जीन गन क्या है ? gene gun method of gene transfer in hindi जीन का सीधा स्थानान्तरण (Direct gene transfer)

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gene gun method of gene transfer in hindi जीन का सीधा स्थानान्तरण (Direct gene transfer in hindi) जीन गन क्या है ?

जीन का सीधा स्थानान्तरण (Direct gene transfer)
पादपों में सीधे ही जीन स्थानान्तरण निम्न विधि द्वारा किया जा सकता है-
इलेक्ट्रोपोरेशन (Electroporation) : इलैक्ट्रिक फील्ड का उपयोग करते हुए इलैक्ट्रोपोरेशन द्वार आजकल भंगुर (fragile) कोशिकाओं में बाह्यजीन का स्थानान्तरण किया जाता है। लगभग 350Va उच्च वोल्टेज विद्युत को पुनर्योगज प्लाज्मिड युक्त प्रोटोप्लास्ट निलम्बन (suspension) पर प्रवाहित करते हैं। विद्युत पल्स (pulse) कोशिका भित्ति में बड़े छिद्र बनाने को प्रेरित करती हैं। इन्हीं छिद्रों का सहायता से बाह्य डीएनए प्रोटोप्लास्ट के अन्दर प्रवेश कर जाता है। एक ही महीने तक प्रोटोप्लास्ट की संवर्धित करते हैं। यह सूक्ष्म कैलस (micro callus) विकसित करते हैं जिन्हें केनामाइसिन नामक चयनित¬ मार्कर (selective marker) युक्त ठोस माध्यम पर संवर्धित करते हैं। लगभग 45 दिनों के पश्चात् रूपान्तरित कोशिकाओं की उपस्थिति के लिए विश्लेषण करते हैं।
जीन गन (Gene gun)
इस गन का आविष्कार स्टेनफोर्ड (Stanford) एवं साथियों ने 1987 में कार्नवेल यूनिवर्सिटी में किया था। ऐसे पादप जिनमें एग्रोबैक्टीरियम ट्यूमीफेशेन्स द्वारा जीन स्थानान्तरण में सफलता नहीं मिली जैसे एक बीजपत्री पादप, चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि इनमें जीन गन द्वारा बाह्य डीएनए को पादप कोशिका के अन्दर तीव्र गति से प्रविष्ट करवाने में पर्याप्त सफलता मिली है। साधारणतया द्विबीजपत्री पादपों में एग्रोबैक्टीरियम का प्रयोग होता है। परन्तु एक बीजपत्री पादपों में जीन स्थानान्तरण हेतु जीन गन कारगर सिद्ध हुई है।
1. पुनर्योगज डीएनए अणु की पहचान (Recognition of Recombinant DNA)
अन्तिम प्रक्रिया के दौरान वाहक निवेशित डीएनए युक्त कोशिकाओं की पहचान करते हैं। यह एन्टीबायोटिक प्रतिरोधकता द्वारा अथवा समांगी या विषमांगी प्रोब (homolgous or heterologous probe) डीएनए संकरण (DNA hybridçation) द्वारा किया जाता है।
बाह्य जीन के प्लाज्मिड में प्रवेश करवाने पर निम्न तीन प्रकार के अणु प्राप्त होते हैं।
(1) संकरित वाहक जिसमें बाह्य डीएनए निवेशित (insert) हो।
(2) वाहक जिसमें बाह्य डीएनए का प्रवेश नहीं हुआ हो।
(3) ऐसा अणु जिसमें वाहक अनुपस्थित हो तथा बाह्य डीएनए के अणु आपस में जुड़े हों।
इसमें प्रतिकृति स्थल अनुपस्थित होते हैं अतः यह जीवाणु में वृद्धि नहीं करते। ..
जिस जीवाणु के वाहक में निवेशित डीएनए उपस्थित हैं ऐसे संकरित प्लाज्मिड युक्त जीवाणु कोशिका की पहचान करते हैं। यह सुनिश्चित करते हैं कि जीवाणु कोशिका में वाहक उपस्थित हो तथा वाहक में निवेशित जीन मौजूद हो।
उदाहरणस्वरूप ल्यूसीन जैव संश्लेषित जीन -स्मऩ (Leucine biosynthesis gene) का यदि क्लोन किया गया है तो इसके लिए परपोषी जीवाणु जो ल्यूसीन जैवसंश्लेषण न कर सकता हो ( स्मन-) का प्रयोग करते हैं।
इस (स्मन-) माध्यम में मात्र वही जीवाणु कोशिकायें वृद्धि करेंगी जिनमें स्मऩ जीन उपस्थित होगा क्योंकि माध्यम ( स्मन-) का चयन किया गया है।
कॉलोनी का संकरण (Colony hybridçation)
जीवाणुओं की कोशिकाओं को ठोस आधार जैसे नाइट्रोसेल्युलोस या नायलोन फिल्टर पर रखकर रेप्लीकेट (तमचसपबंजम) करते हैं। अब इन जीवाणुओं का क्षार (alkali) के साथ लायसिस (lysed) करते हैं। इनके डीएनए विखण्डित (denature) हो जाते हैं। इन विखण्डित डीएनए को 32P-लेबल प्रोब (32p  labelled probe) के साथ संकरित करते हैं।
तत्पश्चात इन फिल्टर को ग्-किरणों की फिल्म पर अनावरित (expose) करते हैं। जीवाण कोशिकाओं से निकले डीएनए प्रोब के डीएनए के साथ संकरित हो जाते हैं जो एक्सरे फिल्म पर मल (original) जीवाणु के साथ एक रेखा (line) पर व्यवस्थित हो (align) हो जाते हैं जिससे इसकी पहचान संभव होती है। इस विधि से अनेक कॉलोनी को परख कर ऐसी कॉलोनी ज्ञात हो जाती है जिसमें पुनर्योगज प्लाज्मिड उपस्थित हों।
डॉट ब्लॉट तकनीक (Dot Blot technique)
इसके द्वारा भी संकरित डीएनए खण्डों युक्त जीवाणु की पहचान की जा सकती है-
ऊतकों में इच्छित डीएनए खण्डों अथवा mRNA की उपस्थिति को ज्ञात करने हेतु डॉट ब्लाट तकनीक का प्रयोग किया जाता है। सर्वप्रथम सम्पूर्ण डीएनए अथवा आरएनए को नाइट्रोसेल्युलोस पर विभिन्न बिन्दुओं के रूप में चस्पा कर दिया जाता है। तत्पश्चात इसे गर्म करके विकृति (denaturation) करके नाइट्रोसेल्युलोस पर एक सुत्रीय डीएनए के रूप में स्थिर (fix) कर दिया जाता है। इसे एकसूत्रीय रेडियोधमी प्रोब (prob) के विलयन में एनीलन (annnealing) के लिये रख दिया जाता है। इस स्थिति में प्रोब मात्र उन एक सूत्रीय डीएनए से जुड़ कर संकरित होता है जो इसके पूरक क्रम में व्यवस्थित होते हैं। संकरित बिन्दुओं (डॉट) को ऑटोरेडियोग्राफी द्वारा चिन्हित किया जाता है।
पॉलिमरेज चेन रिएक्शन (Polymerase chain reaction&PCR)
यह एक सरल एवं आधुनिक विधि है जिसमें विशिष्ट डी एन ए अनुक्रमों का प्रवर्धन (amplifiation) पाने अवस्था में करके डी एन ए संश्लेषण किया जाता है। इस विधि में डी एन ए निर्मित करने के लिए इसके क्लोनिंग की आवश्यकता नहीं रहती। इसके द्वारा क्लोनिंग रहित डी एन ए खण्डों को बड़ी मात्रा में संवर्धित किया जा सकता है। यह तकनीक केरी मुलिस (Kary Mullis) द्वारा विकसित की गयी ।
ऑटोरेडियोग्राफी (Autoradiography)
पुनर्योगज डीएनए व उच्च तकनीक के साथ ही आण्विक बॉयोलोजी के क्षेत्र में तीव्र गति से प्रगति हुई है।
ऑटोरेडियोग्राफी एक प्रकार की ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा कोशिका में उपस्थित रेडियोधर्मी आइसोटोप को चिन्हित करके पहचाना जा सकता है। इसके लिये कशिका या किसी भी अंग या सम्पूर्ण जीव को रेडियोधर्मी घोल से उपचारित करके इनमें रेडियोधर्मी पदार्थ का प्रवेश करवाकर उसे भी रेडियोधर्मी बना दिया जाता है। इसके लिये साधारणतया टिट्रियम (3H), कार्बन (14C) व फास्फोरस (32P) तथा सल्फर (35S) का उपयोग किया जाता है। इन रेडियोधर्मी कोशिकाओं अथवा ऊतकों के सेक्शन को फोटोग्राफिक इमल्शन से आवरित (coated) करके अंधेरे में कुछ महीनों के लिये रख दिया जाता है। यह इन इमल्शन को विकसित करने पर काले बिन्दु उभरते हैं। यह बिन्दु उस जगह को चिन्हित करते हैं जहाँ रेडियोधर्मी पदार्थ उपस्थित थे। ऊतकों के अभिरंजित सेक्शन को माइक्रोस्कोप द्वारा देखा जा सकता है। विभिन्न जीवाणुओं के अपचयन के लिये निम्न रेडियोधर्मी पदार्थों का उपयोग करते हैं।
डीएनए 3H-थाइमिडीन
आरएनए 3H -यूरिडीन
प्रोटीन 3H-अमीनो अम्ल
पोलिसैक्राइड 3H-मेनोज

जैल इलैक्ट्रोफोरेसिस (Gel Electrophoresis)
डीएनए, आरएनए व प्रोटीन के मिश्रण को इलैक्ट्रोफोरेसिस द्वारा अलग करके चिन्हित किया जाता है। इस विधि द्वारा डीएनए अथवा आरएनए के विभिन्न आकार के खण्ड विशिष्ट एन्जाइम “रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्ऐिज द्वारा अलग किये जा सकते हैं। इलैक्ट्रोफोरेसिस की प्रक्रिया छोटे डीएनए खण्ड प्राप्त करने हेतु पॉलीएक्रिलेमाइड जैली (polyacrylamid gel) अथवा बड़े खण्ड (20 Kb) प्राप्त करने के लिये एगरोज जैली (Agarose gel) का उपयोग करते हैं। न्यूक्लिक अम्ल की पहचान करने लिये जैली में इथीडियम ब्रोमाइड रंजक मिला दिया जाता है जो दो संलग्न क्षारों के बीच में बंध कर UV किरणों की उपस्थिति में लाल प्रतिदीप्ति उत्पन्न करके रेडियोचिन्हित न्यूक्लिक अम्लों को ऑटो रेडियोग्राफी द्वारा चिन्हित करता है। उदासीन pH पर विद्युत क्षेत्र उत्पन्न करने पर डीएनए व आरएनए पर ऋणात्मक आवेश होने से यह धनात्मक सिरे पर एकत्रित होते हैं।
सदर्न, नादन व वेस्टर्न ब्लॉटिंग तकनीक (Southern, Northern and Western Blotting Techniques)
सदर्न विधि द्वारा किसी भी डीएनए खण्ड पर उपस्थित क्षार अनुक्रमों को ज्ञात किया जा सकता है। सर्वप्रथम रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम द्वारा डीएनए को खण्डों में विभाजित करके इलैक्ट्रोफोरेसिस द्वारा विभिन्न आकार के खण्ड उत्पन्न करते हैं इन्हें जैल पर से गुजारा जाता है। जैल पर उपस्थित क्षार द्वारा डीएनए खण्ड विकृत (denatured) अर्थात अलग हो जाते हैं। इन्हें नाइट्रोसेल्यूलोजिक फिल्टर पेपर पर स्थानान्तरित करने पर डीएनए खण्ड अलग होकर सूखे ब्लोटिंग पेपर पर ऊपर आकर स्थायी रूप से चिपक जाते हैं।
इस फिल्टर पेपर (डीएनए खण्ड युक्त) को ज्ञात डीएनए अनुक्रम, जिन्हें प्रोब (probe) कहते है, से उपचारित करने पर यह उन स्थानों पर स्पष्ट पट्टिकायें (bands) उत्पन्न करते हैं जहाँ प्रोब के पूरक डीएनए अनुक्रम जैल में उपस्थित रहते हैं।
इस तकनीक द्वारा ट्रांस जीन (जीन अभियान्त्रिकी द्वारा स्थानान्तरित जीन) की उपस्थिति डीएनए फिंगर प्रिन्टिंग अथवा जीन मानचित्र ज्ञात किये जा सकते हैं।
नादर्न विधि में आरएनए खण्डों को माप के आधार पर पृथक किया जाता है जबकि वेस्टर्न ब्लोटिंग तकनीक द्वारा प्रोटीन्स को पृथक करके चिन्हित करते हैं।
डीएनए अनुक्रमण (DNA Sequencing)
डीएनए खण्ड पर उपस्थित क्षार अनुक्रमों को ज्ञात करने की विधि ही डीएनए अनुक्रमण कहलाती है। यह मेक्सम एवं गिल्बर्ट तथा सेंगर (1978) तकनीक द्वारा संभव होता है। सेगंर विधि में द्विलड़ीय डीएनए के 3′ या 5′ सिरे को रेडियोचिन्हित करके विकृत (denaturation) करने के पश्चात एकलड़ाय डीएनए मिश्रण प्राप्त कर लेते हैं तत्पश्चात डीएनए खण्डों को विशिष्ट क्षार विदलन (base specific cleavage) द्वारा ज्ञात किया जाता है।
प्रतिबंध खण्ड लम्बाई बहुरुपिता मानचित्र (Restriction Fragment Length Polymorphism Mapping)
रेस्ट्रिक्शन एन्डोन्यूक्लिएज एन्जाइम द्वारा डीएनए के विभिन्न आकार के पृथक हुए खण्डों का प्रतिबंधित खण्ड लम्बाई बहुरुपिता (RELP) कहते हैं। इन्हें पृथक करने के पश्चात इन्हें रेडियोचिन्हित डीएनए प्रोब (ज्ञात अनुक्रम) युक्त विलयन में रखते हैं।
प्रोब पूरक डीएनए से संकर (hybrid) बनाता है जिसे ऑटोरेडियोग्राफी द्वारा ज्ञात कर लिया जाता है। इस तरह त्म्स्च् द्वारा किसी भी जीन की पहचान करने के पश्चात पृथक किया जा सकता है।
कोशिका प्रभाजन (Cell Fractionation)
इस विधि द्वारा कोशिकीय झिल्लियों को यांत्रिक विधि द्वारा अलग कर लिया जाता है जिससे उप कोशिकीय अंग अपने-अपने भार (mass), सतह (surface) तथा विशिष्ट घनत्वानुसार अलग-अलग सतहों (surface) पर जलीय माध्यम में विलग (isolate) हो जाते हैं। इस विधि द्वारा सर्वप्रथम निम्न चार भाग प्राप्त होते हैं केन्द्रक, माइटोकोड्रियल, माइक्रोसोमीय (microsomic) तथा घुलनशील तत्व माइक्रोसोमीय भाग में प्रदव्यी जालिका (ER), गाल्गी सम्मिश्र तथा राइबोसोम इत्यादि उपस्थित रहते हैं।
पुनर्योगज डीएनए तकनीक के बहुआयामी उपयोग (Uses of multifaced DNA recombinant Technique)
1. इस तकनीक द्वारा ऐसे जीव जैसे बैक्टीरिया व अन्य तैयार किये जाते हैं जिनका इस्तेमाल जीन ट्रांसफर हेतु किया जाता
है।
2. जीन ट्रांसफर में बहुपयोगी व आर्थिक रूप से फायदेमंद जीन को चुना जाता है।
3. पुनर्योगज डीएनए तकनीक द्वारा जीन ट्रांसफर हेतु जो जीव तैयार किये जाते हैं वे फायदेमंद जीनध्जैविक अणु को संवर्धित करने में सक्षम होते हैं।
4. डीएनए व आरएनए के अनुक्रमों को शोध के लिए उपलब्ध करवाया जाता है।
5. जीवों में जिसमें पादप व जन्तु दोनों सम्मिलित हैं, के जीनोम में काट छांट पुनर्योगज डीएनए तकनीक द्वारा की जा सकती है।
6. इस तकनीक द्वारा आनुवंशिक बीमारियों में आनुवंशिक दोष को जीनथेरेपी अर्थात् उपचार द्वारा सही किया जा सकता है।
7. मानव व अन्य जीवों के सम्पूर्ण जीनोम के मानचित्र तैयार किये जा सकते हैं।
8. यह तकनीक आधारभूत, मेडिकल, एग्रीकल्चर, औद्योगिक व व्यापारिक स्तर के शोधों में सहायक हैं।
9. इसके द्वारा अनेक महत्वपूर्ण उत्पाद जैसे इन्सुलिन इत्यादि का उत्पादन किया जा सकता है।
10. कीट विरोधी फसलों का उत्पादन संभव है।
11. इसी तकनीक द्वारा इन्जीनियरिंग किये गये पराजीनी ट्रांसजीनी जीवों जैसे पराजीती पादप (बी टी कॉटन) एवं पराजीनी जन्तु (डॉली) इत्यादि का विकास एवं क्लोन तैयार किये गये हैं।
12. उच्च किस्म की विटामिन व अन्य पोषक तत्वों से भरपूर ट्रांसजीन तैयार किये जा रहे हैं इनमें विटामिन । युक्त सुनहरा चावल, कैल्शियम युक्त गाजर इत्यादि प्रमुख हैं।
13. विभिन्न बिमारियों जैसे कैन्सर, हीपेटाइटिस बी, एड्स इत्यादि के लिए प्रतिजनी प्रोटीन किये जा रहे हैं जो इनमें लाभप्रद साबित हो रहा है।
14. इन्टरफेरोन नामक दवा ट्रांसजीन पादप द्वारा उत्पन्न की जा रही है यह वायरस रोधी है।