में वायुकोष्ठों की संख्या लगभग 300 मिलियन आंकी जाती है।

वायुकोष्ठों की दिवार दो प्रकार के वायुकोष उपकला कोशिकाओं युक्त होती है।

प्रकार-I : प्रोडीमीनेंट शल्की उपकला कोशिकाएं गैसीय आदान प्रदान के लिए होती है।

प्रकार-II : संख्या में कुछ ही होती है और पृष्ठसक्रियकारक उत्पन्न करती है।

फेफड़े एक पतली सरल शल्की उपकला , जिसे pleura कहते है , की दोहरी परत से आवरित होते है। बाहरी या पैराइटल प्ल्युरॉन वक्ष गुहा की दीवारों से जुडी होती है और आंतरिक विसरल प्ल्यूरॉन फेफड़ो के सम्पर्क में होती है। parietal pleuron और विसरल प्ल्यूरॉन के मध्य का अवकाश pleural space कहलाता है।

इसमें एक तरल द्रव भरा होता है जिसे pleural द्रव्य कहते है।

प्ल्यूरोनिक द्रव्य घर्षण कम करने के साथ साथ फेफड़ो की गति सरल बनाता है।

pleura का inflammation एक रोग उत्पन्न करता है जिसे pleurisy कहते है।

फेफड़े जन्म के समय गुलाबी होते है। ये वयस्क में कार्बोनेसियस पदार्थ के जमाव के कारण गहरे धूसर या चितकबरे रंग के हो जाते है। यह गहरापन धूम्रपान करने वाले व्यक्ति में और जो व्यक्ति प्रदूषण में रहते है उनमे होता है। दायाँ फेफड़ा दाई तरफ यकृत के होने से डायफ्राम की उठी हुई स्थिति के कारण 2.5 सेंटीमीटर होता है। बायाँ फेफड़ा बड़ा होता है , हालाँकि यह दायें फेफड़े से संकरा होता है क्योंकि यह असममित रूप से व्यवस्थित ह्रदय के कारण कार्डियक खाँच युक्त होता है।

बायाँ फेफड़ा एक तिर्यक खांच द्वारा दो पिण्डो बायाँ ऊपरी और बायाँ निचला पिंड में बंटा होता है। दायें फेफड़े में भी दो खांचे , समतल और तिर्यक खांच पाई जाती है। ये दायें फेफड़े को तीन पिंडो में बांटती है।

Right anterior

right middle

right inferior

ये पिंड आंतरिक रूप से खंडो में और खंड lobules में विभाजित होते है। बाएँ फेफड़े में 8 खण्ड और दायें फेफड़े में 10 खण्ड होते है। एक औसत वयस्क आदमी में दायें फेफड़े का वजन 625 ग्राम जबकि बाएं फेफड़े का वजन 565 ग्राम होता है।

खरगोश के फेफडे : खरगोश के फेफड़े गुलाबी और स्पंजी होते है लेकिन केन्द्रीय गुहिका नहीं होती। उपरी तिर्यक खाँच अपूर्ण रूप से दायें फेफड़े को 4 और बाएं को 2 असमान पिण्डो में बाँटती है।

दायाँ पिंड अग्र और पश्च एजाइगस मध्यस्थ और दायाँ अग्र और दायाँ पश्च पिण्ड बाह्य होता है। बायाँ पिण्ड बायाँ अग्र तथा बायाँ पश्च होते है।

संवातन की क्रियाविधि

संवाहन प्रक्रिया में वक्ष गुहिका के एकान्तरित संकुचन और शिथिलन शामिल है। यह वयस्क आदमी में 12-16 प्रति मिनट (औसत 14 / मिनट) होता है। यह शिशुओं में 44 times/minute भी हो सकता है।

श्वसन दर सोते समय निम्नतम (10 times/minute) होती है।

श्वसन प्रक्रिया में दो अवस्थाएं शामिल है –

(1) निश्वसन (Inspiration) : इसमें फेफड़ो के वायुकोष्ठ में स्वच्छ वायु अन्दर ली जाती है। यह सक्रीय प्रक्रिया है जिसमे यांत्रिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यहाँ दो प्रकार की नि:श्वसनी पेशियाँ होती है –

(a) Phrenic पेशियाँ : ये पेशियाँ डायफ्राम से पसली और कशेरुक दण्ड तक फैली होती है।

(b) बाह्य intercostal muscles : 12 जोड़ी पसलियों के मध्य अधर , पृष्ठ और पाशर्व रूप से 11 जोड़ी पेशियाँ उपस्थित होती है। जब फ्रेनिक पेशियाँ संकुचित होती है तो पसलियों पर आगे की तरफ ऊपर और बाहर की ओर धक्का लगता है। जिसमे वक्ष गुहा सभी दिशाओं में बढ़ जाती है। जिससे आयतन बढ़ जाता है और दाब कम हो जाता है। इसलिए वायु फेफड़ो में गति करती है।

  1. उच्छवसन (Expiration): इसमें उच्च Pco2की वायु को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। आराम के समय उच्छवसन निष्क्रिय प्रक्रम है और इसमें श्वसनी पेशियों का relaxation शामिल है। इससे वक्ष गुहा का आयतन कम हो जाता है। लेकिन दबावपूर्ण उच्छवसन के दौरान दो उच्छवसित पेशियाँ भी उच्छवसन में सहायता करती है।

(a) उदरीय पेशियाँ : ये पसलियों से उदरीय अंगो तक फैली होती है। जब ये संकुचित होती है तो उदरीय विसरल अंग डायफ्राम की तरफ ऊपर की ओर धकेले जाते है। जिससे डायफ्राम अधिक उत्तलाकार हो जाता है और वक्ष गुहा अग्र पाशर्व रूप से कम हो जाती है।

(b) आंतरिक intercostal पेशियाँ : ये पसलियों के मध्य उपस्थित 11 जोड़ी पेशियाँ है। जब ये संकुचित होती है तो पसलियों पीछे , निचे और अन्दर की ओर धकेली जाती है जिससे वक्ष गुहा अधर पृष्ठ और पाशर्व रूप से आयतन में कम हो जाती है इन परिवर्तनों के कारण बड़ी मात्रा में वायु बाहर निकाल दी जाती है।

स्तनियो में ऋणात्मक दबाव संवातन पाया जाता है , यह एक ही समय में खाने और श्वसन दोनों को allows करता है। मेंढक में धनात्मक दबाव संवातन होता है।

श्वसन तंत्र

प्रत्येक जीव को जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है क्योंकि ऑक्सीजन ही कार्बनिक भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण या विघटन करके ऊर्जा प्रदान करता है। भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण की यही प्रक्रिया ‘श्वसन’ कहलाती है। चूंकि इस प्रकार की श्वसन क्रिया फुस्फुसों में ही सम्पन्न होती है। इसलिए इसे फुस्फुस श्वसन भी कहते हैं। चूंकि इसमें ऑक्सीजन का रुधिर में मिलना तथा ब्व्, का शरीर से बाहर निकलना सम्मिलित होता है, अतः इसे गैसीय विनिमय भी कहते हैं।

* जीवों में सम्पन्न होने वाली यह ऑक्सीकरण क्रिया जिसमें ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में जटिल भोज्य पदार्थों का सामान्य शरीर के तापमान पर विभिन्न एन्जाइमों के नियंत्रण में क्रमिक अपघटन होता है, जिसके फलस्वरूप सरल भोज्य पदार्थ ब्व्2, अथवा जल एवं ब्व्2) का निर्माण होता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है।

* ऑक्सीजन के अन्तर्ग्रहण का कार्य श्वसन तंत्र करता है। श्वसन तंत्र के द्वारा शरीर की प्रत्येक कोशिका ऑक्सीजन की सम्पूर्ति प्राप्त करती है, साथ-ही-साथ ऑक्सीकरण उत्पादनों से मुक्त हो जाती है।

मानव का श्वसन तंत्र

मनुष्य का श्वसन तंत्र कई अंगों से मिलकर बना होता है। इस तंत्र के अंतर्गत वे सभी अंग आते हैं जिनसे होकर वायु का आदान-प्रदान होता है। इन अंगों में सबसे महत्वपूर्ण अंग फेफड़ा या फुफ्फुस होता है।

श्वसन तंत्र के महत्वपूर्ण अंग

* नासिकाः वायु श्वास-मार्ग में सामान्यतः नासिका के द्वारा ही प्रवेश करती है। बाह्य नासिका, नाक का दिखने वाला वह भाग है जो नासिका हड्डियों और उपास्थि द्वारा बनता है।

* नासिका-गुहाः बाह्य नासिका में एक बड़ी गुहा होती है जिसे नासिका गुहा कहा जाता है। नासिका गुहा के दो भागों में बट जाने पर इसके आगे (बाहर की ओर) और पीछे दो-दो छिद्र या रंध्र होते हैं। आगे के छिद्रों को अग्र नासारंध्र कहा जाता है, जो बाहर से अंदर की ओर हवा को ले जाते हैं तथा पीछे की तरफ के छिद्रों को पश्च नासारंध्र कहते हैं जो ग्रसनी तक हवा को ले जाते हैं।

* ग्रसनीः यह पाचन तंत्र के साथ-साथ श्वसन तंत्र का भी हिस्सा होती है। ग्रसनी के मुख्यतः दो भाग होते हैं- मुख-ग्रसनी एवं स्वरयंत्रज ग्रसनी। स्वरयंत्रज, ग्रसनी का सबसे निचला भाग होता है। ग्रसनी के इसी भाग से श्वसनीय एवं पाचन तंत्र अलग-अलग हो जाते हैं।

* कण्ठच्छदः यह पीत प्रत्यास्थ उपास्थि से बनी पत्ती के आकार की एक प्लेट होती है जो थाइरॉयड खांचे के बिल्कुल नीचे थाइरॉयड उपास्थि की अन भित्ति की आतंरिक सतह से जुड़ी रहती है। इसका मुख्य कार्य, निगलने की क्रिया के दौरान स्वरयंत्र के द्वार (इसे ग्लॉटिस कहते हैं) को ढकना होता है जिससे भोजन श्वसनीय मार्ग में नहीं जा पाता है। श्वास क्रिया के दौरान ग्रासनली या इसोफेगस को ढकने का कार्य भी इसी अंग द्वारा होता है।

* स्वरयंत्रः स्वरयंत्र ऊपर की ओर लैरिन्जोफैरिन्क्स और नीचे की ओर श्वासनली के साथ मिला रहता है। यह श्वासनली का सबसे ऊपरी भाग होता है जो नीचे सातवीं सर्वाइकल वर्टिब्रा (कशेरुका) के स्तर पर श्वासप्रणाली में खुलता है। स्वरयंत्र से ही आवाज की उत्पत्ति होती है। बोलते समय इसमें स्थित स्वर रज्जुओं में कम्पन होता है जिसके फलस्वरूप ध्वनि पैदा होती है। पूरा स्वरयंत्र कई असमान आकार की उपास्थियों से मिलकर बनता है।

* श्वासनलीः श्वास प्रणाली को श्वासनली भी कहते हैं । यह नली स्वरयंत्र के नीचे से शुरु होकर फेफड़ों के सिरे तक पहुंचती है, जहां पर यह दो शाखाओं, दायीं और बायीं श्वसनियों या ब्रोंकाई में बंट जाती है और हर फेफड़े में प्रवेश कर जाती है।

* श्वसनियांः श्वास प्रणाली पांचवें थॉरेसिक वर्टिब्रा (कशेरुका) के स्तर पर दाईं और बाईं दो शाखाओं में बंट जाती है जिन्हें श्वसनियां कहा जाता है। दोनों दाई और बाईं श्वसनी प्रत्येक दाएं और बाएं फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है। दाईं श्वसनी बायीं श्वसनी से छोटी और चैड़ी होती है और अक्सर श्वास प्रणाली की सीध में होती है।

* श्वसनिकाएंः हर श्वसनी फेफड़े के खण्ड में प्रवेश करने के बाद बहुत सी सूक्ष्म शाखाओं-प्रशाखाओं में बंट जाती है जिन्हें श्वसनिकाएं कहते हैं। इनमें उपास्थि नहीं होती लेकिन ये पेशीय, तंतुमय एवं लचीले ऊतक की बनी होती है।

* वायुकोशिकाएंः वायुकोष या वायुकोशिकाएं कोशिकाओं के जाल से घिरे रहते हैं। वायुकोष फूले-फूले और अंगूर के गुच्छों के समान रहते हैं जिससे फेफड़ों के आतंरिक तल का क्षेत्रफल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। यहां गैसों का विनिमय आदान-प्रदान होता है।

* फेफड़ेः फेफड़े श्वसन संस्थान के मुख्य स्पन्जी अंग होते हैं। ये संख्या में दो होते हैं- एक दायां और एक बायां । यह ज्यादातर वक्षीय-गुहा में समाये रहते हैं। फेफड़े शरीर की मध्य रेखा के दोनों पार्यों में स्थित होते हैं तथा मीडियास्टाइनम द्वारा एक-दूसरे से अलग रहते हैं।

* फुफ्फुसावरणः फुफ्फुसावरण एक दोहरी परत वाली सीरमी कला होती है, जो हर फेफड़े को घेरे रहती है। प्लूरा अर्थात फुफ्फुसावरण की दोनों परतों के बीच हल्के से खाली स्थान को ‘फुफ्फुसावरणी-गुहा’ कहा जाता है।

* मध्यच्छद पेशीः यह वक्षीय एवं उदरीय गुहाओं को अलग करने वाली गुम्बद के आकार की एक पेशीकलामय भित्ति होती है। इसकी उत्तल सतह छाती की ओर तथा अवतल सतह पेट की ओर रहती है। इसमें एक केंद्रीय टेण्डन रहता है, जिससे पेशी तंतु फैलकर निचली पसलियों, उरोस्थि (स्टर्नम) और कशेरुका दण्ड (वर्टिबल कॉलम) से जुड़ जाते हैं।