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प्रोटीन कितने प्रकार के होते हैं , how many types of proteins are there in hindi प्रोटीन के प्रकारों को समझाइये
जानिये प्रोटीन कितने प्रकार के होते हैं , how many types of proteins are there in hindi प्रोटीन के प्रकारों को समझाइये ?
प्रोटीन वर्गीकरण (Classfication of proteins)
प्रोटीनों का वर्गीकरण भिन्न-भिन्न आधारों पर किया जा सकता है। अधिकांशतः इन्हें संरचना, संवहन, कार्य एवं विलेयता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
संघटन के आधार पर वर्गीकरण (Classification based on composition)
संघटन के आधार पर इन्हें तीन मुख्य वर्गों में बांटा गया है जिन्हें फिर से वर्गीकृत किया गया है।
- सरल प्रोटीन (Simple proteins)
- संयुग्मी प्रोटीन (Conjugated proteins)
- व्युत्पन्न प्रोटीन (Derived proteins)
- सरल प्रोटीन (Simple proteins)
सरल प्रोटीन मात्र अमीनो अम्लों से निर्मित होते हैं तथा इनको जलापघटन से केवल अमिनो अम्ल प्राप्त होते हैं। इन्हें विलेयता के आधार पर 7 समूहों में बांटा जा सकता है।
(i) ऐल्ब्यूमिन (Albumins) :- इस प्रकार के प्रोटीन जल एवं लवणों के तनु विलयनों में घुलनशील होते हैं। उच्च ताप अथवा उष्मा देने पर इनका स्कंदन (coagulation) हो जाता है। इनके विलयन को अमोनियम सल्फेट द्वारा संतृप्त करने पर प्रोटीन का अवक्षेपण (precipitation) हो जाता है। उदाहरण- अंडे से प्राप्त ओवलब्यूमिन ( ovalbumin) अरंड के बीजों मैं उपस्थित रिसिन (ricin), जौ से विलगित B एमाइलेज आदि ।
(ii) ग्लोबुलिन (Globulins) :- ग्लोबुलिन प्रोटीन्स जल में अविलेय किंतु तनु लवण विलयन में घुलनशील होते हैं।
उष्मा प्रदान करने पर इनका स्कंदन हो जाता है। इनके विलयन को अमोनियम सल्फेट से अर्धसंतृप्त करने पर ये अवक्षेपित हो जाते हैं। उदाहरण-प्लाज्मा में उपस्थित प्लाज्मा ग्लोबुलिन, मटर में उपस्थित लैग्यूमिन (legumin) एवं मूंगफली में उपस्थित एरेकिन (arachin) आदि ।
(iii) ग्लूटेलिन (Glutelins) :-ग्लूटेलिन जल में लवण विलयन तथा उदासीन विलयनों में अविलेय होते हैं किंतु त अम्ल एवं एल्कली में विलेय होते हैं। ये प्रोटीन उष्मा संवेदी नहीं होती एवं पादपों में ही पाये जाते हैं। उदाहरण- गेहूँ में उपस्थित ग्लूटेलिन (glutelins) एवं धान में उपस्थित ओराइजेनिन (oryzenin)।
- प्रोलेमिन (Prolamines ) :- प्रोलेमिन जल एवं शुद्ध एल्कोहल में अविलेय किंतु 70-80% ईथाइल एल्कोहल में विलेय होते हैं। इनमें प्रोलीन अमीनो अम्ल की मात्रा बहुत अधिक होती है तथा जल अपघटन के पश्चात इनसे अमोनिया एवं प्रोलीन प्राप्त होते हैं। उदाहरण- गेहूँ में उपस्थित ग्लाएडिन (gliadin), मक्का में जीईन (zein) एवं जौ में हॉर्डिन (hord ein)।
प्रोटीन
सरल प्रोटीन (Simple protein) संयुग्मी प्रोटीन (Conjugated protein) व्युत्पन्न प्रोटीन (Derived protein)
(i) एल्ब्यूमिन (Albumins) (i) न्यूक्लियोप्रोटीन (Nucleoproteins) (i) प्राथमिक व्युत्पन्न प्रोटीन
(ii) ग्लोबुलिन (Globulins) (ii) ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoproproteins) (Primary derived proteins)
(iii).ग्लूटेलिन (Glutelins) (iii) लाइपोप्रोटीन (Lipoproteins) (a) स्कदित प्रोटीन
(iv) प्रोलेमिनं ( Prolamines) (iv) क्रोमोप्रोटीन (Chromoproteins) (Coagulated proteins)
(v) प्रोटेमिन (Protamines) (v) मैटेलोप्रोटीन (Metalloproteins) (b) मैटाप्रोटीन (Metaproteins)
(vi) हिस्टोन (Histones) (vi)फास्फोप्रोटीन (Phosphoproteins) (ii) द्वितीयक व्युत्पन्न प्रोटीन
(vii) स्क्लैरोप्रोटीन (Scleroproteins) (Secondary derived proteins)
(a) प्रोटीयोज (Proteoses)
(b) पैप्टोन (Peptones)
(c) पैप्टाइड (Peptides)
(v) प्रोटेमिन (Protamines) :- ये प्रोटीन जल, तनु अम्ल एवं अमोनिया विलयन में भी विलेय होते हैं। इनमें क्षारीय अमीनो अम्लों की अधिकता होती है किंतु टायरोसीन ट्रिप्टोफान एवं सल्फर युक्त अमीनो अम्ल नहीं पाये जाते। ये सरलता से स्कंदित नहीं होती। अधिकांशतः ये न्यूक्लिक अम्लों से सम्बद्ध होते हैं। उदाहरण- मछली के शुक्राणुओं में उपस्थित सैलमिन (salmin ) प्रोटीन ।
(vi) हिस्टोन (Histones) :- ये प्रोटीन जल एवं तनु अम्लीय विलयनों में विलेय किंतु अमोनियम हाइड्रॉक्साइड में अविलेय होती है तथा आकार में अपेक्षाकृत छोटी होती है। इन प्रोटीनों में क्षारीय अम्लों की अधिकता होती है जैसे लाइसिन एवं आर्जीनीन। उष्मा के प्रभाव से इनका स्कंदन नहीं होता। अधिकांशतः ये प्रोटीन केन्द्रक में न्यूक्लिक अम्लों (विशेषतः DNA) से सम्बद्ध रहती है।
(vii) स्क्लैरोप्रोटीन (Scleroprotein) :- ये प्रोटीन जल एवं अन्य सामान्य विलायकों में अविलेय होते हैं। ये मुख्यतया संरचनात्मक (structural) प्रोटीन होते हैं जो अस्थि, (bone), रोम (hair), ऊन (wool) एवं संयोजी ऊत्तक (connective tissues) में पायी जाती हैं। ये कैरेटिन (keratins) एवं कोलेजन (collagen) दो प्रकार के होते हैं।
- संयुग्मी प्रोटीन (Conjugated proteins)
संयुग्मी प्रोटीनों में ∝ अमीनो अम्लों से बने पॉलीपेप्टाइड के अतिरिक्त प्रोस्थेटिक समूह (prosthetic group) भी होता हैं जो कि अप्रोटीनी प्रकृति (non proteinaceous) के होते हैं। विभिन्न प्रोस्थेटिक समूहों के आधार पर इन्हें निम्न समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
(i) ग्लाइकोप्रोटीन (Glycoproteins) :- इन प्रोटीनों में पॉलीपेप्टाइड के साथ कार्बोहाइड्रेट समूह सहसंयोजी बंघ द्वारा संलग्न होते हैं। इन की मात्रा विभिन्न प्रोटीनों में भिन्न-भिन्न (लगभग 1 से 80% तक) हो सकती है। उदाहरण- कोशिका झिल्ली में उपस्थित कुछ प्रोटीन, प्रतिरक्षी प्रोटीन तथा प्रतिजन प्रोटीन ।
(ii) लाइपोप्रोटीन (Lipoproteins) :- लिपिड एवं पॉलीपेप्टाइडों के संयोजन से बने प्रोटीन लाइपोप्रोटीन कहलाते हैं। ये प्रोटीन जल में अविलेय होते हैं। ये कोशिका में उपस्थित विभिन्न झिल्लियों के मुख्य घटक होते हैं। उदाहरण- कोलेस्टीरोल (cholesterol), फॉस्फेटाइड (phosphatide) आदि ।
(iii) न्यूक्लियोप्रोटीन (Nucleoproteins) :- न्यूक्लिक अम्ल एवं प्रोटीन के संयोजन से निर्मित प्रोटीन न्यूक्लियोप्रोटीन कहलाते हैं। अधिकांशतः ये लवण बन्धों द्वारा आपस में जुड़े होते हैं। उदाहरण- DNA से संलग्न हिस्टोन अथवा न्यूक्लियोहिस्टोन ।
(iv) फॉस्फोप्रोटीन (Phosphoproteins) :- वे प्रोटीन जिनमें आर्थोफास्फोरिक अम्ल प्रोस्थेटिक समूह के रूप में होता है फॉस्फोप्रोटीन कहलाते हैं। ये प्रोस्थेटिक समूह एस्टर बन्ध द्वारा प्रोटीन से संलग्न होते हैं। उदाहरण- दूध में उपस्थित केसीन (casein) प्रोटीन । :
(v) क्रोमोप्रोटीन (Chromoproteins) :- इन प्रोटीनों में वर्णक प्रास्थेटिक समूह के रूप में प्रोटीन के साथ होते हैं। उदाहरण फ्लेवोप्रोटीन, बिलिप्रोटीन, हीमोग्लोबिन ।
(vi) मैटेलोप्रोटीन (Metalloproteins) :- इन प्रोटीनों में धातु अणु एक प्रकार से प्रोस्थेटिक समूह का कार्य करते हैं। अधिकाशतः इस प्रकार के प्रोटीन एन्जाइम (enzymes) होते हैं एवं धात्विक अणु इनके सक्रियक (activator) के रूप में आवश्यक होते हैं। उदाहरण- फैरीटीन-fe-प्रोटीन सम्मिश्र हीमोग्लोबिन Fe की उपस्थिति के कारण मैटेलोप्रोटीन भी है। 3. व्युत्पन्न प्रोटीन (Derived proteins)
ऐसे उत्पाद जो सरल अथवा संयुग्मी प्रोटीनों के आंशिक पाचन (partial digestion) अथवा गुणनाशन (denaturation) के पश्चात बनते हैं । व्युत्पन्न प्रोटीन दो प्रकार के होते हैं।
(i) प्राथमिक व्युत्पन्न प्रोटीन (Primary derived proteins) :- ये विकृत (denatured) प्रोटीन होते हैं जो सामान्य प्रोटीन पर अम्ल, उष्मा, विकिरण (radiation) क्षार अथवा जल आदि के प्रभाव के कारण बनते हैं। इन प्रोटीनों की प्राथमिक संरचना विकृत नहीं होती एवं जल अपघटन के कारण इनकी उत्पत्ति नहीं होती। विलेयता के आधार पर ये तीन प्रकार के होते हैं। (a) प्रोटीएन (Proteans) :- ये जल में विलेय होते हैं उदाहरण केसीन (Casein) प्रोटीन ।
(b) मेटाप्रोटीन (Metaproteins) :- ये तनु अम्ल अथवा क्षार में विलेय होते हैं। उदाहरण- अम्लीय एवं क्षारीय एल्बूमिन । (c) स्कंदित प्रोटीन (Coagulated proteins) :- ये जल में अविलेय होते हैं तथा सामान्यतः उष्मा के प्रभाव के कारण प्राप्त होते हैं। उदाहरण- पके अंडे में उपस्थित एल्बूमिन ।
(ii) द्वितीयक व्युत्पन्न प्रोटीन (Secondary derived proteins) :- ये अपेक्षाकृत छोटे आकार के पॉलीपेप्टाइड (प्रोटीन) होते हैं जो सरल अथवा संयुग्मी प्रोटीनों के आंशिक पाचन अथवा जल अपघटन से प्राप्त होते हैं। इनका आकार जलापघटन के फलस्वरूप धीरे-धीरे कम होता जाता है। ये तीन प्रकार के होते हैं-
(a) प्रोटीयोज (Proteoses) :- ये प्रोटीन जल में विलेय होते हैं तथा उच्च ताप पर स्कंदित नहीं होते। जिंक सल्फेट 1. एवं अमोनियम सल्फेट के साथ इनका संतृप्त विलयन बनाकर इनके अवक्षेप (precipitate) बनाये जा सकते हैं।-
(b) पैप्टोन (Peptones) :- ये प्रोटीन भी जल में विलेय होते हैं एवं उच्च ताप पर स्कंदित नहीं होते। जिंक सल्फेट एवं अमोनियम सल्फेट के साथ इनके अवक्षेप नहीं बनाये जा सकते।
(c) पैप्टाइड (Peptides) :- ये अमीनो अम्लों से बने अपेक्षाकृत बहुत छोटे अणु होते हैं इनमें डाइपैप्टाइड, ट्राइपेप्टाइड टेट्रापेप्टाइड अर्थात ऑलिगोपेप्टाइड तथा छोटे पॉलीपेप्टाइड शामिल हैं।
प्रोटीन के कार्यों के अनुसार वर्गीकरण अथवा जैविक महत्व
(Classification according to function of proteins and and biological importance)
सजीव प्राणियों में प्रोटीन विभिन्न प्रकार के कार्य करते हैं एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। प्रोटीन के कार्यों के आधार पर उन्हें विभिन्न समूहों में बांटा गया है।
- संरचनात्मक प्रोटीन (Structural proteins) :- ये प्रोटीन कोशिका संरचना का मुख्य घटक हैं विभिन्न कोशिका कलाओं में प्रोटीन महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में पाये जाते हैं। अनेक अघुलनशील एवं रेशेदार प्रोटीन यांत्रिक सहारा (Mechanical support) प्रदान करने में बहुत उपयोगी हैं। उदाहरण- कोलेजन, इनसे उपास्थि (cartilage) एवं कंडराओं (tendons) का निर्माण होता है। रोम, बाल नाखून एवं पंख आदि अविलेय प्रोटीन कैरेटिन (keratin) से निर्मित होते हैं। मकड़ी के जाल एवं रेशम के तंतु फाइब्रॉइन (fibroin) नामक प्रोटीन से बने होते हैं।
- विकर (Enzymes) :- विभिन्न जैविक तंत्रों में उपस्थित विकर प्रोटीन ही होते हैं जो विभिन्न जैविक रासायनिक अभिक्रियाओं (biochemical reactions) का उत्प्रेरण (catalyze) करते हैं। ये विकर अथवा एन्जाइम अत्यधिक दक्षता से युक्त (efficient) एवं अत्यंत विशिष्ट (highly specific) होते हैं। एक विशेष एन्जाइम एक निश्चित अभिक्रिया को ही उत्प्रेरित करता है। ये एन्जाइम तापमान pH आदि की निश्चित परिस्थितियों में ही सक्रिय होते हैं। सभी एन्जाइमों में से केवल राइबोजाइम (ribozyme) ही अप्रोटीनी प्रकृति (non proteinaceous) का है।
विभिन्न एन्जाइम न्यूक्लिक अम्लों प्रोटीनों लिपिड एवं अन्य पदार्थों के संश्लेषण एवं अपघटन एवं परिवर्तन आदि प्रक्रियाओं को उत्प्रेरित करते हैं। एन्जाइमों के बारे में वर्णन अन्यत्र दिया गया है।
- स्थानांतरण प्रोटीन :- अनेक प्रोटीन किसी विशिष्ट समूह, आयन अथवा अणु के स्थानांतरण में सहायक होते हैं। उदाहरणतः रक्त में उपस्थित हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन के वाहक के रूप में कार्य करता है। इसी प्रकार रक्त में उपस्थित कुछ लाइपोप्रोटीन यकृत (liver) से अन्य अंगोतक लिपिड के स्थानांतरण में उपयोगी हैं।
अनेक प्रोटीन आयनों आदि के कोशिका एवं अन्य झिल्लियों के आर पार अभिगमन में सहायक होते हैं एवं वाहक प्रोटीन (carrier proteins) कहलाते हैं।
- पोषक एवं संचयी प्रोटीन (Nutrient and storage proteins) :- अनेक पादपों के बीजों में प्रोटीन संचित रहता है। जो आवश्यकता पड़ने पर (बीजांकुरण के समय अथवा पोषण हेतु) उपयोग किया जाता है। अनाज एवं दलहन (pulses) वर्ग के पादप इसमें मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त अंडे में उपस्थित ओवलब्यूमिन एवं दूध में उपस्थित केसीन प्रोटीन भी इसी प्रकार के उदाहरण हैं।
- नियामक प्रोटीन (Regulatory proteins) :- अनेक प्रोटीन कोशिका में होने वाली प्रक्रियाओं के नियंत्रण में सहयोगी होते हैं। इसमें प्रोटीन हार्मोन (जैसे इन्सुलिन) वृद्धि कारक आदि मुख्य हैं। अनेक नियामक प्रोटीन विभिन्न एन्जाइम प्रोटीन एवं अन्य पदार्थों के संश्लेषण को नियंत्रित करते हैं। हिस्टोन प्रोटीन भी यूकेरियोटिक DNA के साथ बन्ध बनाते हैं तथा न्यूक्लियोसोम बनाते हैं। हिस्टोन तथा अनेक नियामक प्रोटीन DNA ट्रांसक्रिप्शन के माध्यम से प्रोटीन संश्लेषण को नियंत्रित करते हैं।
- रक्षी प्रोटीन (Defense proteins) :- अनेक प्रोटीन बाह्य रोगकारकों से रक्षा करते हैं। कशेरूकी प्राणियों (vertebrates) में पाये जाने वाले इम्यूनोग्लोबुलिन (immunoglobulins) अथवा प्रतिरक्षी प्रोटीन (antibodies) इसी प्रकार के प्रोटीन हैं। अनेक सूक्ष्मजीवों द्वारा निर्मित प्रतिजैविक (antibiotics), आविष (toxins) तथा अनेक पादपों में उपस्थित आविषकारी प्रोटीन उदाहरण अरंड में उपस्थित रिसिन – (ricin) भी इन के कुछ उदाहरण हैं।
- संकुचन एवं गति से सबंधित प्रोटीन (Contractile and motility proteins) :- अनेक कोशिकाओं एवं प्राणियों में उपस्थित एक्टिन एवं मायोसिन प्रोटीन उनके संकुचन एवं गति में सहायक होते हैं टयूबूलिन प्रोटीन गति में सहायक ( कशाभिका (flagella) एवं सिलिया (cilia) के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
अन्य (Other) :- उपरोक्त कार्यों के अलावा प्रोटीन ऊर्जा के भी स्रोत हैं तथा शारीरिक ऊर्जा का लगभग 12% अंश प्रोटीन से प्राप्त होता है ।”
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