पारिस्थितिक अनुक्रमण की परिभाषा क्या है व प्रकार ecological succession in hindi

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पारिस्थितिक अनुक्रमण (ecological succession) :

वातावरण में परिवर्तन के कारण पहले के जीवो के स्थान पर नए जीव आ जाते हैं व नया समुदाय स्थापित हो जाता है , इसे पारिस्थितिक अनुक्रमण कहते हैं |

अनुक्रमण एक दीर्घकालीन क्रिया है जिसके अंतिम चरण में एक स्थाई या चरम समुदाय स्थापित होता है |

समुदाय का संपूर्ण क्रम जो दिए हुए क्षेत्र में परिवर्तित होता है उसे क्रमक कहते हैं | तथा परिवर्तनशील समुदायों को क्रमकी चरण या क्रमकी समुदाय कहते हैं |

पारिस्थितिक अनुक्रमण दो प्रकार का होता है

[1] प्राथमिक अनुक्रमण :

ऐसे समुदाय का किसी ऐसे क्षेत्र में स्थापित होना जहां पहले कोई जीव समुदाय नहीं था यह अनुक्रमण किसी भी क्षेत्र में शुरू हो सकता है जैसे ज्वालामुखी के फटने के पश्चात उसका लावा ठंडा होने पर ,  नग्न चट्टानों पर ,  या नए बने तालाब पर नया पादप समुदाय विकसित हो सकता है इसे प्राकृतिक अनुक्रमण कहते हैं इसी अनुक्रमण में हजारों वर्ष लग सकते हैं |

[2] द्वितीयक अनुक्रमण :

यह अनुक्रमण उन क्षेत्रों में शुरू होता है जहां पहले कोई पादप समुदाय निवास करता था लेकिन बाढ़, भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं से नष्ट हो गया हो इन क्षेत्रों में नए पादप समुदाय उपजाऊ मिट्टी होने से शीघ्र ही विकसित हो जाता है |

पादपों में पारिस्थितिक अनुक्रमण :

आवास की प्रकृति के आधार पर पादप अनुक्रमण निम्न प्रकार के हो सकते हैं

[A]जलारंधी अथवा जल क्रमक

[B] शुष्कतारंधी  अथवा मरू क्रमक

[A]जलारंधी अथवा जल क्रमक

यह अनुक्रमण जल में शुरू होता है अतः जल आरंभी अनुक्रमण कहलाता है ,  जल में प्राथमिक अनुक्रमण के निम्न चरण होते हैं

  1. पादप पलवक चरण :

किसी जलीय आवास में मृदा की कमी होने से खनिज तत्वों की भी कमी होती है अतः निम्न श्रेणी के पादप प्लवक जैसे  एना वीना , स्पाइरोगाइरा आदि शेवाले उगती है

(2)  जलनिमग्न पादप चरण :

सवालों के नष्ट होने से जल की मृदा में खनिजों की मात्रा बढ़ती है जिसे जल निमग्न पादप जैसे  पोटे मोजिटोन आदि रुकते हैं |

(3) निमग्न मुक्ति खाली पादप चरण :

अब धीरे-धीरे इस जलीय आवास में स्वतंत्र पलवी पौधे जैसे जलकुंभी वुल्फिया एजोला आदि उगते हैं इनके मृत होकर सड़ने बदलने से जल में खाद की मात्रा बढ़ती है |

(4) नरकुल  अनूप चरण :

जल के ज्यादा विगदीकरण से अब जड़ी युक्त जल स्थलीय पौधे जैसे टाइफा ,लिगनोफिला आदि उग जाते हैं |

(5)कच्छ शाद्वल चरण :

अधिक विगदिकरण से जलीय आवास दलदल में बदल जाता है जिसे दलदली पादप पालिगोनम, आईपोमिया  उगते हैं |

(6) कुंज चरण :

अब दलदली आवास एक स्थल में बदल जाता है अब यहां का काष्ठीय झाड़ियां उग जाती है |

(7) वन अवस्था :

अब इस स्थलीय आवास में वृक्षों की अनेक प्रजातियां विकसित होकर चरम समुदाय विकसित करती हैं इसे वनीकरण कहते हैं |

[B]  शुष्कतारंधी अथवा मरूक्रमण :

जल की कमी वाले स्थानों पर होने वाले अनुक्रमण को शुष्कतारंधी अनुक्रमण कहते हैं | वह प्रजाति जो खाली व नग्न चट्टानों पर अनुक्रमण करती है अर्थार्थ पहले  उगती है  उसे मूल अन्वेषक प्रजाति कहते हैं उदाहरण – लाइकेन नग्न चट्टानों पर प्राथमिक अनुक्रमण करती है और विभिन्न प्रकार के अमलो का स्त्राव कर चट्टानों का अपरदन कर उन्हें मिट्टी में बदल देती है , मृदा की इस पतली भारत में छोटे पौधे जैसे ब्रायोफाइट्स उग जाते हैं , समय के साथ इनका स्थान बड़े पौधे ग्रहण करते हैं और अंत में एक स्थिर चरम अवस्था पर एक 1 समुदाय स्थाई हो जाता है |

परितंत्र सेवाएं (ecosystem services) :

वायु व जल को शुद्ध बनाना ,  सूखे व बाढ़ को रोकने ,  भूमि को उर्वर बनाना आदि परितंत्र सेवाएं हैं |

रोबर्ट कॉन्सटेजा व उनके साथियों ने  परितंत्र सेवाओं की 1 वर्ष की कीमत 33 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तय की है जो वैश्विक  स्कल उत्पाद की कीमत 18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से 3 गुना ज्यादा है |

प्रश्न 1 :  एक वृक्ष के जीवो की संख्या का पिरामिड कैसा बनता है ?

उत्तर :  उल्टा बनता है चौकी वृक्ष अकेला मूल उत्पादक है और उसके फलों को खाने वाले पक्षियों अथवा अन्य जंतुओं की संख्या उससे अधिक होता है तथा पक्षियों अथवा जंतुओं पर परजीवी रूप से रहने वाले कीटों की संख्या इन से भी ज्यादा होती है |

प्रश्न 2 :  स्थित शस्य या खड़ी फसल किसे कहते हैं ?

उत्तर:  प्रत्येक पोषण स्तर में जीवित पदार्थ की कुछ खास मात्रा होती है जिसे स्थित शस्य या खड़ी फसल कहते हैं स्थित शस्य को जीवित जैविक ओ की मात्रा से मापा जाता है |