फौजी शासन क्या होता है ? सैनिक के बारे में जानकारी ? सैनिक के बारे में जानकारी countries ruled by army in hindi

By   September 18, 2020
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countries ruled by army in hindi फौजी शासन क्या होता है ? सैनिक के बारे में जानकारी ? सैनिक के बारे में जानकारी ?

परिभाषा : जब किसी देश में सरकार का सञ्चालन और सरकारी कार्य का संचालन फ़ौज के उच्च चीफ के द्वारा किया जाता है तो ऐसी व्यवस्था को फौजी शासन कहा जाता है |

बर्मा नाम देश में सैनिक शासन निम्न प्रकार था –

Burma (Myanmar) (1962–1988; 1988–2011)

इस बर्मा देश में फौजी शासन की जानकारी निम्नलिखित प्रकार से विस्तार से दी जा रही है |

फौजी शासन
नई राजनीतिक व्यवस्था
अपने राजनीतिक अनुभव से नी विन ने यह जान लिया कि सत्ता में बने रहने के लिए उनको जितना शीघ्र सम्भव हो सके सैनिक शासन को राजनीतिक स्वरूप दे देना होगा। इसलिए सन् 1962 में उन्होंने एक नये समाजवादी दल का सूत्रपात कर दिया जो बर्मा समाजवादी कार्यक्रम दल (बी.एस.पी.पी.) के नाम से जाना जाने लगा। इसने बर्मा के समाज एवं अर्थव्यवस्था को समाजवाद के बर्मी तरीके द्वारा पुनः व्यवस्थित करने का वायदा किया। यह घोषणा की गई कि इसे संसदीय लोकतंत्र द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।

चूंकि इस पद्धति को आजमाया जा चुका था, इसको जांचा जा चुका था और यह एक परिपक्व जनमत न होने के कारण असफल हो चुकी थी। इसलिए अब एक समाजवादी बर्मा के पुनःनिर्माण का उत्तरदायित्व किसी ऐसे प्रभावशाली दल संगठन को सौंपा जाना चाहिए जिसको राजनीतिक सत्ता का पूर्ण एकाधिकार प्राप्त हो । इस दल का तंत्र सम्पूर्ण देश की जनता में फैला होना चाहिए-विशेष रूप से किसानों एवं मजदूरों में। फिर भी शुरुआत में इसे एक कार्यकर्ता-आधारित पार्टी के रूप में बना रहना था जिसके केन्द्र में कार्यकर्ताओं का एक न्यूक्लियस सम्मिलित हो । इसके सर्वोच्च प्राधिकार एक क्रान्तिकारी परिषद में निहित होने थे जिसमें केवल नी विन के निकट-सम्पर्क के कुछ उच्चकोटि के सैनिक अफसरों को सम्मिलित किया जाना था। इसको कुछ उच्च सत्ता प्राप्त कमेटियां नियुक्त करने का अधिकार प्राप्त था, जैसे केन्द्रीय व्यवस्थापक या संगठन कमेटी, अनुशासन कमेटी, समाजवादी अर्थव्यवस्था नियोजन कमेटी। इसे निर्वाचन केन्द्रों एवं उत्पादन की शाखाओं और यदि आवश्यक हुआ तो बस्तियों एवं पहाड़ी इलाकों के आधार पर, प्रमुख दल इकाइयां नियुक्त करने के भी अधिकार थे। दल इकाइयां गांवों, वाडौं, सड़कों एवं गलियों, मिलों, कारखानों इत्यादि में दल समूहों को नियुक्त करेंगी। क्रान्तिकारी परिषद के अध्यक्ष नी विन स्वयं क्रान्तिकारी परिषद के अनुमोदन से मंत्रिमंडल को नियुक्त करेंगे।

इस प्रकार संगठन के ढांचे में सुधार किया गया जिसमें आन्तरिक रूप से आम जनता तक पहुंचने वाले प्रभावशाली दल तंत्र को प्रशासन सम्बन्धी संगठन से जोड़ दिया गया। सम्पूर्ण व्यवस्था का सर्वोच्च नियंत्रण जनरल नी विन के शक्तिशाली नेतृत्व में क्रान्तकारी परिषद की सर्वोच्च शाखा को सौंपा गया। इसके बाद सन् 1964 में राजनीतिक दलों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सन् 1966 में निजी समाचारपत्रों एवं जन-संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस प्रकार नी विन के शक्तिशाली शासन को संगठित किया गया। परन्तु सैनिक शासकों के लिए छठे दशक का आखिरी भाग ज्यादा सुगम नहीं था। अर्थव्यवस्था बिगड़ रही थी और देश के अनेक भागों में जनता का विरोध उबल रहा था। इस परिस्थिति ने शासक गुट को अपने शासन को वैधता प्रदान करने हेतु सार्वजनिक सहमति द्वारा कुछ करने पर बाध्य कर दिया। इस पृष्ठभूमि में बी.एस.पी.पी. का पहला सम्मेलन सन् 1971 में हुआ।

यहां यह निर्णय लिया गया कि साधारण, असैनिक जनता को शामिल कर के कैडर-आधारित पार्टी को आम जनता की पार्टी के रूप में परिणित कर दिया जायेगा। इस निर्णय के बाद व्यापक रूप से सदस्य बनाने का अभियान शुरू कर दिया गया जिसके फलस्वरूप बर्मा की एक-तिहाई वयस्क जनता पूर्णरूप से या उम्मीदवार सदस्यों के रूप में बी.एस.पी.पी. की सदस्य बन गई या फिर जनता की परिषदों जैसे सहायक दलों के द्वारा उससे सम्बद्ध हो गई। इनमें से अनेक को नीचे के स्तर का दलका नेता एवं कार्यकर्ता भी बनाया गया। इससे आशा की गई थी कि यह आम जनता में राजनैतिक व्यवस्था का अंग होने की भावना जागृत करेगी। इसके विपरीत दल में सेना के प्रभुत्व को सावधानीपूर्वक बनाये रखा गया था। सन् 1985 में दल के पांचवें सम्मेलन के समय सैनिक दलों एवं अर्धसैनिक इकाइयों में से 94 प्रतिशत दल के सदस्य हो चके थे। वे दल ही कल सदस्यता का 60प्रतिशत भाग थे। उच्च श्रेणी के नेतृत्व का भार उन सैनिक अफसरों को। सौपा गया था जो जनरल नी विन के विश्वस्त व्यक्ति थे। अन्त में सन् 1974 में जारी किए गये संविधान ने इस एकदलीय शासन को सरकारी रूप से मान्यता प्रदान कर दी। इस दल का निर्माण जनता के दल के रूप में किया गया था परन्तु इस पर शक्तिशाली सैनिक तानाशाही का प्रभावपूर्ण नियंत्रण था।

आर्थिक विकास की समस्याएं
बर्मी नमूने के समाजवाद की उक्तियां जैसा कि हम देख चुके हैं, किसी भी तरह से कोई नई अवधारणा नहीं थी। नये निजाम द्वारा पेश की गई समाजवादी विचारधारा ने अपने पूर्ववर्तियों की भांति उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण करने का प्रावधान किया, जिन पर राज्य अथवा सहकारी संस्थाओं अथवा संगठित यूनियनों का स्वामित्व रहना था, किन्तु निजी उद्यमों को पूरे तौर पर समाप्त नहीं किया जाना था, खासतौर से जिनमें बर्मी लोगों के हित जुड़े हुए थे। इसलिए, राष्ट्रीकरण अधिनियम ने, जो 1963 में आया, मुख्यतः प्रवासी सौदागर पूंजीपतियों, मध्यमवर्गीय कर्मचारियों तथा निवेश कर्ताओं को ही प्रभावित किया। यह नीति धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था तथा सेवाओं के पूर्ण वर्गीकरण की ओर अग्रसर हुई। इसके पश्चात 1956 में भूमि सुधार अधिनियम पारित किया गया। इसने काश्तकारी का उन्मूलन कर दिया तथा भूमिहीन मजदूरों के बीच कुछ अतिरिक्त भूमि का वितरण कर दिया। जहां तक राष्ट्रीय आय के वितरण का प्रश्न है, यह परिकल्पना की गई कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार काम करेगा और भौतिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों में उसकी साझेदारी रहेगी जो कि उसके द्वारा किए गये श्रम की मात्रा तथा गुणवत्ता के अनुसार निश्चित होगी। हालांकि एक काल्पनिक लक्ष्य के तौर पर पूर्ण समानता को स्वीकार किया गया और समुचित सीमा तक आय की असमानताओं को कम करने के लिए उचित उपाय किए जाने का आश्वासन दिया गया। इस तरह से ठोस कल्याणकारी लक्ष्यों का निर्धारण किया गया। साथ ही, सैन्य नौकरशाही द्वारा दौलत एवं सत्ता पर इजारा कायम करने के उसके प्रयत्नों को वैध ठहराने के लिए पर्याप्त तौर पर चैर दरवाजे छोड़ दिये गये।

जहां तक आर्थिक प्रगति का संबन्ध है, नई सरकार ने कृषि-क्षेत्र पर बुनियादी जोर दिया जो कि 1960 में सकल घरेलू उत्पाद का 33प्रतिशत हिस्सा रहा था। कृषि-उत्पादन को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक उपाय किए गये जैसे कृषि ऋणों का प्रावधान, खेती के विकसित तरीकों की शुरुआत, खाद की सुविधा, बेहतरीन किस्म के बीजों का उपयोग, भूमि उद्धार 1040 तथा 1970 के बीच कृषि की वार्षिक वद्धि दर महज 4.1प्रतिशत ही रही-और न ही धान की पैदावार में जिसका बर्मा की कृषि पर वाकई प्रभुत्व था, सैनिक शासन के पहले दशक के दौरान सराहनीय वृद्धि देखी गई। औद्योगिक क्षेत्र में भी स्थिति संतोषप्रद होने से कोसों दूर थी। उद्योग में सार्वजनिक निवेश की मात्रा इस अवधि (1960-61) में 36प्रतिशत से बढ़कर 1970-71 में 37 प्रतिशत हो गई। किन्तु सार्वजनिक निवेश में इस वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन में वृद्धि न हो सकी जबकि ताजा निजी निवेश नाममात्र का ही बना रहा। विदेशी निवेशों से भी लोग कतराते रहे क्योंकि सरकार दृढ़ता के साथ निरंकुशता की नीति पर चलती रही। इसके परिणामस्वरूप 1960 तथा 1970 के बीच असौसत वार्षिक वृद्धि दरें, औद्योगिक क्षेत्र में 3.1 प्रतिशत तथा उत्पादन क्षेत्र में 3.7 प्रतिशत ही रही। 1960 के अंत तक बर्मा एक भयानक आर्थिक संकट की गिरफ्त में आ चुका था, जिसमें सकल घरेल उत्पादन की औसत वृद्धि-दर निराशाजनक हद तक धीमी थी, 1960 तथा 1970 के बीच मात्र लगभग 2.6 प्रतिशत।

इसलिए, 1971 में बी.एस.पी.पी. की पहली पार्टी कांग्रेस में, आर्थिक विकास के प्रश्न को गंभीरता से लिया गया। इसने “बीस वर्ष के लिए विकास कार्यक्रम‘‘ शुरू करने का निर्णय लिया जिसका उद्देश्य 1993-94 तक देश में एक समाजवादी अर्थव्यवस्था कायम करना रखा गया, जिसमें सभी संपन्नता से जी सकें । 20-वर्षीय योजना को चार पंचवर्षीय योजनाओं में विभाजित किया जाना था । चार योजनाओं के समाप्त होने पर (चैथी योजना का समापन 1985-86 में हआ), तीसरी योजना सबसे अधिक सफल साबित हई क्योंकि औसत वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद वद्धि दर, इस योजना अवधि में 6.7 प्रतिशत रही। किन्तु कुल मिलाकर आर्थिक प्रगति की दर काफी धीमी ही रही। 1965 तथा 1980 के बीच यह केवल 3.9 प्रतिशत तथा 1980 व 1986 के बीच केवल 4.9 प्रतिशत रही।

वृद्धि-दर में और अधिक बढ़ोत्तरी हासिल करने के लिए, बर्मा को एक तकनीकी उपलब्धि हासिल करने की जरूरत थी, जिसके लिए विदेशी सहायता की जरूरत पड़ी। किन्तु शुरू से ही नये निजाम ने शेष दुनिया के साथ आर्थिक संपर्क बनाकर नहीं रखा था, क्योंकि प्रायः इसी बहाने से विदेशी राजनैतिक हस्तक्षेप भी हृआ करता है। दूसरी तरफ, उसक विदेशी मुद्रा भंडार का खस्ता हाल था क्योंकि बर्मा की प्रमुख निर्यात वस्तु, चावल का उत्पादन आशातीत ढंग से नहीं बढ़ पाया था। इसके परिणामस्वरूप, आवश्यक औद्योगिक मशीनरी, कलपुर्जाें तथा कृषि-निवेशों का आयात करने में देश को कठिनाई हुई। इसका नतीजा एक तरह की आर्थिक अवरुद्धता के रूप में सामने आया, जिससे बर्मा स्वयं ही बाहर नहीं निकल सकता था। अर्थव्यवस्था में पुनः गिरावट आयी जिसकी वजह या तो अव्यवस्था थी अथवा नौकरशाही के भीतर भारी भ्रष्टाचार था।

किन्तु इस धीमी आर्थिक प्रगति के साथ-साथ वितरणमूलक न्याय उच्चतर स्तर का था। 1963 से सभी आवश्यक वस्तुओं के वितरण पर खाद्य पदार्थों की “जनता-दुकानों‘‘ की एक बया के जरिए सरकार का नियंत्रण कायम था तथा सभी उपभोक्ता वस्तुओं की काफी उचित दरों पर जनता को आपूर्ति की जा रही थी। यह सही है कि एक फलता-फूलता काला बाजार हमेशा वहां बना रहा था। किन्तु उसके बावजूद, चावल अथवा न्यूनतम आवश्यक कपड़ों की आपूर्ति में कोई खास कमी नहीं थी। 1978-79 से सरकार ने जनता को न्यूनतम स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए जन स्वास्थ्य सेवा योजना शुरू की जिसके परिणामस्वरूप शिशु मृत्यु-दर में कमी आयी तथा औसत जीवन प्रत्याशा में सराहनीय वद्धि हुई, खासतौर से अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में । यदि हम तीन औसत सूचकों, अर्थात् जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, शिशु मृत्यु-दर तथा साक्षरता, द्वारा आंकलित जीवन की भौतिक गुणवत्ता के सूचकांक पर ध्यान दें तो यह तुलनात्मक स्थिति और भी स्पष्ट रूप से सामने आ जायेगी। 1984 में बर्मा के लिए सूचकांक 55 था। भारत के लिए 44, पाकिस्तान 40 तथा बंगलादेश के लिए 36 था। इस तरह तमाम जनतांत्रिक अधिकारों में कटौती तथा कल्याणकारी उपायों को शुरू करके बी.एस.पी.पी. ने अपने शासन को बनाये रखने की कोशिश की। ऐसी व्यवस्था तब तक जारी रह सकती थी जब तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली भली प्रकार से काम करती रहे किन्तु एक बार सस्ता चावल मिलना कठिन हो जाय तो इस उत्पीड़क निजाम को बर्दाश्त करने का लोगों को कोई और कारण नहीं मिल सकता। और 1987 से, ठीक यही होना शुरू हो गया।

प्रारंभिक प्रतिरोध
डंडे के बल पर शासन करने की बी.एस.पी.पी. की नीति 26 वर्ष तक इसके शासन के विरुद्ध किसी प्रमुख लोकप्रिय प्रतिरोध को रोके रखने में सफल रही। प्रतिरोध निश्चित रूप से वहां मौजूद था और उनमें से कुछ तो बहुत मामूली चरित्र वाले भी नहीं थे। बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिरोध तथा जातीय अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए गये सशस्त्र संघर्ष को छोड़ भी दिया जाय, तो भी रंगून शहर के भीतर ही जनतंत्र की बहाली के कई आन्दोलन चल रहे थे। जुलाई 1962 में तथा नवम्बर 1963 में पुनः रंगून विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के विद्रोह हए । मई-जून 1974 की हड़ताले हईं तथा उसके बाद छात्रों के आन्दोलन हुए तथा यह घटना अगले वर्ष दोबारा से घटी। फिर जुलाई 1976 में कुछ युवा सैनिक अधिकारियों द्वारा एक असंफल विद्रोह किया गया, जिन्होंने नयी समाजवादी व्यवस्था की भर्त्सना की। किन्तु इन आन्दोलनों में मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के लोगों के अलावा जनता के अन्य हिस्से शामिल नहीं हुए। 1974 का फसाद ही इसका एकमात्र अपवाद है जिसमें मजदूर वर्ग ने सक्रिय भूमिका अदा की थी। लोकप्रिय प्रतिरोध के अभाव की वजह यह थी कि आम आदमी के लिए अब भी भोजन तथा कपड़े की कोई खास तंगी नहीं थी। 1974 में ही ऐसा हआ जबकि खाद्यान्न की असामान्य कमी हो गई जिसने रंगून के मजदूर वर्ग को विचलित कर दिया।

1986-87 में आर्थिक स्थिति ने पुनः खतरनाक स्तर तक खराब होकर संकट का रूप ले लिया। निम्न वृद्धि-दर जो कि बर्मी अर्थव्यवस्था की स्थाई समस्या बन गई थी, उसकी सरकार के लिए पांव की बेड़ी साबित हुई। हालांकि राष्ट्रीय मुनाफे के स्रोतों के आकार में वृद्धि हुई (1986 में बर्मा में सकल घरेलू उत्पाद मात्र 8,180 मिलियन यू.एस. डॉलर था। किन्तु इसमें व्यक्ति के हिस्से में वृद्धि नहीं हुई क्योंकि जनसंख्या भी बढ़ गई। अतः वितरणमूलक न्याय का अर्थ एक तरह से उस गरीबी में साझा करना भर रह गया जो कि लगातार चिन्ताजनक ढंग से बढ़ रही थी। चैथी योजना अवधि (1982-83) से (1985-86) के दौरान अर्थव्यवस्था एक संकट की तरफ बढ़ रही थी, जबकि कुल मिलाकर सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि-दर घट कर 5.5 प्रतिशत रह गई। योजना के अंतिम दो वर्षों के दौरान वास्तविक वृद्धि-दर में और अधिक गिरावट आयी और पांचवी योजना की शुरुआत एक संकट की स्थिति में हुई। इस योजना-अवधि के पहले वर्ष, अर्थात् 1986-87 के दौरान वृद्धि-दर महज 1 प्रतिशत रही तथा दूसरे वर्ष में इसके लगभग 2.2 प्रतिशत तक होने का अनुमान लगाया गया। इसके साथ-साथ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 1987 में बढ़कर 167 के अंक तक पहुंच गया, जिसमें 1980 को आधार वर्ष माना गया था। औसत वार्षिक मुद्रास्फीति दर 1986 में 26.7 प्रतिशत तथा 1987 में 28 प्रतिशत थी। इस तरह की परिस्थिति में बर्मा ने संयुक्त राष्ट्र के सम्मुख सबसे कम विकसित देश का दर्जा दिये जाने के लिए आवेदन किया जो कि 1987 में स्वीकृत कर लिया गया।

किन्तु इस दौरान सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लगभग ठप्प हो जाने से ही राजनैतिक संकट तीव्र हो गया। 1986-87 में, चावल की सरकारी खरीद में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 49 प्रतिशत की गिरावट आयी। इसके कारण थे, ऊंची काला बाजार की कीमतों के साथ-साथ जारी रहते हुए कृत्रिम तौर पर निर्धारित नीची वसूली कीमतें तथा भारी मुनाफे वाले तस्करी के धंधे की बीमारी। इसके साथ ही स्थानीय नौकरशाही की अक्षमता एवं कभी-कभी मिली-भगत ऊपर से मौजूद थी। इस सबका नतीजा यही हुआ कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली लगभग पूरी तरह चैपट हो गई, जिससे आम आदमी खुले बाजार से अत्यंत ऊंचे दामों पर चावल खरीदने के लिए बाध्य हो गया।

इस निराशाजनक स्थिति ने जनरल नी विन को 10 अगस्त 1987 को पार्टी की एक विशेष बैठक में अपनी आर्थिक नीतियों के विफल हो जाने को खुले तौर पर स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। उसने इन पर पुनः विचार करने का आश्वासन दिया और उसका नतीजा अगले महीने के प्रथम सप्ताह में नाटकीय ढंग से अनेक उपायों की एक श्रृंखला के रूप में सामने आया। सितम्बर को धान, मक्का जैसी आवश्यक फसलों तथा फलियों एवं दालों की सात किस्मों के व्यापार पर से नियंत्रण हटा लिया गया। इसके परिणामस्वरूप राशन-प्रणाली को जिन्दा रखने की कोशिश करते हुए यह आदेश जारी किया गया कि भू-राजस्व की वसूली अनाज के रूप में की जायेगी तथा थोक-व्यापारियों से 5 प्रतिशत टोवर-टैक्स वसूल किया जायेगा, और उसे भी खाद्यान्न के रूप में अदा करना होगा। किन्तु इसके बावजूद खाद्यान्नों की कीमतें तुरन्त ही बढ़ने लगीं। खाद्यान्न के व्यापार में मुनाफों पर अंकुश लगाने के एक अन्य उपाय के तौर पर, सरकार ने 6 सितम्बर को 25, 35 तथा 75 क्यात (बर्मी मुद्रा) के नोटों का चलन बन्द कर दिया। इस तरह एक गणना के अनुसार करीब 80 प्रतिशत मुद्रा नोट, जो कि चलन में थे, अवैध हो गये। इस उपाय ने व्यापारियों व काला बाजारियों पर विपरीत प्रभाव डाला, इसमें कोई संदेह नहीं है किन्तु सबसे बुरा असर मध्यम वर्ग पर पड़ा। चूंकि विमुद्रीकरण की घोषणा 6 सितम्बर के दोपहर बाद की गई थी, जो कि शनिवार का दिन था, अर्थात् महीने का पहला सप्ताह-अंत, जबकि बर्मी जनता के नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय हिस्से ने अपना मासिक वेतन लिया ही था। इस घोषणा से पहले कोई पूर्व चेतावनी नहीं दी गई और यहां तक कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को भी इसकी भनक नहीं लगी। अतः एक ही झटके में उन्हें एक महीने के वेतन से हाथ धोना पड़ा और इसका कोई मुआवजा भी नहीं मिला। इससे मध्यम वर्ग भड़क उठा, जबकि निम्नतर वर्ग पहले से ही बेतहाशा बढ़ती खाद्यान्न की कीमतों से परेशान थे। इसका स्वाभाविक परिणाम एक ऐसी ज्वाला के रूप में सामने आया जिसे किसी भी राहत के जरिए रोका नहीं जा सकता था।

बोध प्रश्न 3
टिप्पणी: क) अपने उत्तर के लिए नीचे दिये स्क्ति स्थान का प्रयोग कीजिये।
ख) अपने उत्तरों की जांच इकाई के अन्त में दिये उत्तरों से कीजिए।
1. बर्मा में एक दलीय शासन की स्थापना के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए।
2. बर्मा द्वारा अपनाई गई विभिन्न विकास नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिये।

बोध प्रश्न 3
1. क) बहुदलीय प्रणाली से कोई लाभ नहीं हुआ
ख) सरकारी समर्थन प्राप्त बी.एस.एस.पी. की स्थापना के बाद अन्य सभी पार्टियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था
ग) भीषण राजनैतिक अस्थिरता
घ) बढ़ता आर्थिक संकट

2. क) एक दलीय प्रणाली की स्थापना जनता की राजनीति स्वतंत्रता में कटौती का रास्ता तैयार करती है
ख) राष्ट्रीयकरण सामाजीकरण की जगह वर्गीकरण की तरफ ले गया
ग) एकदलीय शासन के पहले दशक में कृषि नीति तथा औद्योगिक नीति दोनों ने कोई खास प्रगति दर्ज नहीं की
घ) अत्यधिक नियंत्रण ने एक फलते-फूलते कालाबाजार को जन्म दिया
ड़) हालांकि अनेक कमियों के बावजूद, समाजवादी व्यवस्था के तहत बर्मा में जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ