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मानव रोग किसे कहते हैं | मानव रोग कारण एवं निवारण pdf | रोग कारण एवं निवारण mcq | human disease in hindi
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मानव रोग
अक्सर कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है। लेकिन अच्छे स्वाथ्य में रूकावट उत्पन्न हाहेना ही रोग है। शरीर में विभिन्न विकारों को उनकी प्रकृति व कारण के आधार पर विभक्त किया गया है। जैसे उपापययी या विकासीय अनियमितताओं के कारण होने वाले रोगों को जन्मजात रोक कहा जाता है, और जन्म के पश्चात् विभिनन कारकों की वजह से होने वाले रोगों को उपार्जित रोग कहते है।
अन्य रोग
* फाइलेरियाः यह रोग अनेक प्रकार के सूत्रकृमियों के कारण होता है। इस रोग से लसीका वाहिनी और ग्रन्थियां फूल जाती हैं । मलेरिया की भांति इस रोग के आरम्भ में भी ज्वर आ जाता है।
* स्कर्वीः विटामिन ब् एस्कॉर्विक अम्ल है, जो स्कर्वी निरोधी होता है। मसूढ़ों से रक्त का स्राव, दांतों का असमय टूटना, बच्चों के चेहरे और अन्य अंगों में सूजन, पेशाब में रक्त या एल्ब्युमिन का अंश आना आदि इसके लक्षण हैं।
* रिकेट्स या सुखण्डीः विटामिन क् की कमी के कारण कैल्सियम और फॉस्फोरस के लवण का उपापचय ठीक तरह से नहीं हो पाता है, जिसके कारण अस्थियों में कैल्सियम संचित नहीं हो पाती है। विटामिन क् मछली के तेल, कलेजी, अण्डे की जरदी और दूध में पाया जाता है।
* मधुमेहः यह अग्न्याशय से सम्बन्धित रोग है, जो इन्सुलिन का पर्याप्त स्राव नहीं होने के कारण होता है। इन्सुलिन यकृत और पेशियों में ग्लाइकोजेन संचित करने में मदद करता है। इसका पर्याप्त मात्रा में नाव नहीं होने पर यकृत में ग्लाइकोजेन का उपयोग होता है और ग्लाइकोजेन की मात्रा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
* दिल का दौराः हृदय-धमनियां हृदय के पेशी-तंतुओं को रक्त पहुंचाती हैं। हृदय-धमनियों में रक्त जम जाने के कारण, हृदय के पेशी-तन्तुओं को रक्त नहीं मिल पाता है। फलतः हृदय रक्त का संचार नहीं कर पाता है क्योंकि क्षेपक कोष्ठों में आकुंचन और प्रसरण नहीं हो पाता है। इसे हृदय गति का रूक जाना या हार्ट अटैक कहा जाता है।
* कैन्सरः कोशिकाओं में असामान्य वृद्धि को कैंसर कहते हैं। कैन्सर का उपचार एन्टीबायोटिक्स से, एल्केलायड के प्रयोग से, रेडियोथेरेपी से, लेसर किरणों से, शल्य चिकित्सा करके या बोन मेरो का प्रत्यार्पण करके किया जाता है।
* टीनिएसिसः इस रोग का कारक टीनिया सोलियम नामक परजीवी है। रोगी की आंत में कारक परजीवी के अण्डे उपस्थित होते हैं, जो मिलकर मल के साथ बाहर आ जाते हैं। सूअर जब इस मल को खाते हैं, तो यह सूअर के आंत में पहुंच जाते हैं। इस अवस्था को ब्लैडर वर्म कहते हैं। यदि संक्रमित सुअर का अधपका मांस कोई व्यक्ति खाता है, तो ब्लैडर वर्म उसकी आंत में पहुंचकर टेपवर्म के रूप में विकसित हो जाता है तथा आंत की दीवार पर चिपक जाता है। प्रायः टीनिएसिस के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं पड़ते। केवल कभी-कभी अपच और पेट-दर्द होता है। परन्तु जब कभी आंत में लार्वा उत्पन्न हो जाते हैं और केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र, आंखों, फेफड़ों, यकृत व मस्तिष्क में पहुंच जाते हैं, तो रोगी की मृत्यु हो जाती है।
* जोड़ों का दर्दः इसे गठिया या वात रोग के नाम से भी जाना जाता है।
* हाइपरटेंशनः इसका मुख्य कारण उच्च धमनी दाब है, जो छोटी धमनी में सिकुड़न उत्पन्न होने के कारण होता है। छोटी धमनी में सिकुड़न के कई कारण होते हैं, जैसे-अत्यधिक तनाव, ज्यादा लम्बे समय तक परिश्रम, चिंता, संवेदनशीलता आदि। रोगी को आराम करना व पूरी नींद लेना अत्यधिक फायदेमंद होता है।
* न्यूरोसिस (छमनतवेपे) : इससे हृदयवाहिका तंत्र की क्रियाविधि असंतुलित हो जाती है। इस रोग में रोगी को नींद न आना व चिड़चिड़ा हो जाना प्रमुख लक्षण होते हैं।
* पक्षाघात या लकवाः इस रोग में जहां पक्षाघात होता है वहां की तंत्रिकाएं निष्क्रिय हो जाती हैं। इसका कारण अधिक रक्त-दाब के कारण मस्तिष्क की किसी धमनी का फट जाना अथवा मस्तिष्क को अपर्याप्त रक्त की आपूर्ति होना है।
* एलर्जीः कुछ वस्तुएं जैसे-धूल, धुआं, रसायन, कपड़ा, सर्दी, किन्हीं विशेष व्यक्तियों के लिए हानिकारक हो जाती हैं और उनके शरीर में विपरीत क्रिया होने लगती है। खुजली, फोड़ा, फुन्सी, शरीर मे सूजन आ जाना, काला दाग, एक्जिमा आदि एलर्जी के उदाहरण हैं।
* मिर्गीः इसे अपस्मार रोग कहते हैं। यह मस्तिष्क के आंतरिक रोगों के कारण होती है।
* बर्ड फ्लूः इस रोग का मुख्य विषाणु भ्1छ5 है द्य यह रोग प्रायः मुर्गियों तथा प्रवासी पक्षियों के माध्यम से प्रसारित होता है।
* जापानी इन्सेफेलाइटिसः यह रोग क्यूलेक्स प्रजाति के मच्छर से फैलता है। इस विषाणु का संक्रमण मच्छर के काटने से होता है लेकिन सुअर को भी इस रोग का वाहक माना जाता है। क्यूलेक्स प्रजाति का मच्छर धान के खेतों में पनपता है।
* स्वाइन फ्लूः यह भी एक सक्रांमक रोग है। इस रोग का उद्भव उत्तर अमेरिकी देश मैक्सिको में हुआ। विश्व स्वास्थ्य संगठन में स्वाइन फ्लू को एनफ्लूएन्जा भ्छ, नाम दिया है। बार-बार उल्टी आना, दस्त होना, अचानक तेज बुखार, शरीर में दर्द और थकान का अनुभव होना और खांसी आदि इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। इस रोग से बचाव के लिए कोई विशेष टीका या दवा नहीं है।
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