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भक्ति आंदोलन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए , उद्देश्य bhakti movement was started by whom in hindi

bhakti movement was started by whom in hindi भक्ति आंदोलन की प्रमुख विशेषताएं लिखिए , उद्देश्य किसने प्रारंभ किया था ?

भक्ति आंदोलन
भक्ति आंदोलन हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण पुनरुत्थानवादी अभियानों में से एक है और इसका उदय सूफी आंदोलन के साथ ही हुआ। इसका विशिष्ट उद्देश्य पुजारियों और बिचैलियों के हाथों से ईश्वर का संदेश अपने नियंत्रण में लेना था। इसके अतिरिक्त भक्ति संत आम लोगों को उनकी अपनी भाषा में ईश्वर का संदेश देना चाहता थे।

उत्पत्ति
जहां भक्ति आंदोलन ने 7वीं और 12वीं सदी के बीच भारत के दक्षिणी भागों, विशेष रूप से तमिलनाडु में जन्म लिया था, वहीं यह धीरे-धीरे 15 वीं सदी के अंत तक उत्तरी इलाके में फैल चुका था। दक्षिण भारत में भक्ति संतों के दो मुख्य समूह थेरू नायनार (शिव भक्त) और अलवार (विष्णु भक्त)। उनकी अधिकांश कविताएं भक्त और ईश्वर के बीच प्रेम पर केंद्रित थीं। वे इन्हें तमिल और तेलुगू जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में लिखते थे ताकि कई लोग इसे पढ़ और सुना सकें और इसे बहुत लोकप्रिय भी बनाया।

उप-महाद्वीप के उत्तरी भाग में, भक्ति आंदोलन वैष्णव आंदोलन से बहुत प्रभावित था। वैष्णव आंदोलन कृष्ण के जीवन को भक्ति का केन्द्र बिन्दु रखने पर केंद्रित था। वैष्णव संतो ने उनके प्रारंभिक बचपन और यौवन की शरारतों पर मुख्य बल दिया। जो कि भागवत पुराण का अंग बन गया। भक्ति संतों ने प्रारंभ में संस्कृत में रचित इन रचनाओं का स्थानीय भाषा में अनुवाद किया।

इससे ये रचनाएं विस्तृत पाठकों के लिए सुलभ बन गईं। इस प्रवृत्ति के उल्लेखनीय उदाहरण:
हिंदी कबीर, सूरदास, तुलसीदास आदि
मराठी जनंदेव, नामदेव आदि
बंगाली चैतन्य महाप्रभु और चंडीदास
राजस्थानी (ब्रज) मीराबाई, बिहारी आदि
पंजाबी (हिन्दी से समानता) गुरु नानक
कश्मीरी लल्ल
असमिया शंकरदेव

विशेषताएं
हिन्दू भक्ति के दो मूलभूत प्रकार हैं प्रथम, जो परमात्मा की उसके प्रकट रूप में पूजा करता है वह है सगुणः मूर्तियों की पूजा इसकी एक अभिव्यक्ति है, और, द्वितीय, निर्गुणः जो इस तथ्य का समर्थन करता है कि ईश्वर अनिवार्य रूप से निराकार है और इसी प्रकार उसकी पूजा की जानी चाहिए। निर्गुण ईश्वर की एकता में विश्वास करते हैं और कि इस धरती से मुक्ति प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को अपना पूरा अस्तित्व ईश्वर के प्रति समर्पित करना होता है ।
सुफी दर्शन की भांति ये भी सभी मनुष्यों के ‘भातृत्व‘ में विश्वास करते थे जिसे वर्ग, जाति, धर्म, आदि के आधार पर किसी भेद का अनुसरण नहीं करना चाहिए। वे गुरु और शिष्य या और शिक्षक और छात्र की प्रणाली का अनुगमन करते थे। शिक्षक को आध्यात्मिक नेता माना जाता था, जो शिष्य को अनुष्ठानिक पानी का कटोरा प्रदान करता था। इसे स्वीकार करके छात्र प्रशिक्षु बन जाता था और अपने गुरु के नेतृत्व का पालन करता था।
भक्ति संत ईश्वर के साथ एकत्व प्राप्त करने के भौतिक तरीकों का छात्रों को सलाह देते थे। वे आत्मा को शुद्ध करने और अंततः मोक्ष या स्वर्ग-नरक चक्र से स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहायता के लिए नियमित रूप से ईश्वर का नाम जपने पर जोर देते थे। कठोर नैतिक निष्ठा और भक्ति संतों के नियमों के अनुसार जीवन जीने पर बहुत बल दिया जाता था।

उद्देश्य
भक्ति आंदोलन के शुभारंभ के पीछे मुख्य उद्देश्य जाति, पंथ और धर्म के आधार पर बनाए गए निहित विभेदों से लड़ना था। इस विभेद को उन लोगों द्वारा संरक्षित और प्रोत्साहित किया जाता था, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से इस व्यवस्था से लाभान्वित होते थे। इन भक्ति संतों ने संस्थागत धर्म को ठुकरा दिया और कई सुधारों का प्रस्ताव रखा।
वे कन्या भ्रूण हत्या और सती प्रथा की समस्या रोकने में बहुत रुचि रखते थे। वे महिलाओं से अपनी सांसारिक बेड़िया त्याग देने और समुदाय आधारित कीर्तन में सम्मिलित होने के लिए कहते थे। भक्ति आंदोलन के निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख व्यक्तित्व थेः
ऽ कबीर जो कि एक ब्राह्मण विधवा की संतान थे जिसने उन्हें छोड़ दिया था। कबीर की देख रेख और पालन पोषण एक मुस्लिम बुनकर परिवार ने किया था। इस घटना ने उन्हें प्रेरित किया और वह धर्म में विश्वास नहीं करते थे, उनके अनुसार सृष्टिकर्ता एक ही है और हम उसे अलग-अलग नामों से जानते हैं। वे लोगों से मूर्ति पूजा और अन्य पूजाओं को अस्वीकार करने के लिए कहते थे। वे चाहते थे कि लोग के साथ ईश्वर प्रार्थना करें और ईश्वर के साथ एकत्व पाने का प्रयास करें।
ऽ गुरु नानक भी मूर्ति पूजा, पवित्र धार्मिक स्थलों की तीर्थ यात्रा, ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बलिदान देने और अनुष्ठान करने के लिए निंदा करते थे। वे कहते थे कि व्यक्ति के लिए हृदय, चरित्र और आचरण की शुद्धता की आवश्यकता है। उनका विश्वास था कि व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए गृहस्थ जीवन के माध्यम से गुजरने की आवश्यकता होती है। उनके ‘शब्दों या वाणी‘ का गुरु ग्रंथ साहिब में संकलन किया गया है। अन्य प्रमुख व्यक्तित्व थे, वाराणसी से लिखने वाले रामानंद, साधना जो पेशे से कसाई थे, रविदास जो पेशे से मोची थे और सेन जो कि पेशे से नाई थे।
भक्ति आंदोलन पर पड़े स्थायी प्रभावों में से एक वैष्णव आंदोलन से था। वैष्णव आंदोलन राम और कृष्ण के रूप में, विष्णु की पूजा केंद्रीय मंच पर लाना चाहता था। उन्होंने जनता के सामने कविता, नृत्य, गीत और कीर्तन के माध्यम से अपनी रचनाओं का प्रसार किया। इस आंदोलन ने पूर्व में पकड़ बनाई। यहां चैतन्य अपने अनुयायियों और अपने लोगों के बीच समानता लाना चाहते थे।

सुहारावर्दी सिलसिला
इस सिलसिले के संस्थापक शेख शिहाबुद्दीन सुहारावर्दी थे, लेकिन इसे भारत में लाने का उत्तरदायित्व और श्रेय शेख बहाउद्दीन जकारिया (1182-1262) के कंधों पर था । उनकी पहली खानकाह मुल्तान में स्थापित हुई । उनके शासकों के साथ अच्छे संबंध थे और वे धनी भी थे। उदाहरण के लिए, सुल्तान इल्तुतमिश ने राजनीतिक उठापटक में अपने समर्थन के बदले में शेख जकारिया को ‘शेख-उल-इस्लाम‘ या इस्लाम धर्म का पथ प्रदर्शक का नाम दिया था। अन्य उल्लेखनीय सुहारावर्दी संत सैयद नूरूद्दीन मुबारक आदि प्रमुख सूफी थे।

अन्य क्षेत्रीय सिलसिले
फिरदौसिया सिलसिला अन्य क्षेत्रों की तुलना में बिहार और बंगाल में अधिक प्रसिद्ध था। कादरिया सिलसिले के संस्थापक शेख नयामुतुल्लाह कादरी थे। उनका प्रभाव क्षेत्र गुजरात और मध्य प्रदेश में था। लेकिन कादरी संप्रदाय को तब यश मिला जब शहजादा दारा शिकोह लाहौर में मियां मीर का शिष्य बन गया। इसके बाद दारा का संरक्षण मल्ला शाह बदख्सानी नामक एक और कादरी संत को मिला।

कश्मीर में कुब्राविया सिलसिले की स्थापना सैयद अली हमदानी ने की थी और इसकी प्रसिद्धि केवल उन क्षेत्रों तक ही सीमित थी। शाह अब्दुल्ला शत्तारी ने सत्तारी सिलसिला स्थापित किया था और इसकी उत्तर प्रदेश और दक्कन के कुछ भागों में गहरी पकड़ थी। कलंदर, हैदरी या मदार जैसे कई अन्य छोटे सिलसिले भी थे।

नक्शबंदी सिलसिला
नक्शबंदी सिलसिला मुगल काल में अत्यधिक फला-फूला, विशेष रूप से इसका प्रतिपादन बकीबिल्लाह आदि ने किया था। वह अकबर का समकालीन था । इस सिलसिले के मुख्य समर्थकों में से एक शेख अहमद सरहिंदी थे। उन्होंने स्वयं को, ‘मुजदिद अली सफानी‘ या नई सहस्राब्दी के सुधारक की पदवी थी।
सूफियों का महत्व
ऽ अधिकांश सूफी संतों को भूमि अनुदान या ईनाम के रूप में दी जाती थी जिसे वे शेख के वंशजों को हस्तांतरित कर सकते थे। इन कार्यों ने शेख पंथ को संस्थागत बनाया और सामाजिक सीढ़ी पर ऊपर चढ़ने में उनके वंशजों के लिए आर्थिक आधार प्रदान किया।
ऽ नागरिकों के भविष्य में शासक बनने की भविष्यवाणी करने वाले सूफी शेखों के उदाहरणों से इस समय का साहित्य भरा हुआ है, भविष्यवाणी वास्तव में शाही नियुक्ति का परोक्ष रूप से कार्य करती थी, सूफियों ने विश्व पर अपनी आध्यात्मिक सत्ता बढ़ायी और अपनी राजनीतिक संप्रभुता राजाओं को उन्हें प्रशासन, युद्ध, कराधान आदि सांसारिक व्यवसायों का प्रभार देते हुए सौंप दी।
ऽ यह तथ्य कि कुछ सूफी विशाल जन तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में लिखते थे, गैर-अभिजात वर्ग के हिंदू तत्वों के साथ कार्य संबंध बनाने की उनकी इच्छा को प्रकट करता है।
ऽ हालांकि सूफी धार्मिक स्थलों का ग्रामीणों जनता से लेकर सुल्तानों तक पर महत्वपूर्ण आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभाव था, लेकिन इसका मुख्य कारण धार्मिक संस्था होना था।
ऽ इसलिए, हम निष्कर्ष निकालते हैं कि भले ही कानूनी तौर पर उनके पास समर्थन प्राप्त करने के लिए शरीयत की शक्ति नहीं रही होगी लेकिन प्रथाओं और जनता को प्रभावित करने में सूफियों ने उलमा या पुजारियों से अधिक हृदय और निष्ठा जीती।
ऽ उन्होंने लोगों बीच धार्मिक भातृत्व और समानता को बढ़ावा दिया एवं अपने विचारों और व्यवहारों को क्षेत्रीय भाषा या स्थानीय भाषा में लिखा ताकि अधिक-से-अधिक लोग उनके गीतों और संदेशों को सुन या पढ़ सकें।

 

पिछले वर्षों के प्रश्न-प्रारंभिक परीक्षा
2014
1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
(i) ‘बीजक- संत दादू दयाल के उपदेशों का संग्रह है।
(ii) पुष्टि मार्ग का दर्शन माधवाचार्य द्वारा दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i) और (ii) दोनों (d) न तो (i), न ही (ii)
2002
2. अपने संदेश के प्रचार-प्रसार हेतु हिन्दी का प्रयोग करने वाले निम्नलिखित में से प्रथम भक्ति मार्गी संत कौन थे?
(a) दादू (b) कबीर
(c) रामानन्द (d) तुलसीदास

उत्तर
1. (क) बीजक का संदर्भ – संत कबीर द्वारा की गई गीत रचनाओं से है। यह कबीरपंथी सम्प्रदाय का पवित्र ग्रंथ है। पुष्टिमार्ग या अनुग्रह
के मार्ग को वल्लभाचार्य द्वारा लगभग 1500 ईस्वी में शामिल किया गया था। जबकि मधवाचार्य सत्य पर आधारित तत्ववाद दर्शन के प्रमुख प्रवर्तक थे।
2. (ब) 14वीं शताब्दी में अपने संदेशों के प्रचार-प्रसार हेतु हिन्दी का प्रयोग करने वाले प्रथम भक्तिकालीन संत रामानन्द थे। इसने (हिन्दी
ने) स्थानीय जनता में उनकी शिक्षाओं या उपदेशों को लोकप्रिय बनाया।

अभ्यास प्रश्न-प्रारंभिक परीक्षा
1. सूफी आंदोलन की निम्नलिखित अवस्थाओं पर विचार कीजिएः
(i) तरीका (ii) खांका (iii) तरीफा
उपरोक्त अवस्थाओं को उनके उद्भव के क्रम में व्यवस्थित कीजिएः
(a) (i)-(ii)-(iii) (b) (ii)-(i)-(iii)
(c) (iii)-(ii)-(i) (d) (ii)-(i)-(iii)
2. निम्नलिखित में से सूफी आंदोलन के उद्देश्य-कौन-साध्से है/हैं?
(a) अस्तित्व की एकता (b) वेश-भूषा की एकता
(c) (a) और (b) दोनों (d) न तो (a) और न ही (b)
3. दारा शिकोह किसका अनुयायी बन गया था?
(a) चिश्ती सिलसिला (b) सुहरावर्दी सिलसिला
(c) फिरदौसी सिलसिला (d) कादरी सिलसिला
4. निम्नलिखित में से कौन-सा सूफी सिलसिला अकबर के समकालीन है?
(a) शतरी (b) नक्शबंदी
(c) फिरदौसी (d) चिश्ती
5. भक्ति आंदोलन के संबंध में निम्नलिखित कथनों के समकालीन हैं?
(i) इसकी उत्पत्ति चैथी सदी के आसपास हुई।
(ii) यह भारत के उत्तरी भाग में उत्पन्न हुआ।
उपरोक्त दिए गए कथन/कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i) और (ii) दोनों (d) न तो (i) न ही (ii)
6. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिएः
(i) सगुण भक्ति मार्ग के संत ईश्वर की एकता में विश्वास नहीं करते थे।
(ii) मीराबाई सगुण भक्ति मार्ग की संत थी।
उपरोक्त दिए गए कथन/कथनों में से कौन-साध्से सही है/हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i) और (ii) दोनों (d) न तो (i) न ही (ii)
7. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।
(i) भीक्त आंदोलन, सूफी आंदोलन के समकालीन था।
(ii) भक्ति आंदोलन ने ईश्वर की एकता पर जोर दिया।
उपरोक्त दिए गए कथन/कथनों में से कौन-साध्से सही है/हैं?
(a) केवल (i) (b) केवल (ii)
(c) (i) और (ii) दोनों (d) न तो (i) न ही (ii)

उत्तर
1. ;d) 2. ;c) 3. ;d) 4. ;b)
5. ;d) 6. ;b) 7. ;c)

पिछले वर्ष के प्रश्न-मुख्य परीक्षा
1. चिश्ती सिलसिला के बारे में बताइए।
2014
2. सूफी और मध्ययुगीन रहस्यवादी संत हिंदूध्मुस्लिम समुदाय धार्मिक विचारों और प्रथाओं या बाहरी सरंचना को किसी भी विवेचनीय स्तर तक परिवर्तित करने में विफल रहे। टिप्पणी कीजिए।

अभ्यास प्रश्न-मुख्य परीक्षा
1. सूफी आंदोलन के उद्देश्यों एवं विभिन्न क्रमों का उल्लेख कर व्याख्या कीजिए।
2. भक्ति पंथ की दो धाराओं के बीच अंतर कीजिए।