JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now

हिंदी माध्यम नोट्स

Categories: Uncategorized

अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कैसे होता है ? , राष्ट्रपति शासन के नियम , आर्टिकल 365 , राष्ट्रपति शासन अधिकतम लगाया जा सकता है

राष्ट्रपति शासन अधिकतम लगाया जा सकता है , अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कैसे होता है ? , राष्ट्रपति शासन के नियम (article 356 in hindi)  :-
अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कैसे होता है ?
अनुच्छेद (356) केन्द्र को राज्यों में राष्ट्रपति शासन आरोपित करने
का अधिकार देता है। संविधान निर्माण के समय इस प्रावधान को
संविधान की रक्षा के लिए तथा इसके कम से कम अवसरों पर
प्रयोग हेतु लाया गया था। परन्तु व्यवहार में इस प्रावधान का
दुरूपयोग विभिन्न तरीकों द्वारा किया गया जैसे,
1 सदन में बहुमत वाले राज्य सरकार को बर्खास्त कर।
2 दलगत आधार पर सदन को भंग या निलंबित कर।
3 चुनाव परिणाम निर्णायक नहीं होने पर विपक्षी दल को
सरकार बनाने का अवसर नहीं देना।
4 मंत्री परिषद द्वारा त्यागपत्र दिए जाने के बाद विपक्ष को
सरकार बनाने का अवसर नहीं देना।
5 सत्तारूढ़ दल द्वारा सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर
पाने पर विपक्षी दल को सरकार बनाने का अवसर नहीं देना।
अनुच्छेद ख्200, एवं ख्201,ः- राज्य विधेयक को राष्ट्रपति के
विचार के लिए आरक्षित रखने की राज्यपाल की शक्ति, केन्द्र राज्य
संबंधों में तनाव का एक अलग मुद्दा है। यह तब और भी तनावपूर्ण
हो जाता है जब राज्यपाल मंत्री परिषद की सलाह को दर-किनार
कर केन्द्रीय निर्देश पर ऐसा करता है। इस प्रावधान का मुख्य उद्देश्य
यह है कि राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाए जो केन्द्रीय विधि से
प्रतिकूल हो। लेकिन इसका प्रयोग केन्द्र द्वारा राज्यों पर निगरानी
रखने हेतु किया जाता है। दुभाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि राज्यपाल ने
कई अवसरों पर इस शक्ति का प्रयोग केन्द्रीय हित की रक्षा हेतु किया
है। अतः राज्यों द्वारा कई अवसरों पर अनुच्छेद (200) एवं (201) के
विरूद्ध आवाज उठाई जाती रही है। सरकारिया आयोग के प्रश्नावली
के जवाब में पश्चिम बंगाल सरकार ने दोनों अनुच्छेदों के विलोपन
की सिफारिश की थी। और यदि विलोपन संभव नहीं है तो संविधान
संशोधन द्वारा यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इस संदर्भ में
राज्यपाल मंत्रि-परिषद की सलाह पर हीं कार्य करे न कि अपने स्वयं
के विवेक पर। इसके अतिरिक्त यह सुझाव भी दिया जाता है कि
राज्यपाल की इस शक्ति को न्यायिक पुनर्विलोकन के दायरे में लाया
जाए।
राजस्वः- भारतीय संघवादी व्यवस्या में केन्द्र – राज्य वित्तीय
संबंध सर्वाधिक विवादित क्षेत्रों में से एक है। राज्यों द्वारा वित्तीय
स्वायतत्ता की मांग भारतीय संघवादी व्यवस्या के लिए एक बड़ा बहस
का मुद्दा बन गया है। केन्द्र – राज्य संबंधों में वित्तीय मुद्दों के कारण
तनाव के निम्नलिखित क्षेत्र हैं –
1 करारोपण की शक्ति।
2 वैधानिक तथा विवेकाधीन अनुदान
3 आर्थिक नियोजन
राजस्व संबंधित मामलेंः- केन्द्र सरकार का राजस्व संबंधी श्रोत
राज्यों से अपेक्षाकृत लचीला एवं विस्तारित है। केन्द्र अन्य कई
माध्यमों यथा घाटे की वित्त व्यवस्था, संगठित मुद्रा बाजार से ऋण
तथा अंतराष्ट्रीय सहायता, से संसाधन निर्माण करता है। करारोपण की
अवशिष्ट शक्तियाँ भी केन्द्र सरकार के पास हैं। इसके अतिरिक्त
संविधान आपात के समय अतिरिक्त अधिभार लगाने की शक्ति भी केन्द्र
सरकार को देता है। व्यवहार में अधिभार, आयकर का एक स्थायी
अंग बन गया है। कर व्यवस्था में अन्य कमी जिसके कारण राज्य
सर्वाधिक त्रस्त हैं वह है निगम कर जिस पर केन्द्र सरकार का अनन्य
अधिकार है। इस प्रकार राजस्व के मामले में राज्यों को केन्द्र पर
निर्भर होना पड़ता है।
सहायता अनुदानः भारत की संचित निधि से राज्यों को सहायता
अनुदान को शासित करने वाले सिद्धान्तों के निर्धारण हेतु संविधान के
अनुच्छेद (280) के तहत् एक वित्त आयोग के गठन का प्रावधान है।
इसे प्रत्येक पाँच वर्ष की समाप्ति पर या ऐसे पूर्व समय पर जब
राष्ट्रपति आवश्यक समझे गठित किया जाता है। राज्यों को संघ से
सहायता अनुदान अनुच्छेद (275) के तहत् प्रावधानित है।
संघ द्वारा विवेकीय अनुदानः- अनुच्छेद (282) के तहत् संघ
राज्यों को किसी लोक प्रयोजन के लिए सहायता अनुदान दे सकता
है। यह एक विवेकीय शक्ति है जो वित्त आयोग के दायरे में नहीं आता
तथा केन्द्र – राज्य तनाव का यह एक प्रमुख क्षेत्र है। क्योंकि यह
विवेकीय अनुदान राज्यों की योजनागत व्ययों को पुरा करने के लिए
दी जाती है या किसी आकस्मिकता की स्थिति से निपटने के लिए,
अतः संघ द्वारा राज्य नियोजन पर नियंत्रण तथा दलगत आधार पर
विभेदन की प्रवृति पाई जाती है। योजना आयोग जो कि एक
राजनीतिक संस्था है। इस माध्यम से संसाधन आवंटन में राज्य की
योजनाओं में हस्तक्षेप करता है, साथ ही, राजनीतिक संस्था होने के
कारण, राज्यों द्वारा इस पर दलगत आधार पर विभेदकारी नीति
अपनाने का भी आरोप लगाया जाता है। क्योंकि योजना आयोग की
सिफारिश पर दिए गए अनुदान की मात्रा वित्त आयोग की सिफारिश
पर दिए जाने वाले अनुदान से काफी बड़ी होती है, इसलिए राज्यों
(विशेषकर विपक्षी दल की सरकार वाले राज्य) द्वारा यह आरोप
लगाया जाता है कि संसाधन का बटवारा अब पूरी तरह से संघ के
विवेकाधीन हो गया है।
स्वायत्तता की मांग:- राज्यों द्वारा केन्द्र पर यह आरोप लगाया
जाता रहा है कि संविधान द्वारा प्रदत्त स्वायत्तता का अध्यारोहण कर
लिया गया है। मुख्यतः वित्तीय स्वायत्तता के संदर्भ में यह ज्यादा
विवदित है। इसके अतिरिक्त विधायी स्वायत्तता, तथा राज्य में केन्द्रीय
पुलिस बलों को लगाए जाने को लेकर भी मतभेद हैं।
सत्ता में परिवर्तन के बावजूद भी केन्द्रीकरण की प्रवृति में कमी नहीं
आई है। हालंाकि प्रशासनिक सुधार आयोग की यह स्पष्ट राय थी
कि राज्यों को अधिक से अधिक शक्तियों का प्रत्यायोजन किया जाना
चाहिए। इसने यह भी कहा कि केन्द्रीकृत नियोजन ने राज्यों के
कार्यक्रम क्रियान्वयन में अत्यधिक हस्तक्षेप किया है। आयोग ने
राज्यपाल के संदर्भ में भी सिफारिशें की तथा अनुच्छेद (263) के तहत्
एक अन्तर्राज्यीय परिषद के गठन की सिफारिश की। इसका गठन
किया भी गया है परन्तु स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
सरकारिया आयोगः-
अस्सी के दशक में संघीय विषय एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया तथा
केन्द्र – राज्य विवाद तथा राजनीतिक चुनौतियाँ नए आयाम लेने लगी,
तब यह आवश्यक हो गया कि सुधार हेतु प्रयास किए जाएं। इसी
संदर्भ में 24 मार्च 1983 को भारत सरकार द्वारा केन्द्र – राज्य के
शक्ति एवं उत्तदायित्व के सभी क्षेत्रों में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए
एक केन्द्र -राज्य आयोग का गठन न्यायमूर्ति सरकारिया की अध्यक्षता
में किया गया। आयोग से यह अपेक्षा की गई कि वह भारत के
सामाजिक – आर्थिक विकास तथा संविधान के प्रावधानों के अनुरूप देश की एकता एवं अखण्डता को संरक्षित रखने संबंधी विषयों को ध्
यान में रखते हुए अपनी सिफारिशें देगा।
सरकारिया आयोग की सिफारिशें:-सरकारिया आयोग ने
अपनी रिपोर्ट 27 अक्टूबर 1987 को सौंपी जिसमें उसने एक मजबूत
केन्द्र का समर्थन सिर्फ देश की एकता एवं अखण्डता को सुनिश्चित
करने के संदर्भ में किया । आयोग ने मजबूत केन्द्र को केन्द्रीकरण
का समानार्थी नहीं कहा । वास्तव में आयोग ने केन्द्रीकरण को देश
की अखण्डता के लिए एक खतरा बताया। आयोग के अनुसार राज्य
सरकारों को नियंत्रित करने के लिए केन्द्रीय सत्ता कई तरह की
रणनीतियाँ अपना सकती हैं लेकिन वे हमेशा राष्ट्रहित में नहीं होती।
कई बार राज्यों के लिए भेदभावपूर्ण हो जाती है। इस प्रकार का
भेदभावपूर्ण रवैया राष्ट्रीय एकता को बाधित करता है तथा विखण्डनकारी
प्रवृति को बढ़ावा देता है। सरकारिया आयोग द्वारा सुझाई गई मुख्य
सिफारिशें निम्नलिखित हैं।
1 अखिल भारतीय सेवाओं को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए
एवं राज्य का ऐसा कोई कदम जो इस प्रावधान का
उल्लंधन करता हो देश के वृहद हित के लिए खतरा होगा।
आयोग ने अखित भारतीय सेवाओं को और अधिक मजबूत
बनाने की सिफारिश की तथा उनके द्वारा राष्ट्रीय एकता और
अखण्डता के लिए बेहतर कार्य की अपेक्षा की।
2 जब कभी भी केन्द्र राज्य सूची के विषय पर कानून बनाए, उसे
संबंधित राज्य के साथ ही नही बल्कि सभी राज्यों के साथ
सामूहिक रूप से सहमति बनानी चाहिए।
3 केन्द्र सरकार को राज्यों में अर्द्धसैनिक बलों को तैनात करने
से पहले संबंधित राज्य सरकार को विश्वास में लिया जाना
चाहिए। यद्यपि यह जरूरी नहीं है कि राज्य की सहमति
आवश्यक बनाया जाए।
4 राज्यपाल द्वारा अपने पद की समप्ति के बाद किसी भी पद
पर नियुक्त नहीं होना चाहिए।
5 अनुच्छेद (356) का प्रयोग सिर्फ अंतिम उपाय के रूप में ही
प्रयोग किया जाना चाहिए जब सभी तरह के विकल्प असफल
हो जाएं।
6 समवर्ती सूची से संम्बन्धित विधान बनाते समय संघ-राज्य
परामर्श को संवैधानिक बाध्यता नहीं बनाया जाए।
7 संघ सरकार को समवर्ती सूची के उन्हीं विषयों पर हस्तक्षेप
करना चाहिए जो राष्ट्र के व्यापक हित में हो।
8 अनुच्छेद 249, 256, 257 यथावत रहें।
9 योजना आयोग का उपाध्यक्ष ख्यातिमान विशेषज्ञ हो जो
राज्य सरकार को विश्वास में ले सके । राज्य स्तर पर
योजना बोर्ड गाठित होना चाहिए।
10 राज्य सरकारों के प्रतिनिधि भी वित्त आयोग में सम्मिलित
होने चाहिए।
11 निगमकर के उचित बँटवारे के लिए संविधान में संशोधन
किया जाए।
12 जिस व्यक्ति को राज्यपाल बनाया जाए वह किसी न किसी
क्षेत्र में प्रतिष्ठित होना चाहिए। वह राज्य से बाहर का रहने
वाला हो।
राजनीतिक रूप से तटस्थ हो तथा हाल हीं के दिनों में
सक्रिय राजनीति में कार्यरत न हो ।
13 राज्यपाल को विधानसभा के बाहर स्वयं के कंधों पर किसी
मंत्रिमण्डल के बहुमत में होने का जेखिम नहीं लेना चाहिए
बल्कि यह विधानसभा में सिद्ध करवाया जाए।
14 बहुमत खो चुके या खोने की संभावना वाला मंत्रिमंडल
राज्यपाल को विधान सभा भंग करने की सलाह दे तो
राज्यपाल को सदन में इसका निर्णय करवाना चाहिए।
15 यह परम्परा विकसित की जानी चाहिए कि कोई भी कामचलाऊ
सरकार प्रमुख नीतिगत निर्णय न ले।
16 राष्ट्रपति के पास विचार हेतु विधेयक भेजने से बचना
चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा ऐसे विधेयकों पर चार माह में विचार
कर निपटारा करना चाहिए।
17 राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के समक्ष रखा
जाए तथा संसद में विचार किए बिना विधानसभा भंग नहीं
करनी चाहिए।
18 अनुच्छेद (163) में दी गई राज्यपाल की स्वविवेकाधिकार
शक्तियाँ यथावत रहनी चाहिए।

Sbistudy

Recent Posts

Question Tag Definition in english with examples upsc ssc ias state pcs exames important topic

Question Tag Definition • A question tag is a small question at the end of a…

2 weeks ago

Translation in english grammer in hindi examples Step of Translation (अनुवाद के चरण)

Translation 1. Step of Translation (अनुवाद के चरण) • मूल वाक्य का पता करना और उसकी…

2 weeks ago

Report Writing examples in english grammer How to Write Reports explain Exercise

Report Writing • How to Write Reports • Just as no definite rules can be laid down…

2 weeks ago

Letter writing ,types and their examples in english grammer upsc state pcs class 12 10th

Letter writing • Introduction • Letter writing is an intricate task as it demands meticulous attention, still…

2 weeks ago

विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक विशेषताएँ continents of the world and their countries in hindi features

continents of the world and their countries in hindi features विश्व के महाद्वीप की भौगोलिक…

2 weeks ago

भारत के वन्य जीव राष्ट्रीय उद्यान list in hin hindi IAS UPSC

भारत के वन्य जीव भारत में जलवायु की दृष्टि से काफी विविधता पाई जाती है,…

2 weeks ago
All Rights ReservedView Non-AMP Version
X

Headline

You can control the ways in which we improve and personalize your experience. Please choose whether you wish to allow the following:

Privacy Settings
JOIN us on
WhatsApp Group Join Now
Telegram Join Join Now