ddt ki khoj kisne ki thi ? डीडीटी की खोज किसने और कब की थी आविष्कार का नाम वैज्ञानिक कौन था

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डीडीटी की खोज किसने और कब की थी आविष्कार का नाम वैज्ञानिक कौन था ddt ki khoj kisne ki thi ?  who discovered ddt in hindi ?

उत्तर : DDT की खोज 1939 में Paul Hermann Müller (पॉल हर्मन मुलर) ने की थी | वास्तविकता में इन्होने DDT के कीटनाशी के रूप में प्रयोग की खोज की अर्थात उन्होंने खोज की थी DDT का प्रयोग कीटनाशी के रूप में किया जाता है | इस अनूठे गुण की खोज करने पर पॉल को सन् 1948 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

पीड़क प्रबंधन का ऐतिहासिक विकास
ईसा से 10,000 वर्ष पूर्व के लगभग कृषि के प्रारंभ से ही भोजन की गंभीर कमियाँ तथा अकाल संसार भर में मानव-समष्टियों के लिए निरंतर आशंकाएँ बने हुए हैं। समय-समय पर होने वाले कीट-प्रकोप पहले भी थे और आज भी हैं। अपतण और कशेरुकी पीड़क हमेशा ही कृषि-उत्पादन में महत्वपूर्ण समस्या रहे हैं। पीड़कों के बारे में जानकारी में प्रमुख सुधार पिछले 200 वर्षों से ही हुआ हैं। वर्तमान पीड़क-प्रबंधन में प्रयुक्त अधिकांश टैक्नोलॉजी यही कोई पिछले 60 वर्षों में हुई प्रगति का ही परिणाम है।

कीटनाशियों के इस्तेमाल के कारण बढ़ती हुई समस्याओं के परिणामस्वरूप समाकलित पीड़क-प्रबंधन (प्च्ड) की संकल्पना का उद्भव हुआ। इस प्रकार पीड़क-प्रबंधन के इतिहास में तीन स्पष्ट प्रावस्थाएँ हैं रू
1. परंपरागत उपागम का काल
2. पीड़कनाशियों का काल
3. IPM का काल

1. परंपरागत उपागम का काल
अपने अनुभव के आधार पर किसानों ने अपने पुराने सस्य नियंत्रण की विधियाँ विकसित की जैसे कि सस्यावर्तन, खेतों में स्वच्छ-सफाई रखना, गहरी जुताई करना, खेत में पानी भर देना, नुकसान पहुँचा रहे कीटों और ग्रस्त पौधों को एकत्रित करना तथा उन्हें नष्ट कर देना। इसलिए उन्होंने संसार के विभिन्न भागों में पादप-उत्पादों को, जैसे नीम, गुलदाउदी, रोटीनॉन, तंबाकू और अन्य अनेक पादप-निष्कर्षों को प्रयोग किया। कहा जाता है कि विभिन्न फसलों के और भंडारित अनाजों के कीट-पीड़कों के लिए पादपजन्य पीड़कनाशियों के साथ-साथ जैव नियंत्रण विधियों के इस्तेमाल में चीनवासी सबसे अग्रणी थे। हालांकि, पीड़क-नियंत्रण की अनेक महत्वपूर्ण तकनीकों, जिनके अंतर्गत प्रतिरोधी किस्मों, जैव नियंत्रण कारकों और पादपजन्य तथा अकार्बनिक कीट नाशियों का इस्तेमाल शामिल है, का सुव्यवस्थित प्रयास अमरीका में अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक किया गया। इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण सफलता अंगूर फिलोक्सेरा (Phylloxera) में विटियस विटिफोलिआई (Viteus vitifoliae) के कारण हुए रोग के प्रबंधन में प्राप्त हुई जब सन् 1880 में यूरोपीय अंगूर की बेल की कलमों को प्रतिरोधी उत्तरी अमरीकी प्रकंदों पर कलम चढ़ाया गया। लगभग उसी समय कॉटनी कुशल स्केल, आइसेरिया परचेजाई (Icerya purchesi), जो केलिफॉर्नियाँ में नींबू उद्योग को बरबाद कर रहा था, का आस्ट्रेलिया से आयातित वेडैलिया भंग (रोडोलिया कार्डिनैलिस, Rodolia cardinalis) का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक नियंत्रण किया।

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत से लेकर बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक अनेक संश्लेषित अकार्बनिक कीटनाशी, जैसे कि आर्सेनिक, पारा और ताँबा, भी विकसित किए गए। इन कीटनाशियों के विकसित हो जाने पर फसल-नियंत्रण पर शोधकार्य का केन्द्र धीरे-धीरे पारिस्थितिक नियंत्रण और सस्य-नियंत्रण से बदल कर रासायनिक नियंत्रण पर आ गयाय हालांकि अभी संश्लेषित कार्बनिक कीटनाशियों का विकास नहीं हुआ था।

2. पीड़कनाशियों का काल (1939-1975)
पीड़कनाशियों के काल का आरंभ सन् 1939 में पॉल मुलर द्वारा DDT के कीटनाशी-गुणों की खोज के साथ-साथ हुआ। कीटों का नियंत्रण करने के लिए इस अनूठे गुण की खोज करने पर पॉल को सन् 1948 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

क्क्ज् के बाद 1950 के दशक में अन्य कीटनाशियों का पता लगा, जैसे HCH , क्लोरडेन, ऐल्ड्रिन, डाइऐल्ड्रिन, हेप्टाक्लोर (सभी ऑर्गेनोक्लोरिन वर्ग), ट्रॉक्सामीन, स्क्रैडन (ऑर्गोनोफास्फोरस वर्ग) और ऐलीथ्रिन (संश्लेषित पाइरीथ्रॉइड) और अनेक अन्य प्रचलित रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले ऑर्गेनोफॉस्फेट तथा कार्बामेट्स।

अपनी क्षमता, विभिन्न रूपों में प्रयोग किए जाने की नम्यता और सस्ता होने के नाते, इन पीड़कनाशियों का फसल-उत्पादन बढ़ाने में एक प्रमुख योगदान रहा। चावल और गेहूँ की उच्च पैदावार देने वाली किस्मों, जिनसे देश में हरित क्रांति आई, की सफलता अंशतरू पीड़कनाशियों के संरक्षी छत्र के ही कारण थी। इन कीट नाशियों की अभूतपूर्व सफलता के कारण उनकी सीमाओं पर किसी का ध्यान नहीं गया। इसके बाद कीटनाशियों के व्यापक, अविवेकी इस्तेमाल, दुरुपयोग, गलत उपयोग के कारण पर्यावरण की बहुत व्यापक रूप से क्षति हुई। इसके अतिरिक्त, कुछ फसलों में पीड़क-समस्याएँ पुनरुत्थान (resurgence) के लक्षण कारण बढ़ गई।

इसका परिणाम यह हुआ कि कीटनाशियों का प्रयोग उच्च मात्रा में किया जाने लगा जिसके कारण पीड़कनाशी-ट्रेडमिल की परिघटना आरंभ हो गई। इन सभी समस्याओं के मिले-जुले असर के साथ-साथ पीड़कनाशियों की बढ़ती हुई कीमत के कारण रासायनिक नियंत्रण-रणनीति को सीमित रखने के लिए आवश्यक फीडबैक मिला, और प्च्ड की संकल्पना का विकास आरंभ हुआ।

3. IPM का काल (सन् 1976 के बाद)
समाकलित नियंत्रण को पीड़कनाशियों के एकमात्र रूप से और अविवेकी इस्तेमाल की रणनीति से संबंधित बढ़ती हुई समस्याओं से निबटने के लिए सुरक्षित रखा गया। हालांकि, IPM की वास्तविक संकल्पना का आरंभ सन् 1976 के दौरान XV कीटविज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय काँग्रेस के दौरान हुआ। IPM पीड़क-नियंत्रण के लिए पारिस्थितिक और आर्थिक दृष्टियों से निर्दोष उपागमों का निरूपण करता है, और विस्तृत स्पेक्ट्रम वाले तथा स्थायी रूप से बने रहने वाले कीटनाशियों का इस्तेमाल स्वतरू ही अस्वीकार कर देता है।
निम्नलिखित तालिका (तालिका 5.1) में कृषि-पीड़क-प्रबंधन के इतिहास में महत्वपूर्ण घटनाएँ दी गई हैं।

तालिका 5.1: कृषि-पीड़क-प्रबंधन के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ