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पर्यावरण ,परितंत्र , पर्यावरणीय अपशिष्ट , जैव निम्नीकरणीय के गुण , परितंत्र के प्रकार , environment and ecology in hindi
हमारे आस पास की सभी चीजे जो की हमे घेरे रखती है पर्यावरण में शामिल है। इस पर्यावरण में सभी जैव तथा अजैव घटक शामिल होते है। पर्यावरण में जीवो के अलावा वायु , जल आदि भी आते है।
पर्यावरणीय अपशिष्ट
पर्यावरण में जीवो के दवारा किसी वस्तु को उपयोग में लेने के बाद बचे अपशिष्ट को पर्यावरणीय अपशिष्ट कहते है। यह दो प्रकार के होते है।
1.वह अपशिष्ट जो जैव प्रक्रमो दवारा अपधटित हो जाते है। अपधटन के बाद कोई अपशिष्ट शेष नहीं बचता है।
2. वह अपशिष्ट जो जैव प्रक्रमो दवारा अपधटित नहीं होते है तथा यह पर्यावरण में बने रहते है।
जैव निम्नीकरणीय = वे पदार्थ जो जैविक प्रक्रम द्वारा अपघटित हो जाते हैं ‘जैव निम्नीकरणीय’ कहलाते हैं।
उदाहरण सभी कार्बनिक पदार्थ जी की जीवो के दवारा प्राप्त होते है जैव निम्नीकरणीय होते है गोबर ,सूती कपडा,जुट, कागज ,फल आदि जैव निम्नीकरणीय होते है।
जैव निम्नीकरणीय के गुण
1.यह पदार्थ सक्रिय होते है।
2. इन पदार्थ का अपघटन आसानी से हो जाता है।
3. यह पदार्थ पर्यावरण में बहुत कम समय तक बने रहते है।
4. यह पदार्थ पर्यावरण को अजैव पदार्थ की तुलना में कम हानी पहुचाते है
अजैव निम्नीकरणीय= ऐसे अपशिष्ट जो जैव प्रक्रमो दवारा अपधटित नहीं होते है तथा यह पर्यावरण में बने रहते है। अजैव निम्नीकरणीय कहलाते है। उदाहरण प्लास्टिक,पॉलिथीन, रेशे,धातु, कुछ रसायन आदि अजैव निम्नीकरणीय होते है।
अजैव निम्नीकरणीय के गुण
1.यह पदार्थ अक्रिय होते है।
2.इन पदार्थ का अपधटन आसानी से नहीं होता है।
3.यह पदार्थ पर्यावरण में लम्बे समय तक बने रहते है।
4.यह पदार्थ पर्यावरण को हानि पहुचाते है।
परितंत्र
किसी भी जगह के जैव तथा अजीव धटक़ मिलकर एक तंत्र का निर्माण करते है जिसे परितंत्र कहते है। किसी क्षेत्र के सभी जीव तथा वातावरण के अजैव कारक संयुक्त रूप से मिलकर परितंत्र बनाते हैं। अतः एक पारितंत्र में सभी जीवों के जैव घटक तथा अजैव घटक होते हैं। भौतिक कारक_ जैसे- ताप, वर्षा, वायु, मृदा एवं खनिज इत्यादि अजैव घटक हैं जो की किसी भी परितंत्र के उदहारण है।
उदाहरण के लिए बगीचे में विभिन्न पौधे जैसे- घास, वृक्ष, गुलाब, चमेली, सूर्यमुखी जैसे फूल वाले सजावटी पौधे तथा जीव जैसे की मेंढ़क, कीट एवं पक्षी होते है । यह सभी सजीव परस्पर अन्योन्य क्रिया करते हैं तथा इनकी वृद्धि जनन एवं अन्य क्रियाकलाप परितंत्र के अजैव घटकों द्वारा प्रभावित होते हैं। अजैव धटक के रूप में वायु, मुदा आदि होते है अतः एक बगीचा एक परितंत्र है।
1.जैव धटक = किसी भी पर्यावरण के सभी जीवधारी जैसे की मेंढ़क, कीट एवं पक्षी आदि जैव धटक कहलाते है।
2.अजैव धटक = किसी भी पर्यावरण के भोंतिक कारक जैसे की ताप,वायु, खनिज आदि अजैव धटक कहलाते है।
परितंत्र दो प्रकार के होते है
1. प्राकृतिक परितंत्र = वन, तालाब तथा झील प्राकृतिक परितंत्र के प्रकार हैं।
2. कृत्रिम परितंत्र = बगीचा तथा खेत मानव निर्मित कृत्रिम परितंत्र हैं।
जीवो को जीवन निर्वाह के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है।
1. उत्पादक
2. उपभोक्ता
3. अपघटक
1.उत्पादक = वह जीव जो सूर्य के प्रकाश एवं क्लोरोफिल की उपस्थिति में अकार्बनिक पदार्थों से कार्बनिक पदार्थ जैसे कि, शर्करा (चीनी) एवं मंड का निर्माण कर सकते हैं उत्पादक कहलाते है। जैसे की सभी हरे पौधों एवं नील-हरित शैवाल जिनमें प्रकाश संश्लेषण की क्षमता होती है अर्थात् यह भोजन का उत्पादन कर सकते है इसी वर्ग में आते हैं तथा उत्पादक कहलाते हैं।
2. उपभोक्ता = सभी जीव प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अपने निर्वाह हेतु उत्पादकों पर निर्भर करते हैं। वे जीव जो उत्पादक द्वारा उत्पादित भोजन पर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से निर्भर करते हैं उपभोक्ता कहलाते हैं।
उपभोक्ता को मुख्यतः शाकाहारी, मांसाहारी तथा सर्वाहारी एवं परजीवी में बाँटा गया है।
a.शाकाहारी = वे जीव जो अपने जीवन निर्वाह के लिए केवल पेड़ पोधो पर निर्भर करते है
शाकाहारी कहलाते है। जैसे = हिरण,गाय आदि
b. मांसाहारी = वे जीव जो अपने जीवन निर्वाह के लिए अन्य जीव जन्तुओ से प्राप्त मांस पर निर्भर करते है मांसाहारी कहलाते है। जैसे = शेर ,बाघ, चीता आदि
c.सर्वाहारी = वे जीव जो अपने जीवन निर्वाह के लिए अन्य जीव जन्तुओ पर तथा पेड़ पोधो पर निर्भर करते है सर्वाहारी कहलाते है। जैसे = कुता आदि
d.परजीवी = वे जीव जो स्वयं भोजन नहीं बनाते है बल्कि अन्य जीवो के शरीर में या उसके उपर रहकर इनसे भोजन प्राप्त करते है परजीवी कहलाते है। जैसे = जू , फीता कृमा आदि
3.अपमार्जक तथा अपधटक = वे जीव जो की मरे हुए जीव, पोधे तथा अन्य कार्बनिक पदार्थ के जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं अपमार्जक तथा अपधटक कहलाते है। जीवाणु और कवक जैसे सूक्ष्मजीव मृतजैव अवशेषों का अपमार्जन करते हैं। ये सूक्ष्मजीव अपमार्जक हैं क्योंकि ये जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं जो मिट्टी में चले जाते हैं तथा पौधों द्वारा पुनः उपयोग में ले लिए जाते हैं। अपमार्जक के नहीं होने पर पर्यावरण में मृतजैव की संख्या बढ जाती है जिसके कारण पर्यावरण प्रदूषित रहता है।
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