बैलेनोग्लोसस क्या है , वर्गीकरण , संघ , वर्ग , जाति , कुल वंश balanoglossus in hindi स्वभाव एवं आवास (Habit and Habitat)

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बैलेनोग्लोसस (Balanoglossus)

हैमिकाकॉर्डेटा (Hemichordata) अरज्जुकी जन्तुओं का ऐसा संघ है जिसे पूर्व में संघ कॉर्डर में वर्गीकृत किया जाता था। इस भ्रम का कारण यह था कि इस संघ के सदस्यों में एक ऐसी संरचना देखी गई जिसे कुछ प्राणिविज्ञानियों ने पृष्ठरज्जु या नॉटोकॉर्ड (notochord) समझ लिया। इन जन्तुओं की ग्रसनी (pharynx) में क्लोम विदर या गिल खांचे (Gill slits) तो पाई ही जाती हैं अतः कुछ प्राणिज्ञानियों के विश्वास को इससे बल मिला। आपको स्मरण होगा कि कॉर्डेट जन्तुओं के तीन मुख्य लक्षण-जीवन की किसी भी अवस्था में क्लोम छिद्र या गिल स्लिट, नॉटोकोर्ड व पृष्ठ नलिकाकार खोखले तन्त्रिका तन्त्र की उपस्थिति है। बाद में यह ज्ञात हुआ कि जिसे पृष्ठरज्जु समझा जा रहा था वह आन्त्र का एक भाग मुख अंधवर्ध (buccal diverticulum) था। इस तरह सिर्फ गिल खांचों की उपस्थिति से ही ये कॉर्डेटों से समानता रखते हैं अन्यथा ये एकाइनोडर्म जन्तुओं के अधिक निकट हैं। इनके जीवन की प्रारम्भिक भ्रूणीय अवस्थाएँ एकाइनोडर्म जन्तुओं की तरह ही है। इनका प्रारम्भिक टोर्नेरिया लार्वा तो एकाइनोडर्मों के एस्टेरॉइड बाइपिन्नेरिया से बहुत समानता रखता है। उपरोक्त वर्णन का आशय यह नहीं है कि हैमिकॉडेटा का संघ कॉर्डेटा से कोई सम्बन्ध नहीं है इन दोनों के बीच सम्बन्ध तो है परन्तु उतना गहरा नहीं जितना कि हैमिकॉर्डेटा व एकाइनोडर्मेटा का सम्बन्ध हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उद्विकास की जिस दिशा में हैमिकॉर्डेटों का विकास किया उसी से आगे चल कर कार्डटों का उद्भव हुआ हो सकता है।

हैमिकॉर्डेटा (Gr. Hemi = half + Chorde = string) संघ के जन्तु कृमि-रूपी होते हैं तथा इनके धड़क्षेत्र में क्लोम विदर (gill slits) पाई जाती हैं। इनमें खुला परिसंरण तन्त्र मिलता है जिसमें पृष्ठ व अधर वाहिनियाँ व कोटर मिलते हैं। इनमें अनेक सरल जनद (gonads) पाए जाते हैं। इनमें नेफ्रीडिया नहीं पाए जाते हैं। इनमें एक ‘ग्लोमेरूलर’ (glomerular) संरचना पाई जाती है जो उत्सजी कार्य के लिए उत्तरदायी मानी जाती है। इनमें से कुछ में स्पर्शक (tentacle) व ग्रीवा (collar) क्षेत्र में खोखली पृष्ठ तन्त्रिका नलिका पाई जाती है।

इस संघ को दो वर्गों (Classes) में बांटा जा सकता है। एक वर्ग एन्टेरोन्यूस्टा (Enteropneusta) (Gr. Enteron = intestine + Pneustos = breathed) कहलाता है। इस वर्ग के जन्तु एकाकी (solitary) होते हैं तथा इन्हें एकॉर्नवर्म (acorn worm) कहा जाता है। ये समुद्र के पैदे में बिल बना कर रहते हैं। कुछ पत्थरों व चट्टानों के नीचे रहते है। ये सामान्यत: 9 से 45 cm लम्बे होते हैं। एक ब्राजीलियन जाति बैलेनोग्लोसस जाइगेस (Balanoglossus gigas) 1.5 से 2 मीटर लम्बी हो सकती  है तथा इसका बिल लगभग तीन मीटर लम्बा होता है। कुछ जन्तु सिर्फ 2 सेमी के होते हैं। इनका कोमल बेलनाकार शरीर शुण्ड (proboscis), कॉलर (collar) व धड़ (trunk) में विभेदित किया जा सकता है। धड़ क्षेत्र में आन्त्र में अनेक गिल छिद्र पाए जाते हैं जिनसे पोषण व श्वसन के समय गुजरता है।

दूसरा वर्ग टेरोब्रैंकिया (Pterobranchia) (Gr. pteron = wing + branchion = gill) कहा जाता है। इनमें एक जोड़ी गिल छिद्र पाए जाते हैं या यह अनुपस्थित होते हैं। ये निवही (colonial) जन्तु होते हैं। इनमें मुख के चारों ओर भुजा समान संस्पर्शक पाए जाते हैं।

इस अध्याय में हम हैमिकॉर्डेटा के एक सदस्य बैलेनोग्लोसस का अध्ययन करेंगे।

वर्गीकरण (Classification)

संघ : हैमिकॉर्डेटा (Phylum : Hemichordata)

द्विपार्श्वसममित, एन्टोरोसीलोमेट (enterocoelomate) उत्तरमुखीय (deuterostome) कृमिरूपी जन्तु जिनमें क्लोम छिद्र या गिल स्लिटें (gill slits) पाई जाती है।

वर्ग : एन्टोरोन्यूस्टा (Class : Enteropneusta)

एकाकी, बिलकारी (burrowing) जन्तु जिनमें अनेक क्लोम विदर पाए जाते हैं।

कुल : टाइकोडेरिडी (Family : Ptychoderidae)

वंश : बैलेनोग्लोसस ( Genus : Balanoglossus )

जातियाँ व वितरण ( Species and distribution)

इस वंश की लगभग 20 जातियाँ ज्ञात हैं। इनमें से ब्राजील के निकट समुद्र में पाई जाने वाली जाति बैं. जाइगेस (Balanoglossus gigas) सबसे लम्बी जाति है जिसकी लम्बाइ 1.5 से 2 मीटर होती है। बै. ओरेन्टिएकस (B. aurantiacus ) कैरोलिलना तट पर पाई जाती है। बै. ऑस्ट्रेलिएन्सिस (B. auistraliensis) ऑस्ट्रेलिया व बै. क्लेविजिरस (B clavigerus) मेडिटरेनियन द्वीपों के समुद्रों की जातियाँ हैं। इनके अलावा हिन्द- प्रशान्त क्षेत्र में बै. केरनोसस (B carnosus), वेस्ट इन्डीज के जमाइका में बै. जैमेइकेन्सिस (B. jamaicensis), जापान में बै. माइसेकिएन्सिस (B. misakiensis), दक्षिणी अफ्रीकी में बै. केपेन्सिस (B capensis) आदि जातियाँ मिलती हैं।

खोज व नामकरण

जैसा कि इस अध्याय में पहले कहा जा चुका है हैमिकॉर्डेट सामान्यतः बिलकारी या नालवासी (tubicolous) होते हैं। यह दिन के समय अपना सम्पूर्ण शरीर इस नाल में रखते हैं परन्तु रात में अपना अग्र सिरा (शुण्ड या Proboscis ) बिल के बाहर निकाले रखते हैं। ऐसे समय में समुद्र के किनारे निकले इस प्रोबोसिस ओक वृक्ष ( oak) के फल ( बांज फल या वंजु फल) के समान दिखाई देते हैं। इन फलों को आँग्लभाषा में एकॉर्न (acorn) कहा जाता है। इस कारण ही इन कृमि सदृश्य जन्तुओं का नाम एकॉर्न वर्म (acorn worm) पड़ गया। इनके वैज्ञानिक नाम में बेलेनोस (Balanos ) से आशय भी इसी प्रकार के फल से है तथा ग्लॉसस (glossus) से आशय जीभ ( tongue) से है क्योंकि इसकी शुण्ड जीभ के समान भी दिखाई देती है ।

एकॉर्न कृमियों की खोज में वैज्ञानिकों के साथ मछली पकड़ने वाले नाविकों का भी योगदान रहा। एक निएपोलिटन (Neapolitan ) मछुआरे ने अपने जाल में एक ऐसे कृमि को पाया व इसे वह नेपल्स (Naples, Italy) के प्राणिशास्त्री के पास पहचान के लिए ले गया। बै. क्लेविजिरस (B. clavigerus) की पहचान व नामकरण का श्रेय डेल शियाए (Delle chiaje ) को दिया जाता है।

स्वभाव एवं आवास (Habit and Habitat)

बैलेनोग्लोसस समुद्री नालवासी (tubicolous) या बिलकारी (burrowing) जन्तु है। अधिकांश जातियाँ अन्त: ज्वारीय क्षेत्र (inter tidal zone) में पाई जाती हैं। परन्तु अनेक जातियाँ ऐसी भी हैं जो गहरे समुद्र (दो मील गहरे) में पाई जाती हैं। किनारे पर रहने वाली जातियाँ V, Y या U आकृति की नालों में रहती हैं जबकि गहरे समुद्र में मिलने वाली कुछ जातियाँ पैंदे में मुक्त रूप से घूमती हैं। यह जन्तु रात्रिचर (nocturnal) होते हैं।

बाह्य आकारिकी व संरचना

बाहर दिखने वाली बैलेनोग्लासस की शुण्ड प्राकृतिक रूप से चटक नारंगी या लाल दिखाई देती है। नाल को यदि खोदा जाए तो इसमें एक कोमल कृमि सदृश्य या केंचुए जैसा जन्तु प्राप्त होता है। यह द्विपार्श्व सममित बेलनाकार व कंकाल विहीन होता है। आकार अलग-अलग जातियों में अलग-अलग हो सकता है। शरीर पर पक्ष्माभ (cilia) पाए जाते हैं। शरीर तीन भागों में विभेदित किया जा सकता है। इन भागों को सामान्यतः अग्रकाय या प्रोटोसोम (protosome), मध्यकाय या मीजोसोम (mesosome) व पश्चकाय या मेटासोम नाम दिया जाता है। इन भागों में मिलने वाली देह गुहा को भी इसी क्रम से प्रोटोसील, मीजोसील व मेटासील नाम दिया जाता है। बैलेनोग्लोसस में इन्ही क्षेत्रों को क्रमश: शुण्ड (Proboscis ), कॉलर (Collar ) व धड़ (Truck ) नाम भी दिया जाता है।

  1. शुण्ड (Proboscis ) या अग्रकाय ( Protosome) : बैलेनोग्लोसस की शुण्ड वंजुफल (oak fruit) के समान दिखाई देती है। ओक का फल आधार से गोल परन्तु ऊपरी छोर पर कुछ संकरा होता है तथा यह एक कप समान आकृति पर टिका होता है। शुण्ड भी इसी आकृति की होती है व इसके निचले भाग कॉलर किनारों के उभारों (कॉलरेट, collaratte) पर टिकी दिखाई देती है। शुण्ड जन्तु का अग्रतम भाग है जिसे अग्रकाय या प्रोटोसोम (protosome) भी कहा जाता है। काट में यह शुण्ड गोलाकार या शंक्वाकार (conical) दिखाई देती है । शुण्ड वर्तुल व अनुदैर्ध्य पेशियों की उपस्थिति के कारण मांसल दिखाई देती है परन्तु यह ठोस नहीं होती है। इसके मध्य में अग्रदेहगुहा या प्रोटोसील (protocoel) पाई जाती है। इसे शुण्ड गुहा (proboscis coelom) भी कहते हैं। यह एक बारीक रन्ध्र जिसे शुण्डरन्ध्र (proboscis pore) कहते हैं, जो शुण्ड के मध्य – पृष्ठ भाग में बाहर खुलती है। कुछ जातियों में एक के स्थान पर दो रन्ध्र हो सकते हैं तो कुछ में ये अवरूद्ध होते हैं अर्थात् गुहा से नहीं जुड़ते हैं।

शुण्ड की काट में एपीडर्मिस, वर्तुल व अनुदैर्घ्य पेशियों के अतिरिक्त केन्द्र में शुण्ड गुहा देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त मुख गुहा से सतत एक मुख अन्धवर्ध या बक्कल डाइवर्टिकुलम (buccal diverticulum or stomochord) पाया जाता है। पहले इसे गलती से नोटोकोर्ड समझ लिया गया था। इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र में हृदय आशय (heart vesicle) व ग्लोमेरूलस (glomerulus) भी पाए जाते हैं।

शुण्ड एक पतले शुण्ड वृन्त (proboscis stalk ) या ग्रीवा से मध्य भाग कॉलर ( collar) से जुड़ता है। इस वृन्त के आधार पर मुख से पहले एक पक्ष्माभी अंग मिलता है जिसे मुखपूर्वीय पक्ष्माभी अंग (preoral ciliary organ) कहते हैं। यह सम्भवत: जल धारा व इसमें उपस्थित भोजन के संवेदन से सम्बन्धित संरचना है।

  1. कॉलर (Collar) या मध्यकाय (Mesosome ) : शुण्ड के पीछे कॉलर या मध्यकाय पाई जाती है। यह सामान्यतः शुण्ड से छोटी होती है तथा इसकी लम्बाई व चौड़ाई लगभग बराबर होती है। काट में यह लगभग वृत्ताकार दिखाई देती है परन्तु इसकी सीमाएँ एकदम गोल न होकर अनियमित होती हैं। कॉलर आगे की ओर कुप्पी समान उभर बना कर शुण्ड के आधार को ढके रहती है। कॉलर का यह भाग कॉलरेट (collaratte) कहलाता है। शुण्ड व कॉलर की सन्धिस्थल पर अधर भाग में अर्द्धचन्द्राकार मुख पाया जाता है जिसके विषय में यह विश्वास किया जाता था कि यह सदैव खुला रहता है परन्तु कुछ हाल ही के शोध कार्यों से ऐसे संकेत मिले हैं कि यह मुख पेशीय गतिविधि से बन्द भी होता है।

कॉलर क्षेत्र में पाई जाने वाली देहगुहा मध्यगुहा (mesocoel) कहलाती है। यह युग्मित (paired) होती है क्योंकि देहगुहा में अधर व पृष्ठ झिल्लियाँ पाई जाती हैं। यह गुहा भी शुण्डगुहा की तरह पेशियों व संयोजी ऊत्तकों की उपस्थिति के कारण समानीत (reduced) व अस्पष्ट मालूम की यह गहा शुण्डगुहा के साथ सतत नहीं होती है परन्तु कॉलरनाल व कॉलर रन्ध्र द्वारा प्रथम मोड में खलती है (देखे चित्र 4)। जिस स्थान पर कॉलर धड़ से जुडती है उस स्थान पर जान पाई जाती है जिसके कारण कॉलर का विभेदन करने में कोई परेशानी नहीं होती है।

  1. धड़ (Trunk) या पश्चकाय (Metasome) : धड़ बैलेनोग्लॉसस के शरीर का तीसरा, अन्तिम, पश्चतम व सबसे लम्बा भाग होता है। धड़ लगभग चपटा व लम्बा भाग होता है जिसके मध्य में अधर व पृष्ठ भाग में उभार पाए जाते हैं जिन्हें मध्यपृष्ठ (middorsal) व मध्य अधर उभसर (mid ventral ridge) कहते हैं। धड़ को पुनः तीन क्षेत्रों में विभेदित किया जा सकता है

(i) क्लोमजनन क्षेत्र (Branchio-genital region) (ii) यकृत क्षेत्र (Hepatic region) (iii) पश्चयकृतीय क्षेत्र (Post-hepatic region)

(i) क्लोम जनन क्षेत्र (Branchiogenital Region) : इस क्षेत्र में पक्ष के समान पतले व चपटे पार्वीय उभार (lateral ridges) पाए जाते हैं जो अनुदैर्घ्य (longitudinal) होते हैं। इन्हें जनन पक्ष (genital wing) या जनन पल्ले भी कहते हैं। इनमें जनद (gonds) पाए जाते हैं। कुछ जातियों में पाश्र्वीय उभार स्पष्ट नहीं होते हैं। जनदों के रन्ध्र अतिसूक्ष्म होते हैं अतः सिर्फ आंख से दिखाई नहीं देते हैं। इस क्षेत्र में पृष्ठ सतह पर क्लोम रन्ध्रों (branchial apertures) की दो पक्तियाँ पाई जाती हैं जिनमें अनेक क्लोम रन्ध्र उपस्थित होते हैं। अग्रस्थ किनारे पर जनन पक्षों के वलनन के कारण अगले क्लोम रन्ध्र ढक जाते हैं। कुछ जातियों में तो कॉलर का एक उभार, जिसे प्रच्छट (operculum) कहते हैं, अगले रन्ध्रों को ढक लेता है।

(ii) यकृत क्षेत्र (Hepatic region): धड़ का मध्य क्षेत्र या दूसरा भाग यकृत क्षेत्र कहलाता है। इस क्षेत्र में आन्त्र पाई जाती है। आन्त्र अत्यन्त आशयी व छोटे-छोटे उभर लिए हुए होती है। यह उभार यकृत अन्धवर्ध या हिपेटिक सीका (hepatic caeca) कहलाते हैं। चूंकि आन्त्र देहभित्ति से सटी होती है अतः इन सीका के उभर बाहर से (पृष्ठ सतह पर) देखे जा सकते हैं।

(iii) पश्चयकृतीय क्षेत्र (Post-hepatic region) : धड़ का तीसरा, अन्तिम व पश्चतम क्षेत्र पश्चयकृतीय क्षेत्र, उदरीय क्षेत्र (abdominal region) या पुच्छ क्षेत्र (caudal region) कहलाता है। यह धड़ का सबसे लम्बा भाग होता है तथा लगभग बेलनाकार (cylindrical) होता है तथा अन्त तक जाते-जाते इसकी मोटाई या व्यास घट जाता है। इसके अन्त में अन्तस्थ गुदा (terminal anus) पाया जाता है। इस भाग में आन्त्र जहाँ देहभित्ति से सम्पर्क करती है वहीं मध्यअधर दिशा में एक सख्त संरचना पाई जाती है। जिसे पुच्छरज्जु या पाइगोकोर्ड (pygochord) कहते हैं।

धड़ क्षेत्र में देहगुहा (coclom) पश्चदेहगुहा या मेटासील (metacoel) कहलाती है। यह भी युग्मित (paired) होती है क्योंकि यह एक पूर्ण अधर झिल्ली व एक अपूर्ण पृष्ठ झिल्ली (incomplete dorsal mesentery) से विभाजित होती है। यह कॉलर क्षेत्र की मीजोसील से एक पट से विभाजित होती है जिसे कॉलर-ट्रन्क सेप्टम (collar-trunk septum) कहते हैं। धड़ के अग्र क्षेत्र यानि क्लोम जनन क्षेत्र में पार्श्वपट (lateral septum) के कारण और विभाजित होती है।

मेटासील में कोई रन्ध्र नहीं पाए जाते हैं। यह देहगुहिकीय तरल (coelomic fluid) से भरी रहती है। तथा इसमें अमीबाभ सीलामोसाइट (amoeboid coclomocytes) पाई जाती हैं ( शेष दो गुहाएँ प्रोटोसील में मीजोसील सरन्ध्र होती हैं अतः इनमें समुद्री जल भर जाता है) ।

देहभित्ति (Body wall)

बैलेनोग्लॉसस की देहभित्ति में अधिचर्म, पेशियाँ व पैरीटोनियम पाए जाते हैं।

अधिचर्म (Epidermis) : अधिचर्म एक कोशिकीय मोटाई का स्तर है । इसकी कोशिकाएँ लम्बी स्तम्भाकार (columnar) पक्ष्माभी उपकला ( ciliated epithlium) की बनी होती हैं। इन कोशिकाओं के साथ संवेदी तन्त्रिका कोशिकाएँ व ग्रन्थि कोशिकाएँ भी इस स्तर में मिलती हैं। संवेदी तन्त्रिका कोशिकाएँ (neurosensory cells) अभिरंजन रागी होती हैं तथा शुण्ड व अग्र कॉलर में बहुतायत में पाई जाती हैं।

अधिचर्म में तीन प्रकर की ग्रन्थिल कोशिकाएँ पाई जाती हैं। ये कोशिकायें श्लेष्मा ( mucus) का स्रावण करती है। इनमें से एक कलश ग्रन्थि कोशिकाएँ (Goblet gland cells) छोटी व कलेश की आकृति की होती हैं। दूसरी कणिकामय ग्रन्थि कोशिकाएँ (granular or mulberry gland cells) जिनका कोशिका द्रव्य कणिकामय होता है। तीसरी जलिकायित ग्रन्थि कोशिकाएँ (reticulate gland cells) जिनका का कोशिका द्रव्य आशयी होने के कारण जालिका रूपी दिखाई देता है। अधि चम के निचले भाग में तन्त्रिका स्तर (nervous layer) व इसके नीचे आधारी कला या बेसमेण्ट मैम्ब्रेन (basement membrane) पाई जाती है बैलेनोग्लॉसस में डर्मिस (dermis ) अनुपस्थित होती है।

पेशीय स्तर ( Musculature) : शुण्ड व अग्र कॉलर क्षेत्र में बाहरी वर्तुल पेशी तन्तुओं (circular muscle fibres ) व आन्तरिक अनुदैर्घ्य पेशी तन्तुओं (longitudinal muscle fibres) का.. स्तर पाया जाता है। धड़ क्षेत्र में वर्तुल पेशी तन्तु अनुपस्थित होते हैं।

पेरीटोनियम (Peritoneum ) : यह भाग देहगुहा का अस्तर बनाता है। इसके एक ओर पेशी तन्तु व अन्दर की ओर देहगुहा पाई जाती है।

देहगुहा (Coelom)

‘बैलेनोग्लॉसस में सच्ची देहगुहा (truecoelom) पाई जाती है, अर्थात् यह दोनों ओर मध्यजनस्तर (mesoderm) से आस्तरित होती है । इस देहगुहा की उत्पत्ति भ्रूणीय आन्त्र से निकले कोष्ठों से होती है अतः यह आन्त्रगुही (enterocoelous) देहगुहा है। ऐन्टोरोन्यूस्टों की देह गुहा की दो विशेषताएँ हैं। प्रथम तो यह तीन भागों में बंटी होती है अर्थात् त्रिभागी ( tripartite) होती है। यह भाग शुण्ड, कॉलर व धड़ में पाए जाते हैं तथा क्रमश: शुण्डगुहा (proboscis coelom or protocoel), कॉलर गुहा (collar coelom or mesocoel) व धड़ गुहा (trunk coelom or metacoel) कहलाते हैं। यह तीनों भाग आपस में एक-दूसरे से पृथक होते हैं। प्रथम दो देहगुहीय भाग बाहरी जल के सम्पर्क में होते हैं अत: इनमें समुद्री जल पाया जाता है परन्तु मेटासील या पश्च देहगुहा रन्ध्र विहीन होती है तथा इसमें देहगुहिकीय तरल (coelomic fluid) पाया जाता है जिसमें अमीबाभ सीलोमोसाइट (amoeboid coelomocytes) पाई जाती हैं।

एन्टेरोन्यूस्ट जन्तुओं की देहगुहा की दूसरी विशेषता यह है कि इनकी देहगुहा वयस्कावस्था में अत्यन्त क्षीण या समानीत हो जाती है क्योंकि संयोजी व पेशी ऊत्तकों से यह भर जाती है। इस कारण इसे स्पष्ट रूप से पहचानना मुश्किल होता है। कॉलर व धड़ की देहगुहा झिल्लियों के पट के कारण विभाजित हो जाती है। ( देह गुहा का वर्णन इसी अध्याय के प्रारम्भ में शुण्ड, कॉलर व धड़ पुनः के शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा चुका है। )

कंकाल (Skeleton)

बैलेनोग्लॉसस में कोई स्पष्ट या सुनियोजित अन्तः या बाह्य कंकाल तंत्र नहीं पाया जाता है। इसके शरीर में चार दृढ़ संरचनाएँ पाई जाती हैं परन्तु इनका योगदान कंकाल की तरह उतना नहीं होता है जितना की अन्य जन्तुओं में कंकाल तन्त्र का होता है। ये संरचनाएँ निम्न प्रकार हैं

(i) मुखीय अंधवर्ध (Buccal diverticulum)

(ii) शुण्ड कंकाल ( Proboscis skeleton )

(iii) क्लोम कंकाल (Branchial skeleton)

(iv) पुच्छरज्जु (Pygochord )

(i) मुखीय अंधवर्ध (Buccal diverticulum) : मुखीय अंधवर्ध व इससे उत्पन्न नॉटोकॉर्ड के भ्रम के विषय में हम इस अध्याय में अन्यत्र भी जानकारी प्राप्त कर चुके हैं। मुख कॉलर क्षेत्र में पाया जाता है। मुख गुहा ( buccal cavity) से एक सख्त परन्तु खोखला बेलनाकार प्रवर्ध शुण्ड वृन्त तक जाता है। इस संरचना को अनेक प्राणिशास्त्रियों ने स्टोमोकोर्ड (stomochord) या नॉटोकॉर्ड माना (चित्र 3)। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अब यह स्पष्ट हो चुका है कि ऊत्तकीय संरचना व उत्पत्ति के अनुसार यह मुखगुहा का एक प्रवर्ध है नॉटोकॉर्ड नहीं है।

(ii) शुण्ड कंकाल (Proboscis skeleton) : इसे नूकल कंकाल (nuchal skeleton) भी कहते हैं। यह मुखीय अंधवर्ध के नीचे पाया जाता है तथा आकृति में यह गुलेल या अंग्रेजी के ‘Y’ अक्षर समान होता है। इसका मुख्य बड़ा भाग एक आयताकार मध्य पट्टिका ( laminated or median plate) का बना होता है जिस पर सींग या शृंग (horns or cornua) के समान दो प्रवर्ध पाए जाते हैं। ये प्रवर्ध मुख गुहा की ओर पाए जाते हैं जबकि पट्टिका मुखीय अंधवर्ध के नीचे पाई जाती है। पट्टिका के अधर तल पर एक छोटा या उभार ( ventral keel) पाया जाता है। यह कंकाल आधारी झिल्ली (basement membrane) के स्थूलन से बनता है।

(iii) क्लोम कंकाल (Branchial skeleton) : बैलेनोग्लोसस के क्लोम क्षेत्र में भी आधारी कला के स्थूलन से बना काइटिनी कंकाल पाया जाता है। यह कंकाल क्लोमों को सहारा देता है। यह आकृति में त्रिशूल के अग्र भाग जैसे या अंग्रेजी के M अक्षर समान (या fork समान) होता है। इनकी मध्य भुजा अधिक स्थूल व लम्बी होती है तथा आगे से दुफंकी (bifid) होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि दो निकटस्थ ‘U’ आकृति की संरचनाओं के संगलन से यह त्रिशूल समान संरचना बनती है।

(iv) पुच्छरज्जु (Pygochord ) : धड़ के अन्तिम क्षेत्र यानि पश्च यकृति ( post hepatic region) में आन्त्र के अधर भाग व देहभित्ति से जुड़ी एक अनुदैर्घ्य सख्त छड़ जैसी संरचना पाई जाती है जिसे पुच्छरज्जु या पाइगोकॉर्ड कहते हैं। इसकी शरीर में क्या उपयोगिता है यह अभी समझा नहीं जा सकता है।