फसल हानि मूल्यांकन का महत्व क्या है |  फसल हानियों के प्रकार विधि crop loss assessment in hindi

By  

crop loss assessment in hindi definition meaning फसल हानि मूल्यांकन का महत्व क्या है |  फसल हानियों के प्रकार विधि ?

फसल हानि मूल्यांकन का महत्व
पीड़कों द्वारा फसल की हानि वाली हानियों का मूल्यांकन करना इसलिए आवश्यक है ताकि उनके आपेक्षिक महत्व का पता चल जाए। पीड़क द्वारा होने वाली क्षति जितनी ज्यादा होगी उतनी ही ज्यादा आवश्कता होगी उनके प्रबंधन की। फसल हानि की जानकारी इसलिए भी उपयोगी है ताकि रोके जा सकने वाली क्षति की मात्रा का और उसके फलस्वरूप उत्पादन में प्रत्याशित वृद्धि का पता चल सके। पीड़कों द्वारा होने वाली क्षति को परिभाषित कर सकते हैं कि यह प्रयोग्य उत्पादन में होने वाली कमी होती है। उत्पादन के तीन स्तर होते हैरू सम्भाव्य, प्राप्य तथा वास्तविक उत्पादन। सम्भाव्य उत्पादन का निर्धारण मौसम तथा फसल के जीनप्ररूप पर निर्भर होता है। इसमें पोषकों तथा जल का कोई प्रतिबंध नहीं है। साथ ही कोई पीड़क दबाव भी नहीं है। इस प्रकार का उत्पादन बहुत छोटे पैमाने पर होता है विशेषकर प्रयोगात्मक भूखण्डों पर। जब कभी पोषकों तथा जल का प्रतिबल पैदा हो रहा हो तब फसल का सम्भाव्य उत्पादन घट कर प्राप्तशील स्तर पर आ जाता है। पोषकों तथा जल को उत्पादन हासी कारक कहा जाता है। यहां भी पीड़क दबाव मौजूद नहीं है। यह वह उत्पादन है जो कृषक के खेत में प्रभावशाली सुरक्षा उपायों के साथ प्राप्त होता है। जल तथा पोषक दबाव के अतिरिक्त जब पीड़क दबाव भी मौजूद हो तब प्राप्य उत्पादन घटकर वास्तविक उत्पादन पर आ जाता है। पीड़कों को उत्पाद-ह््रासी कारक कहा जाता है। अतरू प्राप्य उत्पादन तथा वास्तविक उत्पादन का अंतर वह हानि है जो पीड़कों के कारण हुई होती है। हम चाहते हैं कि पीड़क प्रबंधन के द्वारा इस खायी को यथासम्भव पाटा जाए।

खेत में एक ही फसल पर अनेक पीडक साथ-साथ रहते पाए जा सकते हैं। हम किसी भी फसल के लिए पूर्ण रूपरेखा बना सकते हैं। पीड़क रूपरेखा में फसल की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान पीड़कों के क्या-क्या क्रियाकलाप होते हैं उनका सब का लेखा-जोख होता है। इसके द्वारा विभिन्न पीड़कों का आपेक्षिक महत्व समझने में सहायता मिल सकती है अथवा यह पता लगाने में भी कि फसल के उत्पादन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कठिनाई क्या थी और इसी प्रकार पीड़क के क्रियाकलाप के क्षति काल का पता चल जाता है।

 फसल हानियों के प्रकार
फसल हानियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता हैरू
ऽ खेत में फसल काटने के पूर्व हुई हानियां
ऽ भण्डारण अथवा संसाधन के दौरान हुई हानियां

हानि का होना केवल मात्रात्मक ही नहीं वरन गुणात्मक भी हो सकता है। फलों तथा सब्जियों में कीटों का होना उपभोक्ताओं द्वारा उनको स्वीकारने में कमी ला सकता है। फूल गोभी में स्पोडॉप्टेरा अथवा एफिडों के होने से उनका मूल्य गिर जाता है। सेब के ऊपर बने चकत्तों से उनका बाजार मूल्य घट जाता है। रूई का ष्स्टेनर”, कपास के लाल मत्कुण से रूई की गुणवत्ता कम हो जाती है। एफिडों तथा अन्य चूषक कीटों से फूल तथा फल लसलसे हो जाते हैं और देखने में अच्छे नहीं लगते। पीड़कों से फसलों को चार प्रकार से हानि होती हैरू (प) पत्तियों का प्रकाश संश्लेषी क्षेत्र नष्ट करके (पप) भण्डारण अंगों जैसे कि आलू, शकरकन्द अथवा गन्ने की पोरियों में भण्डारित अंतर्वस्तु को नष्ट करके (पपप) जनन भागों जैसे फूल, फल तथा बीज को क्षति पहुंचा कर, और (पअ) जड़ों द्वारा जल तथा पोषकों के ग्रहण किए जाने में बाधा डाल कर।

फसल हानि मूल्यांकन की विधियां
पीड़कों के द्वारा होने वाली फसल हानियों का इन विधियों द्वारा मूल्यांकन किया जा सकता हैरू
ऽ पीड़क के प्राकृतिक ग्रसन स्तरों का उपयोग करके
ऽ पीड़कों के नियंत्रण हेतु कीटनाशकों का उपयोग करके
ऽ फसल पर पीड़क आक्रमण को रोकने हेतु भौतिक अवरोध का उपयोग करके
ऽ प्रतिरोधी तथा सुग्राह्य किस्मों का उपयोग करके

1) प्राकृतिक ग्रसन के अंतर्गत हानि मूल्यांकन रू क्षेत्र में फसल के पौधों पर सब में एक जैसा ग्रसन नहीं होता। कुछ पौधों पर ज्यादा ग्रसन होता है, कुछ पर हल्का होता है और कुछ पौधे साफ बचे रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में कई ग्रसित पौधों तथा कई अग्रसित पौधों के उत्पादन के आंकड़े इकट्ठे किए जा सकते हैं । अग्रसित तथा ग्रसित पौधों की औसत उपज निकाली जा सकती है, और इन दो उत्पादनों के बीच का अंतर पीड़क द्वारा हुई हानि होगी। प्रतिशत उत्पादन ह््रास प्रकार निकाला जा सकता हैरू

प्रतिशत ह््रास = अग्रसित पौधों का उत्पादन – ग्रसित पौधों का उत्पादन
अग्रसित पौधों का उत्पादन x 1000
इस विधि में ध्यान रखना होगा कि प्रतिचयन में पीड़क ग्रसन के सभी स्तरों वाले पौधे शामिल किए जाएं। समस्याएं तब आती हैं जब फसल-पौधों पर अन्य पीड़क भी मौजूद हों। वॉकर (ॅंसामत) ने ग्रसन-तीव्रता तथा उत्पादन के बीच छरू प्रकार के संबंधों का सुझाव रखा है (चित्र 7.14 ं.ि)।

ं) कुछ मामलों में ग्रसन के बढ़ते जाने के साथ-साथ उत्पादन भी उसी अनुपात में घटता जाता है।
इ) परंतु सिग्मॉइड (S-आकार की) अनुक्रिया सर्वाधिक पायी जाती है।
ब) अति निम्न पीड़क समष्टि के कारण भी गंभीर क्षति हो सकती है और ऐसा तब होता है जब कुछ थोड़े से ही वाहक वायरस अथवा अन्य रोग-उत्पादक जीवों का संप्रेषण करते हों।
कद्ध उत्पादन का पीड़कों की संख्या के साथ लोगैरिमिक (लघुगणकीय) संबंध भी बना हो सकता है।
म) या यह उत्पादन हल्के ग्रसन के कारण बढ़ जाता हो।
ि) कुछ प्रोग्रामों में ग्रसन में वृद्धि होने से उत्पादन में कोई खास परिवर्तन नहीं होता ऐसा कदाचित इसलिए कि पौधे में पर्याप्त क्षतिपूर्ण संभव हो सकती है।

कौनवे (Conway, 1976) ने पीड़कों का वर्गीकरण साऊथवुड (1976) द्वारा वर्णन की गयी पारिस्थितिक रणनीतियों के आधार पर किया है, तथा उसने कीट पीड़कों के उदाहरण दिए हैं, जिन्हें त अथवा ा पीड़क माना जा सकता है (तालिका 7.1 तथा चित्र 7.15)।

प्रचित्र के एक सिरे पर त पीड़कों में जनन की उच्च सम्भाव्य दर होती है, जिसके कारण जैसे ही पर्यावरण दशाएं अर्थात् खाद्य आपूर्ति, तापमान, आर्द्रता तथा अन्य कारक अनुकूल हों वैसे ही उनकी समष्टियों में बहुत तेजी से वृद्धि होती है। यदि समष्टियों में प्राकृतिक शत्रुओं अथवा रोग के कारण भारी मृत्युता आ जाए तो उनमें फिर से तीव्र रूप में पीड़क समष्टि बढ़ा देने की क्षमता होती है। ऐसे पीड़क जैसे कि एफिड शीघ्रता से प्रकीर्णित हो जाते और वे नये आवास को ढूंढने और उनका समुपयोजन करने में सफल हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप उनका बहुत भारी फैलाव हो जाता है। जिसके कारण इससे पहले कि उनके प्राकृतिक शत्रु भी वहां पहुंच जाए, उनसे भारी क्षति पहुंच गयी होती है। प्रवासी पीड़क जैसे कि टिड्डियां और कुछ आर्मीवर्म त पीड़क होते हैं। इनके विपरीत k पीड़कों में वृद्धि दर अपेक्षाकृत कम होती है। k पीड़कों की प्रतिस्पर्धा क्षमता अधिक होती है, मगर उन्हें अधिक विशेषित आहार चाहिए।

अल्प समष्टियां महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, जैसे कि कॉड्लिग शलभ बागानों का एक मुख्य पीड़क है क्योंकि मांग ऐसे सेबों की होती है जो उच्च गुणवत्ता वाले और बेदाग हों।

महत्वपूर्ण पीड़क अक्सर या तो त रणनीति की या  k रणनीति के होते हैं, मगर अधिकतर पीड़क इन दोनों अतिसीमाओं के बीच मध्यवर्ती होते हैं। मध्यवर्ती पीड़कों की समष्टियों का सामान्यतरू प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा नियमन हुआ रहता है।

तालिका 7.1 – कुछ महत्वपूर्ण कीट पीड़क और उनके अभिलक्षण
स्पीशीज प्रति मादा जनन अवधि पीड़क के पहलू
(प्रजाति) उर्वरता
(लगभग)
r पीड़क 400 1-2 माह समय-समय पर प्रस्फोट
मरुस्थली टिड्डी जिनसे फसल का
(सिस्टोसळ ग्रीगैरिया) निष्पत्रण हो जाता है।
सेम का काला एफिड 100 1-2 सप्ताह बहुत से नानाविध फसल पौधे
(ऐफिड फाबी) जिनमें सेम और चुकंदर भी हैं।
घरेलू मक्खी 500 2-3 सप्ताह जैविक पदार्थ का अशन करती है।
(मस्का डोमेस्टिका)
काला कट-वर्म 1500 1-1.5 माह अधिकांश फसलों के नवोद्भिदों पर आक्रमण करते हैं।
(ऐग्रेटिस इप्सिलान)
k पीडक
गैंडा बीटल 50 3-4 माह व्यस्क नारियलों के शीर्षस्थ वृद्धिशील बिंदु पर आहार
(ओरिक्टीस राइनोसेरॉस) करता है। जिससे अक्सर फली मर जाती है।
सेट्सी फ्लाई 10 2-3 माह ट्रिपैनोसोमिऐसिस का वाहक, जिससे मानव तथा मवेशी दोनों
(ग्लैसाइना स्पी.) ही प्रभावित होते हैं।
कॉलिंग मॉथ 40 2-6 माह लार्वा सेबों तथा अन्य फलों को क्षति पहुंचाते हैं।
(साइडिआ पोमोनेला)

r पीड़कों के लिए उचित नियंत्रण तकनीक पीड़कनाशियों का उपयोग करना था, क्योंकि जब कभी पीड़कों का प्रकोप फैलता तो तीव्रता से तथा जैसा और जब-चाहे-तब मात्र इसी विधि से नियंत्रण किया जा सकता था। k पीड़कों के लिए भी पीड़कनाशियों का उपयोग तब ठीक रहता है जब उनकी छोटी समष्टियां ही बहुत ज्यादा हानि पहुंचाती हों, मगर जब भी हो सके वैकल्पिक रणनीतियां ही अपनानी चाहिए जैसे कि सस्य नियत्रण अथवा प्रतिरोधी किस्में ही इस्तेमाल में लायी जाएं (चित्र 7.15)।

2) कीटनाशियों के द्वारा पीड़क घनत्व का नियंत्रण रू इस विधि में कुछ फसल भूखण्डों को कीटनाशकों का उपयोग कर पीड़कों से पूरी तरह सुरक्षित रखा जाता है। अन्य भूखण्डों पर प्राकृतिक कीट ग्रसन से ग्रसित होने दिया जाता है। दोनों भूखण्डों की उपज
को लिख लिया जाता है। सुरक्षित फसल तथा असुरक्षित फसल के उत्पादन के अंतर से पीड़क द्वारा हुई फसल हानि पता चल जाती है। इन आंकड़ों से पीड़क द्वारा हुआ प्रतिशत उपज ह््रास परिकलित कर लिया जा सकता है। अलग-अलग भूखण्डों में अलग-अलग अंतराल पर कीटनाशकों का अनुप्रयोग करके परिवर्तनशील पीड़क स्तर भी पैदा किए जा सकते हैं। भिन्न पीड़क स्तरों से अलग-अलग भूखण्डों में भिन्न उपज प्राप्त होगी। इस उपज तथा पीड़क समष्टि आंकड़ों से एक गणितीय संबंध निकाला जा सकता है। आगे चलकर भविष्य में आकलन किया जा सकता है कि खेत में मौजूद पीड़क स्तर के आधार पर कितनी उपज होगी। कीटनाशकों के अनुप्रयोग में एक कमी है कि कुछ कीटनाशकों से फसल पर वृद्धि में बढ़ावा भी मिल सकता है। उस स्थिति में पीड़कों द्वारा होने वाली हानि को वास्तविकता से ज्यादा आकलित किया जाता है क्योंकि तब सुरक्षित और असुरक्षित फसल के उत्पादन में ज्यादा अंतर आएगा।

3) भौतिक अवरोधों के उपयोग से पीड़क घनत्वों का नियंत्रण रू इस विधि में फसलों को पीड़कों से बचाने के लिए पौधों, भूखण्डों और यहां तक कि खेतों को भी पिंजड़ों (cages) अथवा जालों (nets) में बंद किया जाता है। वृद्धि हेतु एक जैसी परिस्थितियां प्रदान के वास्ते ग्रसित फसल को पिंजड़ों अथवा अन्य घेरों में बंद किया जाना चाहिए। मगर पिंजड़े ऐसे होने चाहिए कि कीट उनमें से भीतर बाहर आ जा सकें तब सुरक्षित तथा ग्रसित फसल का उत्पादन निर्धारित किया जाता है और पीड़क के कारण हुई हानि का हिसाब लगा लिया जाता है।

4) प्रतिरोधी तथा सुग्राही किस्म का उपयोग रू यदि किसी फसल की सुग्राही तथा प्रतिरोधी किस्में उपलब्ध हों, तो उन्हें उगाया जा
सकता है। दोनों की उपज में पाया अंतर पीड़कों के कारण हुई हानि प्रतिराधी तथा सुग्राही किस्म के उपज विभव का उपज हानि के तर्कसंगत आकलन के साथ मेल खाना चाहिए। क्योंकि यदि प्रतिरोधी किस्म का उपज विभव कम हुआ तब पीड़क से होने वाली हानि कम होगी। परंतु, यदि प्रतिरोधी किस्म का उपज विभव अधिक हुआ तब पीड़क द्वारा होने वाली हानि ज्यादा मानी जाएगी।

बोध प्रश्न 8
प) प्रत्यक्ष पीड़क क्या होते हैं? कुछ उदाहरण दीजिए।
पप) विभव उत्पादन किसे कहते हैं?

 उत्तर
बोध प्रश्न

8) प) ऐसे पीड़क जो फसल के उत्पादन को बनाने वाले भागों की क्षति पहुंचाते हैं जैसे चने का फली छेदक, बैंगन का फल
छेदक, बेर की फल मक्खी, आदि ।
पप) पोषक, जल तथा पीड़क प्रतिरोध के न होने पर फसल का उत्पादन स्तर।