मेंढक का जनन और परिवर्द्धन क्या है ? frog reproduction and fertilization in hindi development

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frog reproduction and fertilization in hindi development मेंढक का जनन और परिवर्द्धन क्या है ? ?

 मेंढ़क का जनन और परिवर्द्धन
जनन वसंत में शाम के समय नदियों और ताल-तलैयों के किनारों से कर्कश वेसुरी ध्वनियों का समवेत गान दूर दूर तक गूंजता रहता है। ये हैं मेंढ़कों के ‘कन्सर्ट‘ जो वे अपनी लंबी सुषुप्तावस्था से जाग उठते ही आयोजित करते हैं।
इन ‘कन्सर्टो‘ में गला फाड़ने का काम सिर्फ नर करते हैं । टर्राते समय मेंढ़क के सिर के दोनों और बड़े बड़े फुलाव उभड़ आते हैं जो आवाज को और जोरदार बनाते हैं।
वसंत में इन ‘कन्सर्टों‘ के दौरान में ही मेंढ़क बच्चे पैदा करते हैं।
मेंढ़क की जननेंद्रियां – मादाओं में अंडाशय और नरों में वृषण – शरीर-गुहा में स्थित होती हैं (आकृति ६३)। अंडों से भरे हुए काले अंडाशय वसंत में अंडे देने से पहले विशेष बड़े होते हैं। वृषण सेम की शकल के छोटे छोटे पोले पिंड होते हैं।
वसंत में मादाएं अपने अंड-समूह पानी में छोड़ देती हैं। ये ऊपर से मछली के अंड-समूह-से लगते हैं। नर अपना शुक्राणुयुक्त वीर्य इन अंडों पर ढाल देते हैं। इस प्रकार पानी में संसेचन होता है। अंडों के पारदर्शी आवरण फूल जाते हैं और श्लेष्मिक , जैलीनुमा पिंडों में उनका समेकन होता है।
परिवर्द्धन अपने आवरण के अंदर अंडा भ्रूण (आकृति ६५) में परिवर्दि्धत होता है। आठ-दस दिन के अंदर अंदर (पानी के तापमान के अनुसार ) आवरण से बेंगची बाहर आती है। यह बेंगची वयस्क मेंढ़क से बिल्कुल भिन्न होती है। उसका लंबी पूंछ सहित तकुए की शकलवाला शरीर मेंढ़क की अपेक्षा मछली के फ्राई से अधिक मिलता-जुलता होता है। उसके सिर के दोनों ओर शाखादार बाह्य जल-श्वसनिकाएं होती हैं जिनके अन्त्रि पानी में निश्रित प्रॉक्सीजन उसके रक्त में प्रवेश करता है।
अपने जीवन के कुछ प्रारंभिक दिनों में बेंगची पानी में उगे पौधों का सहारा लिये रहती है। सिर की निचली सतह पर निकले हुए एक विशेप चूपक द्वारा वह पौधों में चिपकी रहती है। उस समय वेंगत्री के मुंह नहीं होता और वह अंडे के अवशिष्ट पोषक पदार्थों के सहारे जीवित रहती है। पर शीघ्र ही देंगची में नन्हा-सा मुंह परिवर्दि्धत होता है जो सन्दत शृंगीय जबड़ों से घिरा रहता है। अव वेंगची अपने जबड़ों से पानी के पौधों के टुकड़े कुतर कुतरकर स्वतंत्र रूप से अपनी जीविका चलाने लगती है।
वाह्य जल-श्वसनिकाएं देर तक नहीं रहतीं। मछली की ही तरह उनकी जगह अंदरूनी जल-श्वसनिकाओं सहित जल-श्वसनिका-छेद लेते हैं। इस समय वेंगची केवल ऊपर ऊपर से नहीं बल्कि उसकी अंदरूनी इंद्रियों की संरचना के कारण भी नन्ही-सी मछली के समान दिखाई देती है। मछली की तरह उसके भी जलश्वसनिकाएं , दो कक्षों वाला हृदय , रक्त-परिवहन का एक वृत्त और पार्शि्वक रेखा की इंद्रियां होती हैं। कुछ मछलियों की तरह उसके रज्जु भी होती है। यदि हमें मालूम न हो कि वेंगची मेंढ़क के अंडे से परिवर्दि्धत हुई है तो हम सहज ही उसे नन्ही-सी मछली ही समझ बैठेंगे।
बॅगची की यह शकल-सूरत लगभग एक महीने तक रहती है। फिर उसमें अंगों का परिवर्द्धन होने लगता है। पिछली टांगें पहले निकालती हैं और अगली बाद में। मुंह चैड़ा हो जाता है और बेंगची वनस्पतिरूप . भोजन के स्थान में प्राणिरूप भोजन लेने लगती है।
इस समय बैंगची अपने फुफ्फुसों से सांस लेने के लिए पानी की सतह पर उतराने लगती है। उसकी पूंछ घटती जाती है। अब नन्ही बेंगची मेंढ़क जैसी दिखाई देने लगती है। नन्हा-सा मेंढ़क पानी से बाहर निकलता है। केवल ठूंठ-सी पूंछ ही पहले उसके बेंगची होने की याद दिलाती है। फिर यह पूंछ भी झड़ती जाती है और आखिर उसका कोई नामोनिशान नहीं रहता।
इस प्रकार बेंगची की संरचना और आवश्यकताएं दोनों वयस्क मेंढ़क से भिन्न होती हैं । उसे दूसरे भोजन की आवश्यकता होती है, वह केवल पानी में से ऑक्सीजन का अवशोषण करती है और उसकी शकल काफी मात्रा में मछली से मिलती-जुलती होती है।
मेंढ़क का बच्चा तीन या चार वर्ष का होने पर ही वयस्क हो जाता है। इस अवस्था में मेंढ़क बच्चे पैदा करना शुरू करते हैं।
जल-स्थलचरों का मूल मेंढ़क के परिवर्द्धन के अध्ययन से हमें उन रीढ़धारियों का मूल समझने में सहायता मिलती है जिन्हें हम जल-स्थलचरों (ट्राइटन , भेक इत्यादि) के वर्ग में रखते हैं। इन सभी प्राणियों की जनन-क्रिया पानी में होती है। यहीं उनकी बेंगचियां रहती हैं जो बाह्य रूप से और अंदरूनी संरचना की दृष्टि से भी मछली के समान होती हैं। इस समानता के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जल-स्थलचरों और मछलियों के बीच रिश्ता जरूर है।
और सचमुच वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि प्राचीन जल-स्थलचरों की उत्पत्ति मछलियों से ही हुई है। फौसिली प्राणियों में उन्होंने पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियां खोज निकाली हैं जो जल-स्थलचरों के पूर्वज मानी जा सकती हैं (प्राकृति पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियों के सयुग्म मीन-पक्ष तल में रेंगने के अनुकूल थे और उनका कंकाल प्राचीन जल-स्थलचरों की टांगों के कंकाल से मिलता-जुलता था । इन मछलियों का वायवाशय , जिसे आम तौर पर फुफ्फुस कहते हैं, श्वसन के अनुकूल था । पानी में ऑक्सीजन के अभाव की स्थिति में पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियां वायुमंडलीय हवा में सांस कर सकती थीं।
पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियों का पानी से जमीन पर आगमन और जलस्थलचर प्राणियों में परिवर्द्धन निम्न प्रकार से हुआ- धरती पर जीवन के अति प्राचीन काल में, जब विभिन्न मछलियों के अलावा किन्हीं और रीढ़धारियों का अस्तित्व न था, मौसम अधिकाधिक सूखा होता गया। जिनमें पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियां रहती थीं ऐसे बहुत-से जलाशय छिछले होते गये और आखिर सूख गये। वायुमंडलीय हवा में सांस करने की क्षमता होने के कारण ये मछलियां बचे-खुचे जलाशयों की खोज में अपने अंगों के सहारे रेंगती हुई जलाशयों में से निकलकर जमीन पर पहुंचीं। उनमें से कुछ मछलियों को जमीन पर जरूरी भोजन मिल गया और वे वहीं रहने लगीं।
नयी जीवन-स्थितियों के अनुसार जमीन पर भी चलने के लिए अनुकूलन और आनंदी हवा के ट्वमन में अधिक पूर्णता पा गयी। सयुग्म मीन-पक्ष पृथक् हिम्मों वाली टांगों में परिणत हुए और वायवागय वास्तविक फुफ्फुसों में , जिन्होंने का-विका का स्थान लिया। फुफ्फुसों के परिवर्द्धन के साथ रक्त-परिवहन का एक और वृत्त तैयार हुया और हृदय में तीन कक्ष वन गये।
इस प्रकार एक बहुत लंबे समय में मछलियों से जल-स्थलचर प्राणी परिवर्दि्धत हुए। अब थे प्राणी जल में रह सकते हैं और थल में भी , पर उनका जीवन नियमतः पानी ही में शुरू होता है।
प्रश्न- १. जल-स्थलचरों और मछलियों की जनन-क्रिया में कौनसी विशेपताएं समान हैं ? २. बेंगची किस प्रकार मछली से मिलती-जुलती होती है ? ३. बेंगची और मछली की समानता की व्याख्या करो। ४. प्राचीन पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियों की विशेषताएं बतलाओ । ५. पिंडक-मीन-पक्षधारी मछलियों से जल-स्थलचर प्राणी किस प्रकार परिवर्दि्धत हुए?
व्यावहारिक अभ्यास – वसंत में मेंढ़क का संसेचित अंड-समूह ढूंढ लो और उसे घरेलू मत्स्यालय में रख दो। बेंगचियों के परिवर्द्धन का निरीक्षण करो।