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क्लोनिंग किसे कहते हैं पादपों में , cloning in plants in hindi definition

क्लोनिंग किसे कहते हैं पादपों में , cloning in plants in hindi definition ?

क्लोनिंग (Cloning)

क्लोन (Clone )

ग्रीक भाषा में क्लोन (klon) का आशय पादप की शाखा या टहनी से है। इस प्रकार क्लोन वह जीव है जो एक एकल जनक (parent) से कायिक विधि (vegetative) से जन्म लेता है। यह अपने जनक से भौतिक व आनुवंशिक तौर पर बिल्कुल समान होता है। एक क्लोन अर्थात् इस समूह के सभी जीव जीनी संरचना में एक दूसरे के समान (genetically identical) होते हैं। इस प्रकार क्लोनिंग प्रजनन की वह गैर लैंगिक (non sexual) विधि है जिसके द्वारा अनेक जीव अपने जनक के समान प्राप्त होते हैं। एक क्लोन के सभी जीव एक दूसरे की तथा अपने जनक की हुबहू प्रतिलिपि (copy) ) भी होते हैं। जैसे वनस्पति जगत् में अनेक पौधों को कुछ कारणों से उगाना कठिन होता है उस पादप की टहनियाँ काट कर जिन्हें कलम या ग्राफ्ट (graft) कहते हैं और जमीन में रोप दी जाती है। इस प्रकार जनक पादप के समान अनेक पादप प्राप्त हो जाते हैं जो गुणों में जनक के समान होते हैं।

क्या प्राणियों में भी ऐसा किया जा सकता है ? यह उत्सुकता सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में लम्बे अर्से से चली आ रही थी। क्यों नहीं अच्छे लक्षणों वाले जनक के समान अनेक पुत्र उत्पन्न हों अधिक दूध देने वाली कोई गाय हो तो हूबहू उसी नस्ल की अनेक प्रतिलिपियाँ प्राप्त की जाये। मनुष्य की यह कल्पना रही है कि अच्छे शक्ल-सूरत या बुद्धि युक्त सन्तानों की संख्या बढ़े। जन्तु प्रजनन व सामान्य वैज्ञानिकों के लिये यह चुनौति भरा विषय था कि अच्छे लक्षणों वाले जीवों को लुप्त होने से या अच्छे जीनों को विरल (dilute ) होने से बचाया जाये।

उच्च प्राणियों में लैंगिक प्रजनन पाया जाता है। नर व मादा युग्मजों के संलयन से युग्मनज होने (zyote) बनता है। युग्मनज में विखण्डन की क्रिया होती है व परिवर्धन के दौरान भ्रूण व पर व्यष्टि का निर्माण होता है। संतति में माता व पिता दोनों के प्रभावी लक्षण प्रकट होते हैं। अप्रभावी लक्षण छिपे रहते हैं।

प्राणियों की कोशिकाओं में संवर्धन की अल्प क्षमता होती है। यह कोशिका संख्यात्मक वृद्धि उसी परिस्थिति में करती है जब इसमें नैसर्गिक रूप में विभाजन की क्षमता हो तथा यह पूर्णशक्त (totipotent) हो तो ही यह पूर्ण व्यष्टि के रूप मे विकसित हो सकती है।

क्लोनिंग पर किये गये प्रयोग (Experiments on cloning)

हेन्स स्पीमान (Hans Spemann 1869-1941) ने सी अर्चिन व सैलेमेन्डर के अण्डों व भ्रूण पर प्रयोग किये। इन्होंने पाया कि इन जन्तुओं के आरम्भिक भ्रूण की आरम्भिक अवस्थाओं में से यदि कुछ कोशिकाओं को पृथक कर उचित माध्यम में रखते हैं तो भ्रूण कोशिका से एक भ्रूण उत्पन्न होता है।

हाइड्रा में मुकुलन द्वारा व प्लेनेरिया में विखण्डन द्वारा एक समान आनुवंशिक गुणों वाली संतति प्राप्त किये जाने की क्रिया के बारे में आप जानते ही हैं। कुछ ट्यूनिकेट्स में भी यह क्रिया पायी जाती है। एक युग्मनजी यमज एक दूसरे के क्लोन ही होते हैं। डेसिपस नोविमिनक्ट्स (Dasypus moveminctus) आर्मेडिल्लो अपने भ्रूण के विखण्डन से 4-8 क्लोन उत्पन्न करता है।

राबर्ट ब्रिग्स एवं थामस किंग (Robert Briggs and Thomas King) ने 1956 ने भ्रूण के केन्द्रक की पूर्णशक्तता पर कुछ प्रयोग किये। इन्होंने लिओपार्ड मेंढ़क (Rana pipiens) का अण्ड (oocyte) लिया। इसे काँच की नुकीली सूई से स्पर्श किया एवं पाया कि यह प्रेरित हो जाता है इसके केन्द्रक में अर्ध सूत्री विभाजन आरम्भ हो गया है। इन्होंने एक और प्रयोग किया इस सक्रिय अण्ड से केन्द्रक को निष्कासित कर दिया। इस अकेन्द्रकित (enucleated) अंड को पराबैंगनी किरणों से उपचारित किया एवं इसमें एक अन्य ब्लास्टोमियर के केन्द्रक (2n) को रोपित कर दिया। इन्होंने पाया कि इन केन्द्रक प्रतिरोपित अण्डों से पूर्ण टेडपोल विकसित हो जाते हैं।

लन्दन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के जे. बी. गार्डन (J. B. Gurdon 1969 ) एवं इनके साथियों ने केन्द्रक प्रत्यारोपण की अन्य विधि अपनायी । इन्होंने मेंढ़क के कुछ अण्डे लिये। इन अण्डों के केन्द्रक को नष्ट कर दिया। इनके स्थान पर अन्य जाति के टेडपोल की आन्त्र की उपकला कोशिकाओं के केन्द्रक को प्रत्यारोपित कर दिया। इन अण्डों से टेडपोल विकसित हो गये जो कायान्तरण के बाद वयस्क मेंढ़क में विकसित हो गये। ये टेडपोल एवं मेंढ़क अपने पूर्वज की जीनीय दृष्टि से हूबहू प्रतिलिपि (copy) थे। इन प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया कि कुछ विभेदित कायिक कोशिकाएं पूर्ण शक्त (totipotent) ही रहती हैं जैसे-जैसे भ्रूण की आयु बढ़ती जाती है इस क्षमता का ह्रास होता जाता है। गार्डन द्वारा विकसित केन्द्रक प्रतिस्थापन तकनीक ( nuclear transplant technique) को आज भी रूपान्तरित तरीके से क्लोनिंग हेतु उपयोग में लाया जा रहा है।

क्लोनिंग के प्रकार (Types of cloning)

क्लोनिंग एक व्यापक शब्द है इसके अनेक अर्थ निकाले गये हैं। इसे दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। इसका आधार इस क्रिया हेतु उपयोग में लाये जाने वाली सामग्री (material) से है। (i) जीन क्लोनिंग (Gene cloning)

(ii) जीवों की क्लोनिंग (Cloning of animals)

(i) जीन क्लोनिंग (Gene cloning) : यदि किसी जीन या डी. एन. ए. अथवा गुणसूत्र की हूबहू अनेक प्रतिलिपियाँ बनायी जायें तो यह क्रिया भी क्लोनिंग ही कहलाती है तथा प्रत्येक प्रतिलिपि को क्लोन कहा जाता है। जीन या डी.एन.ए. के अध्ययन हेतु इसकी अनेक प्रतिलिपियाँ प्राप्त की जाती है। पी. सी. आर. (polymerase chain reaction) या जीन मशीन से यह क्रिया सम्भव हो गयी है । इसके पूर्व एक अन्य विधि में किसी जीन को किसी वाहक के डी. एन. ए. के साथ जोड़ कर जीवाणु में प्रवेशित कराया जाता है। यह जीवाणु प्रजनन करता है साथ ही इन जीन की भी अनेक प्रतिलिपियाँ प्राप्त होती हैं। यह क्रिया भी जीन क्लोनिंग ही कहलाती है।

(ii) जीवों की क्लोनिंग (Cloning of animals) : इस उद्देश्य के आधार पर इसे पुनः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है-

(a) प्रजननीय क्लोनिंग (Reproductive cloning) (b) चिकित्सकीय क्लोनिंग (Therapeutic cloning)

(a) प्रजननीय क्लोनिंग (Reproductive cloning) : यह पूर्ण प्राणी के क्लोन बनाने से सम्बन्धित है। यह तीन प्रकार की हो सकती है।

(i) भ्रूण क्लोनिंग (Embryo cloning) : नर व मादा युग्मकों के संलयन से युग्मनज (zyote) बनता है। युग्मनज में विखण्डन द्वारा 2.4, 8, 16……कोशिकाएं बनती है। यह रचना बाद में भ्रूण कहलाती है। प्रारम्भिक भ्रूण की कोशिकाएं ब्लास्टोमियर (blastomere) कहलाती है। यदि इन ब्लास्टोमियर को भ्रूण से अलग कर संवर्धित किया जाये तो प्रत्येक पृथकित कोशिका एक भ्रूण विकसित होती है। चूंकि इनका जीनीय पदार्थ समान होता है, ये सभी एक समान अर्थात एक दूसरे की प्रतिलिपि होते हैं। इनसे बने वयस्क को यमज (twins) कहते हैं। यह क्रिया टिवनिंग (twining) भी कहलाती है। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि यमज एक दूसरे की प्रतिलिपि या क्लोन है माता-पिता के नहीं ।

(ii) केन्द्रक प्रतिरोपण द्वारा क्लोनिंग (Cloning by nuclear transter) : यदि वयस्क प्राणी के समान क्लोन बनाना हो तो यह आवश्यक है कि निषेचन कराये बिना ही जीव का परिवर्धन हो अन्यथा दोनों जनकों लक्षण संतति में आयेंगे। इस क्रिया हेतु गुर्डन द्वारा अपनायी गयी तकनीक का उपयोग किया जाता है। अर्थात मादा से अण्ड प्राप्त किया जाता है। इस अण्ड से केन्द्रक का निष्कासन कर दिया जाता है। इस अकेन्द्रकित अण्ड में अब वांछित कोशिका का (2n) केन्द्रक प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। यह 2n केन्द्रक जिस जन्तु से लिया जाता है भ्रूण या वयस्क अर्थात् क्लोन उसी की प्रतिकृति होता है।

यह तकनीक उतनी आसान नहीं है, जितनी बतायी गयी है। इसके प्रत्येक स्तर पर पूर्ण सावधानी रखी जाती है। प्रत्येक पद हेतु विशिष्ट तकनीकों की सहायता ली जाती है। रोजलिन इन्स्टीट्यूट के विलमट एवं इनके साथियों (Wilmut and co workers) ने 1996 में इस तकनीक द्वारा बहुचर्चित भेड़ क्लोन डॉली (Dolly ) प्राप्त की ।

हवाई विश्वविद्यालय के रूजो यानागिमाची एवं साथियों (Ruzo yanagimachi and co workers) ने किंग, ब्रिग्स व गर्डन की तकनीक में कुछ परिवर्तन कर क्लोन विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। इसे होनोलूलू तकनीक (Honolulu technique) का नाम दिया गया है। इस तकनीक में दाता व ग्राही कोशिकाओं या इसके केन्द्रक का संगलन नहीं कराया जाता। इनके स्थान पर केन्द्रक विहीन अण्ड कोशिका में उन कोशिकाओं के केन्द्रक को प्रतिस्थापित किया जाता है जो G0 या G1अवस्था में होती है। इस प्रकार इन्होंने 50 चुहियाएं क्लोन के रूप में प्राप्त की। प्रथम क्लोन चुहिया की तीन पीढ़िया भी प्राप्त की तथा यह भी सिद्ध किया कि क्लोनिंग द्वारा संतति में कोई असामान्यता उत्पन्न नहीं होती। इस पूर्ण क्रिया का श्रेय शोधकर्ता टेरूहिको वाकायामा को दिया गया है।

स्तनधारियों में क्लोनिंग (Cloning in mammals)

स्तनधारियों में सफलतापूर्वक क्लोनिंग द्वारा 1997 में डॉ. इयान विल्मट एवं साथियों (Dr.Ian Wilmut and associates) ने डॉली नामक भेड़ को प्राप्त किया गया। ये स्काटलैण्ड के एडिनबर्ग के निकट रोजलिन इन्स्टीट्यूट से सम्बन्धित है। यहाँ इस भेड़ का जन्म हुआ था । इयान विल्मट ने 1955 में तीन भेड़ों को क्लोन किया था। डॉली के चर्चा में आने का कारण यह था कि यह प्रथम स्तनी जीव थी जिसे वयस्क की कोशिका से क्लोन किया गया था जबकि इससे पूर्व उत्पन्न स्तनी में केन्द्रक या कोशिकाएं भ्रूणीय कोशिका से ली गयी थी। डाली भेड़ के विकास की क्रिया को संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया जा सकता है।

  1. विल्मट व इनके साथियों ने एक गर्भित डार्सेट भेड़ (सफेद मुँह वाली पहाड़ी वेल्श भेड़) की स्तन ग्रन्थियों से 277 कोशिकाएं प्राप्त की। ये कोशिकाएं एक 6 वर्षीय भेड़ से ली गयी थी। इन्हें शीतलक (deep freezer) में रखा गया इन्हें पाँच दिन तक प्रयोगशाला में रखा गया किन्तु पोषक पदार्थ अत्यन्त अल्प मात्रा में दिये गये इस प्रकार इसकी पहचान स्तन ग्रन्थियों के रूप में समाप्त हो गयी। इनके जीन अक्रिय हो गये। यह कोशिका सुप्तावस्था में आ गयी। इस प्रकार यह कोशिका केन्द्रकीय री प्रोग्रामिंग (reprogramming) हेतु तैयार कर ली गयी जिनसे इच्छानुसार कार्य लिया जा सकता था।
  2. एक अन्य काले मुख वाली स्काटिश भेड से अण्ड कोशिकाएं प्राप्त की गयी तथा इनके केन्द्रक को अण्ड कोशिका से निष्कासित कर दिया। इस प्रकार अकेन्द्रति अण्ड कोशिका प्राप्त कर ली गयी।
  3. अकेन्द्रकित अण्ड कोशिकाओं एवं स्तन ग्रन्थि की पृथक की गयी कोशिकाओं को एक साथ संवर्धन माध्यम में रखा एवं विद्युत धारा प्रवाहित की गयी अतः दोनों प्रकार की कोशिकाओं में संलयन हो गया। अण्डाणु कोशिका ने स्तन ग्रन्थि कोशिका के केन्द्रक को अपने में समायोजित कर लिया।
  4. इस प्रकार अण्डकोशिका में स्तन कोशिका के केन्द्रक का प्रतिरोपण होने के कारण यह सक्रिय होकर विभाजन करने लगी। संवर्धन के दौरान इनमें से केवल 29 भ्रूण ही सक्रिय हुए शेष नष्ट हो गये।
  5. इन सक्रिय भ्रूणों को 13 काले मुख काली भेड़ों के गर्भाशय में रोपित (implant) किया गया। इस क्रिया हेतु मादा भेड़ों को कृत्रिम गर्भावस्था हेतु उपचारित किया गया। इनमें से केवल एक भेड़ ही गर्भवती हुयी।
  6. अण्ड कोशिका के संलयन किये जाने के 148 दिन के बाद 5 जुलाई 1996 को एक काले मुख की भेड़ ने जिसे धात्री माता ( surrogate mother) कहा गया ने एक मादा भेड़ को जन्म दिया जिसका नाम स्थानीय गायिका डॉली पैटर्न के नाम पर डॉली (Dolly ) रखा गया। यह जन्म के समय सामान्य थी इसका वजन 6.6 कि.ग्रा. था ।
  7. डॉली के डी. एन. ए. का परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इसका विकास दाता केन्द्रक से हुआ था।

जिस भेड़ से डाली के लिये स्तन कोशिका ली गयी थी उसकी मृत्यु डाली के जन्म से पूर्व हो गयी थी। डॉली की सरोगेट मादा काले मुख वाली भेड़ इसलिये ही चुनी गयी थी कि ताकि उत्पन्न होने वाली सन्तान क्लोन है। यह सिद्ध हो सके। डॉली के जन्म को 6 माह तक प्रकाशित नहीं किया गया। 22 फरवरी 1997 को रोजलिन संस्थान ने डॉली के जन्म को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया। डॉली के जन्म के समाचार से वैज्ञानिकों, धार्मिक नेताओं, राजनीतिज्ञों विधिवेत्ताओं में बहस छिड़ गयी। कोई नैतिकता की दुहाई देता था तो कोई क्लोनिंग के घातक प्रभावों को लेकर चिन्तित था। कुछ डाली के व्यवहार को लेकर आशंकित थे किन्तु यह सामान्य शान्त प्रकृति की भेड़ थी। इसने सामान्य रूप से प्रजनन भी किया व 13 अप्रैल 1998 को एक मेमने को जन्म दिया जिसका नाम बोनी (Bonnie) रखा गया । बोनी का पिता एक सामान्य वेल्श माऊन्टेन मेढ़ा (welsh mountain ram) था जिसका नाम डेविड था। इसी जनक से डाली से तीन मेमने और उत्पन्न हुए

इनमें से 2 नर व 1 मादा था। डॉली की मृत्यु 14 फरवरी 2003 को हुयी। इसे फेफड़े का संक्रमण था चिकित्सकों ने असाध्य रोग होने के कारण उसे बजाय चिकित्सा देने के चिर निद्रा में सुला दिया। कुछ लोगों की मान्यता थी डाली जन्म के समय ही 6 वर्ष की आयु की थीं अतः इसमें जल्दी बुढ़ापे के लक्षण प्रकट होने लगे थे। (डॉली का जीनीय पदार्थ 6 वर्षीय भेड से प्राप्त किया गया था। )

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने डॉली के जन्म के एक सप्ताह बाद ही क्लोनिंग द्वारा दो वानरों नेति (Neti) व दित्तो (Diotto) के जन्म की घोषणा की। ये वानर अमेरिका के ओरगोन रीजनल प्राइमेट रिसर्च सेन्टर ने क्लोनिंग द्वारा तैयार किये थे। नेति से इनका आशय न्युक्लियर एम्ब्रयो ट्रान्सफर इन्फेट (nuclear embryo transfer infant ) से था ।

चीनी वैज्ञानिकों ने 12 मार्च 1997 को बीजींग में घोषणा की कि उन्होंने दिसम्बर 1996 में ही क्लोनिंग द्वारा प्रयोगशाला में 6 चूहें प्राप्त कर लिये थे ।

जापानी वैज्ञानिकों के एक दल ने एक 8 कोशीय भ्रूण गाय के गर्भाशय से लिया। इसे पोषकीय माध्यम में रख कर भ्रूण की 8 कोशिकाओं को एक दूसरे से पृथक कर लिया। इसके उपरान्त प्रत्येक कोशिका को अन्य पोषक या सरोगेट माता में स्थानान्तरित कर दिया। इस प्रकार 8 क्लोन्स प्राप्त हुए।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने लुप्त हो रही प्रजाति एशियन गौर (Bos gaurus) की त्वचा को कोशिका से केन्द्रक निकाल कर गाय के अकेन्द्रीय अण्ड में प्रवेशित करा कर नवीन द्विगुणित अण्ड अन्य गाय के गर्भाशय में प्रवेशित करा कर सरोगेट माता से गौर बछड़ा प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। यह भी पाया गया है कि अन्य जाति के अण्ड सरोगेट प्राणी में प्रवेशित करा कर क्लोन प्राप्त किया जा सकता है। यह भी पाया गया है कि अकेन्द्रकित अण्ड से ISWI नामक एन्जाइम प्राप्त किया जाता है जो कायिक केन्द्रक को विभाजन हेतु सक्रिय बना देता है।

इसी प्रकार अन्य स्तनधारियों में गाय, लाल मुख के बन्दर (rhesus monkey) व मूसे के क्लोन बनाये गये हैं। इस प्रकार के समाचार पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए है।

मानव क्लोनिंग (Human cloning) पर अनेक प्रयोगशालाओं में शोध कार्य जारी है। इसका उपयोग मानव के रोगग्रस्त होने पर जैसे केन्सर से यकृत, हृदय, अथवा वृक्क के खराब हो जाने पर मानव भ्रूण जो क्लोन के रूप में तैयार किया गया है से प्रतिस्थापित किये जाने हेतु योजना बनायी गयी है। इसे चिकित्सकीय क्लोनिंग ( therapeutic cloning) नाम दिया गया है। यह तो विदित ही है कि मानव देह परायी (non self) कोशिकाओं अंग या ऊत्तकों को अस्वीकृत कर देती है या इनके प्रति प्रतिरक्षियाँ बनाने लगती है। यदि उसी मानव की देह की कोशिकाएं (स्टेम कोशिकाएं ) लेकर प्रत्यारोपण हेतु अंगों के क्लोन बनाये जाते हैं तो देह उन्हें स्वीकार कर लेगी। इस प्रकार खराब या अनुपयोगी अंगों को बदला जा सकेगा।

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