गुजराती भाषा का आधुनिक साहित्य क्या है ? गुजराती भाषा के साहित्य का इतिहास gujarati language and literature history in hindi

By   July 6, 2021

gujarati language and literature history in hindi गुजराती भाषा का आधुनिक साहित्य क्या है ? गुजराती भाषा के साहित्य का इतिहास ?

गुजराती भाषा का आधुनिक साहित्य
भारत की अधिकांश अन्य भाषाओं की भांति गुजराती पर भी आधुनिक प्रवृत्तियों का प्रभाव पड़ा। मध्य युग गुजराती कवि कविता के क्षेत्र में अपने भक्तिगीतों और धार्मिक तथा पौराणिक विषयों पर अपनी कृतियों के माध्यम से एक समृद्ध पैतृक धन छोड़ गए थे। उन्होंने दर्शन और जीवन तथा प्रकृति से संबद्ध अन्य विषयों पर भी लिखा।
कविता के क्षेत्र में, कवि नर्मदा शेकर (1833-1886) के कविता को नया अर्थ, नए आयाम प्रदान किए। अलौकिकता और भक्ति प्रधान विषयों के स्थान पर मनुष्य और उसके वातावरण से संबद्ध यथार्थवादी विषय लिए जाने लगे और कवियों ने इन नए विषयों के साथ पूरा-पूरा न्याय करने के लिए अपनी प्रति का उपयोग किया। 19वीं शताब्दी केक अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ तक, कवतिा के क्षेत्र में नाना लाल, कांत, कलापी, बलवंय राय और नरसिंहाराव जैसे कवियों की कृतियों ने कविता को अद्वितीय रूप से विकसित किया।
जब राष्ट्रवाद के युग का समारंभ और विकास हुआ तो गुजरात पर गांधी के प्रभाव ने गुजराती साहिष्य के प्रत्येक क्षेत्र में नया उत्साह पैदा किया। इस प्रकार गुजराती कवियों को अभिव्यक्ति के नए मार्ग मिले। साथ ही उन्होंने कविता में उच्च दार्शनिकाता और कल्पना के मूल तत्त्वों को बनाए रखा। इस संदर्भ में उमाशंकर जोशी, सुंदर जी बेताई, और संदरम की कविताओं का काफी योगदान है। नए कवियों में राजेन्द्र शाह, निरंजन भगत, बाल मुकंद और बेनीभाई पुरोहित के नाम उल्लेखनीय हैं।
20वीं शती के उपन्यासकार ऐसे विषयों पर अधिक बल देते थे, जिनसे ज्यादा संख्या में पाठकों की प्रशंसा मिल चके। इन उपन्यासकारों में उल्लेखनीय हैं-रमण लाल देसाई, झवेरचंद मेघानी, मुंशी गुणवंत राय आचार्य, चूनीलाल शह, धूमकेतु पन्नालाल पटेल, मन्नूभाई पंचोली, चूनीलाल मेदिया, ईश्वर पेतलीकर, पीताम्बर पटेल और सारंग बारोट। मेघानी ने भूतकाल और उसके सांस्कृतिक वैभवों को प्रस्तुत किया, वर्तमान परिस्थितयों के साथ इसकी तुलना की। पन्नालाल जैसे उपन्यासकारों ने ग्रामीण जीवन और ग्रामीण चरित्रों का बड़ा सजीव विवरण दिया। पन्नालाल के उपन्यास ‘मलेला जीव‘ और ‘मानवी नीभवाई‘ का सदा के लिए महत्व रहेगा और यह अपने समय में बड़े लोकप्रिय सिद्ध हुए।
नाटक के क्षेत्र में पहले तो लेखकों पर प्राचीन संस्कृत शैली का प्रभाव पड़ा। लेकिन 19वीं शताब्दी के बाद के वर्षों में अंग्रेजी नाटक का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा और इसी के अधीन आधुनिक गुजराती नाटक ने विकसित होना शरू किया। रंगमंच को सार्वजनिक मनोरंजन का माध्यम बनाकर नाटक को बहुत सारे दर्शकों तक ले जाने के के. एम. मंशी और चन्द्रवदन मेहता जैसे लेखकों के प्रयास बड़े सफल सिद्ध हुए।
गुजराती में छोटी कहानियां 20वीं शताब्दी के प्रारंभ के बाद ही लिखी जाने लगीं। धूमकेतु, झवेरचंद मेघानी. रामनारायण पाठक, उमा शंकर जोशी, सुन्दरम्, गुलाबदासद्व पन्नालाल पटेल, जयंती दलाल, विनोदिनी नीलकंठ, ईश्वर पेतलीकर और चनीलाल मेदिया ने अलग-अलग विषय लेकर कहानिया लिखी जो मन की गहराइयों को छु जाती थीं। कुछ सच्ची कहानियां भी प्रकाशित हई जिनमें वास्तविक मानवीय मूलय दर्शाए गए थे। जी.बी. मावलंकर और अन्य लेखकों ने वास्तविक जीवन में ऐसी सच्ची घटनाएं देखीं जो कल्पना से भी कहीं अधिक विचित्र थीं और उन्होंने इन घटाना हो एक रोचक साहित्यिक रूप में अपने पाठकों तक पहुंचाया।