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रुधिर परिसंचरण तंत्र किसे कहते हैं ? blood circulatory system in hindi रक्त परिसंचरण तंत्र की खोज किसने ?
(blood circulatory system in hindi) रुधिर परिसंचरण तंत्र किसे कहते हैं ? रक्त परिसंचरण तंत्र की खोज किसने की ? परिभाषा क्या है , अंगो के नाम लिस्ट पीडीऍफ़ हिंदी में ?
रक्त : मानव रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है। यह स्वाद में नमकीन और दिखने में अपारदर्शी होता है तथा एक विशेष प्रकार की गंध से युक्त होता है। धमनियों में रक्त ऑक्सीजिनेटेड रहने की वजह से लाल होता है और शिराओं में रक्त डिऑक्सीजिनेटेड रहने की वजह से गहरा बैगनी लाल होता है। शिराओं का रक्त इस रंग का इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यह अपना कुछ ऑक्सीजन ऊतकों को दे देता है यानि डिऑक्सीजिनेटेड हो जाता है और इसी प्रक्रिया के दौरान इसमें ऊतकों से बेकार पदार्थ मिल जाते हैं।
* रक्त हल्का सा क्षारीय होता है तथा इसका चभ् अक्सर 7.35 और 7.45 के बीच रहता है।
* धमनियों का रक्त शिराओं के रक्त से ज्यादा क्षारीय होता है क्योंकि इसमें कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम रहती है।
* एक सामान्य वयस्क व्यक्ति में रक्त शरीर के कुल भार का लगभग 7 से 9 प्रतिशत होता है और उसके शरीर में रक्त की मात्रा 5 से 6 लीटर व एक सामान्य स्त्री के शरीर में 4 से 5 लीटर होती है।
रुधिर परिसंचरण
ऊर्जा स्रोत
* मानव शरीर में रूधिर का परिसंचरण हृदय की पम्प क्रिया द्वारा संपन्न होता है और धमनियों में रूधिर प्रवाहित होता रहता है।
* हृदय का संकुचन शिराओं में रूधिर प्रवाह के लिए पर्याप्त नहीं होता है। इसके लिए कुछ मांसपेशियां होती हैं जो हृदय में रूधिर को आगे-पीछे करने के लिए शिराओं को संकुचित करती हैं और दबाव डालती हैं।
* मनुष्य, अन्य स्तनधारी, पक्षी और मगरमच्छ में हृदय दो अलग-अलग मार्गो या सर्किट में रूधिर को पम्प करता है। इन्हें सामान्य परिसंचरण और फुफ्फुसीय परिसंचरण कहते हैं।
प्रणालीगत या सामान्य परिसंचरण
इसमें रूधिर हृदय से सीधे शरीर के ऊतकों के लिए जाता है और फिर वापस हृदय में आ जाता है।
फुफ्फुस परिसंचरण
फुफ्फसों को रक्त पहुंचाने का कार्य फुफ्फुसीय परिसंचरण द्वारा पूरा होता है। वाहिकाएं अशुद्ध रक्त को हृदय से फुफ्फुस तक ले जाती हैं और वहां रक्त शुद्ध होकर दोबारा हृदय में आ जाता है। यहां से शुद्ध रक्त बाकी शरीर में वितरित होता है।
हृदय
* हृदय को रक्त परिसंचरण तन्त्र का मुख्य अंग माना जाता है। व्यस्क पुरुषों में हृदय का वजन लगभग 250 से 390 ग्राम तथा
व्यस्क स्त्रियों में 200 से 275 ग्राम के बीच होता है।
मानव हृदय की संरचना
हृदय की भित्ति तीन परतों से मिल कर बनी होती हैः
- पेरिकार्डियम
- मायोकार्डियम
- एंडोकॉर्डियम
* हृदय आधार से शिखर तक एक पेशीय पट द्वारा दो भागों में बंटा रहता है – दाएं और बाएं। इनका आपस में कोई संबंध नहीं होता है। हृदय का पूरा दायां भाग अशुद्ध रक्त के आदान-प्रदान से और बायां भाग शुद्ध रक्त के आदान-प्रदान से सम्बन्ध रखता है। हृदय का पूरा भीतरी भाग चार कक्षों में बंटा रहता है। इसका दाईं ओर का ऊपरी कक्ष दायां अलिन्द और निचला कक्ष दायां निलय कहलाता है। इसी प्रकार बाईं ओर का ऊपरी कक्ष बायां अलिन्द और नीचे वाला कक्ष बायां निलय कहलाता है।
* दायां अलिन्दः पूरे शरीर में घूमकर लौटा हुआ अशुद्ध रक्त (ऑक्सीजन रहित) वापस आकर दाएं अलिन्द में ही जमा होता है।
* दाएं अलिन्द का कार्य सिर्फ रक्त को लेना है। रक्त को पम्प करने का कार्य इसे बहुत कम करना पड़ता है, इसलिए इसमें संकुचन अपेक्षा से थोड़ा कम होता है जिसके कारण इसकी भित्तियां पतली और कमजोर होती हैं।
* दायां निलयः दाएं अलिन्द से निकला अशुद्ध रक्त दाएं एट्रियोवेन्ट्रिकुलर छिद्र से होकर दाएं निलय में आकर गिरता है।
* दाएं निलय में एक छिद्र होता है, जिसे फुफ्फुसीय छिद्र कहते हैं। इससे होकर फुफ्फुसीय धमनी निकलती है।
* फुफ्फुसीय धमनी को छोड़कर सभी धमनियों में शुद्ध रक्त बहता है।
* बायां अलिन्दः हृदय के बाएं भाग के ऊपरी कक्ष को बायां अलिन्द कहते हैं। यह दाएं अलिन्द से थोड़ा छोटा होता है। ऑक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त बाएं अलिन्द में ही आता है।
* बायां निलयः हृदय के बाएं भाग का निचला कक्ष बायां निलय (वेन्ट्रिक्ल) सबसे बड़ा कक्ष होता है। इसमें एक छिद्र होता है जिसे महाधमनी छिद्र कहते हैं। इस छिद्र से निकली महाधमनी शरीर के अलग-अलग भागों तक रक्त को पहुंचाती है।
* हृदय के कपाटः हृदय में रक्त प्रवाह गलत दिशा में होने से रोकने के लिए कपाट होते हैंः
- त्रिकपर्दी कपाट
- द्विकपर्दी कपाट
- फुफ्फुसीय कपाट
- महाधमनी कपाट
हृदय स्पंदन
स्वस्थ मनुष्य का हृदय एक मिनट में 72 से 75 बार स्पंदन (धड़कता) करता है। स्पंदन की यह गति कम या अधिक हो सकती है। हर स्पंदन में पहले दोनों अलिन्दों (एटिया) का संकुचन और फिर निलयों (वेन्टिकल्स) का संकुचन होता है। दोबारा दोनों का एक साथ शिथिलन होता है।
* बच्चों में स्पंदन (दिल धड़कन) गति अधिक तेजी से होती है। आयु के बढ़ने के साथ हृदय स्पंदन की गति घटती जाती है।
* हृदय चक्रः इसमें निम्न चार घटनाएं होती हैंः
- अलिन्द प्रकुंचन
- निलय प्रकुंचन
- अलिन्द अनुशिथिलन
- निलय अनुशिथिलन
रक्त चाप
हृदय के संकुचन से धमनियों की दीवारों पर पड़ने वाला दाब रूधिर दाब या रक्त चाप कहलाता है। इस दाब को संकुचन दाब भी कहते हैं जो निलयों के संकुचन के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। इसके ठीक विपरीत अनुशिथिलन दाब होता है जो निलय के अनुशिथिलन के फलस्वरूप उत्पन्न होता है, जब रूधिर अलिंद से निलय में प्रवेश कर रहा होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तचाप 120/80 होता है।
झिल्ली की भित्ति रहती है, जो लचीली तथा रंगहीन होती है।
रक्त कोशिकाएं
रक्त में तीन प्रकार की कोशिकाएं पायी जाती हैंः
- लाल रक्त कोशिकाएं
- सफेद रक्त कोशिकाएं
- बिंबाणु या प्लेटलेट्स
लाल रक्त कोशिकाए
इनमें न्यूक्लियस न होकर हीमोग्लोबिन रहता है। मानव रक्त की लगभग आधी मात्रा इन्हीं लाल रक्त कोशिकाओं से बनती है। इनका व्यास लगभग 7 माइक्रोमीटर (नउ) तथा मोटाई लगभग 2 माइक्रोमीटर होती है। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर एकाकी लाल रक्त कोशिका हल्के पीले रंग की नजर आती है। लेकिन सामूहिक रूप में रहने से ये लाल रंग की लगती हैं।
* लाल रक्त कोशिकाओं के ऊपरी भाग पर पारदर्शी लाल रक्त कोशिकाओं को अपनी संरचना के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है जो एमिनो एसिड से प्राप्त होती है। इनको आयरन की भी जरूरत होती है।
* लाल रक्त कोशिकाओं की रचना मुख्यतः अस्थि मज्जा होती है।
* रक्त परिसंचरण में लाल रक्त कोशिकाएं लगभग 120 दिन जीवित रहने के बाद नष्ट हो जाती हैं। ये विशेष रूप से प्लीहा और जिगर में अन्तर्ग्रहित हो जाती हैं। यहां हीमोग्लोबिन अपने अलग-अलग भागों में टूट कर जिगर में पहुंच जाती हैं। ग्लोबिन एमिनो अम्ल में टूट कर ऊतकों में प्रोटीन की तरह उपयोग होता है या बाद में और अधिक टूट कर यह मूत्र के साथ बहार निकल जाता है।
* लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण एवं नष्ट होने की प्रक्रिया अक्सर समान दर से होती है जिससे इनकी संख्या स्थिर रहती है।
सफेद रक्त कोशिकाएं
सफेद रक्त कोशिकाएं आरबीसी से बड़ी होती हैं। हालांकि इनकी संख्या लाल रक्त कोशिकाओं से कम रहती हैं, एक स्वस्थ व्यक्ति के रक्त में डब्लूबीसी 4000 से 11000 प्रति घन मिलीमीटर (उउ3) रहती हैं। लेकिन शरीर में किसी तरह का संक्रमण होने पर इनकी संख्या बढ़कर 25,000 प्रति घन मिलीमीटर तक पहुंच जाती है। सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या की इस वृद्धि को ल्यूकोसाइटोसिस कहते हैं।
* सफेद रक्त कोशिकाएं रक्त वाहिनियों की भित्ति से होकर ऊतकों में पहुंच जाती हैं। इन कोशिकाओं का निर्माण अस्थि मज्जा और लसिका ग्रंथियों में होता है।
* सफेद रक्त कोशिकाओं का प्रमुख कार्य रक्त में आये विजातीय पदार्थों और जीवाणुओं को निगलकर या उन्हें नष्ट करके शरीर की रक्षा करना है।
* सफेद रक्त कोशिकाओं या ल्यूकोसाइट्स को दो वर्गों में बांटा गया हैः
Ø कणिकीय सफेद रक्त कोशिकाएं या ग्रेन्यूलोसाइट्स
Ø अकणिकीय सफेद रक्त कोशिकाएं या एग्रेन्यूलोसाइट्स
बिंबाणु या प्लेटलेट्स या थ्रॉम्बोसाइट्स
इनकी संख्या रक्त में लगभग 2,50,000 प्रति घन मिलीमीटर (उउ2) होती हैं। प्लेटलेट्स में न्यूक्लियस नहीं होते हैं। इनका रक्तप्रवाह में औसत जीवनकाल 5 से 9 दिन का होता है।
* प्लेटलेट्स या थॉम्बोसाइट्स का निर्माण लिम्फोसाइट्स की तरह ही अस्थि मज्जा की हीमोसाइटोब्लास्ट नामक कोशिकाओं से होता है। इनका खास कार्य रक्त का थक्का बनाने की प्रक्रिया में मदद करना है।
हीमोग्लोबिन
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में मौजूद होता है। इसे लाल रक्त कोशिकाओं का मुख्य घटक माना जाता है, जो ऑक्सीजन के संवाहन का कार्य करता है। हीमोग्लोबिन प्रोटीन का एक बहुत ही ज्यादा जटिल एवं संलिष्ट रूप है जिसमें 95ः ग्लोबिन (प्रोटीन) तथा 5ः हीमेटिन नामक आयरन युक्त पिगमेंट रहते हैं। यही कारण है कि हीमोग्लोबिन के निर्माण के लिए आयरन बहुत जरूरी है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन को फेफड़ों से ऊतकों में पहुंचाता है तथा ऊतकों से कार्बन डाइऑक्साइड को फेफड़ों में पहुंचाता है। इस क्रिया में हीमोग्लोबिन का हीमेटिन भाग फेफड़ों की ऑक्सीजन से संयोजित होकर ऑक्सीहीमोग्लोबिन बनाता है, जो एक अस्थायी योगिक है। रक्त के साथ ऑक्सीहीमोग्लोबिन पूरे शरीर में परिसंचारित होता है। परिसंचरण के द्वारा दूर-दूर के ऊतकों को (जहां भी ऑक्सीजन की जरूरत होती है) ये ऑक्सीजन दे देते हैं और खुद ऑक्सीजन मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार ऊतकों में हीमोग्लोबिन का अपचयन हो जाता है। ऊतकों के विकार (कार्बन डाइऑक्साइड) इसमें भर जाते हैं तथा इसका रंगा नीला-सा लाल हो जाता है। इसके बाद रक्त शुद्ध होने के लिए फेफड़ों में पहुंचता है जहां कार्बन डाइऑक्साइड शरीर से बाहर निकल जाती है। हीमोग्लोबिन के द्वारा ऑक्सीजन के इस प्रकार के लेन-देन का क्रम जीवित अवस्था में लगातार चलता रहता है।
प्लाज्मा
प्लाज्मा रक्त के हल्के पीले रंग के द्रव वाले भाग को कहते हैं। इसके लगभग 90 प्रतिशत भाग में जल होता है, 7 प्रतिशत भाग में प्रोटीन्स और बाकी बचे 3 प्रतिशत भाग में इलेक्टोलाइटस एमिनो अम्ल, ग्लूकोज, विभिन्न एन्जाइम्स (पाचक रस), हॉर्मोन्स, मेटाबोलिक अवशिष्ट पदार्थ तथा बहुत से अन्य दूसरे कार्बनिक लवणों के सूक्ष्मांश होते हैं जो प्लाज्मा में घुली हुई अवस्था में रहते हैं। इनके अलावा प्लाज्मा में ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन गैस भी घुली होती है।
* जलः रक्त प्लाज्मा में मौजूद जल शरीर की सारी कोशिकाओं और ऊतकों को गीला करके रखता है। जल को बाह्यकोशिकीय और अन्तरकोशिकीय दोनों रासायनिक प्रतिक्रियाओं का विलायक माना जाता है।
* प्लाज्मा प्रोटीन्सः प्लाज्मा प्रोटीन्स को एल्ब्यूमिन्स फाइब्रिनोजन्स और ग्लोबुलिन्स में बांटा जा सकता है।
* एल्ब्युमिन्सः प्लाज्मा प्रोटीन्स में सबसे अधिक प्रतिशत में पायी जाने वाली प्रोटीन्स एल्ब्युमिन्स होती हैं। ये यकृत में संश्लेषित होती हैं।
* एल्ब्युमिन्स प्रोटीन का मुख्य कार्य प्लाज्मा के परासरणी दाब को सामान्य बनाये रखना है जिससे प्लाज्मा का जल रक्त में रूका रहता है।
* यदि प्लाज्मा में एल्ब्यूमिन्स की मात्रा कम जो जाती है तो प्लाज्मा का परासरणी दाब कम हो जाता है और अगर द्रव रक्त प्रवाह से निकलकर आस पास के ऊतकों में जमा हो जाता है, तो इसके कारण शरीर में सूजन हो जाती है जिसे शोफ कहते हैं ।
रक्त का थक्का बनना
सामान्यतः रक्त वाहिनियों के टूटने या कट जाने पर अथवा चोट आदि लग जाने से खून बहने लगता है जो कुछ देर बाद अपने आप बंद हो जाता है। यह क्रिया रक्त के वायु के संपर्क में आने पर जम जाने से संभव होती है। इसे रक्त स्तम्भन कहते हैं। रक्त का जमना या थक्का बनना गूढ़ एवं जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं की एक शृंखला है जो तीन चरणों में पूरी होती हैंः
1* सामान्यतः ऊतकों के टूट-फूट जाने तथा रक्तवाहिनी से रक्त बहने के कारण रक्त वाहिनियां संकुचित हो जाती हैं व रक्त का प्रवाह धीमा पड़ जाता है।
2* रक्त का थक्का बनने के दूसरे चरण में प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों से बाहर निकल आते हैं और फूलकर आस-पास के संयोजी ऊतकों के कॉलेजन से चिपक जाते हैं । लगभग एक मिनट में यह प्लेटलेट्स का प्लग बनाकर रक्तवाहिनी के टूटे या कटे-फटे छिद्र को बन्द कर देते हैं जिससे रक्त बहना बन्द हो जाता है। इस प्रक्रिया को प्लेटलेट्स एग्रीगेशन कहते हैं।
3* रक्त स्कन्दन या थक्का बनने की प्रक्रियाः रक्त वाहिनियों के बहुत ज्यादा क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में प्लेटलेट प्लग रक्तस्राव को रोक नहीं पाते हैं। ऐसी स्थिति में रक्त का थक्का बनने की काफी जटिल प्रक्रिया रक्त स्कन्दन प्रवरथा शुरु होती है, जिसमें बहुत से कारक भाग लेते हैं।
* फाइबिनोजनः फाइब्रिनोजन प्रोटीन भी जिगर में बनता है। इस प्रोटीन को रक्त का थक्का बनने की क्रिया में जरूरी माना जाता है। रक्त में थक्का बनने के बाद बाकी द्रव को सीरम कहते हैं।
* रक्त स्कन्दन प्रवस्थाः टूटे-फूटे या कटे-फटे ऊतक कोशिकाओं से रक्त बहने के बाद प्लेटलेट्स और प्लाज्मा ग्लोब्युलिन (इसे एन्टी-हीमोफिलिक फैक्टर (।भ्थ्) के मिलने पर थॉम्बोकाइनेज नामक एन्जाइम मुक्त होता है।
* प्लेटलेट्स, एन्टी हीमोफिलिक फैक्टर और थॉम्बोकाइनेज के एक साथ मिलने से थॉम्बोप्लास्टिन बनता है। थॉम्बोप्लास्टिन रक्त में मौजूद कैल्शियम ब्लड फैक्टर्स तथा प्लाज्मा में स्थित प्रोथॉम्बिन से मिलकर एक नये पदार्थ में बदल जाता है जिसे थॉम्बिन कहते हैं।
* थॉम्बिन भी एक सक्रिय एन्जाइम है जो प्लाज्मा में मौजूद फाइब्रिनोजन नामक प्रोटीन पर क्रिया करके एक अघुलनशील तन्तुमय पदार्थ का निर्माण करता है जिसे फाइब्रिन कहते हैं।
* फाइब्रिन के तन्तु आपस में फसकर जाल बनाते हैं जिसमें लाल और सफेद रक्त कोशिकाएं फंस जाती हैं और रक्त का थक्का बन जाता है। कुछ समय बाद यह रक्त का थक्का सिकुड़ जाता है और सीरम अलग हो जाता है।
* सीरम ऐसा प्लाज्मा है जिसमें फाइब्रिनोजन अलग हो गया होता है।
* ग्लोबुलिन्स- इन्हें इनकी संरचना एवं कार्यो के अनुसार 3 वर्गों में बांटा गया है – अल्फा, बीटा और गामा
* एल्फा और बीटा ग्लोबुलिन्स प्रोटीन जिगर द्वारा बनते हैं।
* गामा ग्लोबुलिन्स प्रोटीन या इंम्युनोग्लोबलिन एण्टीबॉडी के रूप में कार्य करती है जो खसरा, टिटनेस और पोलियोमाइलाटिस जैसे रोगों को रोकने में सहायक होती है।
* मुख्य पॉजिटिव चार्जड आयन के रूप में सोडियम को माना जाता है। जबकि मुख्य निगेटिव चार्जड आयन के रूप में क्लोराइड को माना जाता है।
रुधिर के प्रकार
मानव रक्त को ।ठव् रक्त वर्ग सिस्टम (।ठव् इसववक हतवनचपदह ेलेजमउ) द्वारा ।ए ठए ।ठ एवं 0 चार वर्गों में बांटा गया है। लाल रक्त कोशिकाओं की सतह पर पाये जाने वाले दो भिन्न ग्लाइकोप्रोटीन्स (एन्टीजन) जिन्हें एग्ल्यूटिनोजन्स कहते हैं, की उपस्थिति या अनुपस्थिति के अनुसार रक्त वर्गों का नाम दिया जाता है। एग्ल्यूटिनोजन्स । तथा ठ दो प्रकार के होते हैं। यदि । एग्ल्यूटिनोज उपस्थित है तो रक्त वर्ग को श्।श् वर्ग, यदि ठ है तो श्ठश् वर्ग, यदि । और ठ दोनों उपस्थित हैं तो ।ठ वर्ग तथा यदि कोई भी एग्ल्यूटिनोजन नहीं है तो रक्त वर्ग को श्व्श् वर्ग कहा जाता है। रक्त प्लाज्मा में प्राकृतिक एन्टीबॉडीज मौजूद रहते हैं। इन्हें एग्ल्यूटिनिनेस कहा जाता है और ये असंगत रक्त वर्गों का मिलान होने पर लाल रक्त कोशिकाओं का समूहन कर देते हैं ।
रीसस फैक्टर
* लगभग 85 प्रतिशत व्यक्तियों के रक्त में ।ठव् वर्ग के अलावा एक अतिरिक्त फैक्टर मौजूद रहता हैं। यह एक एग्ल्युटिनोजन होता है जिसे रीहसस फैक्टर कहते है। जिन व्यक्तियों में यह फैक्टर रहता है उन्हें रीसस पॉजिटिव (त्ी़) कहते है तथा बाकी 15 प्रतिशत को रीसस नेगेटिव (त्ी.) कहते हैं।
* यदि त्ी नेगेटिव (त्ी.) व्यक्ति को त्ी पॉजिटिव (त्ी़) व्यक्ति का रक्त चढ़ाया जाता है तो उसमें एन्टीबॉडी पैदा हो जाती है। यदि बाद में त्ी पॉजिटिव (त्ी़) रक्त को दोबारा उसी व्यक्ति में चढ़ाया जाता है तो इस दिये हुए रक्त की कोशिकाएं एकत्रित होकर नष्ट या हीमोलाइज्ड हो जाती हैं और रोगी (प्राप्तकर्ता) की हालत खराब हो जाती है जिसकी वजह से उसकी मृत्यु भी हो सकती है।
रक्त वर्ग
।ठ रक्त वर्ग वाले रोगी को किसी भी रक्त वर्ग वाले व्यक्ति का रक्त दिया जा सकता है। इसलिए इस रक्त वर्ग वाले व्यक्ति को सर्ववर्ग प्राप्तकर्ता कहा जाता है। जबकि व् रक्त वर्ग के व्यक्ति का रक्त किसी भी रक्त वर्ग के रोगी को सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है और इसे सर्ववर्ग दाता कहा जाता है।
परिसंचरण तंत्र के रोग के उदाहरण
* हाइपरटेंशन या उच्च रक्तचाप
* अर्टरीस्कलरोसिस
* हार्ट अटैक
होमियोस्टेसिस
शरीर के तापमान को नियंत्रित रखने हेतु सहायता करने के लिए चार प्रमुख अंग होते हैंः
फेफड़ा
फेफड़ों द्वारा शरीर में दो प्रकार के गैसीय पदार्थों कार्बन डाइऑक्साइड एवं जलवाष्प का उत्सर्जन होता है। वे वायु की ऑक्सीजन को कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित करते हैं।
यकृत
यह शरीर का एक मुख्य अंग है जोकि बड़ी मात्रा में रासायनिक अभिक्रिया करता है जिससे ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस प्रकार यकृत शरीर के आंतरिक तापमान करीब 37° सेल्सियस को बनाए रखने के लिए जरूरी ऊष्मा का उत्पादन करता है।
त्वचा
त्वचा शरीर की अतिरिक्त ऊष्मा को पसीने के रूप में बाहर उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार होती है। यह एक ऐसा अंग है जो होमियोस्टेसिस करता है। यह शरीर को रोगाणुओं से भी बचाती है।
वृक्क
यह शरीर में परासरण नियंत्रण द्वारा जल की निश्चित मात्रा को बनाये रखता है। यह रूधिर तथा ऊत्तक द्रव्य में जल एवं लवणों की मात्रा को निश्चित कर रूधिर दाब बनाए रखता है। वृक्क होमियोस्टेसिस का भी हिस्सा होते हैं।
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