केकड़ा का जीवन परिचय क्या है | crustaceans in hindi definition meaning केकडे़ का फोटो

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केकडे़ का फोटो केकड़ा का जीवन परिचय क्या है | crustaceans in hindi definition meaning ?

 क्रस्टेशिया (केकड़ा)
केकडे़ समुद्र में विभिन्न क्रे-मछलियों के अलावा केकड़े (प्राकृति ३७) भी रहते हैं। केकड़े क्रे-मछली की तरह दिखाई देते है पर इनमें अन्तर यह है कि केकड़े का उदर अपरिवर्दि्धत होता है और चैड़े शिरोवक्ष के नीचे मुड़ा रहता है।
केकड़े अपने सुपरिवर्दि्धत वक्ष-पादों के सहारे चलते हैं। पैरों के पहले जोड़े के सिरों पर स्थित मजबूत पंजों को उठाते हुए वे पानी के तल में जल्दी जल्दी दौड़ते हैं।
गति के इस ढंग के कारण केकड़े के मजबूती से परिवर्दि्धत चैड़ा शिरोवक्ष होता है जिसमें जोड़युक्त पैरों के पांच जोड़े लगे रहते हैं। साथ साथ उदर का तैरने के काम में उपयोग न किया जाने के कारण वह अपरिवर्दि्धत रहता है।
बहुत-से केकड़े खाने योग्य होते हैं और बहुत बड़ी मात्रा में उनका शिकार किया जाता है । केकड़े का अत्यन्त पोषक मांस डिब्बों में बन्द करके बेचा जाता है।
डैफनिया डैफनिया (आकृति ३८) एक छोटा-सा ताजे पानी का क्रस्टेशियन है। नदी की क्रे-मछली के विपरीत इसका हल्का अर्धपारदर्शी शरीर पानी में टंगा हुआ सा रहता है।
डैफनिया के पैर जलतल में रेंगने के काम में नहीं आते और इसी लिए वे अपरिवर्दि्धत रहते हैं। गति की इन्द्रियों का काम दो जोड़ा शृंगिकाएं करती हैं। अपनी शृंगिकाओं को लहराते हुए यह प्राणी पानी में उछलता-कूदता है और इधर-उधर चलता है। इसी कारण शृंगिकाएं सुपरिवर्दि्धत और शाखाधारी होती हैं। उछल-कदवाली गति के कारण डैफनिया को जलपिस्सू भी कहते हैं।
डैफनिया सूक्ष्म कार्बनीय कण और पानी में स्थित सूक्ष्म जीव खाकर जीता है। पर डैफनिया भी बड़ी भारी मात्राओं में मछलियों के बच्चों द्वारा चट किये जाते हैं। सोवियत वैज्ञानिकों ने तालाबों में संवर्दि्धत मछलियों को खिलाने के लिए डैफनिया के संवर्द्धन के तरीके विकसित किये हैं । कार्प-मछली के बच्चों के संवर्द्धन के लिए उपयुक्त तालाब के पहले हिस्से में एक गड्ढा बनाया जाता है। इस गड्ढे में ताजी खाद और रद्दी घास रखी जाती है। इसके बाद वह गड्ढा कुछ डैफनियों सहित पानी से भर दिया जाता है। ़१८ से़२० सेंटीग्रेड तक के तापमान में इस गड्ढे में पैरामीशियम तथा अन्य इनफसोरिया बड़ी शीघ्रता से पैदा होते हैं । भोजन के रूप में इनका उपयोग करके डैफनिया शीघ्रता से बड़े होते हैं और उनकी संख्या भी बढ़ती जाती है।
मछलियां केवल डैफनिया ही नहीं बल्कि एक आंखवाले साइक्लाप नामक ऋस्टेशियन भी खाती हैं। साइक्लाप डैफनिया से भी छोटे होते हैं।
क्रस्टेशिया वर्ग नदी की क्रे-मछली , केकड़े, डैफनिया और साइक्लाप जैसे आरोपोडा ऋस्टेशिया वर्ग में गिने जाते हैं। इस वर्ग के प्राणी कई विशेषताओं के कारण आरोपोडा के दूसरे वर्गों से भिन्न पाये जाते है। अले क्रस्टेगिया के ही शृंगिकारों के दो जोड़े होते हैं और वे जल-श्वसनिकायों में मांस लेने हैं।
प्रश्न – १. केकड़े और के-मछली में क्या अंतर है? २. कौनसे मंरचनात्मक लक्षणों के कारण डैफनिया को क्रे-मछली से भिन्न माना जाता है? ३. राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था में छोटे ऋस्टेशिया का उपयोग किस प्रकार किया जाता है ? ४. कौनसी विशेषताओं के कारण प्राणियों को क्रस्टेशिया वर्ग में रखा जाता है ?
व्यावहारिक अभ्यास – गरमियों के मौसम में किसी धुपहले दिन में किमी तालाब में कुछ डैफनिया और साइक्लाप पकड़कर लाओ। उन्हें पानी से भरे शीशे के बरतन में छोड़ दो और उनकी गति का निरीक्षण करो। खुर्दबीन या माइक्रोस्कोप के सहारे इन प्राणियों की जांच करो।
 क्रॉसधारी मकड़ी
बाह्य लक्षण क्रॉसधारी मकड़ी (प्राकृति ३६) कई विशेषताओं के कारण के-मछली से भिन्न है। इसका शरीर दो हिस्सों में वंटा रहता है- शिरोवक्ष और उदर। पर इसका उदर वृत्तखण्डसहित नहीं होता। मकड़ी के चार जौड़े पैर होते हैं। इसके न शृंगिका होती है और न संयुक्त आंखें ही। अन्य मकड़ियों की तुलना में क्रॉसधारी मकड़ी की विशेपता यह है कि उसकी पीठ पर क्रॉस जैसा एक चिह्न होता है। इससे यह क्रॉसधारी मकड़ी कहलाती है।
क्रॉसधारी मकड़ी एक शिकारभक्षी प्राणी है। वह मुख्यतया अपने जाले में फंसाये हुए कीटों को खाकर जीता है।
मकड़ी मुख्यतया दृष्टि और स्पर्श की सहायता से वातावरण से संपर्क रखती है। उसके शिरोवक्ष के अगले किनारे पर साधारण आंखों के चार जोड़े होते हैं । मकड़ी का मुख्य भोजन जिन्दा प्राणी होने के कारण वह केवल चलते-फिरते प्राणियों को ही ठीक से देख सकती है।
मकड़ी के पैरों में नखर होते हैं और इनकी कई संरचनाएं होती हैं। इनमें से कुछ कंघी की तरह दांतेदार होते हैं और जाले के तन्तुओं को जोड़ने का काम करते हैं। दूसरे चिकने होते हैं और इनके सहारे मकड़ी अपने जाले पर शीघ्रता से दौड़ सकती है।
जाला मकड़ी अपना शिकार महीन तन्तुओं से बने जाले में पकड़ती है। यह तंतु बिनाई ग्रन्थियों से निकलनेवाले द्रव से बनता है। यह द्रव अनगिनत बारीक वाहिनियों के जरिये उदर के पिछले सिरे में स्थित जाल-कर्तनांग की नोकों से बाहर निकलता है। हवा के संपर्क में आते ही वह फौरन सख्त होकर सैकड़ों बारीक तंतुओं में परिवर्तित हो जाता है। पिछले पैरों के कंघी जैसे नखरों के सहारे मकड़ी इन्हें जाले के मोटे तंतु में बदल डालती है। यह तंतु चिपचिपा नहीं होता। ठोस चीजों में उसे चिपकाकर मकड़ी एक बहुकोणीय चैखट-सी बना लेती है और एक लम्बे आड़े तन्तु के सहारे उसके आमने-सामने के हिस्से जोड़ देती है। उस तन्तु के बीचोंबीचवाले विन्दु से मकड़ी छोटी छोटी त्रिज्याएं डालती है जो केन्द्रीय विन्दु और बहुकोणीय जाले के बाजुओं को जोड़ देती हैं। इस अवस्था में जाला बहुकोणीय हाल और पारों वाले पहिये-सा लगता हैं (आकृति ३६ )।
इसके बाद मकड़ी चिपचिपा जाला रसने लगती है। वह त्रिज्यानों पर कुंडलाकार गति में चढ़ती जाती है और इस तरह जाले का फंदा बना लेती है।
जाला बनकर तैयार होने के बाद मकड़ी जाले से लेकर किसी आश्रय-स्थान तक एक चेतावनी तन्तु डाल देती है।
यदि मक्खी या दुसरा कोई कीट जाले में चिपककर मुक्त होने के लिए पैर झटकने लगता है तो फौरन चेतावनी तन्तु कांप उठता है। जैसे ही मकड़ी को जाले के हिलने का बोध होता है वह फौरन घात लगाने के स्थान से उचककर फंसे हुए कीड़े की ओर दौड़ पड़ती है। मक्खी को काटकर मकड़ी उस घाव में एक शीघ्रप्रभावी विष टपका देती है और साथ साथ पाचक रस भी। इसके बाद वह मक्खी को जाले में फंसा-लिपटाकर वहीं छोड़ देती है।
पाचक रस के प्रभाव से सम्बन्धित कीड़े के अंदरूनी अंग उसके काइटिन युक्त आवरण के अंदर शीघ्रता से पच जाते हैं। कुछ देर बाद मकड़ी अपने शिकार के पास लौट आती है और पचे हुए अंश को चूस लेती है। जाले में रहता है बस उस कीड़े का खाली काइटिन युक्त आवरण ।
सहज प्रवृत्तियां मकड़ी द्वारा जाले का निर्माण, संबद्ध अचेत क्रियाओं का एक सिलसिला होता है। ये क्रियाएं प्रतिवर्ती क्रियाएं कहलाती हैं। संबद्ध प्रतिवर्ती क्रियाओं को सहज प्रवृत्ति कहते हैं ।
प्राणियों की सहज प्रवृत्तियां आनुवंशिक होती हैं। अण्डों से छोटी मकड़ियों के पैदा होते समय यह आसानी से देखा जा सकता है। यह क्रिया माता की अनुपस्थिति में होती है। मकड़ी के बच्चों को ‘कातनेश् का काम कोई सिखाता नहीं और फिर भी वे फौरन अपना जाला बुनने लगते हैं।
प्रश्न – १. क्रॉसघारी मकड़ी की संरचना और जीवन की मुख्य विशेषताएं क्या हैं ? २. मकड़ी अपना जाला कैसे बुनती है ? ३. सहज प्रवृत्ति क्या होती है ?
व्यावहारिक अभ्यास – शरद ऋतु में उद्यान या बगीचे में मकड़ी का कोमा ढूंढ लो और उसे एक टेस्ट-ट्यूब में डाल दो। नली का मुंह रूई से बंद कर दो। देखो अंडों से किस प्रकार बच्चे निकलते हैं।