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परिवार की परिभाषा क्या है | परिवार किसे कहते है हिन्दू धर्म में अर्थ मलतब Family in hindi meaning
Family in hindi meaning definition परिवार की परिभाषा क्या है | परिवार किसे कहते है हिन्दू धर्म में अर्थ मलतब ?
परिवार (Family)
‘‘गृहस्थ आश्रम‘‘ हिन्दू व्यक्ति के लिए पारिवारिक जीवन का चरण है। विवाह का मुख्य उद्देश्य गृहस्थ आश्रम में परिलक्षित होता है। गृहस्थ आश्रम के चरण में हिन्दू व्यक्ति परिवार के लगातार बने रहने के लिए और अपने मोक्ष के लिए धर्म कर्म करता है। इस तरह एक सामान्य आदर्श हिन्दू परिवार संयुक्त परिवार होता है, जिसमें सामान्यतया तीन पीढ़ी के लोग साथ-साथ रहते हैं। हिन्दू संयुक्त परिवार अधिकांशतः पितृवंशागत होता है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य साथ-साथ रहते और खाते-पीते हैं और एक ही संपत्ति के स्वामी होते हैं। इस प्रकार के परिवार में सामान्यतया पुरुष और उसकी पत्नी, उनके वयस्क बेटे और उनकी पत्नियाँ और बच्चे होते हैं। कभी-कभी दूसरे निकट के (या दूर के भी) संबंधी इस संयुक्त परिवार के सदस्य बन जाते हैं। परिवार का सबसे बड़ा पुरुष सदस्य उसका मुखिया होता है। इस परिवार में श्रेणीबद्धता का आधार लिंग और आयु होते हैं।
हाल के वर्षों में तेजी से हुए शहरीकरण, उद्योगीकरण, शिक्षा और जन-संचार और वाणिज्यिक मूल्यों के प्रसार और प्रगतिशील भूमि सुधारों और उत्तराधिकार के कानूनों के लागू होने के कारण भारत में संयुक्त परिवार का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। सच में, आजकल एकल परिवार का जोर है। फिर भी, संयुक्त परिवार की भावनाएं अभी भी खत्म नहीं हुई हैं, और उनकी झलक अधिकांश हिन्दुओं में पारिवारिक अनुष्ठानों के समय और संपत्ति के स्वामित्व के मामले में देखने को मिलती है। (इस विषय पर अधिक जानकारी के लिए आप ईएसओ-12 के खंड 2 की इकाई संख्या 6 और ईएसओ-16 के खंड 2 की
हिन्दू सामाजिक संस्थाएँ (Hindu Social Institutions)
ईएसओ-13 के खंड 4 में आपने पढ़ा ही होगा कि मैक्स वेबर ने आर्थिक विकास की प्रेरक शक्तियों का धार्मिक विश्वास पद्धतियों के नीतिशास्त्र के अंदर होना बताया है। उसके अनुसार पश्चिमी देशों में आर्थिक विकास पनपने का कारण ईसाई धर्म के प्रोटेस्टैंट संप्रदाय के धार्मिक नीतिशास्त्र को बुद्धिसंगत या तार्किक बनाया जाना था। लेकिन उसका मानना है कि इस प्रकार बुद्धिसंगत बनाने की प्रक्रिया हिन्दू धर्म में नहीं चली: इसके विपरीत धर्म, कर्म और मोक्ष के सिद्धांतों पर केंद्रित हिन्दू विश्वास पद्धति और हिन्दू सामाजिक संस्थाओं ने एक बौद्धिक दृष्टि से असंगत और ‘‘परलोकवादी सामाजिक वातावरण को जन्म दिया। इस स्थिति ने आर्थिक विकास और औद्योगिक पूँजीवाद की वृद्धि में बाधा उत्पन्न की। लेकिन फिर मैक्स वेबर की इस धारणा की प्रामाणिकता को अनेक विद्वानों ने चुनौती भी दी है। उदाहरण के लिए मिल्टन सिंगर का कहना है कि हिन्दू धर्म ने भारत में औद्योगिक पूँजीवाद की वृद्धि को बाधित नहीं किया है, बल्कि उसने तो उसके विकास को आसान ही बनाया है। भारत में पारंपरिक व्यापारी परिवारों ने अपने व्यापार के लिए आवश्यक पूँजी पारिवारिक स्रोतों से ही प्राप्त की है और परंपरा से चले आ रहे उनके विशेष कौशल का उपयोग भी आर्थिक विकास के लिए किया गया है। विद्वानों का यह भी कहना है कि हिन्दू सामाजिक संस्थाओं और विश्वास पद्धतियों में आर्थिक आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक बुद्धिसंगत बनाने के तत्व और ‘‘इहलोकवादी‘‘ अभिवृत्तियाँ बहुतायत से मिलती हैं। लेकिन बुद्धिसंगत बनाने के इन तत्वों और इहलोकवादी इन अभिवृत्तियों को विशेष स्तर पर हिन्दू धर्म की बदलती आवश्यकता और सामान्य स्तर पर भारतीय समाज के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
कार्यकलाप 1
हिन्दू धर्म के दस अलग-अलग जाति समूहों के दस परिवारों के मुखियों से बातचीत कीजिए। उनके विवाह की रीतियों और उनके बच्चों के विवाहों में अपनाई गई रीतियों के बारे में जानकारी एकत्र कीजिए। अपने निष्कर्ष के आधार पर ‘‘हिन्दू विवाह की विशेषताएँ: क्षेत्रीय सर्वेक्षण‘‘ विषय पर दो पृष्ठ की एक टिप्पणी लिखिए। संभव हो तो अपने अध्ययन केन्द्र के अन्य छात्रों के साथ अपनी टिप्पणी का मिलान कर लीजिए।
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