मौलिक कर्तव्य क्या है | मौलिक कर्तव्य किसे कहते हैं अर्थ कौन कौनसे है लिस्ट नाम fundamental duties in hindi

By   October 3, 2020

fundamental duties in hindi मौलिक कर्तव्य क्या है | मौलिक कर्तव्य किसे कहते हैं अर्थ कौन कौनसे है लिस्ट नाम परिभाषा , महत्व विशेषता |

भारत: मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51 क)
1) संविधान, राष्ट्रीय झण्डा तथा राष्ट्रीय मान के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना।
2) राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की कदर करना एवं उसके आदर्शों का पालन करना।
3) भारत की प्रभुसत्ता, एकता और अखंडता को बनाए रखना तथा उसे सुरक्षित रखना।
4) देश की सुरक्षा करना और जब आवश्यकता पड़े राष्ट्र की सेवा में समर्पित भाव से शामिल होना।
5) सामान्य भाईचारा (तथा बहिनापा या भगिनीत्व) के प्रति सदभाव को उन्नत करना।
6) महिलाओं की प्रतिष्ठा का अनादर करने की प्रवृत्ति को नष्ट करना।
7) देश के मूल्यों और उसकी समृद्ध धरोहर को सुरक्षित रखना।
8) राष्ट्रीय पर्यावरण को सुरक्षित एवं उसमें सुधार करना ।
9) जीवित प्राणियों के लिए करूणा का भाव रखना।
10) विज्ञान, मानवतावाद तथा जांच एवं सुधार की भावना के ज्ञान के विकसित करना।
11) सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना तथा हिंसा को पनपने न देना।
12) व्यक्तिगत और सामूहिक कार्यकलापों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्ठता प्राप्त करने के प्रयास करना।

हेलसिंकी प्रक्रिया
हमें यह विशेष रूप से याद रखना चाहिए कि जब पश्चिमी देश, अमरीका, कनाडा एवं यू के तथा यूरोप के कम्यूनिष्ट गुट के देशो के बीच वातावरण में नरमी आने पर एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय घटना घटी, यह दौर 1970 के दशक का था। इसे यूरोप में सुरक्षा तथा सहयोग पर सम्मेलन के (एस सीई) के नाम से जाना जाता है। यह हेलसिंकी प्रक्रिया (यह नाम कैपिटल ऑफ फिनलैंड के बाद सामने आया, जिसका पहला आयोजन 1973 में हुआ था।) का महत्वपूर्ण राजनय विकास पर प्रभाव पड़ा जो शीत युद्ध के अंतिम दिनों के दौरान प्रमुख शक्तियों के संबंधों पर आधारित था। उस समय सोवियत संघ ने हेलसिंकी प्रक्रिया के तहत पश्चिमी सीमाओं को मान्यता प्रदान की और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसार अपने आप मानव अधिकारों का पालन करने के लिए सहमति जाहिर की। यह निर्णय जो पश्चिमी देशों की इच्छा के अनुसार था। इसके साथ ही सोवियत गुट के देशों का विखंडन होने से हेलिसंकी प्रक्रिया को व्यापक महत्व मिला। यद्यपि हेलसिंकी प्रक्रिया का प्राथमिक कार्य गूरोप में शांति और सुरक्षा के विकास के लिए सुव्यवस्थित संरचना स्थापित करना था साथ ही अभी तक जो समझौता बाध्यता की स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता था उसने संस्थानिक प्रकृति के द्वारा लोकतंत्रीय सरकारों के कार्यों को उन्नत करने के लिए महान शक्ति एवं संवेग का स्वयं स्रोत बना और पूरे विश्व में राजनीतिक बहुलवाद को शक्ति प्रदान की। इसके साथ ही जो रियायतें मिली उनसे मानव अधिकार आंदोलन का अंतर्राष्ट्रीयकरण हुआ यह कार्य सोवियत गुटों के देशों का निर्णायक सहमति से पूरा हुआ जो वास्तव में पश्चिमी देशों की ओर से प्राप्त हुआ था। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानव अधिकारों को प्रोत्साहन एवं उनका अंतर्राष्ट्रीयकरण में व्यापक प्रगति को देखा जा सकता है। यह रूप स्वयं लोकतांत्रिक सरकार एवं राजनीतिक बहुलवाद को स्वयं शक्ति से स्थापित करने में सहायक हुआ जिसका विकास पश्चिम के उदार. लोकतांत्रिक आदर्शों के माध्यम से समापन हुआ। इस स्थिति का वास्तविक उदगम शीत युद्ध से विजय प्राप्त करने के साथ माना जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव अधिकारों का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संवर्द्धन हुआ।

इसलिए यह जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि शीतयुद्ध के बाद अनेक राज्यों की भौतिक विदेश नीति में अधिपत्य की स्थिति प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय अखाड़ा की बाहरी परिधि बनी। इस स्थिति से ही मानव अधिकार उभर कर सामने आए हैं। परन्तु जिस व्यापकता से मानव अधिकारों का विकास हुआ है वह तो सामूहिक विकास की देन ही है। अर्थात् मानव अधिकार, मुक्त बाजार तथा लोकतंत्र की त्रिक, तिगड़ी जो विकसित पश्चिम से आर्थिक एवं अन्य सहायता की प्राप्ति पर आधारित हैं।

इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अध्येता विद्यार्थियों के ऐतिहासिक श्रृंखला को स्मरण करना चाहिए उसमें हेलिसंकी में रियायते देने से पहले सोवितय संघ ने अपने पैरो में पश्चिम को झुका दिया था। इसलिए इतिहास से ज्ञात होता है कि 70 का दशक पश्चिमी पूंजीपति देशों के लिए विशेषकर उनकी विदेश नीति को बहुत हानि उठानी पड़ी थी। उस समय ओ पी ई सी देशों ने तेलों की कीमतों में चार गुना वृद्धि कर दी थी। इससे यह भय हो गया था कि कहीं ‘‘तीसरे देशों का संगठीकरण‘‘ न हो जाए इसलिए अमरीका के नेतृत्व वाले गुट के देशों की विदेशनीति की स्थिति बहुत बिगड़ गई थी। उस स्थिति का विपरीत प्रभाव दक्षिण पूर्व एशिया में पड़ा था। इन कारणों से नरमी का मार्ग बन कर सामने आया। दसरी ओर सोवियत संघ ने इस स्थिति से लाभ उठाते हुए अबाध गति से अपने प्रभाव का विस्तार करने में जुट गए। क्रिसमिस के दिन 1979 में सोवियत संघ की विदेश नीति को भी उसी तरह से धक्का लगा जिस तरह से दूसरे गुट के सामने दिक्कते सामने आई थी। और कठिनाइयां तब तक चलती रही थी जब तक सोवियत संघ स्वयं बिखर नहीं गया। इस तरह से मानव अधिकारों का इतिहास आर्थिक सुविधाओं, दो शक्तियों की गुटबंदी एवं शक्ति प्रदर्शन के रहते हुए चला और उसका अंतर्राष्ट्रीयकरण रूप में स्थापना हुई।

व्यक्ति के विविध संकल्पना-निर्धारण
पश्चिमी उदारवाद का लंगर व्यक्तिवाद के खम्बे में बंधा हुआ है। यह एक राजनीतिक दर्शन है जो ‘‘व्यक्तिगत की भौतिकवादी संकल्पना‘‘ पर अपना केंद्र बिदु स्थापित करती है। इसीलिए कहते हैं कि यह शरीर की संवेदना होती है और इसका दूसरे व्यक्तिगत अथवा प्रकृति से कोई अंतः संबंध नहीं होता है फिर इसका क्या महत्व होता है इस संबंध में प्रो. भिक्षु पारेख का कहना है कि ‘‘जीवन, अपने ठीक समय में निरंतर गतिमान और स्वतंत्र रहती है एवं शरीर की अदृश्य संचलन की उच्चतम नैतिक मूल्यों को स्थापित करती है।‘‘ यह है हिंसा, संकुचन । अवरोध व प्रतिबंध, पीड़ा होना आदि ये सब हमेशा उनकी शारीरिक शर्तो में मानव अधिकारों पर प्रभाव डालती है। जैसे कि चिल्लाना, पुकारना, मारना, भुखमरी तथा इसी तरह की अन्य “शारीरिक‘‘ पीड़ाएं व्यक्ति के नैतिक भर्त्सना और मानव अधिकारों के उल्लंखन एवं उसके अतिक्रमण का प्रतिवाद करती है उसे रोकने के लिए उत्साहित करती है। परन्तु यदि यह देखता है कि एक बालक धन प्राप्त करने के लिए – अपनी योग्यता में वृद्धि करने के लिए कुंठित होता है अथवा एक अच्छे लाभकारी रोजगार के लिए हताश रहता है। इन समस्याओं में कोई भी व्यक्ति नैतिक समस्या का अवलोकन नहीं करेगा। इन सब के लिए उसी तरह से समाधान खोजने का प्रयास किया जायेगा। जिस तरह से मृत्यु को रोकने के लिए या उससे बचने के लिए किया जाता है। तीसरी दुनिया के विकासशील देश इस मानव अधिकारों की संकुचित संकल्पना पर आधारित सिद्धांत का कोई लाभ नहीं उठा सकते थे क्योंकि यह उस ‘‘व्यक्ति‘‘ जिसकी की अपनी समाज जिसमें वह रहता है और इस स्थिति में यह याद रखना बहुत ही लाभकारी है कि “व्यक्तिगत का संकुचित दृष्टिकोण‘‘ का उदगम सतरहवीं शताब्दी में आरंभ हुआ था। इसके बाद इसका विकास होता रहा। इसको स्थापित करने वाले अंग्रेज राजनीतिक दार्शनिक जॉन लोक थे। जॉन लोक 1689 का राइट्स ऑफ बिल का मसौदा तैयार करने में बहुत नजदीकी सहयोगी रहे थे। जिसमें व्यक्तिगत की महत्वाकांक्षाहीन के अधिकारों को निरस्त कर दिया था और इसे सम्राट यानि क्राउन के परमाधिकार में सीमित कर दिया गया था। इस प्रकार 1689 का बिल राइटस इस तरह के विषय को विश्व के सामने प्रस्तुत करने वाला यह पहला अधिकार बिल था। नियत प्रक्रिया की सामान्य विधि और बन्दी प्रत्यक्षीकरण की रिट (उपस्थापक) के अतिरिक्त सभी अधिकार मौजूद थे जिनको 1215 मैगनाकार्टा की तरह सम्राट ने संरक्षण दिया हुआ था। परन्तु सम्राट के परमाधिकार के विरूद्ध व्यक्ति के नागरिक एवं बाद में, राजनीतिक अधिकारों को इसमें संबद्ध करने का प्रयास किया गया था। यद्यपि पहले से चली आ रही इस दिशा की कारवाही जो व्यक्ति के अधिकारों के अर्थ और उसके विषय क्षेत्र को सीमित करते चले आ रहे थे। अतः आज की तथाकथित आधुनिक राजनीति से पहले व्यक्तिगत या व्यक्ति को बहुत धनी माना जाता था और इसके अर्थ भी बहुत ही कलिष्ट थे। प्राचीन एथेन्स से विश्वास किया जाता था कि ष्व्यक्ति वह होता है जिसके साथ भूमि और राजनीतिक अधिकार जुड़े होते हैं और यह दृष्टिकोण मध्य युग के आते आते यह माना जाने लगा कि एक शिल्पकार के औजारों को किसी शिल्पी से अलग नहीं किये जा सकते है या फिर उससे अलग नहीं माने जाते थे। उस समय में औजार उसके जैविक अंग माने जाते थे। जैसे कि किसी व्यक्ति के हाथ और पैर अंग होते हैं उसी तरह से यह औजारों को भी माना जाता था। (भिक्षु पारेख) हिन्दू इस बात में विश्वास करते हैं कि मनुष्य जन्म से ही एक जाति के सुनिश्चित घेरे में होता है अर्थात् जाति की कुप्रथा में माना जाता है कि मनुष्य की जाति जन्म से होती है। यह जाति प्रथा उसे उस तरह का समाज उपलब्ध कराता है जिसमें व्यक्ति जन्म लेता है। चीनी लोगों की भी बहुत जटिल संकल्पना होती है उनका मानना है कि मनुष्य एक परिवार में जन्म लेता है जिससे उसका संबंद्ध उसके पूर्वजों के साथ स्वयं ही बन जाते हैं और अपने जीवित संघ में बहुत सारे लोगों का मित्र एवं कई लोगों का शत्रु बन जाता है। इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से इन सब से अलग दृष्टि से नहीं देखा जा सकता है। इस तरह हमने एक व्यक्ति की संकल्पना का संक्षिप्त सार बताने का प्रयास किया है जो आपके लिए व्यक्ति के अधिकारों की संकल्पना को स्पष्ट करता है।

मानव अधिकार एवं अंतर्राष्ट्रीय राजनीति
इकाई की रूपरेखा
उद्देश्य
प्रस्तावना
मानव अधिकारों का महत्व
संकल्पना: विकास एवं अर्थ
प्राचीन यूनानी एवं स्टोइक दार्शनिक
आज का प्रमुख सिद्धांत
विकास के मील के पत्थर
विकास का अधिकार
व्यक्ति के विविध संकल्पना-निर्धारण
सार्वभौम बनाम सांस्कृतिक सापेक्षवाद
कारेल वास्क के अधिकारों की तीन पीढ़ियाँ
दो प्रसंविदा पत्रों में अंतर
संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष सम्मेलन
संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उपनिवेशीकरण
मानव अधिकार, विकास एवं लोकतंत्र
हेलसिंकी प्रक्रिया
भूमंडलीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में कार्यनीतिक परिवर्तन
मानव अधिकारों पर अमरीकी नीति
मानव अधिकारों पर वियना घोषणा की विशेषताएँ
मानव अधिकार संरक्षण के समक्ष उभरती चुनौतियाँ
सारांश
परिशिष्ट-प्
भारत: मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51क)
भारत: मौलिक अधिकार
भारत: राज्य के नीति निदेशक तत्व
परिशिष्ट-प्प्
कुछ उपयोगी पुस्तकें
बोध प्रश्नों के उत्तर

उद्देश्य
आज “मानव अधिकार‘‘ विषय बहुत ही प्रसिद्ध हो चुका है, इसके बहुत सारे आयाम हैं और प्रत्येक आयाम पर पूरे शोध पत्र लिखे जा सकते हैं तब ही उन आयामों के विवरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं क्योंकि इन आयामों में बहुत सारी सामग्री हैं जिसको यहाँ पर प्रस्तुत करने के लिए न तो स्थान ही और न उचित अवसर। फिर भी हम इस इकाई में मानव अधिकार तथा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति से संबंधित अनेक मुद्दों और विकसित परिघटनाओं पर चर्चा करेंगे। इस इकाई का अध्ययन करने के बाद आप:
ऽ संकल्पना की पहचान: मूल्यांकन, अर्थ एवं उसके महत्व को समझ सकेंगे,
ऽ विश्वव्यापी स्तर पर उठे या उठाए गए मुद्दों पर चर्चा कर सकेंगे,
ऽ विकास एवं लोकतंत्र के अनेक मुद्दों पर मानव अधिकारों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट कर सकेंगे, और
ऽ विकासशील देशों में मानव अधिकारों के संरक्षण में लगी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों की भूमिका का मूल्यांकन करने में समर्थ होंगे।