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राष्ट्रीय आय की गत और मूल्य क्या है ? Cost and Price of National Income in hindi कर और राष्ट्रीय आय
कर और राष्ट्रीय आय राष्ट्रीय आय की गत और मूल्य क्या है ? Cost and Price of National Income in hindi ?
राष्ट्रीय आय की गत और मूल्य
(Cost and Price of National Income)
राष्ट्रीय आय की गणना करते समय ‘गत’ और ‘मूल्य’ भी तय कर लिए जागे चाहिए। दरअसल गत और मूल्य की दो श्रेणियां होती हैं और अर्थव्यवस्था को यह तय करना होता कि कौन-सी दो गत और कौन-से दो मूल्य राष्ट्रीय आय का हिसाब लगने में काम आएंगे। हमें इस भ्रम और इस भ्रम की उपयुक्तता को समझ लेना चाहिए।
;i) गतः किसी अर्थव्यवस्था की आय, मतलब, इसकी कुलउत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की गणना या तो ‘घटक गत’ पर की जा सकती है या फिर ‘बाजार गत’ पर। इन दोनों में अंतर क्या होता है? ‘घटक गत’ मूलतः ‘निवेश की गई गत’ होती है जिसे उत्पादक उत्पादन प्रक्रिया के दौरान लगता है (जैसे कि पूंजी की गत, मतलब, ऋणों पर ब्याज, कच्चा माल, श्रम, किराया, बिजली आदि)।
इसे ‘कारखाना गत’ या ‘उत्पादन गत/मूल्य’ भी कहते हैं। यह कुछ और नहीं निर्माता के नजरिए से वस्तु की‘कीमत’ है। दूसरी तरफ ‘बाजार गत’ वस्तु की ‘घटक गत’ पर अप्रत्यक्ष कर जोडने के बाद गिकाली जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि वह गत जिस पर वस्तु बाजार में पहुंचती है, मतलब शोरूमों में (उत्पादक केंद्र सरकार को सेनवेट/केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सी,सटी देते हैं)। इसे ‘कारखाना मूल्य’ भी कहते हैं।
भारत आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय आय की गणना कारक गत (Factor cost) पर किया करता था। वैसे राष्ट्रीय आय के आंकड़े बाजार गत (market cost) पर भी प्रकाशित किए जाते थे जिसका इस्तेमाल सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र भी किया करता था। जनवरी 2015 से ब्ैव् द्वारा राष्ट्रीय आय की गणना बाजार मूल्य (market price) पर की जा रही है जो वास्तव में बाजार गत (market cost)पर ही है। सकल मूल्य वर्द्धन (GVA) में उत्पाद करों (Product taxes) को शामिल करने के बाद ‘बाजार मूल्य’ ज्ञात होता है। उत्पाद कर केन्द्र एवं राज्यों के अप्रत्यक्ष कर (Indirect tax) हैं। वस्तु एवं सेवा कर (GST) को अपना लेने के बाद इस गणना में काफी सुविध होगी।
;ii) मूल्यः आय को दो-मूल्यों स्थायी और वर्तमान से गिका जा सकता है। स्थायी और वर्तमान मूल्य में अंतर सिर्फमुद्रास्फीति के असर का है। स्थायी मूल्य के मामले में मुद्रास्फीति को पहले के एक साल में स्थिर माना जाता है (पहले से इस साल को ‘आधार वर्ष’ माना जाता है) जबकि वर्तमान मूल्य के मामले में आज की मुद्रास्फीति को जोड़ा जाता है। दरअसल, वर्तमान मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) है जिसे हम बाजार में बिकने वाली चीजों पर अंकित देखते हैं।
नई गइडइंस के मुताबिक भारत का बेस ईयर 1993-94 से संशोधित होकर 2004-05 हो गया है। (इसके मुताबिक आंकड़ों को आंकड़ों की नई सीरीज कह रहे हैं।) इसकी घोषणा सितंबर 2010 में हुई थी। भारत अपनी राष्ट्रीय आय का आकलगी स्थिर मूल्य पर करता है, यही हाल दूसरे विकासशील देशों का है। वहीं विकसित देश अपनी राष्ट्रीय आय का आकलगी वर्तमान मूल्य के आधार पर करते हैं। हांकि सांख्यिकी गणना के लिए सीएसओ वर्तमान मूल्य के आधार पर भी राष्ट्रीय आय के आंकड़े जारी करता है। आखिर क्यों? दरअसल, भारत के नीति निर्माण में महंगई एक चुनौतीपूर्ण पहलू है। महंगई की दर बढ़ ही रही है और यह स्थायित्व के करीब नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वों की आमदनी में वृद्धि के स्तर का आकलगी संभव नहीं होग और सरकार को कभी भी अपने गरीबी उन्मूलगी कार्यक्रमों के वास्तविक असर का पता नहीं चलेग।
यहां आमदनी के एक महत्वपूर्ण पहलू को समझना जरूरी है। किसी भी व्यक्ति विशेष की आमदनी तीन प्रारूप की हो सकती है-पह प्रारूप, नाममात्र आय का है, जिसमें आपको प्रति दिन या प्रति माह के हिसाब से मजदूरी मिल जाती है। दूसरा प्रारूप है, वास्तविक आमदनी का है। इसमें आपकी नाममात्र आय में से मौजूदा दिन की महंगई दर को घटाकर उसे प्रतिशत रूप में व्यक्त करना होग। इससे आपको वास्तविक आमदनी का पता चलता है। अंतिम प्रारूप व्यय योग्य आय का है। यह आय कमाने वा खर्च कर सकता है, यह आप वास्तविक आमदनी में से टैक्स घटाकर प्राप्त करते हैं। अभ्यास में होता यह है कि नाममात्र की आय में 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, अगर महंगई की दर 10 प्रतिशत हो तो यह 15 प्रतिशत दिखाई देगी। भारत के उलट दुनिया के कई विकसित देशों में महंगई की दर कई सों से 2 प्रतिशत के आसपास है। यही वजह है कि उगके स्थिर और वर्तमान मूल्य की स्थिति में आमदनी के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं होग। यही वजह है कि विकसित देश वर्तमान मूल्य के आधार पर राष्ट्रीय आय का आकलगी करते हैं, जो कहीं ज्यादा भरोसेमंद आंकड़े होते हैं।
कर और राष्ट्रीय आय
(Taxes and National Income)
राष्ट्रीय आय को आकलित करने के दौरान सरकार द्वारा एकत्रित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों को भी शामिल किया जाता है। भारत के संदर्भ में प्रत्यक्ष कर के दायरे में व्यक्तिगत आयकर और काॅरपोरेट आयकर इत्यादि आते हैं। इस कर को शामिल करते हुए राष्ट्रीय आय के आकलगी में इसका कोई फर्क नहीं पड़ता है यह फैक्टर काॅस्ट पर आधारित है या फिर मार्केट काॅस्ट पर, क्योंकि दोनों मूल्यों पर प्रत्यक्ष कर समान होता है। यह कर संबंधित शख्स और संस्था से लिए जाते हैं।
लेकिन दूसरी ओर अप्रत्यक्ष कर (उत्पाद कर, मूल्यवर्द्धित कर, बिक्री कर इत्यादि) के दौरान तब ख्याल रखने की जरूरत है जब राष्ट्रीय आय में शामिल करने के वक्त इसका आकलगी फैक्टर काॅस्ट पर हुआ हो। अगर राष्ट्रीय आय का आकलगी फैक्टर काॅस्ट पर हो तो कुल में से अप्रत्यक्ष कर को घआगे की जरूरत है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि यह कर दो बार शामिल हो चुका है-एक तो आमलोग और समूह द्वारा (अपनी व्यय करने वाली रकम से कुछखरीदते हैं तब) और दूसरी बार सरकार की अपनी आय रसीद के जरिए। अप्रत्यक्ष कर का ड्डोत हमेशा व्यय करने वाली आय ही होता है। अगर राष्ट्रीय आय का आकलगी फैक्टर काॅस्ट पर हुआ हो, तो हम इस फाॅर्मू का इस्तेमाल करते हैंः
फैक्टर काॅस्ट पर नेशनल इगकम – मार्केट काॅस्ट पर NNP – अप्रत्यक्ष कर अगर नेशनल इगकम यानी राष्ट्रीय आय का आकलगी मार्केट काॅस्ट (बाजार मूल्य) पर हो तो अप्रत्यक्ष कर को घआगे की कोई जरूरत नहीं है। ऐसी स्थिति में सरकार अपनी राष्ट्रीय आय में अप्रत्यक्ष कर से होने वाली आमदनी को शामिल नहीं करती है। इससे साफ है कि फैक्टर काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय का आकलगी अप्रत्यक्ष कर से जुड़ा हुआ है।
छूट और राष्ट्रीय आय
(Subsidies and National Income)
अप्रत्यक्ष कर की तरह ही सरकार को राष्ट्रीय आय आकलित करते वक्त विभिन्न अनुदानों को भी शामिल करना पड़ता है। भारतीय संदर्भ में अनुदान को मार्केट काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय में शामिल किया जाता है। मार्केट काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय में अनुदान को जोड़कर हमें फैक्टर काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय हासिल होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सरकारें अनुदान में जो उत्पाद और सेवा मुहैया कराती है वह उगका वास्तविक फैक्टर काॅस्ट नहीं होता है। ऐसे में हमारा फॅार्मू तैयार होता हैः
फैक्टर काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय – मार्केट काॅस्ट पर NNP अनुदान अगर राष्ट्रीय आय मार्केट काॅस्ट पर आकलित हो और सरकार ने कोई अनुदान नहीं दिया हो तो इसे एडजस्ट करने की जरूरत नहीं होती। हांकि दुनिया की कोई भी अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है जो किसी.न-किसी रूप में अपने यहां अनुदान नहीं देती हो।
अब अप्रत्यक्ष कर और अनुदान को एक साथ रखने पर भारत की राष्ट्रीय आय को आकलित करने का फाॅर्मू है (भारत में यह आकलगी फैक्टर काॅस्ट पर होता है)ः
फैक्टर काॅस्ट पर राष्ट्रीय आय – मार्केट काॅस्ट
पर NNP – अप्रत्यक्ष कऱ अनुदान
राष्ट्रीय आय लेखा के आधार वर्ष एवं
विधिा में संशोधन (Revision in The Base Year and Method of National Income Accounting)
केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने जनवरी 2015 में राष्ट्रीय लेखा के नए एवं संशोधित आंकड़े जारी किए ए हैं जिनमें दो परिवर्तन किए गए हैंः
;i) इसके अन्तर्गत आधार वर्ष 2004-05 को संशोधित करके 2011-12 कर दिया गया है। यह राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) के अनुसंशा के आधार पर किया गया है जिसमें प्रत्येक 5 वर्ष पर सभी आर्थिक घटकों के आधार वर्ष को संशोधन करने की सह दी गई थी।
;ii) राष्ट्रीय लेखा के गणना की कार्यप्रणाली में संशोधन कर अंतर्राष्ट्रीय मापदंड के अनुरूप राष्ट्रीय लेखा-2008 के उपाय की पूर्ति की गई।
चालू आधार वर्ष का संशोधन जनवरी, 2010 मंे किए गए संशोधन के बाद का है। आधार वर्ष में हुए संशोधन में शामिल किए गए प्रमुख फैरबदल निम्नलिखित हैंः
;i) वर्तमान में विकास को स्थिर बाजार मूल्यों पर स.घ.उ. द्वारा मापा जाएना, जिसे इसके बाद ‘‘GDP’’ के रूप में संदर्भित किया जाएना, जैसा कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलगी है। इससे पूर्व, विकास को स्थिर मूल्यों पर कारक गत पर GDP में वृद्धि दर की दृष्टि से मापा जाता था।
;पपद्ध जोड़े गए सकल मूल्य का क्षेत्रवार अनुमान अब कारक गत के स्थान पर मूल कीमतों पर किया जाएना। कारक गत पर ळट। मूल कीमतों पर ळट। और GDP (बाजार कीमतों पर) के बीच संबंधा नीचे दिया गया है।
मलू कीमतांे पर जीवी, = सीई $ ओएस/एमआई $ सीएफसी $ उत्पादन कर रहित उत्पादन इमदाद कारक गत पर जीवी, = मूल कीमतों पर जीवी, – उत्पादन कर रहित उत्पादन सब्सिडी
GDP = Σ मूल कीमतों पर जीवी, $ उत्पाद कर – उत्पाद सब्सिडी
(जहां सीईः कर्मचारियों की क्षतिपूर्ति ओएसः परिचालगी अधिशेष; एमआईः मिश्रित आय; और सीएफसीः अचल पूंजी का उपभोग है। उत्पादन करों या उत्पादन सब्सिडियों का भुगतान या इगकी प्राप्ति उत्पादन से संबंधित होती है और ये वास्तविक उत्पादन के परिमाण पर आश्रित नहीं होते। उत्पादन करों के कुछ उदाहरण भू-राजस्व, स्टाम्प और पंजीयन शुल्क तथा व्यावसायिक कर हैं। कुछ उत्पादन सब्सिडी रेलवे को सब्सिडी, किसानों को वस्तुगत सब्सिडी, गंवों और लघु उद्योगें को सब्सिडी, निगमों या सहकारी समितियों को प्रशासगिक सब्सिडी आदि हैं। उत्पादन करों या सब्सिडी का भुगतान या इगकी प्राप्ति उत्पाद के प्रति यूनिट पर होती है। उत्पाद करों के कुछ उदाहरण उत्पाद कर, बिक्री कर, सेवा कर और आयात-निर्यात शुल्क है। उत्पाद सब्सिडी में खाद्यान्न, पेट्रोलियम और उर्वरक सब्सिडी, किसानों के परिवारों आदि को बैंकों के जरिए प्रदत्त ब्याज इमदाद, परिवारों का बीमा कराने के लिए कम दरों पर प्रदत्त सब्सिडी शामिल हैं।
;iii) काॅर्पोरेट कार्य मंत्रलय की ई.अभिशासन पहल, एमसी, 21 के अंतर्गत उसमें यथा दर्ज कंपनियों के वार्षिक लेखाओं के समावेशन से विनिर्माण और सेवा दोनों ही कारपोरेट क्षेत्र की व्यापक कवरेज। विनिर्माण कंपनियों के एमसी, 21 डाटाबेस के उपभोग से इन कंपनियों द्वारा विनिर्माण से भिन्न किए गए कार्यों का हिसाब-किताब रखने में मदद मिली है।
;iv) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), स्टाक ब्रोकर, स्टाक एकसचेंजों, आस्ति प्रबंधान कंपनियों, म्युचुअल फंडों और पेंशन फंडों, और पेंशन निधिा एवं विनियामक विकास प्राधिकरण (पीएफआरडी,) और बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (इरडा) सहित विनियामक गिकायों के लेखाओं से सूचना के समावेशन से वित्तीय क्षेत्र को व्यापक सुरक्षा कवरेज।
;v) स्थानीय गिकायों और स्वायत संस्थाओं के कार्यकपों, जिनमें इन संस्थाओं को प्रदत्त लगभग 60 प्रतिशत अनुदान/अंतरण राशियां शामिल हैं, की संवर्धित कवरेज।
2017-18 के लिए आय के अनुमान
(Income Estimates वित 2017-18)
वित्तीय वर्ष 2017-18 के राष्ट्रीय आय से संबंधित प्रमुख आंकड़े निम्न प्रकार (आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18, टवस. 2) रहने के अनुमान हैः
;पद्ध जी.डी.पी. (स्थायी बाजार मूल्यांे पर) के 129.85 लाख करोड़ रु- रहने का अनुमान है जो 6.5% वृद्धि पर दर्शाता है (वर्ष 2016-17 के 7.1% से कम)।
;पपद्ध जी.वी.ए. (स्थायी बेसिक मूल्यों पर) के 118-71 लाख करोड़ रु- रहने का अनुमान है जो 6.1% वृद्धि पर दर्शाता है (वर्ष 2016-17 के 6.6% से कम)।
;iii) प्रति व्यक्ति आय (चालू मूल्यों पर) के 1,11,782 रु- रहने का अनुमान है जो वर्ष 2016-17 के 1,03,219 रु- से अधिक है।
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