पैंक द्वारा अपरदन चक्र की व्याख्या क्या है ? what is cycle of erosion by penck in hindi सिद्धान्त , बाधायें

By   August 21, 2021

सिद्धान्त , बाधायें what is cycle of erosion by penck in hindi पैंक द्वारा अपरदन चक्र की व्याख्या क्या है ? पेंक ?

पैंक द्वारा अपरदन चक्र की व्याख्या
डेविस के ‘भौगोलिक चक्र‘ के सबसे बड़े आलोचक वाल्टर पैक है। उन्होंने 1924 में अपना मत प्रस्तुत किया। पैंक ने अपरदन चक्र को उत्थान एवं निम्नीकरण की दर तथा दोनों के आपसी संबंधों का योग बताया। उन्होंने इसे श्भआकति तंत्रश् कहा। इस प्रक्रिया को पैक ने आकृतिक विश्लेषण की संज्ञा दी। पैक के अनुसार किसी भी क्षेत्र में स्थलरूपा का आकार वहाँ की विवर्तनिक क्रिया से संबंधित होती है। स्थलस्वरूपों का विकास समय रहित होता है। उसे अवस्थाओं में नहीं बॉटा जा सकता। स्थलरूपाों के विकास का कोई निश्चित क्रम भी निर्धारित नहीं किया जा सकता।
सिद्धान्त के आधार :-
(1) भूआकृतिक विकास उत्थान की दर व अपरदन की दर के बीच का संबंध होता है।
(2) पैक ने भूआकृति के विकास में ढाल को विशेष महत्व दिया है। किसी भी भूखण्ड का ढाल अनाच्छादन (मलबा के निष्कासन) एवं नदी द्वारा निम्नवर्ती अपरदन की सापेक्षिक दर पर निर्भर करता है। पैक यह मानते हैं कि ढाल की प्रवणता निचले भागों में कम होती व ऊपरी भागों में अधिक। ऊपरी हिस्से में नदी की अपरदन शक्ति अनाच्छादन से अधिक होती है व निम्न भागों में अनाच्छादन के बराबर पायी जाती है।
(3) उत्थान व अपरदन साथ- साथ काफी लम्बे समय तक चलते हैं। कभी उत्थान तीव्र व अपरदन मंद गति से होता है तो कभी अपरदन की गति अधिक होती है। भूआकृति का स्वरूपा इसी अनुपात पर निर्भर करता है।
(4) पैक डेविस की तरह चक्रीय प्रणाली में विश्वास नहीं करते हैं।
(5) पैंक स्थलरूपाों के विकास की कोई समय सीमा नहीं मानते हैं। स्थलरूपाों के विकास संरचना प्रक्रम जलवायु ढाल आदि तत्वों पर निर्भर करता है।
पैंक के सिद्धान्त की विवेचना:- पैंक के अनुसार जब भी कोई भूखण्ड समुद्र से बाहर आता है तो उत्थान मंद गति से लम्बे समय तक चलता है। बाहर आते ही इस पर विभिन्न प्रक्रम अपना अपरदन कार्य शुरू कर देते हैं। इससे ढाल का निर्माण होता है। उत्थान की दर व अपरदन की दर ढाल की प्रवणता निर्धारित करती है। स्थलरूपाों के विकास में पैंक ने तीन नामावलियों का प्रयोग किया जो उत्थान की मित्रता का द्योतक है-
(1) आघस्तीजिण्डे इण्टिविकलुंग (Aufteigende Entwicklung) – यह उत्थान की प्रथम अवस्था है। इसमें स्थल खण्ड धीरे-धीरे ऊपर उठता है व अपरदन भी प्रारंभ हो जाता है।
(2) ग्लीसग्लारमिंग इण्टिविकलुंग (Gleicglorming Entwicklung) – इस अवस्था में स्थल खण्ड के उत्थान की गति तीव्र हो जाती है। साथ ही ढाल प्रवणता बढ़ती है व अपरदन की गति भी उसी दर से बढ़ जाती है।
(3) आव्स्तीजिण्डे इण्टिविकलुंग (Absteigende Entwicklung) – इस अवस्था में उत्थान की गति अत्यधिक मंद हो जाती है व कछ समय बाद समाप्त हो जाता है। अपरदन की गति भी मंद होने लगती है।
पैंक ने भी अपरदन चक्र को ग्राफीय व्यवस्था से भिन्न प्रकार से समझाया है। क्षैतिज रेखा पर समय व लंबवत रेखा स्थलखण्ड की ऊँचाई बताती है। दो वक्र औसत उच्चतम व न्यनतम उच्चावच को प्रदर्शित करते हैं। पैंक का अपरदन चक्र विकास मान स्वरूपा रखता है। इसमें पाँच अवस्थायें देखी जा सकती हैं –
(1) प्रथम अवस्था – उत्थान की प्रथम अवस्था का द्योतक है। उत्थान की गति बहुत मंद होती है। अपरदन की दर उत्थान की दर से कम होती है अतः भूखण्ड की कुल ऊँचाई बढ़ती जाती है। नदियों का जन्म होता है।
(2) द्वितीय अवस्था- इस अवस्था में भी उत्थान जारी रहता है। कुल ऊँचाई में वृद्धि होती रहती है। अपरदन की दर भी बढ़ जाती है, परन्तु उत्थान की दर से कम ही रहती है जिससे नदी गहरी घाटी बनाती है। धरातल पर विषमताएँ उत्पन्न होने लगती हैं।
(3) तृतीय अवस्था – यह मध्यवर्ती अवस्था है। उत्थान व अपरदन की दर समान हो जाती है। अतः उच्चावचन में वृद्धि नहीं होती। दोनों वक्र एक दूसरे के समानान्तर हो जाते हैं।
(4) चतुर्थ अवस्था – उत्थान की दर मंद पड़ जाती है व अपरदन की दर बढ़ जाती है। ढाल प्रवणता बढ़ जाती है। उत्थान की दर कम हो जाती है। इस कारण ऊँचाई का ह्रास होने लगता है। नदी की घाटी चैड़ी होने लगती है। साथ ही गहरी भी होती है।
(5) पाँचवीं अवस्था – इस अवस्था को पैंक सबसे लम्बा मानते हैं। उत्थान समाप्त हो जाता है। नदियों की कटाव क्षमता भी घटने लगती है।
अतः ऊँचाइयाँ घटने लगती हैं। विषमतायें धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। अंत में इन्ड्रम्प का निर्माण पक का संकल्पना में अपरदन चक्र का प्रारंभ प्राइमारम्प (Primarump) से होता है। इसका ढाल लाता है। इस पर विभिन्न भूरूपा जन्म लेते हैं तथा अंत में आकृति विहीन समतल मैदान रह जाता है जिसे इण्ड्रम्प (endrump) कहा है। इसमें ढाल अवतल हो जाता है।
पैंक ने भी भूआकृतियों के विकास में संरचना प्रक्रम व ढाल को अधिक महत्व प्रदान किया, परन्तु पैंक के विचारों को भी आलोचना का सामना करना पड़ा।
(1) पैक द्वारा सिद्धान्त को अत्यधिक गणितीय बना दिया गया जिसे प्रारंभ में लोग समझ नहीं पाये। इसीलिये पैक को उवेज उपेनदकमतेजववक हमवहतंचीमत कहा जाता है।
(2) पैंक का विश्लेषण अत्यधिक जटिल है। उत्थान की दर कभी मंद तो कभी अधिक होती है। इसी प्रकार अपरदन भी असमान दर से होता है। इसका कारण पैंक ने स्पष्ट नहीं किया है।
(3) कई विद्वान यह मानते हैं कि भू-आकृतियों के विकास में ढाल को इतना अधिक महत्व देना तर्कसंगत नहीं है।
(4) पैंक का मत जटिल व काल्पनिक प्रतीत होता है।
अपरदन चक्र की बाधायें
(Obstruction in Cycle of Erosion)
वास्तविक जीवन में हम भूआकृतियों का विकास न तो डेविस के सिद्धान्त की तरह सरल पारे हैं, न ही पैक के विचारों के अनुसार ढाल का नियन्त्रण देखते हैं। भूआकृतियों में दोनों के द्वारा बतायी गयी अवस्थायें क्रमानुसार देखने को नहीं मिलती। आधार तल में परिवर्तन हो जाने से अपरदन चक्र का नवीन रूपा विकसित हो जाता है। इसे ही अपरदन चक्र में बाधा या पुर्ननवीनीकरण (Rejuvination) कहते हैं। यह कई प्रकार से घटित होता हैः-
(1) भूगर्भिक हलचलों के कारण स्थलमण्डल का यदि उत्थान हो जाए या उसमें अवतलन हो तो नदियों को पुनः अपरदन की शक्ति प्राप्त हो जाती है। वे पुनः युवावस्था में पहुँच जाती हैं। स्थल के उत्थान या सागर तट के अवतलन से ढाल में परिवर्तन होता है इससे नदी की प्रवाह गति बढ़ जाती है जिससे अपरदन क्षमता बढ़ती है। नदी पुनः अपनी घाटी को गहरा करने लगती है व नदी घाटी में वेदिकाओं का निर्माण होता है। नदी के प्रवाह मार्ग में यदि स्थल का उत्थान हो या सागर तल ऊँचा हो जाए तो अपरदन चक्र रुक जाता है। नदी के ढाल में कमी आने से निक्षेप की क्रिया बढ़ जाती है क्योंकि नदी में परिवहन क्षमता घट जाती है। इस प्रकार अपरदन चक्र की अवस्थाओं में परिवर्तन देखा जा सकता है।
(2) समुद्र तल में परिवर्तन होने पर भी अपरदन चक्र में अवरोध उत्पन्न होता है। प्लीसटोसीन हिमयुग में सागर तल के 60 मीटर नीचे चले जाने से नदियाँ प्रौढ़ावस्था से युवावस्था में पहुँच गयी थी जब हिमयुग समाप्ति के बाद सागर तल ऊपर आ गया तो इनकी अपरदन शक्ति घट गयी। इस कारण निक्षेप अधिक होने लगा। नदियों ने मैदानी व पर्वतपदीय क्षेत्रों में अपने अवसाद छोड़ दिये। कनाडा मध्य यूरोप में नदियों के अपरदन चक्र में अवरोध देखे जा सकते हैं।
(3) नदी की गति मंद हो गयी क्योंकि ढाल में कमी आ गयी थी। चट्टानों की स्थिति व संरचना में विभिन्नता भी अपरदन चक्र में बाधा डालती है। कठोर चट्टान नदी घाटी में आ जाने से अपरदन के गति मंद हो जाती है व चक्र में बाधा उत्पन्न होती है। कठोर चट्टानें धीमें कटती हैं अतः नदी घाटी के गहरा नहीं कर पाती, इससे साथ आये अवसादों का निक्षेप प्रारंभ हो जाता है। नदी के मार्ग में घुमाव पड़ लगता है। इस प्रकार की बाधा अल्पकालिक होती है। इससे नदी की अवस्था का काल लम्बा हो जाता है कुछ समय पश्चात जब कठोर चट्टान कट जाती है या टूट जाती है तब नदी पुनः अपनी पूर्व अवस्थ में पहुँच जाती है।
(4) ज्वालामुखी विस्फोट व भूकम्प आदि से स्थानीय रूपा से भूखण्ड के ढाल में परिवर्तन हो जा है, जिससे अपरदन चक्र में बाधा उत्पन्न होती है। अगर भूखण्ड ऊपर उठ जाता है तो अपरदन चन पुनः नवीनीकरण होने लगता है।
(5) जलवायु परिवर्तन से भी अपरदन चक्र में बाधा आती है। जलवायु के शुष्क हो जाने पर नदियों में जल की कमी हो जाती है तथा उनकी युवावस्था समाप्त होने लगती है। उनकी अपरदन क्षमता व अवसादों की परिवहन क्षमता जल के अभाव में घट जाती है तथा वो अवसादों को मार्ग में ही छोड़ देती है। इसके पति अधिक वर्षा या हिम के पिघलने से नदी में अचानक जल की मात्रा बढ़ जाती है, तब नदी की अपरदन व परिवहन क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रकार पूर्व अपरदन चक्र रुक जाता है तथा नया चक्र क्षमता प्रारंभ हो जाता है।
इसके अतिरिक्त नदी में अवसादों की अधिकता भूस्खलन, सरिता, अपहरण, झीलों का भरना आदि अनेक कारण हो सकते हैं जिससे अपरदन चक्र का कभी पुर्ननवीनीकरण हो जाता है और कभी उसका शीघ्र समय से पूर्व समापन हो जाता है। पृथ्वी पर लाखों वर्षों से ऐसा होता चला आ रहा है इसी कारण स्थलरूपा विकास को प्रदर्शित करते हैं। इनका स्वरूपा जटिल होता है। हर जगह स्थलरूपाों का विकास अपनी यता रखता है। उसे किसी एक सिद्धान्त के आधार पर स्पष्ट नहीं किया जा सकता।
महत्वपूर्ण प्रश्न
दीर्घउत्तरीय प्रश्न –
1. स्थलरूपाों के विकास पर प्रकाश डालते हुए स्थलरूपाों के विभिन्न उपागम बताइए।
2. स्थलरूपाी अपरदन चक्र की संकल्पना एवं बाधायें स्पष्ट कीजिए।
लघुउत्तरीय प्रश्न –
1. स्थलरूपाों के विकास से तुम क्या समझते हो?
2. स्थलरूपाों के कोई दो उपागम बताइए।
3. अपरदन चक्र की संकल्पना स्पष्ट कीजिए।
4. बैंक द्वारा अपरदन चक्र की व्याख्या कीजिए।
5. अपरदन चक्र की बाधाये स्पष्ट कीजिए।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1. डेविस ने अपना अपरदन चक्र कब प्रस्तुत किया-
(अ)1899 (ब)1890 (स)1901 (द) 1905
2. अपरदन चक्र की सर्वप्रथम संकल्पना किसने रखी-
(अ) डेविस (ब) जेम्स हटन (स) वाल्टर (द) वारसेक्टर
3. डेविस के भौगोलिक चक्र के सबसे बड़े आलोचक-
(अ) हटन (ब) वाल्टर (स) बैंक (द) रुसवी
4. ॅण्डण् डेविस महोदय ने स्थलरूपाों के विकास से संबंधित वास्तविक सामान्य सिद्धान्त कब प्रस्तुत किया-
(अ)1890 (ब)1989 (स) 1889 (द) 1920
5. डेविस के अपरदन चक्र का आधार-
(अ) संरचना (ब) प्रक्रम (ब्) अवस्था (द) उपरोक्त तीनों
उत्तर- 1. (अ), 2. (ब), 3. (स), 4. (स), 5.(द)