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ताप की अभिधारणा क्या है concept of temperature in zeroth law of thermodynamics in hindi

ताप की अभिधारणा क्या है concept of temperature in zeroth law of thermodynamics in hindi ?

ताप की अभिधारणा तथा ऊष्मागतिकी का शून्यवां नियम (Concept of Temperature and Zeroth Law of Thermodynamics)

पिछले खण्ड में यह देखा गया है कि ऊष्मागतिक प्राचल β के निम्नलिखित दो गुण होते हैं :

(i) यदि दो निकाय पृथक रूप से साम्यावस्था में है और इन्हें समान प्राचल β से व्यक्त किया जाता है तो ऊष्मीय सम्पर्क कराने पर भी उनके प्राचल β समान रहते हैं और उनके मध्य नेट ऊष्मा विनिमय नहीं होता है अर्थात् वे साम्यावस्था में रहते हैं।

हैं

(ii) यदि दो निकाय पृथक रूप से साम्यावस्था में हैं परन्तु उनके प्राचल B समान नहीं हैं तो ऊष्मीय सम्पर्क होने पर उनके बीच साम्यावस्था नहीं रहती है और ऊष्मा विनिमय होता है।

अब हम तीन निकाय A, B, C लेते हैं जो पृथक रूप से साम्यावस्था में हैं। यदि निकाय C को निकाय A के ऊष्मीय सम्पर्क में रखने पर इन निकायों के बीच ऊष्मा विनिमय नहीं होता है तो βc = βA । यदि यही निकाय C, निकाय् B के ऊष्मीय सम्पर्क में रखने पर भी इन निकायों के बीच ऊष्मा विनिमय नहीं होता है अर्थात् βc = βB तो यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि निकायों A व B में भी ऊष्मीय सम्पर्क करा दें तो उनके मध्य भी किसी प्रकार का ऊष्मा विनिमय नहीं होगा। सारांश में उपरोक्त तथ्य को निम्न कथन से व्यक्त किया जा सकता है-

यदि दो निकाय एक तीसरे निकाय से अलग-अलग ऊष्मीय साम्यावस्था में हों तो वे आपस में भी ऊष्मीय साम्यावस्था में होते हैं। ऊष्मीय साम्यावस्था के सम्बन्ध में यह एक महत्त्वपूर्ण नियम है। इसे ऊष्मागतिकी का शून्यवां नियम (Zeroth law of thermodynamics) कहते हैं।

इस प्रकार B एक ऐसा मूल ऊष्मागतिक प्राचल है जो ऊष्मीय संतुलन में निकायों के लिए समान होता है। B से सम्बद्ध विमाहीन राशि T = ( 1 / kβ ) परम ताप ( absolute temperature) कहलाती है। इस प्रकार यदि दो निकाय ऊष्मीय सम्पर्क में रखने पर ऊष्मीय संतुलन में बने रहते हैं अर्थात् उनके मध्य नेट ऊष्मा का विनिमय नहीं होता है तो उनके ताप समान होंगे।

उपरोक्त नियम के आधार पर कार्य करने वाले ऐसे उपकरण, जिनके द्वारा यह ज्ञात करना संभव हो कि कोई दो निकाय ऊष्मीय सम्पर्क में लाने पर ऊष्मा का विनिमय करेंगे या नहीं अर्थात् वे साम्यावस्था में हैं या नहीं, तापमापी कहलाते हैं।

परम ताप के गुण (Properties of Absolute Temperature)

(i) खण्ड (1.4) के समीकरण ( 12 ) व ( 13 ) के द्वारा परम ताप की परिभाषा से,

अर्थात् β व T दोनों सदैव धनात्मक होते हैं। ………..(2)

इस प्रकार सभी सामान्य निकायों का परम ताप सदैव धनात्मक होता है।

(ii) परम ताप के परिमाण के आकलन के लिए Ω(E) की ऊर्जा E पर सन्निकटत: निर्भरता

ले सकते हैं जहाँ | निकाय की स्वातन्त्र्य कोटियों की संख्या तथा Eo निकाय की मूल अवस्था में ऊर्जा है। समीकरण (3) का लॉगरिथ्म लेने पर.

इससे स्पष्ट होता है कि परमताप T पर राशि KT निकाय की मूलभूत अवस्था में ऊर्जा के सापेक्ष प्रति स्वातंत्र्य कोटि माध्य ऊर्जा की अधिकता के सन्निकटतः बराबर होती है। ऊष्मीय सम्पर्क में संतुलनावस्था में समान ताप T होने का तात्पर्य है कि उनमें ऊष्मीय ऊर्जा के विनिमय द्वारा प्रति स्वतान्त्र्य कोटि माध्य ऊर्जा समान हो जाती है।

(iii) समीकरण (4) से

जो सदैव धनात्मक होगा।

अर्थात् निकाय की ऊर्जा E में वृद्धि होने से ताप T में भी वृद्धि होती है या ताप T, ऊर्जा E का वर्धमान फलन (increasing function) होता है।
(iv) समीकरण (7) निकायों के बीच ताप T व ऊष्मा बहाव की दिशा के सम्बन्ध को भी व्यक्त करता है। इस सम्बन्ध को समझने के लिए माना दो निकाय A व B प्रारम्भ में ताप TA और TB पर पृथक रूप साम्यावस्था में हैं।
इब इनको ऊष्मीय सम्पर्क में रखते हैं तो एक निकाय ऊष्मा अवशोषित करता है तथा दूसरा निकाय ऊष्मा उत्सर्जित करता है जब तक कि दोनों निकाय संतुलनावस्था में न आ जायें। साम्यावस्था में, माना अन्तिम ताप Tf हो जाता है। यदि यह मान लें कि निकाय A ऊष्मा अवशोषित करता है अर्थात् इसकी ऊर्जा में वृद्धि होती है तो इसके ताप में वृद्धि होगी इसलिए Tf > TA इसी प्रकार दूसरा निकाय B ऊष्मा उत्सर्जित करता है तो उसके लिए Tf < TB इस प्रकार

TA < Tf < TB
अत: जब दो निकाय ऊष्मीय सम्पर्क में रखते हैं तो जिस निकाय का ताप कम होता है वह ऊष्मा अवशोषित करता है और वह शीतल या ठण्डा (cold) निकाय कहलाता है। जिस निकाय का ताप अधिक होता है वह ऊष्मा का उत्सर्जन करता है और वह ऊष्ण (hot) निकाय कहलाता है। अतः ऊष्मा उच्च परम ताप से निम्न ताप की ओर प्रवाहित होती है।

ताप पैमाना (Scale of Temperature)

किसी निकाय की ऊष्णता ( hotness ) के डिग्री का बोध कराने के लिए निकाय के एक नवीन भौतिक राशि, जिसे ताप कहते हैं, को एक संख्या द्वारा व्यक्त किया जाता है। इस संख्या के निर्धारण के लिए ताप या इस संख्या का मापक्रम (scale) का होना आवश्यक है। वह उपकरण जिसमें ताप का मापक्रम उपयोग में लाया जाता है उसे तापमापी (Thermometer) कहते हैं । ताप का मापक्रम बनाने के लिए ऐसे दो स्थिर बिन्दुओं ( ताप के सापेक्ष) को चुनते हैं जिन्हें किसी भी समय सरलता से प्राप्त किया जा सके। उदाहरण के तौर पर जल के दो स्थिर बिन्दु हिमांक (ice point) एवं भाप बिन्दु (steam point ) जिनके अन्तर ( प्रमाणिक अन्तर) को 100 बराबर भागों में बाँट लेते हैं। इस प्रकार प्राप्त प्रत्येक भाग को डिग्री कहते हैं तो ताप का मात्रक कहलाता है। ताप पैमाने को सेन्टीग्रेड या सेलसियस कहते हैं। वैज्ञानिक कार्यों में इस ताप पैमाने का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है। ऊष्मा के कारण पदार्थों के अनेक भौतिक गुणों में परिवर्तन होते हैं परन्तु ताप मापन के लिए पदार्थों के किसी ऐसे गुण का चयन करते हैं जो ताप का रेखीय फलन (linear function) होता है अर्थात् ताप के अनुक्रमानुपाती होता है। अतएव

यहाँ a नियतांक है तथा मापक गुण x का ताप के साथ स्वैच्छिक रूप में रेखीय सम्बन्ध लिया है ताकि ताप का मापक्रम रैखिक हो । यदि एक तापमापी को किसी ज्ञात ताप T1 वाले निकाय में रखने पर ऊष्मीय साम्यावस्था में उस निकाय का ताप मापक गुण x का मान x1 प्राप्त होता है तो समीकरण (1) से

समीकरण (2) से स्पष्ट है कि यदि किसी निकाय का ताप T ज्ञात करना चाहते हैं तो दूसरे निकाय का ताप ज्ञात होना आवश्यक होता है। इसलिए एक मानक निकाय का चयन करते हैं जिसका ताप यर्थाथतः ज्ञात हो । उदाहरण के तौर पर जल का त्रिक बिन्दु ( triple point ) जिस पर जल की तीनों अवस्थाऐं बर्फ, जल एवं वाष्प तीनों साम्यावस्था में होते हैं, को मानक ताप (standard temperature) (4.58 मि.मी. दाब पर 273.16 K) के रूप में लेते हैं।

यदि जल के त्रिक बिन्दु के संगत निकाय का भौतिक गुण Xtr हो तो T = Ttr = 273.16K पर x1 = xtr ले सकते हैं। समीकरण (2) से,
इस समीकरण द्वारा निर्देशित ताप कैल्विन मापक्रम में ताप होगा। कैल्विन मापक्रम सैद्धान्तिक मापक्रम है जो ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम पर आधारित है। यह मापक्रम गैस तापक्रम के पूर्णत: समान होता है। उपर्युक्त समीकरण को किसी भी पदार्थ तथा ताप के साथ रेखिक रूप से परिवर्तनशील किसी भी गुण पर आधारित तापमापी के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। तापमापी : उपर्युक्त सिद्धांतों के आधार पर अनेक प्रकार के तापमापियों की रचना की गई है। यहाँ हम कुछ प्रमुख प्रकार के तापमापियों का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं।
(i) द्रव तापमापी (Liquid Thermometers ) : ये तापमापी ताप के परिवर्तन के साथ द्रवों के आयतन में परिवर्तन पर आश्रित होते हैं। सामान्य प्रयोगों में प्रयुक्त पारा तापमापी, एल्कोहल तापमापी इसके उदाहरण हैं। इसकी मापन परास सीमित होती है, पारा तापमापी की परास -30° C से 350°C तक व सुग्राहिता कम होती है।
(ii) गैस तापमापी (Gras Thermometers) : गैस का आयतन व दाब, ताप पर चार्ल्स के नियमानुसार निर्भर होते हैं अतः गैस तापमापी दो प्रकार के हो सकते हैं- (अ) नियत दाब तापमापी : जिसमें दाब नियत रख कर आयतन के परिवर्तन के द्वारा ताप का मापन किया जाता है। सब गैसों के लिये आयतन प्रसार गुणांक समान होता है और इसका मान 1 / 273 प्रति डिग्री होता है । अत: यदि 0°C व t°C पर नियत दाब की गैस के आयतन Vo व Vt हैं तो
जहाँ T = (273 + t) केल्विन ताप है व To केल्विन मापक्रम पर हिमांक हैं।
(ब) नियत आयतन तापमापी : यह तापमापी मानक तापमापी के रूप में भी प्रयुक्त होता है। इसमें नियत आयतन की गैस के दाब के ताप के साथ परिवर्तन का उपयोग किया जाता है। चार्ल्स के नियम से नियत आयतन के लिए P∝T अर्थात्
यदि हिमांक 0°C (273 K) का दाब Po है, भाप बिन्दु 100°C ( 373K) पर दाब P100 पर दाब Pt है तो
आदर्श तापमापी के रूप में प्रयुक्त करने के लिये यदि त्रिक बिन्दु 273.16 K पर दाब Ptr है व अज्ञात ताप T K
इस तापमापी के अशांकन की आवश्यकता नहीं होती। सूत्र के उपयोग से गैस ताप ज्ञात कर सकते हैं अतः ये मानक तापमापी भी कहलाते हैं। गैस तापमापी अत्याधिक सुग्राही होते हैं तथा इनकी परास भी वृहद होती है। नियत दाब हाइड्रोजन तापमापी -200°C से 1100°C तक प्रयुक्त किया जा सकता है। -200°C से कम तोपों के लिये हीलियम गैस का उपयोग करते हैं। इनका उपयोग जटिल होता है तथा ये ताप- पात्र (bath) का ताप ज्ञात करने के लिये उपयुक्त होते हैं।
(iii) प्रतिरोध तापमापी ( Resistance Thermometers) : इसमें प्लैटिनम तार के प्रतिरोध को तापमापक गुण के रूप में प्रयुक्त करते हैं। यदि 0°C व 1°C पर किसी तार का प्रतिरोध क्रमश: Ro व Rt है तो
जहाँ δ प्रयुक्त प्रतिरोध तार के लिये नियतांक है। प्रतिरोध तापमापी का उपयोग सरल होता है, परास अधिक होती (- 200°C से 1200°C तक) तथा सुग्राहिता उपयुक्त प्रतिरोध मापन विधि से 0.01°C तक प्राप्त हो जाती है।
(iv) ताप वैद्युत तापमापी (Thermoelectric Thermometers) : ये सीबैक (Seeback) के ताप वैद्युत प्रभाव पर आधारित होते हैं। यदि भिन्न धातुओं जैसे Cu व Fe, Sb व Bi, Pt व (Pt + Rh ) आदि से बने दो तारों को सिरों पर जोड़ कर इस युग्म की एक संधि को दूसरी संधि के सापेक्ष भिन्न ताप पर रखा जाये तो परिपथ में एक वि.वा. बल उत्पन्न होता है जिसे ताप वैद्युत वाहक बल कहते हैं। यह वि.वा. बल संधियों के तापान्तर पर निर्भर करता है। एक संधि का नियत ताप जैसे 0°C पर रख कर दूसरी संधि का तापt परिवर्तित कर वि.वा. बल व ताप t में आलेख प्राप्त कर लेते हैं। इस आलेख का उपयोग कर अज्ञात ताप पर वि.वा. बल के मापन द्वारा अज्ञात ताप ज्ञात कर सकते हैं।
ये तापमापी उपयोग में बहुत सुगम तथा अत्यधिक सुग्राही होते हैं। परिवर्ती तापों के मापन में ये बहुत उपयोगी होते हैं क्योंकि संधि की ऊष्मा धारिता अत्यल्प होने से वह तुरन्त ताप प्राप्त कर लेती है। एक बिन्दु पर ताप का मापन इससे सम्भव होता है। इनकी मुख्य कमी सैद्धांतिक सूत्र का न होना है।
(v) विकिरण तापमापी ( Radiation Thermometers ) : ये तापमापी किसी पिण्ड, भट्टी आदि द्वारा उत्सर्जित विकिरणों के मापन पर आधारित होते हैं। स्टीफन के नियम का उपयोग कर जो सम्पूर्ण विकिरण ऊर्जा के मापन द्वारा ताप का निर्धारण करते हैं उन्हें सम्पूर्ण विकिरण उत्तापमापी (total radiation pyrometer) कहते हैं तथा जो पिण्ड विकिरण स्पेक्ट्रम के निर्दिष्ट भाग की किसी मानक लैम्प से प्राप्त उसी भाग के स्पेक्ट्रम से तुलना कर. ताप का मापन करते हैं, प्रकाशीय या स्पेक्ट्रमी उत्तापमापी (optical or spectral pyrometer) कहलाता है। ये तापमापी एक निश्चित ताप (~ 600°C) से कम ताप का मापन करने के लिये उपयोगी नहीं होते ।
(vi) चुम्बकीय तापमापी (Magnetic Thermometers ) : पदार्थों की चुम्बकीय प्रवृत्ति (Magnetic susceptibility) ताप पर निर्भर होती है। इस गुण का उपयोग परम शून्य के निकट अत्यल्प तापों के मापन के लिये किया जाता है।