सूअर पालन क्यों किया जाता है , महत्व , उपयोग सूअर की सबसे अच्छी नस्ल कौनसी है best pig breeds in india

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best pig breeds in india in hindi सूअर पालन क्यों किया जाता है , महत्व , उपयोग सूअर की सबसे अच्छी नस्ल कौनसी है ?

सूअर
सूअरों का महत्त्व खाद्य-पदार्थों की प्राप्ति की दृष्टि से सूअर-पालन बहुत महत्त्वपूर्ण है। सूअर जल्दी जल्दी बड़े होते हैं और उनकी संख्या भी बहूत जल्द बढ़ती है। सूअर की सर्वोत्तम नस्ल की मादा वर्ष में दो बार दस दस, बारह बारह बच्चे देती है। पालतू सूअर तरह तरह की चीजें खाते हैं। इससे सूअर किसी भी फार्म में पाले जा सकते हैं।
पालतू सूअरों का मूल पालतू सूअर की उत्पत्ति जंगली वराह से हुई है (प्राकृति १५७) । जंगली सूअरों के प्राकृतिक गुणों का उपयोग करते हुए मनुष्य ने उन्हें पालतू बना लिया। मनुष्य ने देखा कि यह प्राणी सर्वभक्षी है , सहज संतोषी है, उससे काफी बड़ी मात्रा में चरबी और मांस मिलता है और वह जल्दी जल्दी बच्चे जनता है।
पालतू सूअर के पुरखे अभी जीवित है। पालतू सूअर इस बात का एक स्पष्ट उदाहरण है कि प्राणियों के प्राकृतिक गुणों को मनुष्य किस प्रकार इच्छित दिशा में मोड़ सकता है। सूअर की सर्वोत्तम नस्लें शीघ्र परिवर्द्धन और वजन की दृष्टि से जंगली वराह को मात करती हैं और उनका मांस तथा चरबी ज्यादा नरम और जायकेदार होते हैं। यह बहुत ज्यादा बच्चे देते हैं। साथ ही साथ जंगल के जीवन में विशेष महत्त्व रखनेवाले गुण पालतू सूअरों में कम विकसित हुए होते हैं-वे उतने मजबूत नहीं होते , उनकी टांगें छोटी और कमजोर होती हैं और उनके सुआ-दांत छोटे होते हैं।
सूअर की नस्लें सूअर की सर्वोत्तम नस्लों में से एक है उक्रइनी स्तेपीय सफेद नस्ल (आकृति १७८)। यह अकादमीशियन म० फ० इवानोव (१८७१-१९३५) ने उत्रइन के दक्षिण में पैदा करायी। स्थानीय और ब्रिटिश सूअरों के संकर, निर्धारित पालन-पोषण और नस्ल-संवर्द्धन के लिए उत्कृष्ट जानवरों के चुनाव के जरिये इस नस्ल का विकास किया गया।
स्थानीय उऋइनी सूअर स्तेपी के जीवन के आदी थे पर काफी उत्पादनशील न थे। दो वर्ष की उम्रवाले सूअर का औसत वजन सिर्फ १०० किलोग्राम होता था। उक्रइन में आयात किये गये बड़े ब्रिटिश सफेद सूअरों के लिए विदेशी हवा-पानी में अच्छी तरह निभा लेना मुश्किल थाय गरमियों में उन्हें उष्णता और सूखे से तकलीफ होती थी और शरद , शिशिर तथा वसंत के दौरान आबोहवा में आनेवाले तीव्र परिवर्तनों से वे परेशान रहते थे।
अकादमीशियन इवानोव ने एक ऐसी नस्ल पैदा कराने का काम हाथ में लिया जो बहुत उत्पादनशील हो और स्थानीय परिस्थितियों में निर्वाह कर सके।
इस काम को संपन्न कराने में उन्होंने वही तरीके अपनाये जो इ० ब० मिचूरिन ने पौध-संवर्द्धन में अपनाये थे। इवानोव ने स्थानीय नस्ल में से कई सर्वोत्तम मादाएं चुन ली और सर्वोत्तम बड़े ब्रिटिश सफेद नर से उनका जोड़ा खिलाया। इस तरह पैदा हुई संकर पीढ़ी में से उन्होंने फिर से सर्वोत्तम मादाएं भावी संवर्द्धन के लिए चुन लीं। फिर इनका तथा एक और बड़े ब्रिटिश सफेद नर का संकर कराया गया। दूसरी पीढ़ी में से उन्होंने स्थानीय परिस्थिति के लिए अत्यंत अनुकूल और उच्च । उत्पादनशील नस्ल-संवर्द्धन की दृष्टि से मादाओं का चुनाव किया। नस्ल-संवर्द्धन के लिए चुने गये सूअरों को अच्छी तरह खिलाया और पाला-पोसा गया।
नस्लों के संकर, बच्चों के कुशलतापूर्ण पालन-पोषण , अच्छी खिलाई और उचित चुनाव के फलस्वरूप सूअरों की एक नयी नस्ल पैदा हुई। इसका नाम है उक्रइनी स्तेपीय सफेद नस्ल । नयी नस्ल के सूअर उक्रइन की दक्षिणी स्तेपी के मौसम के अनुकूल निकले। इस नस्ल के गुण संकर में उपयोग की गयी ब्रिटिश सफेद नस्ल के गुणों से बढ़कर हैं।
उत्कृष्ट गुणों के बावजूद उक्रइनी स्तेपीय नस्ल के सूअर सोवियत संघ के अति। विभिन्न प्राकृतिक परिस्थितियों वाले सभी प्रदेशों में प्रभावशील ढंग से नहीं पाले जा सकते। अतः विभिन्न जनतंत्र और प्रदेश सूअर की अपनी अपनी नस्लों का संवर्द्धन करते हैं। उदाहरणार्थ , पश्चिमी साइबेरिया में उत्तर साइबेरियाई नस्ल विकसित की गयी है। इस नस्ल के मोटे और सख्त बाल होते हैं। ये सूअर आसानी से जाड़ों का मुकाबिला कर सकते हैं और गरमियों में उन्हें मक्खियों से कोई तकलीफ नहीं पहुंचती।
प्रश्न – १. पालतू सूअर और जंगली वराह में क्या फर्क है ? । २. अकादमीशियन म० फ० इवानोव ने उक्रइनी स्तेपीय सफेद नस्ल का विकास कैसे किया ? ३. तुम किन तथ्यों के आधार पर कह सकते हो कि नयी साइबेरियाई नस्ल स्थानीय परिस्थिति के अनुकूल है ?
व्यावहारिक अभ्यास – यह देखो कि तुम्हारे इलाके के सबसे नजदीकवाले फार्म में सूअर की कौनसी नस्ल पाली जाती है और उसका आर्थिक महत्त्व क्या है।

भेड़
भेड़ों का महत्त्व भेड़ जुगाली करनेवाला समांगुलीय प्राणी है। गायों की तरह । इनके भी जटिल जठर और लंबी आंतें होती हैं।
भेड़ों से हमें मांसश्, चरबी और दूध के अलावा चमड़ा और ऊन मिलते हैं। इनसे विभिन्न ऊनी कपड़े, फेल्ट बूट , फेल्ट और अन्य चीजें बनायी जाती हैं। इनकी कुछ नस्लों से रोएंदार खालें (शीप-स्किन , अस्त्रांखान , इत्यादि) मिलती हैं।
भेड़ों का पालन व्यवहारतः सब जगह किया जा सकता है। सूखी स्तेपियां, अधरेगिस्तान और पहाड़ी प्रदेश भी जहां चरागाहें उतनी अच्छी नहीं होती, इसके अपवाद नहीं हैं। जिन चरागाहों में बड़े बड़े ढोरों के लिए काफी चारा नहीं होता वहां भेड़ों का गुजारा हो सकता है। सोवियत संघ के सभी जनतंत्रों में भेड़ों का पालन होता है।
पालतू भेड़ो का मूल भेड़ों को बहुत ही समय पहले पालतू बनाया गया। स्पष्ट है कि मनुष्य ने इतिहासपूर्व काल में पहले पहल कुत्तों के साथ भेड़ों को पालतू बनाया। भेड़ों की विभिन्न नस्लें विभिन्न पुरखों से पैदा हुई हैं। एक ऐसा पुरखा जंगली भेड़- मफलोन – माना जाता है। यह आज भी भूमध्य सागर के कुछ टापुओं में पाया जाता है (आकृति १७६ )।
मनुष्य के प्रभाव में भेड़ों के गुणों में काफी परिवर्तन हुए। यह विशेषकर उनके ऊन पर लागू है। ऊन भेड़ों से मिलनेवाला मुख्य पदार्थ है।
भेड़ों की नस्लें ऊन के अनुसार भेड़ों की विभिन्न नस्लों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है – मुलायम रोएंदार, मोटे रोएंदार और मध्यम मोटे रोएंदार।
मुलायम रोएंदार भेड़ों के लंबा, महीन और एक-सा ऊन होता। इसमें केवल मुलायम या रेशमी रोएं होते हैं। अलग अलग बाल मेद-ग्रंथियों और स्वेदग्रंथियों से चूनेवाले मेद और पसीने के मिश्रण से एक दूसरे से चिपके रहते हैं। इससे मुलायम रोएं बनते हैं। यह ऊन की एक अखंडित परत होती है जो बारिश में भीगती नहीं और ऊन उतारते समय भी छितराती नहीं। मुलायम रोएंदार भेड़ों के ऊन का उपयोग विभिन्न ऊनी कपड़ों के उत्पादन में किया जाता है।
सोवियत संघ में विकसित की गयी मुलायम रोएंदार भेड़ों की सर्वोत्तम नस्ल अस्कानिया मुलायम रोएंदार भेड़ की नस्ल है (प्राकृति १८०)। यह नस्ल सोवियत शासन-काल में म ० ०इवानोव द्वारा उऋइन के अस्कानिया-नोवा में विकसित की गयी।
अस्कानिया मुलायम रोएंदार भेड़ों से बड़ी भारी मात्रा में मुलायम ऊन और मांस मिलता है। एक एक भेड़ से साल-भर में तीन-चार मर्दाना सूटों के लिए काफी ऊन मिल सकता है। सर्वोत्तम ज्ञात भेड़ से तो पाठ सूटों के लिए काफी ऊनश् (२६.४ किलोग्राम) मिला।
मोटे रोएंदार भेड़ों का ऊन दरदरा और विषम होता है। इसमें ऊपरी बाल , मुलायम रोएं और बीच के बाल शामिल हैं।
इनकी एक बढ़िया नस्ल रोमानोव नस्ल है (आकृति १८१)। इससे शीपस्किन मिलता है। यह ऐसी फर है जिसमें अधिकतर मुलायम रोएं ऊपरी बालों से लंबे होते हैं। इससे इन खालों से बनाये गये फरदार कपड़ों में ऊन के गुमटे नहीं बनते। रोमानोव भेड़ की खालें वजन में बहुत हल्की और टिकाऊ होती हैं। भेड़ खाल के गरम कोट बनाने के लिए यह सर्वोत्तम मानी जाती है। इसके अलावा यह नस्ल बड़ी बहुप्रसू है। नियमतः भेड़ हर बार एक और कभी कभी दो मेमने देती है। पर रोमानोव भेड़ हर बार दो और कई बार तो तीन, चार या इससे भी ज्यादा मेमने जनती है।
कराकुल या अस्त्राखान भेड़ें दुनिया भर में मशहूर हैं (प्राकृति १८२)। इनकी फर से कालर और जाड़ों के टोप बनते हैं। सर्वोत्तम खालें दो या तीन दिन की उम्रवाले मेमनों से मिलती हैं। इनके नन्हा नन्हा , चमकीला और बढ़िया – धुंघराला ऊन होता है। जिनके दूध से बच्चे छुड़ाये गये हैं उन भेड़ों का दुध निकाला जाता है और उससे ब्रीजा नामक एक विशेष किस्म का पनीर बनाया जाता है।
मध्यम मोटे रोएंदार भेड़ों की नस्लों में सबसे मशहूर सिगाइस्क नस्ल है। इनसे अच्छी फर मिलती है और इनके ऊन से कपड़ा तैयार किया जाता है।
भेड़ों से सर्वोत्तम दर्जे का ऊन और मांस प्राप्त करने के लिए उन्हें अच्छी तरह खिलाना और पालना-पोसना जरूरी है। यदि खिलाई अच्छी न हो तो भेड़ों का ऊन विषम और दोषपूर्ण हो जाता है। बुरी देखभाल के कारण ऊन धूल-मिट्टी और तरह तरह के पौधों की पत्तियों आदि से गंदा हो जाता है।
भेड़-पालन-फार्मों में उचित ढंग से ऊन उतारना बड़ा महत्त्वपूर्ण है। पहले यह काम हाथ से होता था। अब बिजली की मशीनों से ऊन उतारा जाता है। इससे काम में काफी तेजी आती है और ऊन का भारी उत्पादन ( एक एक भेड़ से २०० से ४०० ग्राम अधिक) सुनिश्चित होता है।
प्रश्न – १. राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था में भेड़-पालन का क्या महत्त्व है ? २. पालतू भेड़ें किस माने में उनके जंगली पुरखों से सर्वाधिक भिन्न हैं ? ३. सोवियत संघ में मुलायम रोएंदार भेड़ों की कौनसी नस्लें विकसित की गयी हैं ? ४. सोवियत संघ में मोटे रोएंदार भेड़ों की कौनसी सर्वोत्तम नस्लें हैं ?
व्यावहारिक अभ्यास – यह देखो कि तुम्हारे इलाके में भेड़ों की । कौनसी नस्लें पाली जाती हैं और उनमें कौनसे कीमती गुण हैं।
घोड़े
घोड़ों का महत्त्व घोड़ों का उपयोग भारवाही पशु के रूप में, यातायात के लिए और खेती के विभिन्न कामों में किया जाता है। सोवियत संघ के कुछ जनतंत्रों में घोड़े का मांस खाया जाता है और घोड़े के दूध से कूमिस नामक बहुत ही पुष्टिकर और स्वास्थ्यदायी पेय बनाया जाता है। घोड़े की खाल से चमड़े की विभिन्न चीजें तैयार की जाती हैं।
घोड़ों का मूल हम पहले उल्लेख कर चुके हैं कि प्रजेवाल्स्की घोड़ा मंगोलिया के मैदानों में आज भी पाया जाता है। एक सौ वर्ष पहले उक्रइन की दक्षिणी स्तेपियों में तरपन नाम के जंगली घोड़े पाये जाते थे। उससे भी पहले , दूसरे जंगली घोड़े विद्यमान थे। जंगली घोड़ों से पालतू घोड़ों की उत्पत्ति हुई। मनुष्य के प्रभाव में पालतू घोड़े अपने पुरखों से ज्यादा मजबूत और बड़े तगड़े हो गये।
घोडों की नस्लें उपयोग की दृष्टि से घोड़ों की नस्लों को निम्नलिखित समूहों में बांटा जा सकता है – भारवाही घोड़े, सवारी ऋऋ के घोड़े और हल्की गाड़ियों में जुतनेवाले घोड़े जो सवारी के घोड़ों के समान ही होते हैं।
भारवाही घोड़ों की सर्वोत्तम नस्लों में से एक है व्लादीमिर भारवाही घोड़ा (आकृति १८३)। यह नस्ल व्लादीमिर प्रदेश के कोलखोजों में विकसित की गयी। इस नस्ल के घोड़े लंबे, मोटे-ताजे होते हैं और लंबे डग भरते हैं। ये भारी भारी बोझ खींच सकते हैं।
सवारी के घोड़ों की एक सर्वोत्तम नस्ल दोन घोड़े की नस्ल है। इसका संवर्द्धन विशाल स्तेपी क्षेत्रों की चरागाहों में चरनेवाले गल्लों में हुआ। इस कारण यह सहज संतोषी नस्ल बड़ी मजबूत निकली। घुड़दल के लिए यह बढ़िया जानवर है और भार-वहन तथा खेत की जुताई में भी उसका उपयोग किया जा सकता है।
इधर सोवियत संघ के मारशल स ० म ० बुद्योन्नी के व्यक्तिगत मार्गदर्शन में दोन घोड़े से एक नयी नस्ल विकसित की गयी जो बुद्योन्नी नस्ल कहलाती है। यह दोन घोड़े की तरह ही बड़ा सहनशील घोड़ा है और दौड़ता है उससे तेज।
हल्की गाड़ियों में जुतनेवाले घोड़ों में से प्रोर्योल दुलकी चालवाली नस्ल सर्वोत्तम है । इसका विकास डेढ़ सौ से अधिक वर्ष पहले वोरोनेज प्रदेश में किया गया।
सोवियत संघ के विभिन्न जनतंत्रों और प्रदेशों में उत्कृष्ट घोड़ों की कई अन्य नस्लें हैं जो स्थानीय परिस्थिति की आदी हैं।

प्रश्न – १. पालतू घोड़े के पुरखें कौन हैं ? २. भारवाही घोड़ों के विशेष लक्षण कौनसे हैं ? ३. सवारी के घोड़ों की सर्वोत्तम नस्लें कौनसी हैं ?