विधि विज्ञान क्या है या फोरेंसिक प्रयोगशाला किसे कहते हैं न्यायिक विज्ञान का अर्थ forensic science in hindi

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forensic science in hindi meaning विधि विज्ञान क्या है या फोरेंसिक प्रयोगशाला किसे कहते हैं न्यायिक विज्ञान का अर्थ ?

(6) विधि विज्ञान (Forensic science)
पिछले कई दशकों से विधि विज्ञान की सहायता से अपराधियों को पकड़ना सहज हो गया है। इसमें डी एन ए अंगुलीछापी (DNA Finger printing) द्वारा किसी भी व्यक्ति के रक्त, ऊतक, नाखून, हड्डी, बाल, वीर्य, आदि से डीएनए को इलेक्ट्रोफोरोसेस की सहायता से अलग करके आण्विक प्रोब द्वारा विशिष्ट पुनरावृति डीएनए की पहचान कर लेते हैं। जो व्यक्ति विशिष्ट की पहचान होती है। बिछड़े बच्चों अथवा अवैध संतानों को माता पिता से मिलवाने में यह विधि बहुत सटीक है क्योंकि माता पिता का DNA बच्चे से 50% एक समान होता है। यह अपराध जगत में अपराधियों की पहचान फिंगर प्रिंटिंग से अचूक हो जाती है। भारत में हैदराबाद का CCMB केन्द्र (Centre for Cellular and Molecular Biology) में सर्वप्रथम डीएनए फिंगर प्रिंटिग का कार्य आरम्भ हुआ था।

(3) चिकित्सकीय ओषधियाँ (Therapeutic medicines)
बीमारी के उपचार हेतु ज्यादातर औषधियाँ जन्तुओं, जीवाणुओं अथवा पादपों को मार कर या, रसायनिक संश्लेषण द्वारा तैयार की जाती है। इन औषधियों को प्राप्त करने में कई परेशानियों थी जैसे जन्तुओं से हार्मोन की कम उपलब्धता तथा इनका अवांछित प्रभाव, जन्तुओं की कमी, अधिक मूल्य आदि। वर्तमान में सूक्ष्म जीवों से जैव प्रौद्योगिकी की तकनीकों का इस्तेमाल करके इन्टरफेरॉन तथा मानव वृद्धि हार्मोन बनाऐं जा रहे हैं जो कम खर्चे पर अधिक मात्रा में उपलब्ध हो जाते हैं, इनका कोई अवांछित प्रभाव भी नही होता है व यह काफी सुरक्षित होते हैं। परजीवी पादपों व परजीवी जन्तुओं से कुछ विशिष्ट प्रकार की दवाईयाँ संश्लेषित की जा रही है यह विधि आण्विक खेती आण्विक औषधीकरण (Molecular farming/moleculer pharming) कहलाती है। इस विधि द्वारा हैजे के टीके बनाये जा रहे हैं। सिन्टीडीन दवाई निर्मित की जा रही है जो अल्सर ठीक करने के काम आती है। इसी प्रकार 6-मर्केप्टो प्यूरीन थायोगुआनीन (6-Mercapto purine thioguanine) औषधी निर्मित की जा रही है जो कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जा रही है।

(4) आनुवांशिक रोगों का संशोधन व उपचार (Correcting and curing genetic diseases)
वर्तमान में जैव प्रौद्योगिकी का प्रयोग मानव के आनुवाशिक रोगों को ठीक करने में किया जा रहा है। मानव मे अनेक रोग अप्रभावी जीन के कारण समय रहते पता नही चल पाते हैं। अगर किन्ही जनकों के यहां एक दोष युक्त शिशु पैदा हो गया है तब अन्य सन्तानों में यह दोष ना हो उसके लिये साधारण व दोषयुक्त व्यक्ति के खून की जांच में उन जीन उत्पादों का पता लगाया जा सकता है जो अप्रभावी जीन बनाती है और गर्भावस्था में ही विशिष्ट तकनीकों द्वारा पता लगा सकते हैं कि रोग पैदा करने वाले जीन दोषयुक्त है अथवा ठीक है। अगर गर्भस्थ शिशु में रोगयुक्त जीन है तो ऐसी स्थिति में गर्भपात करवाया जा सकता है। कुछ आनुवांशिक बीमारियों का जीन अभियांत्रिकी मदद से भी उपचार संभव है।
(5) उर्वरता नियंत्रण तथा परखनली शिशु (Fertility control and test tube baby)
जनसंख्या नियंत्रण हेतु जैव प्रौद्योगिकी की मदद से कई सरल, सुरक्षित तथा लम्बे समय तक उपयोगी रहने वाली कई गर्भ निरोधक युक्तियाँ विकसित की है। इसके साथ ही उन दंपतियों के लिये जिनके बच्चे पैदा नहीं होते हैं उनके लिये परखनली शिशु पात्रे निषेचन व भ्रूण प्रत्यारोपण द्वारा बच्चे प्राप्त करने हेतु जैव प्रौद्योगिकी एक बेहतर अवसर प्रदान करता है।

(ठ) वानिकी पर जैव प्रौद्योगिका का प्रभाव (eff~ect of Biotechnology on forestry)
वन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मानव जाति को प्रभावित करते हैं। प्रत्यक्ष रूप से वह लकड़ी, गोंद, रबड, औषधियाँ, फल, फूल, सब्जी, अनाज, दालें, कागज की लुगदी, बांस, तारपीन का तेल, कत्था, सुपारी आदि प्रदान करते हैं व अप्रत्यक्ष रूप से वातावरण को स्वच्छ करते हैं तथा मानव के सौन्दर्य मान (aesthetic Ualue) को बढ़ाते हैं। विश्व मे घटती वनसंख्या एक चिंता का विषय है जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव पड़ रहा है तथा ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है। आज नये वनों को लगाने के लिये काफी अधिक संख्या में वृक्षं उगाने की आवश्यकता है तथा जो वन बचे हुये है उनके संरक्षण की आवश्यकता है। उपरोक्त बातों के लिये तेजी से वृद्धि कर सके ऐसे पादपों की जरूरत होगी। बीज से पौधा लगाने पर वृद्धि करने में कई साल लग जाते हैं किन्त का प्रौद्योगिकी क तकनीकों का इस्तेमाल करके पात्रे विधियों से वृक्षों की संख्या में बढ़ोतरी की जा रही है व उनके सरंक्षण (perservation), वरण (selection) तथा प्रजनन (breeding) कार्यों को सफलतापर्वक किया जा रहा है। वनों के पादपों को बड़े पैमाने पर लगाने के लिये निम्न दो विधियाँ काम में ली जा रही हैं-
(प) क्लोनीय प्रवर्धन (Clonal propagation)
(पप) कायिक भ्रूणजनन व संलिश्ट बीज (Somatic embryogenesis and Synthetic Seeds)
(प) क्लोनीय प्रवर्धन (Clonal propagation)
किसी भी पादप का क्लोन बनाना होता है तब उसके किसी भी भाग कर्तोतक (explant) लेकर उसे निर्जमित (sterilçe) किया जाता है। तत्पश्चात् उपयुक्त पोषपदार्थ पर रखकर प्ररोह बना लिये जाते हैं व इनका गुणन कर लिया जाता है। उपयुक्त पदार्थ की उपस्थिति में मूल उत्पन्न हो जाती है, पादपक निर्मित हो जाता है जिसे गमले में आगे वृद्धि करने के लिये स्थानांतरित कर दिया जाता है। इस विधि मे कैलस निर्माण को बढ़ावा नही देते हैं तथा साइटाकाइनिन की अधिक सान्द्रता का उपयोग करके प्ररोह व आक्सिन का उपयोग करके मूल उत्पन्न कर ली जाती है। जिससे शीघ्र ही पादपक तैयार हो जाते हैं जिन्हें कुछ समय तक गमले में लगाते हैं उस के पश्चात् यह खेत या वनों में उगाने के लिये तैयार हो जाते हैं।
क्रम जाति (species)
सं. कायिक भ्रूण (Somatic)
(embryogenesis) क्लोनीय प्रवर्धन (Clonal
(propagation)
1. शीशम (Delbergia latifolia)
2. एबीस (Abies- balsamia)
3. सिरस (AlbçZia/lebbek)
4. नीम (Azadirachta indica)
5. पाइनस (Pinus sp)
6. मोरपंखी (Biota orientalis)
7. प्रोसोपिस (Prosopis sp)
8. टेक्टोना ग्रेडिस (Tectona grandis)
9. रोहिड़ा (Tecomella undulata) कायिक भ्रूण
कायिक भ्रूण
कायिक भ्रूण
कायिक भ्रूण
कायिक भ्रूण
कायिक भ्रूण


— क्लोनीय प्रवर्धन
क्लोनीय प्रवर्धन




क्लोनीय प्रवर्धन
क्लोनीय प्रवर्धन
क्लोनीय प्रवर्धन
2. कायिक भ्रूणजनन व संशलिष्ट बीज (Somatic embryogenesis and Synthetic Seeds)
किसी पादप की बीज से फल बनने की प्रक्रिया में काफी अधिक समय लगता है तथा संतति पादप के लक्षण भी जनक के पूर्णरूप से समान नहीं होते हैं। प्रत्यक्ष कायिक भ्रूण, जनन कर्तोतकों (explant) पर सीधे भ्रूण की उत्पति द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं। इनके लक्षण पूर्णतः जनकों के समान ही होते हैं। अप्रत्यक्ष भ्रूण जनन द्वारा कायिक क्लोनीय विविधता उत्पन्न होती है। किन्तु इस विधि द्वारा जैवरिएक्टर में कोशिका निलम्बन (Cell Suspension) द्वारा अनगिनत भ्रूण बनाकर कृत्रिम बीज (synthetic seed) बनाने का मौका प्राप्त हो जाता है। कायिक भ्रूणों का उत्पादन यूक्लिप्टस, सेन्टेलम (चंदन), कॉमीफोरा,