फसल चक्र , crop rotation , फसल चक्र के प्रमुख उदाहरण , जैव पीडकनाशी तथा कीटनाशी , Bacillus Thuringiensis

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crop rotation (फसल चक्र) : एक खेत में प्रतिवर्ष बदल बदलकर फसल बौने का प्रक्रम फसल चक्र या क्रॉप रोटेशन कहलाता है।

सामान्यत: निम्न कारणों से फसल चक्र अत्यधिक आवश्यक है –
(A) एक खेत में लगातार एक प्रकार की फसल उत्पन्न करने से किसी एक विशिष्ट पोषक तत्व की या खनिज की कमी हो सकती है जो भूमि की उर्वरक क्षमता को प्रभावित करती है।
(B) लगातार एक ही प्रकार की फसल उत्पन्न किये जाने पर मृदा जन्य पादप रोग उत्पन्न हो सकते है जो भूमि की उर्वरक क्षमता को प्रभावित करते है।
(C) लगातार एक ही प्रकार की फसल उत्पन्न करने से उत्पादन क्षमता प्रभावित होती है।
फसल चक्र अपनाए जाने पर निम्न लाभ होते है –
(A) फसल चक्र के प्रक्रम के अंतर्गत परिवर्तित करके भिन्न भिन्न फसल उत्पन्न किये जाने पर मृदा में पोषक तत्वों की न्यूनता नहीं होती क्योंकि सभी पादपो की आवश्यकतायें पृथक होती है।
(B) फसल चक्र प्रक्रम अपनाने पर उत्पन्न होने वाला कोई मृदा जन्य पादप रोग अगली ऋतु में परपोषी अनुपस्थित होने के कारण स्वत: ही नष्ट हो जाता है।
फसल चक्र के प्रमुख उदाहरण निम्न प्रकार से है –
फसल चक्र के अन्तर्गत बोई जाने वाली फसले एकवर्षीय , द्विवर्षीय तथा त्रिवर्षीय हो सकती है।
कुछ एक वर्षीय फसलें जो फसल चक्र के अंतर्गत बौइ जाती है , निम्न है –
(A) मक्का तथा सरसों।
(B) चावल तथा सरसों
फसल चक्र के अन्तर्गत बोई जाने वाली द्विवर्षीय फसलें निम्न प्रकार से है –
(A) मक्का तथा सरसों
(B) गन्ना तथा मेथी
(C) मक्का तथा आलू
(D) गन्ना तथा मटर
त्रिवर्षीय फसलों के कुछ उदाहरण जिन्हें फसल चक्र के अंतर्गत बोया जाता है निम्न है –
(A) चावल तथा गेहूँ
(B) मुंग तथा सरसों
(C) गन्ना तथा बर्सी
(D) कपास
(E) गेहूँ तथा मटर
(F) गन्ना तथा मटर

जैव पीडकनाशी तथा कीटनाशी

  • वे प्राकृतिक पदार्थ जिनकी सहायता से पादपो पर निर्भर रहने वाले विभिन्न प्रकार के पीडक तथा किट नष्ट किये जाए , जैव पीडक नाशी या कीट नाशी कहलाते है।
  • यह प्राकृतिक पदार्थ सामान्यत: जीवाणु , विषाणु , कवक , प्रोटोजोआ आदि हो सकते है।
  • जैव पीड़क नाशी के रूप में उपयोग किये जाने वाले कुछ प्रमुख प्राकृतिक पदार्थ निम्न प्रकार से है –

(A) Bacillus Thuringiensis नामक जीवाणु से प्राप्त cry प्रोटीन

  • Bacillus thuringiensis मृदा में पाया जाने वाला एक स्वतंत्र जीवाणु है , इसके आनुवांशिक पदार्थ में एक विशेष जीन cry जीन पाया जाता है जो प्रोटीन संश्लेषण की क्रिया से एक विशेष प्रोटीन उत्पन्न करता है जिसे cry protine के नाम से जाना जाता है।  यह cry प्रोटीन जीवाणु के शरीर में असक्रीय अवस्था में पाए जाते है परन्तु क्षारीय माध्यम प्राप्त होने पर यह सक्रीय होकर विष में परिवर्तित हो जाते है जिसे Bt-विष के नाम से जाना जाता है।
  • अत: इस जीवाणु के cry प्रोटीन को बिजाणुक के रूप में उपयोग किया जाता है।  बाजार में उपलब्ध यह बीजाणु जल में घोलकर पादपों पर छिडके जाते है तथा यह बिजाणुक पादप के भागो से चिपक जाते है।
  • किसी पीडक /कीट के ऐसे पादपीय भागो का उपयोग करने पर यह बिजाणुक ऐसे पीड़क/किट के आंत में पहुंचकर क्षारीय माध्यम उपलब्ध होने के कारण सक्रीय हो जाते है तथा आंत की उपकला स्तर की कोशिकाओ से चिपक कर उन्हें फुला देते है जिसके फलस्वरूप यह कोशिकाएं नष्ट हो जाती है तथा ऐसे कीट / पीड़क की आँत में छिद्र उत्पन्न हो जाते है जिसके कारण ऐसे पीडक या किट की मृत्यु हो जाती है अत: इसके उपयोग से भूमि की उर्वरकता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा पारस्थितिक संतुलन भी बना रहती है।
नोट : Bacillus thuringiensis के बिजाणुक सामान्यत: कपास के ball worm तथा मक्का छेढ़क के प्रति उपयोग किये जाते है।
cry protein संश्लेषित करने हेतु सामान्यत: Cry I Ab , CryIIAb तथा CryIAC geue उत्तरदायी होते है।
पीडक या कीटो को किसी जीवाणु कवक या प्रोटोजोआ की सहायता से नियंत्रित किया जाए तो यह क्रिया जैव नियंत्रण या बायो कंट्रोल के नाम से जानी जाती है।
जैव नियन्त्रण के अन्तर्गत उपरोक्त उपाय के अतिरिक्त चक्रीय फसल पद्धति या किसी विशेष प्रकार के परजीवी या परपोषी का भी उपयोग किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त पीड़क या कीटों के जनन की क्षमता में तथा संख्या में कमी करके नियंत्रण किया जा सकता है।
जैव नियन्त्रण के अंतर्गत अपनाएँ जाने वाले कुछ अन्य उपाय या विधियाँ निम्न प्रकार से है –
(A) नियोजित फसल चक्र अपनाकर।
(B) किसी विशेष रसायन या विकिरण की सहायता से पिड्को के नर सदस्य को बंध्य बनाकर।
(C) पीडको पर किसी विशेष हार्मोन का उपयोग कर उनके जीवन चक्र को बाधित किया जा सकता है।
(D) किसी परजीवी का पिड्को का संक्रमण करवाकर पीडकों की संख्या नियंत्रित की जा सकती है।
प्रश्न : पीड़क नाशी या किटनाशी के रूप में किसी रासायनिक पदार्थ को उपयोग किये जाने के कुछ हानिकारक प्रभाव बताइयें।
उत्तर : कुछ हानिकारक प्रभाव निम्न प्रकार से है –
  • यह रसायन विषैले तथा प्रदूषक होते है।
  • इनके द्वारा उपभोग करने वाले के शरीर पर तथा स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डाला जाता है।
  • इनके उपयोग से कृषि भूमि की उर्वरता में कमी आती है।
  • इनके उपयोग से पीडक तथा कीटो की प्रतिरोधकता में वृद्धि होती है जिसके कारण कुछ समय में उपयोग किये जाने वाले रसायन प्रभावहीन हो जाते है।