JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

हिंदी माध्यम नोट्स

Categories: Uncategorized

संघवाद क्या है | संघवाद की अवधारणा किसे कहते है , परिभाषा की विशेषताएं प्रकार federalism in hindi

federalism in hindi definition what is meaning संघवाद क्या है | संघवाद की अवधारणा किसे कहते है , परिभाषा की विशेषताएं प्रकार निबन्ध लिखिए विशेषता नोट्स |

संघवाद : अवधारणा
संघ का क्या अर्थ है? संघ एक ऐसा राजनीतिक संगठन होता है जो अनेक राजव्यवस्थाओं (चवसपजपमे) को एक विशाल राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे समाहित कर लेता है, कि प्रत्येक इकाई का मूलभूत पृथक अस्तित्त्व भी बना रहे। संघ, सरकारों के दो स्तर – केन्द्र और राज्य की अवधारणा पर आधारित होता है। प्रत्येक के अलग कार्य होते हैं, तथा प्रत्येक स्वयं में स्वायत्त होता है। सभी सरकारी शक्तियों को संविधान द्वारा दोनों स्तर की सरकारों के मध्य विभाजित किया जाता है। स्वयं संविधान समस्त शक्तियों का आधार एवं स्रोत होता है। न तो राज्य सरकारें केन्द्र से शक्तियाँ प्राप्त करती हैं, और न केन्द्र सरकार राज्यों से। दोनों सरकारें अपनी शक्तियाँ संविधान से प्राप्त करती हैं, क्योंकि वह ही समस्त शक्तियों का स्रोत होता है। संविधान सर्वोच्च होता है, तथा उसकी सर्वोच्चता न्यायिक हस्तक्षेप के द्वारा बनाए रखी जाती है।

देश की संक्षिप्त रूपरेखा
यह समझने के लिए कि ऑस्ट्रेलिया ने संघीय संविधान क्यों अपनाया, देश के इतिहास की संक्षिप्त रूपरेखा का ज्ञान आवश्यक है। ऑस्ट्रेलिया के स्वतंत्र राष्ट्र बनने से पूर्व, वहाँ ब्रिटिश शासन के अधीन अनेक उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों में उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक भाग में बस्तियाँ बसने लगी थीं। आपने पढ़ा है कि इस महाद्वीप की खोज कैप्टेन कुक ने की थी। परन्तु, ऐसा विश्वास किया जाता है कि कैप्टेन मैथ्यू फिन्डर्स (डंजीमू थ्पदकमते) ने सर्वप्रथम 1802-03 में इसके लिए ‘‘ऑस्ट्रेलिया‘‘ शब्द का प्रयोग किया। इसका अर्थ है ‘‘दक्षिणी भूमि‘‘ तस्मानिया में प्रथम बस्ती 1803 में, क्वीन्सलैण्ड में 1824 मेंय पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में 1829 में, विक्टोरिया में 1835 में, तथा दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में 1836 में बसाई गई। अंग्रेजों ने इन बस्तियों को बसाया था, और इनका अंग्रेजी उपनिवेशों के रूप में ही विकास हुआ। ऑस्ट्रेलियावासी अपने महाद्वीप का विकास अपने ही ढंग से करना चाहते थे, अतः उन्होंने, आगे चलकर राष्ट्रव्यापी ‘‘श्वेत ऑस्ट्रेलिया‘‘ नीति अपनाई। उन्होंने अश्वेत आप्रवासियों पर प्रतिबंध लगा दिए। अतः एशिया के लोग वहाँ जाकर नहीं बस सके। जब ऑस्ट्रेलिया एक स्वतन्त्र राष्ट्र, तथा एक संघ बना, उस समय तक वहाँ विविधतापूर्ण समाज नहीं था। वास्तव में उस समय ऑस्ट्रेलिया के औपनिवेशिक समाज में एक ही संस्कृति, एक ही भाषा तथा समान मूल की प्रधानता थी।

ऑस्ट्रेलिया में संघीय व्यवस्था क्यों?
प्रश्न यह उठता है कि छह स्वशासी राज्यों ने, एकात्मक राज्य का विकास न करके, संघ स्थापित करने का निर्णय क्यों किया, यद्यपि वे सभी ब्रिटिश समाज की संतति थे। यहाँ यह स्मरण रखना आवश्यक है चाहे ऑस्ट्रेलिया में विविधतापूर्ण समाज नहीं था, फिर भी अलग-अलग उपनिवेशों की विधायिकाओं में पृथक संस्कृति, नेतृत्त्व, मुद्दों तथा स्थानीय भावना का विकास हो रहा था। विभिन्न उपनिवेशों का एक दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं थाय उन्होंने सामूहिक रूप से ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष भी नहीं किया था। उनमें एक सबसे प्रमुख समानता यह थी कि ब्रिटेन के साथ उनके शक्तिशाली बाह्य सम्बन्ध थे। उनकी पृथक सीमा शुल्क व्यवस्थाएँ थीं, तथा उनके मध्य आर्थिक प्रतिद्वन्दिता का प्रभुत्त्व था।

संघ की स्थापना को प्रोत्साहित करने वाले तत्त्व
कुछ विशेष मामलों में पृथकता तथा आर्थिक प्रतिद्वन्दिता के बावजूद उपनिवेशों में कुछ समान तत्त्व थे जिन्होंने संघ की स्थापना को प्रोत्साहन दिया। प्रथम, यह कि यह विश्वास विकसित हो गया था कि बाहरी आक्रमण के विरुद्ध ऑस्ट्रेलिया की रक्षा और सुरक्षा एक केन्द्रीय सरकार ही कर सकती थी। उस समय फ्रांस तथा जर्मनी दोनों की साम्राज्यवादी विकास की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए उपनिवेशों का अपनी सांझी सुरक्षा के लिए इकट्ठा होना स्वाभाविक था।

दूसरे, ऑस्ट्रेलिया में संघीय संरचना की स्थापना के प्रमुख कारण आर्थिक थे। यह इच्छा थी कि सीमा शुल्क के सम्बन्ध में, तथा अश्वेतों के आप्रवास पर प्रतिबंध के सन्दर्भ में सामान्य कानून बनाया जाए। उपनिवेश अपना विकास तीव्र गति से चाहते थे, परन्तु उन्होंने अनुभव किया कि नए देश में अलगअलग रेल व्यवस्था चलाना न केवल महंगा था, वरन् विकास के लिए कठिनाई भी उत्पन्न हो रही थी। वाणिज्य में गिरावट के कारण 1890 के दशक में आर्थिक प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गए थे। अतः उपनिवेश यह चाहते थे कि यदि वे इकट्ठे हो जाएँ तो उनके मध्य सीमा शुल्क सम्बन्धी रुकावटें समाप्त हो जाएगी। उपनिवेशों ने यह निश्चय किया कि संघ की स्थापना करने से उपनिवेशों के मध्य मुक्त व्यापार हो सकेगा।

आर्थिक तत्त्वों के अतिरिक्त, एक अन्य कारक भी था जिसको ध्यान में रखना होगा। वह था उपनिवेशों में नवजात राष्ट्रवाद। संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में संघ की स्थापना के बाद ही राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय भावना का प्रभावी उदय हुआ था, परन्तु, ऑस्ट्रेलिया में तो राष्ट्रवाद संघ की स्थापना में सहायक एक तत्त्व, या कारक, सिद्ध हुआ। इस सब के बावजूद, उपनिवेशों में कुछ मतभेद थे तथा कुछ पारस्परिक शंकाएँ थीं। फिर भी एक इतना सशक्त तत्त्व था जिसने सब उपनिवेशों को जोड़ दिया। वह थी जातीय एकरूपता। ऑस्ट्रेलिया में संघ की स्थापना से पूर्व, जो तत्त्व विद्यमान थे और जो सम्बन्ध की स्थापना में सहायक सिद्ध हुए, वे थे रू जातीय एकता, भाषाई एकता, एक समान परम्पराएँ, एक जैसी संस्थाएँ, काफी हद तक धर्म की समानता, सांझे खेल इत्यादि। इन्होंने देश के राजनीतिक जीवन में एकता उत्पन्न की।

अतः एक ओर सशक्त राष्ट्रीयता की तीव्र भावना थी, तो दूसरी ओर राज्यों की अपनी पहचान, उनके अधिकारों तथा स्वतन्त्रता की माँग भी थी। इन दोनों प्रकार की माँगों में संघीय सौदेबाजी के द्वारा समन्वय स्थापित किया गया। परिणामस्वरूप, ऑस्ट्रेलिया में अनेक संघीय संस्थाओं की स्थापना हुई। इस प्रकार, चाहे ऑस्ट्रेलियावासी अंग्रेजों की संतति थे, फिर भी उन्होंने एकात्मक सरकार को न अपनाकर, संघीय व्यवस्था स्थापित की।

बोध प्रश्न 1
नोट : क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) संघवाद से आप क्या समझते हैं?
2) ऑस्ट्रेलिया के राज्यों ने संघीय व्यवस्था क्यों अपनाई। स्पष्ट कीजिए।

बोध प्रश्नों के उत्तर
बोध प्रश्न 1
1. एक राजनीतिक संगठन जिसमें अनेक इकाइयों का एकीकरण किया जाता है। यह राज्य या प्रान्त स्वतन्त्र नहीं रहते, स्वायत्त होते हैं। समूचा देश संप्रभु होता है। राज्यों और केन्द्र के मध्य शक्तियों का विभाजन संविधान के द्वारा किया जाता है।
2. अन्य विविधतापूर्ण समाजों की भाँति ऑस्ट्रेलियाई राज्यों ने भी संघ बनाने का निर्णय किया ताकि रक्षा व्यवस्था, संचार साधनों और राज्यों के मध्य मुक्त व्यापार का बेहतर प्रबंध हो सके।
1. संविधान ने केन्द्र को जो शक्तियाँ दी उनमें प्रमुख थीं : प्रतिरक्षा, विदेशी व्यापार, आप्रवास, डाक और तार इत्यादि। शेष सभी अलिखित शक्तियाँ राज्यों के पास रहीं।
2. राज्यों को सीमा शुल्क तथा उत्पाद कर, मुद्रा, तथा सशस्त्र सेनाओं के सम्बन्ध में कोई अधिकार नहीं दिए गए।

ऑस्ट्रेलिया की संघीय संरचना
राज्य संगठन के एक मूल तत्त्व के रूप में संघवाद ऑस्ट्रेलिया के संविधान की प्रस्तावना (च्तमंउइसम) में ही वर्णित है। प्रस्तावना में पाँच उपनिवेशों- न्यू साउथ वेल्स, विक्टोरिया, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, क्वीन्सलैण्ड एवं तस्मानिया — के उस समझौते का उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने भंग न हो सकने वाले (अविभाज्य) ऑस्ट्रेलियाई संघ (पदकपेवसनइसम थ्मकमतंस ब्वउउवदूमंसजी) में शामिल होने का निर्णय किया। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया बाद में संघ में शामिल हुआ।

विशिष्टताएँ
ऑस्ट्रेलिया ने संघवाद की सभी प्रमुख विशेषताओं को अपनाया। यह थीं : एक लिखित संविधान, केन्द्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन, तथा संवैधानिक एवं न्यायिक सर्वोच्चता। ऑस्ट्रेलिया के संघ का निर्माण सरकार की तीन-स्तरीय व्यवस्था के आधार पर हुआ। राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों का प्रबंध केन्द्र सरकार का उत्तरदायित्त्व है। छह राज्यों और उनकी विधायिकाओं को राज्य स्तर पर अनेक विषयों का प्रबंध सौंपा गया है जो कि केन्द्र के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। इनके अतिरिक्त नौ सौ स्थानीय निकाय (स्थानीय सरकारे) शहरों, कस्बों, ग्रामों, इत्यादि से सम्बन्धित स्थानीय प्रकृति के विषयों का प्रबंध करते हैं।

शक्तियों का विभाजन
ऑस्ट्रेलिया के संविधान ने केन्द्र (अर्थात् संघ) सरकार तथा राज्यों की सरकारों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया है। शक्ति विभाजन के सन्दर्भ में ऑस्ट्रेलियाई संघ में अमरीकी व्यवस्था के अनुरूप प्रावधान किया गया है, कनाडा के अनुरूप नहीं। संघ को जो शक्तियाँ प्राप्त हैं उनका उल्लेख अनुच्छेद 51 की 40 धाराओं (ेनइ-ेमबजपवदे) में किया गया है। केन्द्र की शक्तियों में विदेश विभाग, प्रतिरक्षा, आप्रवास, विदेश व्यापार तथा वाणिज्य, डाक और तार सेवाएँ, मुद्रा तथा बैंकिंग शामिल हैं। अनुच्छेद 51 में केन्द्र सरकार की शक्तियों का स्पष्ट एवं विस्तृत उल्लेख किया गया है।

ऑस्ट्रेलिया के राज्य रू अपने संविधान
ऑस्ट्रेलिया के सभी राज्यों के अपने अपने संविधान हैं, और उन्हें अधिकार है कि वे उनमें संशोधन कर सकते हैं। संघ सरकार का उन पर, इस सम्बन्ध में, कोई भी नियन्त्रण नहीं है। राज्य पहले से थे, संघ सरकार बाद में स्थापित हुई। अतः राज्यों के संविधानों, उनकी संसदों, तथा कार्यकारी अधिकारियों को पूर्ववत् बने रहने दिया गया। केवल उनमें वहीं सीमित परिवर्तन किए गए जिनका प्रावधान संघीय संविधान के अनुच्छेद 106 और 107 में किया गया है। वहाँ राज्यों के विषयों की अलग कोई ‘राज्य सूची‘ नहीं है। जो शक्तियाँ संघ को दी गई हैं उनको छोड़ शेष सभी अधिकार राज्यों के हैं, परन्तु उन्हें सूचीबद्ध नहीं किया गया है। अतः, अमेरिका की तरह समस्त अवशेष शक्तियाँ राज्यों के क्षेत्राधिकार में हैं। इसका अर्थ हुआ कि जो शक्तियाँ संघ की नहीं हैं, वे सब राज्यों की हैं।

 विधायी शक्तियों के क्षेत्र अनन्य नहीं
इसके अतिरिक्त, संघ और राज्यों की शक्तियाँ अनन्य (मगबसनेपअम) नहीं हैं। उन अधिकारों को छोड़ कर जो केन्द्र सरकार के (अनन्य) एकाधिकार में हैं, या जो राज्यों को नहीं दिए गए हैं, शेष सभी वे शक्तियाँ जो अनुच्छेद 51 में संघ की संसद के विधायी क्षेत्राधिकार में हैं, उन पर राज्यों और केन्द्र का समवर्ती (बवदबनततमदज) अधिकार है।

किसी विषय पर निर्मित संघ और राज्य के कानूनों पर मतभेद, या संघर्ष, होने की स्थिति में संघीय कानून ही लागू होता है। अनुच्छेद 109 के अनुसार, जब किसी राज्य का कानून संघीय कानून के समरूप नहीं है, तब जहाँ तक उनमें समरूपता नहीं है, राज्य का कानून लागू नहीं होगा, केन्द्र का कानून ही लागू किया जाएगा।

कार्यों में संघर्ष असामान्य बात है, क्योंकि उच्च न्यायालय दोनों सरकारों के अधिकारों को सुरक्षित । रखता है। अनुच्छेद 51 में उल्लिखित शक्तियाँ ब्रिटिश उत्तर अमरीकी कानून के अनुच्छेद 91 में वर्णित शक्तियों जैसी ही हैं। अमेरिका की अपेक्षा ऑस्ट्रेलिया की संघीय शक्तियाँ अधिक व्यापक हैं। आपने इकाई संख्या 7 में पढ़ा है कि राज्यों के अतिरिक्त 3 केन्द्र शासित क्षेत्र भी हैं जिनका प्रशासन प्रत्यक्ष रूप से संसद सरकार चलाती है। इनमें राजधानी क्षेत्र शामिल है।

 राज्यों की विधायी शक्तियों पर प्रतिबंध
संविधान ने कुछ शक्तियाँ राज्यों से पूरी तरह लेकर केन्द्र सरकार को सौंप दी थीं। संघ में शामिल होने से पूर्व, राज्यों की जो असीमित शक्तियाँ थीं उनमें से कुछ से उन्हें वंचित होना पड़ा था। कुछ क्षेत्रों में कोई कार्य करने पर राज्यों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस प्रकार जो शक्तियाँ संघ सरकार को सौंपी गई थीं, वे उसकी अनन्य शक्तियाँ हैं।

सीमा शुल्क तथा उत्पाद कर लगाना
इन अनन्य शक्तियों में महत्त्वपूर्ण हैं सीमा शुल्क का निर्धारण करना तथा उत्पाद कर (मÛबपेम कनजल) लगाना। इनका प्रावधान अनुच्छेद 88, 90, 91 तथा 92 में किया गया है। संघ सरकार स्थापित करने की जो योजना बनाई गई थी, सीमा शुल्क का अधिकार केन्द्र को देना उसका प्रमुख अंग था। इस प्रकार व्यापार के क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया को एक इकाई के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

 भुगतान की वैध मुद्रा (Legal Tender)
मुद्रा जारी करना, तथा यह निश्चित करना कि ऋण भुगतान की वैध मुद्रा (समहंस जमदकमत) क्या होगी यह संघ सरकार के अनन्य क्षेत्राधिकार (मÛबसनेपअम रनतपेपकपबजपवद) में है। अनुच्छेद 52 (पप) तथा 69 ने डाक घरों, प्रतिरक्षा तथा संगरोध (संक्रामक रोगियों को अलग रखना) विभाग जैसे सार्वजनिक सेवा विभाग भी राज्यों के क्षेत्राधिकार के बाहर रखे गए।

सशस्त्र सैन्यबलों का रखरखाव
अन्य संघात्मक देशों की भाँति, ऑस्ट्रेलिया में भी, संघीय संसद की अनुमति के बिना, राज्य सरकारों को अपने सशस्त्र सैन्य बल रखने का अधिकार नहीं है। प्रतिरक्षा (कममिदबम) संघ सरकार की अनन्य शक्ति मानी जा सकती है। केन्द्र सरकार, राज्यों की सलाह के बिना, विदेशों की सरकारों के साथ राजनयिक तथा वाणिज्य-सम्बन्धी समझौते कर सकती है। केन्द्र ही विदेशों में ऑस्ट्रेलिया के राजदूतों तथा अन्य राजनयिकों को नियुक्त करता है, और वह ही अन्य देशों से राजनयिकों को स्वीकार करता है।

केन्द्र की अन्य अनन्य शक्तियाँ
संविधान के उपरोक्त प्रावधान जिनके द्वारा कुछ विषय पूरी तरह राज्यों के अधिकार से लेकर केन्द्र को दे दिए गए थे, उनके अतिरिक्त कुछ ऐसे अन्य प्रावधान भी हैं जो राज्यों की शक्तियों को सीमित करते हैं। उदाहरण के लिए अनुच्छेद 114 में राज्यों को निर्देश है कि वे संघ सरकार की किसी सम्पत्ति पर कोई कर नहीं लगा सकेंगे।

अनुच्छेद 92 में राज्यों पर और भी कठोर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अनुसार, राज्यों के आपसी सम्बन्ध तथा उनके पारस्परिक व्यापार एवं वाणिज्य पूरी तरह स्वतन्त्र (मुक्त) होंगे। इस प्रावधान का उद्देश्य है कि ऑस्ट्रेलिया के समस्त प्रदेश में व्यापार और वाणिज्य मुक्त रूप से चले तथा उनके बीच सीमा शुल्क जैसी कोई बाधा न हो। परन्तु इस प्रावधान का यह परिणाम भी हुआ है कि कुछ विषयों जैसे, बुनियादी वस्तुओं के उत्पादन, उनके मूल्य निर्धारण तथा उनकी बिक्री पर और सड़क यातायात एवं उद्योगों पर राज्य सरकारों का कोई अधिकार नहीं है।

बोध प्रश्न 3
नोट : क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) ऑस्ट्रेलियाई संघ में केन्द्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन किस प्रकार किया गया है?
2) ऑस्ट्रेलिया में राज्यों की विधायी शक्तियों पर क्या प्रतिबंध हैं?

नए राज्यों की स्थापना
संविधान के अध्याय VI के अनुच्छेद 121, 122, 123 और 124 में नए राज्यों की स्थापना की व्यवस्था है। नए राज्यों की स्थापना (या उनके निर्माण) करने का अधिकार संघ की संसद के पास है। वह नए राज्यों का निर्माण उन शर्तों पर करती है जिन्हें वह उचित समझे। संविधान में नए राज्यों के प्रवेश (admision) और स्थापना (establisment) दोनों की व्यवस्था है। अर्थात, ऐसे राजनीतिक रूप से संगठित समुदाय जो संघीय व्यवस्था के बाहर हों, (चाहे संघीय क्षेत्रों के रूप में अथवा अन्यथा), को प्रवेश दिया जा सकता है। साथ ही, बिल्कुल नई राजनीतिक इकाइयों की स्थापना भी की जा सकती है।

यदि किसी नए राज्य की स्थापना, किसी वर्तमान् राज्य के कुछ भाग को अलग करके, या दो अथवा अधिक राज्यों को मिलाकर, अथवा विभिन्न राज्यों के कुछ भागों को मिलाकर करनी हो, तब यह अनिवार्य है कि सम्बद्ध राज्य की विधायिका (संसद) अथवा विधायिकाओं की स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर ली जाए। समय-समय पर कुछ राज्यों के कुछ भागों में नए राज्यों की माँग उठी और उसके लिए आंदोलन किए गए। ऐसा विशेषकर न्यू साऊथ वेल्स और क्वीन्सलैण्ड के भागों में हुआ। परन्तु अभी तक किसी नए राज्य की स्थापना नहीं हुई, क्योंकि किसी राज्य की संसद से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह स्वयं अपने राज्य के विभाजन का समर्थन करेगी। अतः नए राज्यों के प्रावधान के बावजूद ऑस्ट्रेलिया में अभी तक किसी नए राज्य का निर्माण नहीं हुआ है।

 पार्थक्य की अनुमति नहीं
ऑस्ट्रेलिया के संविधान में किसी राज्य के संघ से अलग होने का कोई प्रावधान नहीं है। वास्तव में संविधान कानून की प्रस्तावना में यह स्पष्ट कहा गया है कि राज्यों के लोगों ने एक ‘अखंडनीय संघ‘ की स्थापना का निर्णय किया। ऑस्ट्रेलिया संघ को भंग नहीं किया जा सकता है। यह स्थायी है। एक बार संघ में शामिल होने के बाद कोई भी राज्य पृथक नहीं हो सकता है। राज्यों में स्वःशासन, अथवा उनकी स्वायत्तता, के अधिकार को संविधान ने सुरक्षा प्रदान की है। संविधान के संशोधन की प्रक्रिया की व्यवस्था अनुच्छेद 129 में की गई है। परन्तु, इसमें (संशोधन के द्वारा भी) संघ से राज्यों के पार्थक्य कोई प्रावधान नहीं है।

 राज्यों के अधिकारों तथा हितों की सुरक्षा
संघात्मक देशों में राज्यों के अधिकार और हित उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं जितने कि केन्द्र सरकार के। संघ के उचित संचालन के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है कि राज्य सरकारों के स्वतन्त्र क्षेत्राधिकार का संविधान में प्रावधान मात्र कर दिया जाए। परन्तु संघीय व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन के लिए आवश्यक है कि संविधान में जो अधिकार राज्यों को दिए गए हैं उनकी सुरक्षा की समुचित गारंटी दी जाए। यह सुरक्षा स्वयं संविधान के द्वारा दी जानी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया के संविधान में अनुच्छेद 106 और 107 राज्यों के संविधानों एवं शक्तियों की उस सीमा तक सुरक्षा की व्यवस्था करते हैं जहाँ तक वे संघीय संविधान को प्रभावित नहीं करते।

 प्रतिनिधित्त्व के द्वारा सुरक्षा
संघीय संसद (ब्वउउवदूमंसजी च्ंतसपंउमदज) में राज्यों के हितों की रक्षा उनके प्रतिनिधियों के द्वारा की जाती है। संसद के निचले सदन, अर्थात् प्रतिनिधि सदन में प्रत्येक राज्य का प्रतिनिधित्व (अनुच्छेद 24) उसकी जनसंख्या के अनुपात में होता है। द्वितीय सदन, अर्थात् सीनेट की परिकल्पना ‘‘राज्यों के सदन‘‘ के रूप में की गई थी। उसमें प्रत्येक राज्य का प्रतिनिधित्त्व (अमेरिका की सीनेट की भाँति) बराबरी के आधार पर होता है। अतः, वर्तमान में प्रत्येक राज्य 12 सीनेटरों का चुनाव करता है, (देखे इकाई 8)।

आन्तरिक गड़बड़ीध् बाहरी आक्रमण के विरुद्ध राज्यों की सुरक्षा
संघीय सरकार का यह कर्तव्य है कि वह, संघ के अंगों के रूप में, आन्तरिक गड़बड़ी तथा बाहरी आक्रमण के विरुद्ध राज्यों की रक्षा करे। अनुच्छेद 119 के अनुसार संघ सरकार से अपेक्षा है कि वह ‘‘प्रत्येक राज्य की आक्रमण के विरुद्ध, तथा राज्य की कार्यकारी सरकार की प्रार्थना पर, आंतरिक हिंसा के विरुद्ध‘‘, रक्षा करेगी।

अन्य क्षेत्र
इस सब के अतिरिक्त संघ सरकार पर प्रतिबंध है कि वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेगी जो राज्य के हितों के मार्ग में बाधक होगी। संघ सरकार अन्तर्राज्यीय व्यापार और वाणिज्य की अपनी शक्ति का प्रयोग करते समय ‘‘राज्यों और वहाँ के निवासियों के उस अधिकार को कम नहीं करेगी‘‘ जिसके द्वारा वे सिंचाई अथवा अन्य कार्यों के लिए नदियों के जल का औचित्यपूर्ण उपयोग करते हैं। अनुच्छेद 114 के अनुसार केन्द्र सरकार राज्यों की सम्पत्ति पर कोई कर नहीं लगा सकती है। संघ के कर कानून (जंग सूं) विभिन्न राज्यों, अथवा राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों के मध्य भेदभाव नहीं कर सकते हैं (अनुच्छेद 51 (पप))। राजस्व कानूनों और व्यापार एवं वाणिज्य सम्बन्धी कानूनों को ‘‘एक राज्य और दूसरे राज्य अथवा एक राज्य के एक भाग और दूसरे राज्य के किसी भाग‘‘ के बीच भेदभाव करने का अधिकार नहीं है। इन प्रावधानों से न केवल राज्यों के अधिकार और हित सुरक्षित रहते हैं, वरन् उनसे विभिन्न राज्यों की संवैधानिक समानता भी सुनिश्चित होती है।
बोध प्रश्न 4
नोट : क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) क्या ऑस्ट्रेलिया के राज्यों को पार्थक्य का अधिकार प्राप्त है?
2) ऑस्ट्रेलिया की संघीय व्यवस्था में राज्यों के अधिकार किस प्रकार सुरक्षित किए जाते हैं?

बोध प्रश्न 4 उत्तर
1. ऑस्ट्रेलिया चिरस्थायी संघ है। राज्यों के पास प्रार्थक्य का अधिक नहीं है, वे अंखडनीय ऑस्ट्रेलियाई संघ का अंग हैं।
2. राज्यों के अधिकार की प्रतिनिधि संयुक्त ऑस्ट्रेलियाई सीनेट है, जिसमें प्रत्येक राज्य का बराबर प्रतिनिधित्त्व है। संघ की कार्यकारिणी आक्रमणों, आंतरिक हिंसा एवं विद्रोह के विरुद्ध राज्यों की रक्षा करती है। संविधान की व्याख्या के द्वारा उच्च न्यायालय भी राज्यों के अधिकारों की रक्षा करता है।

ऑस्ट्रेलिया में संघवाद की कार्यप्रणाली
ऑस्ट्रेलिया के अस्तित्त्व के लगभग 100 वर्षों में देश कई विषम परिस्थितियों से गुजरा है। इनमें दो विश्व युद्ध, आर्थिक संकट, औद्योगिक उथल-पुथल, आर्थिक विनाश तथा शहरीकरण शामिल हैं। इस पृष्ठभूमि में ऑस्ट्रेलिया में संघ व्यवस्था जड़ नहीं रही है। संघीय संतुलन में परिवर्तन हुआ है। इस संतुलन का केन्द्र की ओर झुकाव हुआ है। इसकी शक्तियों में वृद्धि हुई हैय इसके क्षेत्राधिकार में विस्तार हुआ है। ऐसा यहीं नहीं, अन्य पुराने परिपक्व संघात्मक देशों में भी हुआ है। संविधान द्वारा किया गया शक्तियों का विभाजन जैसा 100 वर्ष पूर्व था वैसा अब नहीं है। इन वर्षों में, तथा बदलती परिस्थितियों में, उच्च न्यायालय द्वारा संविधान की व्याख्या, जनमत संग्रह तथा सम्पूर्ण सरकारी शक्तियों में वृद्धि ने उस शक्ति विभाजन को बदल दिया है जो संविधान में 1900 में लिखा गया था। इस प्रकार तत्कालीन संघीय संतलन भी बदल गया है।

 परिवर्तन लाने वाले कारक
यह सत्य है कि ऑस्ट्रेलिया का संविधान कठोर है, और उसमें बहुत कम ऐसे संशोधन हुए हैं जिन्होंने संघ राज्यों के सम्बन्धों में परिवर्तन किया है। किसी ऐसे प्रस्ताव को जिसके द्वारा केन्द्र की शक्तियों में वृद्धि की जानी थी, जनमत संग्रह में जनसाधारण के बहुमत का समर्थन नहीं मिला। यह आम धारणा थी कि केन्द्रीय सरकार को बहुत अधिक शक्तियाँ न दी जाएँ। इसके विपरीत यह माँग की जाती रही है कि केन्द्र के पंख कुतर दिए जाएँ, अर्थात् उसकी शक्तियों को कम किया जाए। ऑस्ट्रेलिया के मतदाताओं में संघीय संरचना में औपचारिक परिवर्तन करने के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं है।

फिर भी, व्यवहार में ऑस्ट्रेलियाई संघ के क्रियान्वयन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। केन्द्र-राज्यों सम्बन्धों में परिवर्तन के लिए तीन प्रमुख कारक उत्तरदायी हैं। वे हैं संविधान की न्यायिक व्याख्या, संघ द्वारा राज्यों को अनुदान, तथा संघ-राज्य संयुक्त गतिविधियों में वृद्धि। परन्तु संविधान की अधिकांश शब्दावली अपरिवर्तनीय रही है। फिर भी उनके अर्थ, उदार प्रवृत्ति के न्यायाधीशों द्वारा दी गई व्याख्या के फलस्वरूप, केन्द्र अधिक शक्तिशाली तथा प्रभावी हो गया है। अतः न्यायिक व्याख्या के द्वारा संघ सरकार, संविधान निर्माताओं की अपेक्षा से कहीं अधिक शक्तिशाली हो गई है। ऐसा अनुभव किया जा रहा है कि केन्द्र ने न केवल नई शक्तियाँ प्राप्त की हैं, बल्कि उसने राज्य सरकारों के अधिकारक्षेत्र में भी ‘कानूनी हस्तक्षेप‘ किया है। इसी पृष्ठभूमि में प्रोफेसर के.सी. व्हियर (ज्ञण्ब्ण् ॅीमंतम) ने टिप्पणी की थी कि ऑस्ट्रेलिया में ऐसी केन्द्रीय प्रवृत्तियाँ विद्यमान थीं ‘जो शीघ्र ही आवश्यक कर देंगी कि इस देश के संविधान और उसकी सरकार को अर्ध-संघात्मक (ुनेंपमिकमतंस) की संज्ञा दी जाए।‘

 इंजीनियर का मुकदमा
ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय ने पहली बार 1920 में ‘इंजीनियर के मुकदमे‘‘ (म्दहपदममतश्े ब्ेंम) में संविधान की वृहत और प्रगतिशाली व्याख्या की थी। लगभग उन्हीं दिनों संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने भी संविधान की ऐसी ही व्याख्या दी थी। व्याख्या यह थी कि संविधान का निर्माण लम्बे समय के लिए किया गया था, ताकि उसमें सहनशीलता हो। संविधान को न्यायालय ने मात्र ऐसी रूपरेखा (तिंउम) कहा जिसमें नीति सम्बन्धी सामान्य सिद्धांत शामिल किए गए थे। इन नीतियों के अनुसार बदलती परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर विस्तृत नियम-उपनियम बनाए जाते हैं। इन्जीनियर के मुकदमें में उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि संघ (बवउउवदूमंसजी) की शक्तियों की उदार (अथवा विस्तीर्ण) व्याख्या की जाए। राज्यों की अवशेष शक्तियों का निर्णय केन्द्र सरकार की विशिष्ट शक्तियों का निश्चय करने के बाद ही किया जा सकता है। यह निर्णय ऑस्ट्रेलिया के संवैधानिक विकास, तथा संघीय शक्तियों के विस्तार में एक प्रमाणक-चिन्ह सिद्ध हुआ।

 संघीय (कॉमनवेल्थ) सरकार : विस्तीर्ण शक्तियाँ
संविधान ने विभिन्न अनुच्छेदों, विशेषकर 51 (अप), (गगगपप), 52 (पप), 68, 69, 70, 114 तथा 119 की उदार व्याख्या के फलस्वरूप, विश्व युद्धों के दौरान अनेक नियमों को संवैधानिक पाया गया। इस काल में संविधान की इतनी बार विस्तार से व्याख्या की गई कि केन्द्र सरकार की शक्तियाँ और भी विस्तीर्ण (मगजमदेपअम) हो गई। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, संघीय शक्ति संतुलन का केन्द्र की ओर इतना झुकाव इसलिए हो गया, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के उच्च न्यायालय ने संविधान की अति उदार व्याख्या की।

वित्तीय क्षेत्र में भी, 1900 में संविधान निर्माताओं ने जो अनुमान लगाया था, उनमें केन्द्र सरकार की शक्तियों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। ऐल्फ्रेड डीकिन (।सतिमक क्मांपद) ने तो 1982 में ही कहा था कि राज्य कानूनी तौर पर अवश्य स्वतन्त्र (स्वायत्त) थे, परन्तु वित्तीय दृष्टि से वे केन्द्र पर निर्भर थे। उसने कहा था कि ‘‘वे केन्द्र सरकार के रथ के पहियों के साथ बंधे हुए थे।‘‘ जैसा कि डीकिन ने तब कहा था, उस स्थिति का परिणाम यही होना था कि अन्ततः राज्यों के ऊपर संघ की श्रेष्ठता (या सर्वोच्चता) स्थापित हो जाए।

राजस्व खाते में राज्यों की दयनीय दशा
जहाँ तक राजस्व खाते में धन एकत्र करने का प्रश्न है, राज्यों की स्थिति और भी खराब है। उनकी आमदनी के स्रोत सीमित हैं। जहाँ तक राजस्व (सरकारी आय) के तीन प्रमुख स्रोतों का प्रश्न है दृ आयकर, माल.पर अप्रत्यक्ष कर, तथा सम्पत्ति करदृ प्रथम दो केन्द्र सरकार के क्षेत्राधिकार में हैं। अंतिम पर स्थानीय सरकारें निर्भर हैं। राज्यों के पास क्या बचा? सीमा शुल्क (ब्नेजवउ कनजल), तथा उत्पाद शुल्क (मगबपेम कनजल) निश्चय ही केन्द्र सरकार के अनन्य अधिकार क्षेत्र में हैं। ऐसा करना देश में एक समान सीमा शुल्क एवं उत्पाद कर के लिए आवश्यक है।

आयकर, जो पहले केन्द्र और राज्य दोनों के समवर्ती अधिकारक्षेत्र में था, उसको 1942 के एक रूप कर अधिनियम (Uniform Taxation Act) के तहत् केन्द्र के अनन्य अधिकार में ले आया गया। अनुच्छेद 51 का संशोधन इसलिए किया गया था ताकि राष्ट्रीय रक्षा एवं विकास के लिए अधिक धन-राशि जुटाई जा सके। अतः, वित्तीय क्षेत्र में राज्यों की स्वायत्तता को निश्चित धक्का लगा। एकरूप कर व्यवस्था ने व्यापक रूप से केन्द्र-राज्य सम्बन्धों को प्रभावित किया। संघ की शक्तियों की वृद्धि और राज्यों के अधिकारों में कमी ने राज्यों की स्थिति इतनी दयनीय बना दी है कि वे मात्र प्रशासकीय निकाय बन कर रह गई हैं।

राज्यों के राजस्व में आई कमी की भरपाई करने के लिए, संघ सरकार ने मुआवजे के तौर पर, अनुच्छेद 96 के अधीन, अनुदान राशि देने का निर्णय किया। इस राशि का उल्लेख अधिनियम में किया, और यह व्यवस्था भी की गई कि इस राशि में समय समय पर वृद्धि की जाएगी।

आर्थिक स्थिति को समता पर आधारित सुधारा जा सके। परन्तु, यह प्रावधान अब संविधान का स्थायी अभिन्न अंग बन गया है। इसका प्रयोग संघ सरकार के प्रभाव और अधिकारों में और वृद्धि करने के लिए किया जाने लगा है।

 विशेष उद्देश्यों के लिए अनुदान एवं ऋण
सामान्य रूप से सार्वजनिक कार्यों के लिए दिए जाने वाले अनुदान के अतिरिक्त, संघ सरकार राज्यों को विशेष उद्देश्यों के लिए भी अनुदान देती है। यह विशेष अनुदान की परम्परा 1923 में आरम्भ हुई जब ऐसे कार्यक्रमों के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता की आवश्यकता पड़ी जो कि केन्द्र के क्षेत्राधिकार में नहीं थे। इस प्रकार के अनुदान अनेक विशेष कार्यों के लिए दिए जाते हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थय, मूल निवासियों का कल्याण, सड़कें, संचार माध्यम इत्यादि शामिल हैं। इस प्रकार इन अनुदानों के माध्यम से संघ सरकार उन क्षेत्रों में भी प्रवेश करती है जो उसके क्षेत्राधिकार में नहीं हैं। साथ ही यह निम्नलिखित तीन प्रकार से राज्यों की स्वायत्तता को प्रभावित करती है :
1. राज्यों की प्रतिबद्धता होती है कि विशेष कार्यक्रमों के लिए दी गई धनराशि उन्हीं परियोजनाओं (या कार्यक्रमों) पर व्यय की जा सकती है, अन्य पर नहीं।
2. कभी कभी राज्य अपने राजस्व में से उतनी ही धनराशि शामिल कर लेते हैं, जितनी उन्हें केन्द्र से मिली।
3. संघ सरकार इस बात का सर्वेक्षण कर सकती है कि अनुदान का उपयोग किस प्रकार किया गया।

इन प्रवृत्तियों से राज्यों की शक्तियों की कीमत पर केन्द्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि हुई है।

अनुदान की भाँति, ऋणों के क्षेत्र में भी संघ सरकार ने अपनी वरीयता स्थापित कर ली है। सन् 1928 में संविधान में संशोधन कर अनुच्छेद 105-ए जोड़ा गया। इसके अनुसार, राज्य सरकारों द्वारा लिए गए ऋणों को केन्द्र सरकार अपने ऊपर ले सकती है। इसके लिए वह राज्यों से समझौते कर सकती प्रकार, नए ऋणों के प्रबंधन के विषय में राज्य आपस में परामर्श करने, तथा केन्द्र के साथ परामर्श करने, सम्बन्धी समझौते कर सकते हैं। इस प्रावधान के दो परिणाम हुए :
1. एक ऑस्ट्रेलियाई ऋण परिषद् की स्थापना की गई जिसके सदस्य होते हैं देश के प्रधानमन्त्री (अथवा उसका प्रतिनिधि) तथा छह राज्यों के प्रधानमन्त्री (च्तमउपमते) अथवा उनके प्रतिनिधि।
2. संघ सरकार ने राज्यों के तत्कालीन ऋणों का भार स्वयं पर ले लिया, तथा एक डूबते कोष (ेपदापदह थ्नदक) की स्थापना की गई जिसमें केन्द्र तथा राज्य दोनों ही वित्तीय योगदान करते हैं।

संघ और राज्यों के सम्बन्धों की दृष्टि से ऋण परिषद् एक महत्त्वपूर्ण नवपद्धति थी। परन्तु इसने संघ सरकार की सर्वोच्चता स्थापित कर दी, क्योंकि वह ऋणों का प्रबंध करने लगी, तथा इस प्रकार वह राज्य सरकारों की वित्तीय गतिविधियों को प्रभावित एवं नियन्त्रित करने लगी।

बोध प्रश्न 5
नोट : क) अपने उत्तरों के लिए नीचे दिए गए स्थान का प्रयोग कीजिए।
ख) इस इकाई के अंत में दिए गए उत्तरों से अपने उत्तर मिलाइए।
1) ऑस्ट्रेलिया की संघ व्यवस्था की कार्य प्रणाली की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

बोध प्रश्न 5 उत्तर
1. एक लिखित संविधान, जनमत संग्रह का प्रावधान, इंजीनियर के मुकदमें के निर्णय से संघ सरकार की शक्तियों में और वृद्धिद्य उच्च न्यायालय ने कहा कि संघ में स्थायित्त्व है। अतः केन्द्र की आपातकालीन शक्तियों ने संघ सरकार को और भी शक्तिशाली बना दिया।

ऑस्ट्रेलिया की संघ व्यवस्था का मूल्यांकन
यद्यपि संघीय शक्ति संतुलन का झुकाव केन्द्र सरकार की ओर हो गया है, तथापि संघीय व्यवस्था की भावना और उसके मूल्यों में क्षति नहीं हुई है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया में राज्य आज भी स्वायत्त इकाइयों के रूप में अपना अस्तित्त्व बनाए हुए हैं। अन्य संघात्मक देशों की भाँति, ऑस्ट्रेलिया में भी संघ-राज्य सहयोग अनिवार्य हो गया है। ए. जे. डेवीस (।ण्श्रण् क्ंअपमे) ने संघ और राज्यों के इन सम्बन्धों को ष्सम्पर्क संघवाद (ब्वदजंबज थ्मकमतंसपेउ) का नाम दिया है। इसका अर्थ हुआ श्मुद्दों का संघीय मिश्रण में मिलनश् तथा कार्यों का परस्पर मिलन (पदजमतउपदहसपदह वि निदबजपवदे), संघ के कार्यों को राज्यों के कार्यों से पृथक करना अब सम्भव नहीं है। व्यवहार में सभी कार्यक्रमों की सफलता के लिए संयुक्त प्रयास की आवश्यकता होती है। इसके द्वारा दोनों स्तर की सरकारों में अधिक भागीदारी और सहयोग सम्भव हो सकता है। यह एक व्यावहारिक प्रक्रिया है। अतः स्वामी और सेवक जैसी कोई बात नहीं है। सामान्य कार्यक्रमों और परियोजनाओं में केन्द्र और राज्यों का स्थान समानता का है। निर्भरता के संलक्षण का स्थान सहयोग एवं सौहाद्र के संलक्षण (ेलदकतवउम) ने ले लिया है। प्रभुत्त्व और बल प्रयोग के स्थान पर अब केन्द्र-राज्य सम्बन्ध परामर्श ओर समझानेबुझाने की प्रक्रिया पर आधारित हैं। यह सब प्रवृत्तियाँ इस ओर संकेत करती हैं कि ऑस्ट्रेलिया में संघीय व्यवस्था का नाश होने वाला नहीं है। दूसरी ओर संघ और राज्य दोनों सरकारों के शक्तिशाली होने और उनके सहयोग से ऑस्ट्रेलियाई संघ और भी सशक्त हुआ है।

Sbistudy

Recent Posts

Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic

Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…

2 weeks ago

Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)

Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…

2 weeks ago

Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise

Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…

2 weeks ago

Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th

Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…

2 weeks ago

विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features

continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…

2 weeks ago

भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC

भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…

2 weeks ago
All Rights ReservedView Non-AMP Version
X

Headline

You can control the ways in which we improve and personalize your experience. Please choose whether you wish to allow the following:

Privacy Settings
JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now