एटीपी का पूरा नाम लिखिए इसे ऊर्जा मुद्रा क्यों कहते हैं ATP – The biological energy currency in hindi

ATP – The biological energy currency in hindi एटीपी का पूरा नाम लिखिए इसे ऊर्जा मुद्रा क्यों कहते हैं ?

एटीपी : जैविक ऊर्जा मुद्रा ( ATP : The biological energy currency)

जैसा कि नाम से ही विदित होता है, ऐडिनोसिन ट्राईफॉस्फेट (Adenosine triphosphate, ATP) एक न्यूक्लिओटाइट है जो कि एक क्षार एडिनोसिन, एक पेन्टोस शर्करा राइबोस तथा तीन फास्फेट समूह से मिलकर बना है (चित्र 1)। तीन फॉस्फेट समूहों में से आखिरी दो समूह उच्च ऊर्जा युक्त बधों (bonds) से जुड़े रहते है। इन बंधों को वक्र बंधों (-) से निरूपित ATPके जल अपघटन (hydrolysis) से उर्जा मुक्त होती है जो कोशिका द्वारा प्रयुक्त हो जाती है। इसलिये, को प्रचुर ऊर्जा युक्त ( energy rich) अथवा उच्च ऊर्जा युक्त (high energy ) यौगिक के नाम से जानते हैं। ATP को कोशिका की ऊर्जा मुद्रा (energy currency) भी कहते है चूंकी कोशिका में यह मुक्त उर्जा (free energy) का एक संग्रहणक (reservoir) एवं निष्पादक होता है।

जेन्क्स (Jancks, 1976) के अनुसार ATP के क्रमबद्ध जल अपघटन से मुक्त उर्जा निम्न प्रकार प्राप्त होती है।

(i) ATP एडिनोसिन डाई फोस्फेट (ADP) में बदलना ATP के अंतिम फॉस्फेट के जल अपघटन को आर्थोफास्फेट विखण्डन कहते है। pH 7 पर इससे 7.3Kcal उर्जा विमुक्त होती है :

ATP + H2O → ADP + Pi: AF 7.3 kcal/mol.

(ii) ADP का AMP (एडिनोसिन मोनो फॉस्फेट) में परिवर्तन :

ADP+H2O- AMP+Pi; F=-7.8 kcal/mol

(ii) AMP का एडिनोसिन एवं अकार्बनिक फॉस्फेट (H3PO4) 1) में परिवर्तनः

AMP + H2O → एडिनोसिन + Pi: F 3.4 k cal/mol.

(iv) ATP का AMP में परिवर्तन :

ATP + H2O → AMP+PP AF = 10.9 k cal/mol.

ATP के उच्च ऊर्जा युक्त होने के कारण (Causes of energy richness of ATP )

  1. ATP के प्रत्येक फॉस्फेट समूह में स्थित ऑक्सीजन अणु, इलेक्ट्रान ग्राही प्रकृति के कारण ऋणात्मक आवेश युक्त हो जाते हैं जिसके परिणाम स्वरूप पास में स्थित फॉस्फोरस अणुओं पर एक धनात्मक आवेश उत्पन्न हो जाता है। इसका यह अर्थ हुआ कि ATPअणु में फॉस्फोरस अणुओं में धनात्मक आवेशों में इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रतिकर्षण को रोकने के लिये तथा अणु को साथ स्थिर रखने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, उक्त इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रतिकर्षण को अत्यधिक ऊर्जा दूर कर सकती है जो कि इन फास्फेट अणुओं में संग्रहित हो जाती है। जब एक फॉस्फेट समूह जल अपघटन द्वारा हटाया जाता है तब यही संग्रहित ऊर्जा विमुक्त हो जाती है।
  2. जल अपघटन के क्रियाधारों (reactants) एवं उत्पादों (products) की अनेक अनुनादित प्रकार ( resonance forms) होते हैं। अधिक अनुनादित प्रकारों से अधिक स्थिरता उत्पन्न होती है। ATP में ADP के बजाय कम प्रकार की अनुनादित प्रकार पायी जाती है अतः ATP, ADP के बजाय कम स्थिर है।

ATP ऊर्जा का उपयोग (Uses of ATP energy)

  1. जैव संश्लेषणिक अभिक्रियाओं में आवश्यकता जैसे- प्रोटीन, वसा, बहुशर्करा एवं न्यूक्लिक अम्लों का संश्लेषण ।
  2. सक्रिय स्थानांतरण (active transport) में आवश्यक ।
  3. प्रोटोप्लाज्मिक स्ट्रिमिंग में आवश्यक ।

4.जैव दीप्तिमान प्रक्रिया (bioluminescence phenomenon) में आवश्यक ।

  1. संग्रहित ऊर्जा के रूप में।
  2. कोशिका विभाजन में आवश्यक ।
  3. कोशिकीय झिल्लियों के जैव-इलेक्ट्रॉनिक विभव (bio electic potential) का नियंत्रण करना ।

श्वसन (Respiration )

ग्लूकोज अणु के कार्बन डाईऑक्साइड एवं जल के अणुओं में टूटने पर ऊर्जा उत्पन्न होने की दशा को श्वसन (respiration) कहते हैं जो सभी सक्रिय कोशिकाओं में निरन्तर 24 घन्टे सम्पन्न होती है। यह क्रिया प्रकाश-संश्लेषण ह या न होने की दशा में भी सतत रूप से सम्पन्न होती रहती है। यह कोशिकाद्रव्य में प्रारम्भ होकर माइटोकॉन्ड्रिया में समा होती है। इस क्रिया से सरल शर्करा अणु विभिन्न चरणों में टूटते हैं जिससे ऊर्जा मुक्त होती है। यह सभी चरण, विक द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं। श्वसन क्रिया के प्रारम्भ होने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है परन्तु वायवीय श्वसन (aerobic respiration) ऑक्सीजन की उपस्थिति के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। ऊर्जा का नियंत्रित रूप से मुक्त हो एक महत्वपूर्ण घटना है। इस क्रिया में कार्बन डाईऑक्साइड एवं जल अन्तिम उत्पाद होते हैं। सम्पूर्ण श्वसनक्रिया को निय लिखित समीकरण द्वारा संक्षिप्त रूप में लिखा जा सकता है।

C6H12O6    + 6O2        विकर            6CO2                         + 6H2O   +  673 Kcal

ग्लूकोज       ऑक्सीजन        कार्बनडाई ऑक्साइड               जल             ऊर्जा

(Glucose)   (Oxygen)    (Carbon dioxide)               (water)        (Energy)

ऊर्जा, एडिनोसिन ट्राईफास्फेट (एटीपी) (Adenosine triphosphate, ATP) के रूप में मुक्त होती है। कार्बोहाइड्रेटस के आक्सीकरण की अनुपस्थिति में ऑक्सीकरण से कार्बन डाईऑक्साइड, एथिल एल्कोहाल या लैक्टि अम्ल बनता है। इसे अवायवीय श्वसन अथवा अनॉक्सीश्वसन (anaerobic or anoxyrespiration) कहते हैं। इस क्रिया क्रियाधार का पूर्ण आक्सीकरण नहीं होता है इसलिए इसमें मुक्त ऊर्जा वायवीय श्वसन में मुक्त ऊर्जा से कम होती है।

C6H12O6             विकर                  2C2H5OH            2CO2        + 56 Kcal

ग्लूकोज                                    एथिल एल्कोहॉल       कार्बन डाई आक्साइड    ऊर्जा

(Glucose)                               (Ethyl alcohol)       (Carbon dioxide)    (Energy)

तालिका 1: वायवीय एवं अनॉक्सी श्वसन में तुलना

वायवीय श्वसन (Aerobic respiration)

 

वायवीय श्वसन (Aerobic respiration)

 

1.    यह क्रिया सभी सजीव कोशिकाओं में सम्पन्न होती है।

 

2.    इस क्रिया में O2 की आवश्यकता है।

 

3.    इसे क्रिया के अंतिम उत्पाद CO2 एवं H2O होते हैं।

 

4.    ग्लूकोज के एक अणु के पूर्ण आक्सीकरण से कुल 30 या 32 एटीपी अणु मुक्त होते हैं।

 

5. इस क्रिया में ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रियाऐं कोशिका कोशिकाद्रव्य में एवं क्रेब्स चक्र की अभिक्रियाऐं माइटो- कॉन्ड्रिया में सम्पन्न होती है।

1. यह क्रिया कुछ जीवाणुओं, कवक, अंकुरित बीज, मांसल फल इत्यादि में सम्पन्न होती है।

2. इसमें O2 की आवश्यकता नहीं होती है।

 

 

3. अन्तिम उत्पाद CO2 एवं एल्कोहॉल अथवा लैक्टिक अम्ल होता है

 

4.इस क्रिया में 2 एटीपी अणु मुक्त होते हैं।

 

 

5. सभी अभिक्रियाऐं कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। यहाँ माइटोकॉन्ड्रिया की आवश्यकता नहीं होती।

श्वसन एव दहन (Respiration and combustion)

ईंधन का दहन भी ऑक्सीकरण कहलाता है क्योंकि इसमें भी कार्बनिक पदार्थों से ऊर्जा मुक्त होती है। परन्तु यह श्वसन से भिन्न है।

तालिका- 2: श्वसन एवं दहन में तुलना

श्वसन (Respiration)

 

दहन (Combustion)

 

1.    यह एक जैविक क्रिया है जो कि सभी जीवित कोशिकाओं में सम्पन्न होती है।

2.    यह क्रिया बहुत सी अभिक्रियाओं की एक श्रृंखला है जो कि विशिष्ट विकरों द्वारा नियन्त्रित होती है।

3.    इस क्रिया के विभिन्न चरणों में ऊर्जा मुक्त होती है।

4.    मुक्त हुई ऊर्जा का कुछ भाग ATP के रूप में संचित रहता है तथा शेष भाग मुक्त हो जाता है।

5.    श्वसन कोशिकीय (शरीर) तापमान पर घटित होता है। इसलिए शरीर का तापमान नहीं बढ़ता है।

 

 

1.    दहन जीवित कोशिकाओं में नहीं होता।

2. यह एक सरल रासायनिक अभिक्रिया हैं जिसमें विकारों की आवश्यकता नहीं होती है।

3. दहन में ऊर्जा एक ही चरण में सतत मुक्त होती है।

4. दहन में सम्पूर्ण ऊर्जा उष्मा एवं प्रकाश के रूप में मूक्त हो जाती है।

5. दहन में बहुत सी ऊर्जा उष्मा एवं प्रकाश के रूप में मुक्त होती है। इसलिए यह वातावरण के तापमान को बहुत अधिक बढ़ा देता है।

 

 

श्वसन क्रियाधार (Respiration substrate)

श्वसन में उच्च ऊर्जा युक्त यौगिकों जैसे काबोहाइड्रेटस, वसा, प्रोटीन एवं कार्बनिक अम्ल का ऑक्सीकरण होता है। इन्हें श्वसन क्रियाधार (respiratory substrates) कहते हैं।

श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of respiration)

ऑक्सी- श्वसन एवं अनॉक्सी- श्वसन में प्रारम्भिक रासायनिक क्रियाएँ समान होती है जिसके फलस्वरूप ग्लूकोज़ का विघटन होकर पाइरूविक अम्ल बनता है। इस क्रिया को ग्लाइकोलिसिस कहते हैं तथा यह कोशिका द्रव्य में होत क्रिया के लिये O2 की आवश्यकता नहीं होती। इसके पश्चात् यदि O2, उपलब्ध है तो पाइरूविक अम्ल का विघटन एवं पूर्ण ऑक्सीकरण माइटोकॉन्ड्रिया में होता है जिससे CO2, जल एवं ऊर्जा प्राप्त होते हैं ये अभिक्रियाएं क्रेब्स चक्र कहलाती है। O2 की अनुपस्थिति में पाइरूविक अम्ल से एथिल ऐल्कोहॉल, CO2 एवं ऊर्जा प्राप्त होते हैं।

श्वसन के तीन चरण होते हैं-

  1. ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)
  2. क्रेब्स चक्र (Krebs cycle) एवं
  3. इलेक्ट्रान स्थानान्तरण तंत्र (Electron transport system)
  4. ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis)

ग्लाइकोलिसिस की सर्वप्रथम खोज एम्बड़न, मेयरहॉफ एवं पारानास (Embden. Mayerhof and Paranas) ने की थी इसलिए इसे ई एम पी पथ (EMP Path-way) भी कहते हैं। यह दोनों प्रकार के श्वसनों-वायवीय एवं अवायवीय में पाया जाता है। यह क्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। इसमे पायरूविक अम्ल के दो अणु प्राप्त होते हैं। इस क्रिया को दो भागों में बाँटा गया है-

(i) फास्फोराइलेशन ( Phosphorylation )

(ii) पायरूविक अम्ल का बनना (Formation of pyruvic acid)

(i) फास्फोराइलेशन ( Phosphorylation)

इस क्रिया के अन्त में फ्रक्टोज 1, 6 डायफॉस्फेट (fructose 1.6 diphosphate) प्राप्त होता है। भोज्य पदार्थ स्टार्च (starch), ग्लूकोज (glucose) अथवा फ्रक्टोज (fructose) इत्यादि के रूप में संग्रहित होता है। इनका फास्फोराइलेशन होता है जिससे फ्रक्टोज 6-फास्फेट (fructose 6 phosphate) बनता है।

स्टार्च + Pi  फास्फोराइलेज (Phosphorylase) ग्लूकोज I-P

म्यूटेज ( Mutase)

ग्लूकोज + ATP  हेक्सोकाइनेज (Hexokinase)   ग्लूकोज 6-P + ADP  …………………………(1)

Mg++

अथवा                                   ↓ हेक्सोस आइसोमरेज (Haxose Isomerase)

फ्रक्टोज + ATP हेक्सोकाइनेज (Hexokinase)           फ्रक्टोज 6-P + ADP  ……………………..(2)

Mg++                  फ्रक्टोज 6-P + ADP

ATP                  हैक्सोकाइनेज (Haxokinase)   ………………………….(3)

ADP                    Mg++

फ्रक्टोज 1,6-DiP

फ्रक्टोज-6 फास्फेट का दुबारा से फास्फोराइलेशन होकर फ्रक्टोज 16- डाईफास्फेट बनता है। इस प्रकार अब तक फास्फोराइलेशन में दो एटीपी का उपायोग हो जाता है।

(ii) पायरूविक अम्ल का निर्माण (Formation of pyurvic acid)

यह दो चरणों में सम्पन्न होता है-

(a) शर्करा का विदलन (Splitting of sugar) – इस क्रिया में फॉस्फोरायलेटिड शर्करा का दो भिन्न अणुओं में विदलन होता है जोकि एक दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं (PGAL एवं DiHAP) ।

फ्रक्टोस 1, 6- डाई फास्फेट

(Fructose 1,6-diphosphate)

↓ एल्डोलेज (Aldolase)

फॉस्फोग्लिसरएल्डिहाइड                          आइसोमरेज                  डाइहाइड्रोक्सीएसीटोन फॉस्फेट

(Phosphoglyceraldehyde, PGAL)        (Isomerase)            (Dihydroxyacetone, Phosphate,                              DiHAP)

ग्लाइकोलिसिस में केवल फास्फोग्लिसरएल्डिहाइड (phosphoglyceraldehyde, PGAL) ही प्रवेश कर सकता है। इसलिए डाइहाइड्रोक्सीएसीटोन फॉस्फेट (dihydroxyacetone, Phosphate, DiHAP) फास्फोग्लिसरएल्डिहाइड में परिवर्तित हो जाता है।

(b) पायरूविक अम्ल का निर्माण (Formation of pyruvic acid)

  1. H3PO4, PGAL से क्रिया करके उसे 1,3 – डाइफास्फोग्लिसरएल्डिहाइड (1,3- diphosphoglyceraldehyde, 1. 3-Di PGAL) में परिवर्तित कर देता है।
  2. यह 1, 3 diPGAL डीहाइड्रोजनेज एन्जाइम की उपस्थिति में 13 डाइफास्फोग्लिसरिक अम्ल (1, 3 diphosphoglyceric acid 1,3- Di PGA) बनाते हैं।
  3. उक्त क्रिया में दो इलेक्ट्रोन तथा दो प्रोटोन मुक्त होते हैं। जो एन ए डी’ (NAD+) से क्रिया करके एन ए डी एच + H* (NADH + H*) बनाते हैं।
  4. फास्फेट के मुक्त होने से 1.3-Di PGA, 3PGA में परिवर्तित होता है।
  5. यह 3-PGA, 2PGA में रूपान्तरित हो जाता है।
  6. 2PGA से एक जल अणु के मुक्त होने से यह फास्फोइनॉल पायरूवेट (phosphoenol pyruvate. PeP) में परिवर्तित होता है।
  7. इस PeP से फास्फेट समूह मुक्त होता है जो ADP के द्वारा ग्रहण किया जाता है। इससे ADP से ATP निर्माण होता है। फास्फोइनोल पायरूविक अम्ल (PeP), पायरूविक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है। उपरोक्त दी गई अभिक्रियाएँ उनके

विकरों के साथ चित्र 3 में दी गई है।

जैसा कि चित्र 3 में दिखाया गया है, ग्लाइकोलिसिस के अन्त में पायरूविक अम्ल NADH, एव ATP प्रत्येक के दो अ

प्राप्त होते हैं। NADH2 के दो अणुओं से 6 ATP अणु प्राप्त होते हैं। इसलिए यहाँ कुल 8ATP अणुओं का लाभ होता है ग्लाइकोलिसिस में न तो O2 की आवश्यकता होती है न ही CO2 मुक्त होती है।

पायरूविक अम्ल का वायवीय ऑक्सीकरण (Aerobic oxidation of pyruvic acid)

पायरूविक अम्ल (pyruvic acid) का ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में पूर्ण ऑक्सीकरण हो जाता है। यह क्रिया दो चरणों में सम्पन्न होती है।

  1. एसीटाइल कोएन्जाइम ए का निर्माण (Formation of acetyl Co-A)

इस क्रिया में सर्वप्रथम पायरूविक अम्ल का सक्रियण होता है। इसमें NAD+ एवं कोएन्जाइम – ए (Coenzyme A, COA SH) पायरूविक अम्ल से क्रिया करते हैं तथा ऑक्सिडेटिव डी कार्बोक्सीलेशन (oxidative decarboxylation) होता हैं। इस अभिक्रिया में CO2 का एक अणु मुक्त होता है तथा NAD, NADH + H+ में अपचयित हो जाता है और एसीटाइल को एन्जाइम – ए (Acetyl CoA = सक्रिय एसीटेट) बनता है।

पायरूविक अम्ल + CoASH + NAD+     बहु एन्जाइम संकुल multienzyme complex      Acetyl-S-CoA +

(Pyruvic acid)                            थायमिन पायरोफास्फेट  (Thiamine pyrophosphate TPP). NAD H+H+                                        CO2

लिपोइक अम्ल अमाइड (Lipoic acid amide, LAA)

यह अभिक्रिया क्रेब्स चक्र का भाग नहीं है।