बोनस क्या होता है | बोनस की परिभाषा किसे कहते है अर्थ मतलब bonus in hindi meaning definition

By   March 11, 2021

bonus in hindi meaning definition बोनस क्या होता है | बोनस की परिभाषा किसे कहते है अर्थ मतलब ?

बोनस
अभी तक हमने सभी प्रकार के भुगतानों को एक श्रेणी श्मजदूरीश् अथवा वेतनश् में रखा है। किंतु व्यवहार में कर्मचारियों के भुगतान में मूल मजदूरी, बोनस और विभिन्न प्रकार के भत्ता (उदाहरण के लिए चिकित्सा व्यय, आवास किराया, यात्रा और बच्चों की शिक्षा के लिए) शामिल होते हैं। इन घटकों का विशेष रूप से उच्च आय अर्जित करने वाले वर्गों पर अलग-अलग आय कर प्रभाव होता है। किंतु सैद्धान्तिक दृष्टि से भी इन्हें अलग कर विश्लेषण करना आवश्यक है क्योंकि जहाँ मूल वेतन नियोजन का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारक समझा जाता है वहीं अन्य घटक विद्यमान नियोजकों के साथ विद्यमान कर्मचारियों के बने रहने के निर्णय अथवा कठिन कार्य करने इत्यादि को प्रभावित करते हैं।

निम्नलिखित तालिका 34.4 में, हम यह प्रदर्शित करेंगे कि इस विश्लेषण में किस तरह से समय के साथ (1960 से 1994 तक) परिवर्तन आया है। यहाँ हम श्रमिकों और वेतन अर्जित करने वालों में अंतर नहीं करते हैं और आँकड़ा सभी कर्मचारियों के संदर्भ में है। हम देखते हैं कि पूरी अवधि में बोनस घटक अत्यन्त ही स्थिर स्थिति पर है और यह 6 प्रतिशत था। किंतु 1990 के बाद मूल मजदूरी और नकद भत्ता ने एक दूसरे का स्थान लिया, यह ध्यान देने योग्य है। 1990 के दशक में जहाँ मल मजदूरी में नकद भत्ते की तुलना में काफी वृद्धि हुई. ये दो अंश पहले के दो दशकों तक काफी हद तक स्थिर रहे। मूल मजदूरी का अंश 1964 में 60.90 प्रतिशत की तुलना में 1994 में 75.37 प्रतिशत था। दूसरी ओर, नकद भत्ते का अंश 1965 में 34.13 प्रतिशत की तुलना में 1995 में मात्र 14.35 प्रतिशत था। इस प्रकार, इस प्रवृत्ति से पता चलता है कि मूल मजदूरी के अंश में वृद्धि हो रही है।

विनिर्माण क्षेत्र में मजदूरी और बोनस
सिद्धान्त में हम मजदूरी दर पर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं और यदि हम रोजगार निर्धारित करते हैं तो हम एक श्रमिक का प्रति समय इकाई (दिन, माह, अथवा वर्ष) मजदूरी आय की गणना कर सकेंगे। किंतु वास्तव में हमारे पास कदाचित ही मजदूरी दर संबंधी आँकड़ा होता है। कारखाने में यदि एक सांख्यिकिविद् को मजदूरी दर (उदाहरण के लिए प्रति घंटा) के संबंध में आँकड़ा संग्रह करना है, तो उसे सभी प्रकार के श्रमिकों जैसे मेकैनिक, इलैक्ट्रिशियन, सफाईकर्मी, मटेरियल हैंडलर, फोरमैन, पर्यवेक्षक, क्लर्क इत्यादि पर विचार करना होगा। यह अव्यवहारिक है, इसलिए सामान्य रूप से प्रचलन यह है कि सभी श्रमिकों (जिसका वर्गीकरण कतिपय मोटे शीर्षों जैसे कुशल-अकुशल, अथवा ब्लू कॉलर और व्हाइट कॉलर इत्यादि में किया जा सकता है) का दी गई समय की इकाई (पुनः माह अथवा वर्ष) में कुल मजदूरी बिल संबंधी आँकड़ा एकत्र किया जाता है, और साथ ही साथ कुल रोजगार भी रिकार्ड किया जाता है। त्तपश्चात् कुल मजदूरी बिल को रोजगार से विभाजित करने से हमें विशेष श्रमिक की औसत मजदूरी आय (प्रति माह अथवा वर्ष) प्राप्त होती है। यह आँकड़ा यद्यपि कि पूर्णतः नहीं फिर भी मजदूरी दर के सदृश होगा। इसका सीधा कारण यह है कि हो सकता है कि कुछ श्रमिकों ने समयोपरि कार्य किया हो और श्रमिकों के अनेक प्रकार हैं, औसत आय आँकड़ा हमें मजदूरी दरों के बारे में बहुत ही कम जानकारी दे सकता है। इसलिए, अनुभव सिद्ध विश्लेषण में, हमें आँकड़ों की विवेचना करने में अत्यधिक सावधान रहना चाहिए।

ए एस आई आँकड़ों से हम औद्योगिक श्रमिकों की औसत वार्षिक आय की गणना समय और सारे उद्योगों के संदर्भ में कर सकते हैं। आगे, आँकड़ों का वर्गीकरण दो प्रकार के कर्मचारियों के लिए किया जा सकता है: श्रमिक और गैर श्रमिक कर्मचारी। पहले श्रेणी से अभिप्राय उत्पादन की प्रक्रिया में सम्मिलित कर्मचारियों से है, जिन्हें बहुधा शॉप-फ्लोर श्रमिक अथवा ब्लू-कॉलर श्रमिक कहा जाता है। हम उन्हें सिर्फ श्रमिक कहेंगे। दूसरी श्रेणी से अभिप्राय पर्यवेक्षकों और उच्च पदस्थ कर्मचारियों से है जो उत्पादन का प्रबन्ध करते हैं, अथवा बाह्य सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं (जैसे लेखाकार, बिक्री से जुड़े लोग इत्यादि)। हम उन्हें वेतन अर्जित करने वाला कहेंगे। पहले हम वार्षिक वास्तविक मजदूरी (श्रमिक की औसत आय) और वार्षिक वास्तविक वेतन (वेतन अर्जित करने वाले की औसत आय) की प्रवृत्तियों पर चर्चा करेंगे। आँकड़े वास्तविक रूप में अभिव्यक्त किए गए हैं ताकि दो समयावधियों में तुलना की जा सके और 1982 को आधार वर्ष मानकर सामान्य वस्तुओं के लिए औद्योगिक श्रमिकों हेतु उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की सहायता से सांकेतिक आँकड़ों को वास्तविक आँकड़ों में बदला गया है।

एक छोटा किंतु महत्त्वपूर्ण विषय यह है कि आय आँकड़ों में सभी प्रकार के भुगतान जैसे मूल मजदूरी, बोनस और नकद भत्ता सम्मिलित हैं, जिसके लिए हम इस चरण पर कोई विभेद नहीं करते हैं और इन्हें सीधे-सीधे मजदूरी अथवा वेतन कहते हैं। किंतु बाद में हम उनमें भेद करेंगे।

तालिका 34.1 में 1967 से मजदूरी और वेतन प्रवृत्तियों को संक्षेप में दर्शाया गया है। दोनों की प्रवृत्ति कभी-कभी मामूली गिरावटों के साथ बढ़ने की रही है जैसा कि तालिका 34.1 में स्पष्ट रूप से अधिक निरन्तर आँकड़ों में दर्शाया गया है। दोनों वर्षों में लगभग एक ही समय में वृद्धि और गिरावट आई है और यह निश्चित तौर पर दोनों प्रकार के कर्मचारियों के लिए स्पष्ट लाभ का वृत्तान्त है। तथापि, वेतन में मुख्य रूप से 1970 और 1980 के बीच वृद्धि हुई है। 1960 और 1970 के बीच, तीव्र वृद्धि और तीव्र गिरावट दोनों देखी गईं परिणामस्वरूप स्थिर औसत बना रहा जबकि 1970 के आगे सत्त् रूप से वृद्धि हुई तुलनात्मक रूप से, मजदूरी क्रम में कम अनियमित वृद्धि और कमी हुई है जिससे दशक के अंत में औसत वृद्धि दर्ज की गई इसने 1970 और 1980 के बीच अधिक वृद्धि दर्ज किया।

इन वृद्धि प्रवृत्तियों के कारण मजदूरी और वेतन दोनों में दीर्घकालीन वृद्धि हुईं वर्ष 1997 में वास्तविक मजदूरी 1967 की तुलना में लगभग दोगना है और वास्तविक वेतन में दोगनी से थोड़ी कम वृद्धि हुईं दोनों आय (वेतन-मजदूरी) आँकड़ों में अंतर भी 1990 तक 8000 रु. के लगभग (1982 के मूल्यों पर) स्थिर रहा। यह आकृति-34.1 से और तालिका-34.1 में वेतन-मजदूरी अनुपातों से भी बिल्कुल स्पष्ट है जो 1973 में 2.36 से 1988 में 1.85 तक महत्त्वपूर्ण गिरावट दर्शाता है। दो वास्तविक आँकड़ों में अंतर बढ़ कर लगभग 11000 करोड़ रु. के करीब हो गया और वेतन-मजदूरी अनुपात में भी वृद्धि हुई।

अनेक कारणों से ये प्रेक्षण महत्त्वपूर्ण हैं। पहला, मजदूरी और वेतन में वृद्धि की सत्त् प्रवृत्ति कुछ-कुछ नियोजन और औद्योगिक विवाद आँकड़ों के विषम है। नियोजन क्रम श्रृंखला 1980 और 1990 के बीच कोई वृद्धि नहीं दर्शाता है जिससे पता चलता है कि रोजगार प्रवृत्ति अथवा प्रथा में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ। इसी प्रकार औद्योगिक शृंखला में भी भारी परिवर्तन देखे गए हैं। किंतु मजदूरी श्रृंखला में आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक परिवर्तन हुआ जिससे पता चलता है कि नियोजित श्रमिक के आय के स्तर में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ। अरसी के पूरे दशक में मजदूरी और वेतन में वृद्धि होती रही जबकि नियोजन में अचानक ही जड़त्व आ गया। दूसरा, उदारीकरण के पश्चात् भी मजदूरी और वेतन में वृद्धि होती रही जो कि स्वागतयोग्य विशेषता है और अनेक आलोचकों के दावों के विपरीत है।

तीसरा, यह अत्यंत ही गूढ़ तथ्य है कि उदारीकरण पश्चात् अवधि में वेतन में मजदूरी की अपेक्षा अधिक तीव्र दर से वृद्धि हुई है, जिसके कारण दोनों के बीच अंतर हाल में बढ़ गया है। आर्थिक सिद्धान्त यह पूर्वानुमान करता है कि अधिक व्यापार के कारण (उदारीकरण का अर्थ है अधिक विदेश व्यापार) विकासशील देश को श्रम-प्रधान उत्पादों में लाभ होना चाहिए जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों, विशेषकर अकुशल श्रमिकों को अधिक मजदूरी मिलती है। इस संबंध में अनुभवसिद्ध साक्ष्य मिले-जुले हैं और अन्यथा निकले परिणामों के नए स्पष्टीकरण हैं। भारतीय संदर्भ में हालाँकि श्रमिकों और वेतन अर्जित करने वालों का हमारा वर्गीकरण कुशलता के आधार पर नहीं है वेतन-मजदूरी अंतर में वृद्धि जिसमें वेतन में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुई है अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करता है। अतएव, इस परिघटना की अधिक सावधानीपूर्वक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है।

 विसमुच्चय दृष्टिकोण
अगला महत्त्वपूर्ण प्रश्न है: क्या यह वृद्धि सभी उद्योगों में दर्ज की गई? क्या वृद्धि की गति सभी उद्योगों में समान रही या अलग-अलग? चूँकि मजदूरी और वेतन प्रवृत्तियों जिस पर हमने विचार किया सिर्फ औसत हैं यह समझने के लिए वृद्धि में अंतर के बारे में अलग से अध्ययन करना होगा कि क्या वृद्धि की इस दौड़ में कोई उद्योग पीछे छूट गया है।

इस प्रश्न का उत्तर विसमुच्चय आँकड़ों (दो या तीन अंक स्तरों) का विश्लेषण कर और सभी उद्योगों पर विचार करके दिया जा सकता है। किंतु इसे कुछ संक्षिप्त किया जा सकता है और उसमें से कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं का चयन किया जा सकता है। यहाँ हम कुछ उद्योगों जिन्होंने अत्यन्त ही अलग-अलग प्रवृत्ति दर्शाई है की जाँच करके ऐसा करने का प्रयास करते हैं। वास्तविक वार्षिक वेतन और मजदूरी के मामले में सात उद्योगों, जैसे कि, तम्बाकू, वस्त्र, सीमेण्ट, लौह तथा इस्पात, पेट्रोलियम शोधक और मोटर वाहन की तुलना की गई है। तालिका 34.2 और 34.3 में क्रमशः मजदूरी और वेतन के तुलना का विहंगम अवलोकन प्रस्तुत किया गया है जबकि आकृति 34.2 और 34.3 में अधिक व्यापक वर्ष दर वर्ष तुलना की गई है।

जहाँ तक मजदूरी का संबंध है प्रायः सभी सात उद्योगों (तम्बाकू छोड़कर) में वृद्धि की प्रवृत्ति एक जैसी थी, और संपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र में भी ऐसी ही स्थिति थी। किंतु इस तालिका का प्रयोजन उद्योगों के बीच असमानता को दर्शाना है न कि उनके बीच समानता को । सबसे पहले सबसे कम भुगतान करने वाले तम्बाकू उद्योग और सबसे अधिक भुगतान करने वाले पेट्रोलियम शोधक उद्योग के बीच भारी अंतर को देखिए । अन्य सभी उद्योगों में तम्बाकू सबसे कम भुगतान करने वाला है। इस उद्योग में मजदूरी अत्यन्त ही कम स्तर पर बनी रही और सिर्फ 1980 के बाद ही इसमें मामूली वृद्धि हुईं विशेषकर बीड़ी निर्माण उद्योग में अकुशल श्रमिकों की प्रधानता सत्त् रूप से कम मजदूरी का मुख्य कारण हो सकती है। इसके विपरीत दूसरे श्रम प्रधान उद्योग वस्त्र में, मजदूरी में 1970 और 1970 के बीच सत्त् वृद्धि हुई किंतु उसके बाद इसकी गति भी धीमी पड़ गई, इसका कारण संभवतया औद्योगिक विवाद था जिससे यह उद्योग 1980 के दशक के आरम्भ में पीड़ित रहा था।

इसी दृश्य के दूसरे छोर पर आधुनिक और पूँजी प्रधान उद्योग है जैसे मोटर वाहन उद्योग और पेट्रोलियम शोधक। इन उद्योगों में विशेषकर पेट्रोलियम शोधक में, मजदूरी का स्तर अत्यन्त ही ऊँचा है और 1980 के दशक में दोनों में असाधारण वृद्धि हुई थी। पेट्रोलियम शोधन उद्योग में 1980 के दशक के आरम्भ में विशेष स्थिति थी जब इसके रोजगार में इसकी मजदूरी भुगतानों की अपेक्षा अकस्मात् वृद्धि हुई तथा लगातार तीन वर्षों तक इसमें वृद्धि बनी रही। इसलिए 1971 के बाद मजदूरी में तीव्र गिरावट आई और कुछ वर्षों के बाद फिर इसमें वृद्धि हुई जैसा कि आकृति-34.2 में दर्शाया गया है। इस प्रकार हम दिए गए वर्ष में और पूरे वर्ष में मजदूरी में अत्यधिक अंतर-उद्योग विषमता देखते हैं। उनका वृद्धि चरण भी अलग-अलग है। इन सबसे यह पता चलता है कि समान समष्टि आर्थिक वातावरण होने के बावजूद भी मजदूरी के निर्धारण में उनके अलग बाजार दशाओं और श्रमिक उत्पादकता का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

वास्तविक मजदूरी से भिन्न, सिर्फ दो उद्योगों, मोटर वाहन और लौह तथा इस्पात, में वास्तविक वेतन में दीर्घकालीन वृद्धि हुई और यह वृद्धि भी अत्यन्त मामूली थी। शेष पाँच उद्योगों में वेतन में न तो वृद्धि हुई और न ही कमी आई यह एक गलत संकेत दे सकता है कि वेतन में बिल्कुल ही वृद्धि नहीं हुईं इसके विपरीत, हम जानते हैं कि संपूर्ण विनिर्माण क्षेत्र में वेतन में वृद्धि हुई और जब 1970 तथा 1990 के बीच तुलना करते हैं तो दीर्घकालीन वृद्धि स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है, हालाँकि जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया 1970 और 1980 के बीच समग्र वृद्धि मामूली थी।

यहाँ हमने जिन उद्योगों का उल्लेख किया है वे 1990 के बाद के चरण में अपने स्थिर वेतन प्रवृत्तियों से महत्त्वपूर्ण अलगाव नहीं दर्शाते हैं। इसका अभिप्राय यह हुआ कि इस समय में वेतन में जो उच्च वृद्धि हुई वह इन उद्योगों के अलावा किन्हीं अन्य उद्योगों में हुई जिसे हमने सम्मिलित नहीं किया है।

जैसा कि हमने पहले कहा, हमें उद्योगों के बीच असमानता को रेखांकित करना है और इन उद्योगों का चयन इस तथ्य पर प्रकाश डालने के लिए किया गया है कि जहाँ मजदूरी में सत्त् रूप से वृद्धि हुई वेतन में गत्यावरोध बना रहा। पेट्रोलियम शोधक, वस्त्र और सीमेण्ट उद्योग इस श्रेणी में आते हैं, यद्यपि कि पेट्रोलियम शोधकों में 1980 के दशक के आरम्भ में थोड़ी सी अवधि के लिए वेतन में गिरावट आई थी। तम्बाकू और रसायन उद्योग एक अन्य श्रेणी हैं जिसमें वास्तव में वेतन में कमी आई थी। सिर्फ लौह तथा इस्पात और मोटर-वाहन उद्योगों में वेतन में मजदूरी की भाँति ही वृद्धि हईं इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि वेतन में अंतर-उद्योग भिन्नता अधिक विविधतापूर्ण है और इनके सावधानीपूर्वक विश्लेषण की आवश्यकता है।

बोध प्रश्न 2
1) मजदूरी और वेतन प्रवृत्तियों की तुलना कीजिए?
2) क्या आप समझते हैं कि सभी उद्योगों में मजदूरी में एक समान वृद्धि हुई?
3) पाठ्यक्रम में चर्चा किए गए किन्हीं दो उद्योगों में विगत कुछ दशकों में वेतन वृद्धि की जाँच कीजिए।
4) सही के लिए (हाँ) और गलत के लिए (नहीं) लिखिए।
क) मजदूरी वृद्धि में भिन्नता-उद्योग अंतर तुच्छ हैं। ( )
ख) उदारीकरण के पश्चात् हाल में वास्तविक वेतन और वास्तविक मजदूरी में अंतर बढ़ा है। ( )
ग) तम्बाकू उद्योग में वास्तविक मजदूरी 1980 तक नहीं बढ़ी। ( )
घ) मोटर वाहन उद्योग ने वेतन में कोई दीर्घकालीन सुधार नहीं दर्शाया। ( )
ड.) 1990 के दशक में कुल मजदूरी बिल में मूल मजदूरी के हिस्से में भारी वृद्धि हुई। ( )

बोध प्रश्न 2 उत्तर
1) 1980 के दशक में दोनों में धीरे किंतु स्थिर वृद्धि हुईं अधिक जानकारी के लिए भाग 34.2 पढ़िए।
2) सभी (अथवा अधिकांश) उद्योगों में मजदूरी में वृद्धि हुई किंतु इसकी गति तथा वृद्धि के स्तर में भारी अंतर था। पाठ्यक्रम में चर्चा किए गए कुछ उद्योगों को देखने से यह धारणा दृढ़ होती है।
3) धारा 34.2 पढ़िए। 4) (क) नहीं (ख) हाँ (ग) हाँ (घ) नहीं (ड.) हाँ।