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जाने कला सिनेमा क्या है , art cinema definition in hindi meaning | समानांतर सिनेमा किसे कहते हैं परिभाषा अर्थ लिखिए |

कला सिनेमा (आर्ट सिनेमा)
लोकप्रिय सिनेमा के महत्वपूर्ण विषयों से अपेक्षाकृत बचाव की मुद्रा के विरुद्ध 1960 के दशक में फिल्म-निर्माताओं के एक वग्र से प्रतिक्रिया आई। इसे विभिन्न नामें से ‘समानांतर सिनेमा’, ‘आर्ट फिल्में’, और ‘नई लहर सिनेमा’, से पुकारा गया। इस प्रकार की फिल्में छोटे बजट की होती थीं, और भारतीय परिदृश्य के कटु सत्य पर केंद्रित होती थीं। शायद इसकी प्रेरणा सत्यजीत रे थे जिन्होंने अपनी फिल्मों पाथेर पांचाली (1955) और अपराजितो (1956) और अपूरसंसार (1959) से भारत को विश्व सिनेमा के मानचित्र पर रख दिया। मृणाल सेन एक अन्य निर्देशक थे जिनका नाम नए प्रकार के सिनेमा से जोड़ा जाता है। उनकी फिल्म भुवन शोम, यद्यपि ‘न्यू वेव’ या आर्ट फिल्म के तौर पर खरी थी, को पूरी लोकप्रियता एवं व्यावसायिक सफलता मिली। उन्होंने एक दिन प्रतिदिन, मृगया और एकालेर संधाने जैसी अन्य अच्छी फिल्में बनाईं। श्याम बेनेगल ने अंकुर (1974), मंथन और निशांत जैसी फिल्में बनाकर ‘आर्ट फिल्मों’ के क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी। इन फिल्मों में धनाढ्य एवं जमींदार वर्गें द्वारा ग्रामीण लोगों पर अत्याचार एवं उनके शोषण के विषय को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया। ‘न्यू इंडियन सिनेमा’ पर कोई भी चर्चा रितविक घाटक के योगदान की उपेक्षा नहीं कर सकती, जिनकी फिल्मों मेघे ढाका तारा, कोमल गंधार और सुवर्ण रेखा ने परिवर्तन का माग्र प्रशस्त किया।
हिन्दी फिल्म जगत में ‘नया सिनेमा’ बसु चटर्जी (सारा आकाश), राजिन्दर सिंह बेदी (दस्तक), मणि कौल (उसकी रोटी, दुविधा), अवतार कौल (27 डाउन), कुमार साहनी (माया दर्पण), बसु भट्टाचार्य (अनुभव) और एमण्एस. सथ्यु (गरम हवा), जैसे निर्देशकों की महत्वपूर्ण फिल्मों से आया। 1970 के दशक के अंत तक ऐसे बेहतरीन निर्देशक हुए जिन्होंने उच्च गुणवत्ता की खूबसूरत फिल्में बनाईं जिसने बड़ी संख्या में दर्शकों की भीड़ भी जुटायी। इनमें से कुछ निर्देशकों में गोविंद निहलानी (अ)र् सत्य, आक्रोश), सईद मिर्जा (मोहन जोशी हाजिर हो, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है) सांई परांजपे (स्पर्श) मुजफ्फर अली (गमन), केतन मेहता (होली), और बिपलाव रॉय चौधरी (शोध) प्रमुख हैं।
आर्ट सिनेमा क्या है ?
इण्डियन न्यू वेव, आमतौर पर भारत में आर्ट सिनेमा या समानांतर सिनेमा के तौर पर जागा जाता है, मुख्यधारा के व्यावसायिक सिनेमा के विकल्प के तौर पर उदित हुआ। यह अपने गंभीर विषय-वस्तु, यथार्थवाद एवं प्रकृतिवाद के लिए जागा जाता है, और इसमें तात्कालिक समय की सम्बद्ध सामाजिक-राजनीतिक प्रकृति होती है। इसका प्रारंभ बंगाली फिल्म उद्योग में सत्यजीत रे, मृणाल सेन, रितविक घाटक और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों के साथ हुआ। लेकिन अन्य फिल्म उद्योग की तरह महत्व अडूर गोपालकृष्णन और गिरीश कसारवल्ली के समय में हासिल हुआ।
अभ्युदय
आर्ट सिनेमा की शुरुआत 1920 के दशक से मानी जा सकती है, विशेष रूप से वी. शांतराम की 1925 में बनी मूक फिल्म सावकारी पाश से, जिसमें एक गरीब कृषक के बारे में बताया गया है जो एक लालची महाजन के चलते अपनी जमीन खो देता है और एक शहर में मिल मजदूरी करने को बाध्य हो जाता है। इस फिल्म की इसके यथार्थवादी चित्रण के लिए बेहद प्रशंसा हुई। शांताराम की दुनिया ना माने (1937) ने भारतीय समाज में महिला के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की आलोचना की।
सत्यजीत रे, ऋत्विक घाटक, विमल रॉय, मृणाल सेन, ख्वाजा अहमद अब्बास, चेतन आनंद, गुरु दत्त एवं वी. शांताराम जैसे दिगदृष्टा ने 1940 के दशक से आगे आर्ट सिनेमा के आंदोलन को आगे बढ़ाया। उनकी फिल्मों की तकनीकी जादूगरी, सौंदर्यपरकता एवं सादगी और विषयक गरिमा के लिए भारत एवं विश्व में प्रशंसा की गई। रे की पाथेर पांचाली (1955), अपराजितो (1956) और वर्ल्ड ऑफ अप्पू (1959) को केन्स, बर्लिन एवं वेनिस फिल्म महोत्सव में बड़े पुरस्कार प्राप्त हुए।
चेतन आनंद की नीचा नगर (1946), एक सामाजिक फिल्म, ने कांस फिल्म महोत्सव में एक बड़ा पुरस्कार जीता। उसके बाद, 1950 और 1960 के दशक में, भारतीय फिल्में कांस फिल्म महोत्सव में बड़े पुरस्कार जीतने की होड़ में लग गईं।
आर्ट सिनेमा आंदोलन इटेलियन सिनेमा और फ्रांस के सिनेमा से प्रभावित हुआ, विशेष रूप से इटेलियन नवयथार्थवाद और फ्रांस के कवित्त यथार्थवाद द्वारा।
इस समय बनाई गई अधिकतर फिल्में राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित होती थीं ताकि भारतीय फिल्म बंधुता से प्रामाणिक कला वंश को प्रोत्साहित किया जा सके। 1960 के दशक में, भारत सरकार ने भारतीय विषयों पर आधारित स्वतंत्र आर्ट फिल्मों को वित्तीयन करना प्रारंभ कर दिया। अधिकतर निर्देशक भारतीय फिल्म एवं टेलीवजिन संस्थान के स्नातक थे। बंगाल फिल्म निर्देशक ऋत्विक घाटक ने नागरिक (1952) फिल्म बनाई।
1970 और 1980 के दशक में, आर्ट फिल्मों ने न केवल आलोचक का ध्यानाकर्षण किया अपितु आम लोगों को भी अपनी तरफ खींचना प्रारंभ किया। गुलजार, श्याम बेनेगल, सईद अख्तर मिर्जा, महेश भट्ट और गोविंद निहलानी इस समय के प्रमुख निर्देशक थे। फिल्म निर्माताओं ने अपने तरीके से यथार्थवाद को चित्रित करने का प्रयास किया, यद्यपि उनमें से अधिकतर लोकप्रिय सिनेमा
समानांतर सिनेमा
‘समानांतर सिनेमा’ का शब्द उन ऑफबीट फिल्मों के लिए किया गया जिनका निर्माण बॉलीवुड में हुआ। इसने एक अलग प्रकार की शैली ‘मुम्बईनोर’ को जन्म दिया, जो शहरी फिल्में थीं और मुम्बई शहर की सामाजिक समस्याओं को प्रतिबिम्बत करती थीं। ‘समानांतर सिनेमा’ में व्यावसायिक वॉलीवुड फिल्मों की तरह चमक-दमक नहीं होती। इसमें मणिरत्नम की दिल से (1998) और युवा (2004), नागेश कुक्कूनर की 3 दीवारें (2003) और डोर (2006), सुधीर मिश्रा की हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), जॉन बरुआ की मैंने गांधी को नहीं मारा (2005), पैन नलिन की वैली ऑफ फ्लावर्स (2006), नंदिता दास की फिराक (2008), ओनिर की माई ब्रदर-निखिल (2005) और बस एक पल (2006), अनुराग कश्यप की देव डी (2009), और गुलाल (2009), पीयूष झा की सिकंदर (2009) और विक्रमादित्य मोटवानी की उड़ान (2009) शामिल हैं। रेवती की मित्र, माई फ्रैंड (2002), अर्पणा सेन की मिस्टर एवं मिसेज अय्यर (2002) और 15 पार्क एवेन्यू (2006), अनंत बलानी की जाग्रर्स पार्क (2003) पीयूष झा की किंग ऑफ बॉलीवुड (2004), होमी अदजानिया की बीइंग साइरस (2006), रितुपर्णों घोष की द लास्ट लीयर (2007) और सूनी तारापोर बाला की लिटिल जीजो (2009) भी समानांतर सिनेमा के अंतग्रत आती हैं।

की कुछ प्रथाओं को अक्सर स्वीकार करते थे। नये अभिनेता आर्ट फिल्मों के परिदृश्य में सामने आए। इनमें शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, आमोल पालेकर, ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरमंदा और पंकज कपूर प्रमुख रूप से शामिल हैं। यहां तक कि व्यावसायिक सिनेमा के कुछ कलाकारों ने भी आर्ट सिनेमा में पदार्पण किया।
अडूर गोपालाकृष्णन ने अपनी फिल्म स्वयंवरम् (1972) के साथ भारतीय न्यू वेव को मलयालम सिनेमा तक विस्तारित किया। उनकी फिल्म एलीपथयम (1981) को लंदन फिल्म महोत्सव में सदरलैंड ट्रॉफी प्राप्त हुई, और मथिलुकल (1989) ने वेनिस फिल्म महोत्सव में बड़े पुरस्कार हासिल किए। जी. अरविंदन, पदम्राजन, जॉन अब्राहम, टी.वी. चंद्रन और शाजी एन करून मलयालम फिल्म उद्योग से इस समय के प्रमुख फिल्म-निर्माता थे। शाजी. एन करून प्रसिद्ध आर्ट फिल्म निर्देशक के तौर पर उदित हुए; उनकी प्रथम फिल्म पिरावी (1989) ने 1989 में कान्स फिल्म महोत्सव में ‘कैमरा डी’ ओर पुरस्कार प्राप्त किया। उनकी दूसरी फिल्म स्वाहम 1994 के कान्स फिल्म महोत्सव में पाम डी’ ओर पुरस्कार की दौड़ में थी। कन्नड़ फिल्म उद्योग में गिरीश कसारवल्ली, गिरीश कर्नाड और बी.वी. करंथ ने समानांतर सिनेमा का माग्र प्रशस्त किया। यही काम मणिरत्नम ने तमिल सिनेमा के लिए किया।
आर्ट सिनेमा की विषय-वस्तु को भारी मात्रा में तात्कालिक समय के भारतीय साहित्य से लिया गया। यह समयकालीन भारतीय समाज का एक प्रमुख अध्ययन रहा है, और इसलिए इसका प्रयोग शोधार्थियों एवं इतिहासकारों द्वारा भारतीय जनमानस की बदलती जनांकिकी एवं सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक प्रवृत्ति का मापन करने के लिए किया जाता है।
कुछ आर्ट फिल्मों ने व्यावसायिक सफलता भी अर्जित की। विमल रॉय की दो बीघा जमीन (1953) ने व्यावसायिक एवं आलोचनात्मक दोनों प्रकार की सफलता अर्जित की, और 1954 के कांस फिल्म महोत्सव में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीता। ऋर्षिकेश मुखर्जी को ‘मिडिल सिनेमा’ का अग्रदृष्टा माना जाता है और उन्हें मध्य-वग्र में बदलावों के चित्रण के लिए जागा गया। गुरुदत्त ने भी आर्ट सिनेमा के जरिए व्यावसायिक सफलता अर्जित की, प्यासा (1957) इसका उत्तम उदाहरण है।